Sunday, March 2, 2014

जनसंख्या विस्फोट और जल संकट - मीनाक्षी अरोड़ा

हमारे आस-पास के पेड़-पौधे और जीवजन्तु खत्म होते जा रहे हैं। दुनियां के विलुप्त प्राणियों की रेड-लिस्ट लगातार बढ़ती जा रही है। इन्सानी फितरत और प्राकृतिक संसाधनों के अन्धाधुंध दोहन ने हजारांे जीव प्रजातियों और पादप प्रजातियों को हमारे आस-पास से खत्म कर दिया है। औद्योगिक खेती और शहरी-ग्रामीण विकास में वनों के विनाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अकेले भारत में ही केवल 1336 पादप प्रजातियां असुरक्षित और संकट में मानी गई हैं। इन्टरनेशनल यूनियन फार कन्जर्वेशन आफ नेचर (आईयूसीएन) की रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती से 7291 जीव प्रजातियां इस समय विलुप्ति के कगार पर हैं। वनस्पतियों की 70 प्रतिशत प्रजातियों और पानी में रहने वाले जीवों की 37 फीसदी प्रजातियां और 1147 प्रकार की मछलियांे पर भी विलुप्ति का खतरा मड़रा रहा है। हम केवल चिन्ता और चिन्तन का नाटक कर रहे हैं। दूसरों के जीवन चक्र को समाप्त करके मनुष्य अपने जीवन चक्र को कब तक सुरक्षित रख पायेगा? ईश्वर के बनाये गये हर जीव का मनुष्य के जीवन चक्र में महत्व है। मनुष्य दूसरे जीवों के जीवन में जहर घोल कर अपने जीवन में अमृत कैसे पायेगा? वर्तमान समय में तीन रूझान ऐसे हें जो मानव जाति पर मडराते खतरे की ओर गंभीर संकेत कर रहे हैं। (1) मौसम सम्बन्धी आपदाओ में बढ़ोत्तरी। (2) पीने के साफ पानी की बढ़ती मांग। (3) मानव और पशु अंगों की काला बाजारी। धरती पर पिछली शताब्दी में पर्यावरण और मौसम सम्बन्धी तूफान, चक्रवात, भू-स्खलन, बाढ़, अत्यधिक तापमान, जंगलों की आग आदि बहुत सी प्राकृतिक आपदायें आयीं, यानी हम कह सकते हैं कि पृथ्वी अपने पर हुए अत्याचार के बदले में अपना गुस्सा प्रकट कर रही थी। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की बजह से कितने ही द्वीप देखते ही देखते काल के गाल में समा गये। बढ़ते तापमान से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नदियों में पानी नहीं है। दुर्भाग्य से कार्बन उत्सर्जन,,भूमि की विषाक्तता बढ़ने तथा जमीन और पानी के बढ़ते प्रदूषण के मामले में हम अब भी उतने सक्रिय नहीं हुए हैं, जितना होना चाहिए। सच तो यह है कि हम अभी तक समस्या की सही पहचान ही नहीं कर पाये हैं कि दुनियां अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सामुहिक इन्कार की स्थिति का सामना कर रही हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक बीस वर्ष में शुद्ध पेयजल की मांग दोगुनी रफ्तार से बढ़ रही है। पानी का दुरूपयोग रोकने और आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विश्वबैंक की अनुशंसा से एक फ्र्रान्सीसी कन्सल्टेंट कास्टेलियो को मुम्बई में जल सेवाओं का निजीकरण करने के उद्देश्य से सर्वेक्षण का ठेका दिया गया है, जिसने अपनी रिपोर्ट में कई सिफारिशें रखीं जिनमें बस्ती निवासियों के लिए प्रीपेड़ वाटर मीटर के लिए भी कहा गया है। अभी तक ब्राजील, अमेरिका, फिलीपीन, नामीविया, स्विटजरलैंड, तंजानियां, नाइजीरिया, ब्रिटेन और चीन देश हैं जहाँ प्रीपेड मीटर इस्तेमाल किये जा चुके हैं, लेकिन जहां कहीं भी यह मीटर लगाये गये वहां हैजा व अन्य बीमारियां फैल गईं। क्योंकि भुगतान न कर सकने की स्थिति में लोग असुरक्षित और गंदे स्रोतों से पानी लेने लगते हैं। यही स्थिति मुंबई में भी होगी? अमेरिका और ब्रिटेन ने लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर 90वे के दशक में ही प्रीपेड़ मीटर प्रणाली बंद कर दी थी। कुल मिलाकर पानी की बढ़ती मांग तथा उसकी अनिश्चित आपूर्ति समूची मानव प्रजाति को संकट में डा़लने जा रही है। आस्ट्रेलियन नेशनल यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर र्फैंकफैनर का तो यहां तक कहना है कि ‘‘जनसंख्या विस्फोट और प्राकृतिक संसाधनों के बेतहासा इस्तेमाल की बजह सें उत्पन्न होने वाले संकटों को यदि गंभीरता से नहीं लिया गया और उसके लिए आवश्यक सुधार न किये गये तो अगले सौ वर्षों में धरती से मनुष्यों का सफाया हो जायेगा।’’ ु