Sunday, March 2, 2014

जल क्रान्ति एक अनूठा प्रयास -

गुजरात में जलक्रान्ति ट्रस्ट पिछले 10 वर्षों से भी अधिक समय से राष्ट्र के समक्ष उपस्थित विविध समस्याओं के समाधान हेतु सामाजिक सहयोग व सहभागिता के आधार पर सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। ट्रस्ट के अनुसार आज प्रत्येक भारतवासी यदि अपने जीवन में निम्नांकित प्रगति के कदम अपनायें तो हमारी अनेक समस्याओं का निदान सम्भव है। 1. जलरक्षा - इस कदम को पूरा करने और प्रभावी परिणाम के लिए संस्था ने 1998 में पंचसूत्री कार्य योजना बनाई और फिर उसके अनुसार सफलता पूर्वक कार्य किया और उत्साह वर्धक परिणाम प्राप्त किये। वह पंचसूत्री योजना इस प्रकार है। (1) ग्राम संगठन, (2) सस्ती एवं टिकाऊ चेकडैम निर्माण तकनीक, (3) लोकचंदा, (4) श्रमदान, (5) चेकडैम या तालाब के लिए योग्य स्थल का चयन। ऽ योजना का प्रारम्भ - सर्वप्रथम जामका गांव, जिला-जूनागढ़ में कार्य प्रारम्भ किया, उस समय गावं का जल स्तर 500-700 फिट था, जिसके कारण वहाँ खेती छः महीने वर्षा आधारित जल पर ही सम्भव थी। अतः गांववासी स्वाभाविक रूप से छः महीने बेरोजगारी की त्रासदी झेलने के लिए बाध्य थे। परन्तु संस्था के कार्यकर्ताओं नें गांव के लोगों में जागरूकता पैदा करके, बिना एक भी पैसा सरकारी सहयोग के दुनियाँ में सबसे सस्ते चेकडैम व तालाबों के निर्माण कर के सामाजिक शक्ति की मिसाल कायम की। ऽ किये गये कार्य - चेकडैम - 41: खर्च 10 लाख रू॰ तालाब - 2 : खर्च 2 लाख रू॰ श्रमदान - : 21 हजार मानव दिन ऽ परिणाम - कृषि उत्पादन में 3 करोड़ रूपये की सालाना वृद्धि, कुओं में वर्ष भर पानी, बारह मास कृषि भूमि पर खेती होने से पूरे साल रोजगार तथा अकाल जैसी समस्या से मुक्ति। इसके अतिरिक्त गोवंश एवं अन्य पशुधन की रक्षा, पर्यावरण का संरक्षण, भूजल के स्तर में वृद्धि, परिणामतः बिजली की खपत में कमी और उस पर होने वाले अर्थ की बचत से गांव के जीवन स्तर में आशातीत परिवर्तन आया और वह स्वस्थ जीवन विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने लगे। ऽ कार्य का सामाजिक प्रभाव - उपरोक्त कार्य एवं उसके परिणामों को देख कर क्षेत्र के लोगों के मन में कार्य योजना के प्रति विश्वास व पे्ररणा पैदा हुई और परिणाम स्वरूप 50 हजार लोगों ने चेकडैम-तालाब बना कर जल-रक्षा का ऐतिहासिक संकल्प लिया और संस्था नें उनके संकल्प के बल पर 3000 चेकडैम-तालाबों का निर्माण तथा 2000 पुरानी खानों में जल संग्रहण का कार्य किया गया। ऽ कार्य के अन्य प्रभाव- (1) गुजरात सरकार ने जामका गांव चेकडैम योजना से प्रेरित होकर सरदार पटेल सहभागी जल-संचय योजना प्रारम्भ की। (2) संस्था ने पांच नई व सस्ती डिजाइन तैयार कीं। (3) केवल 5 हजार से लेकर 1 लाख रूपये में तालाबों में वर्षा जल संभरण संभव। (4) अनेक सूखी नदियां सजीव हो गईं। (5) जामका गांव में जन्मी चेकडैम योजना सम्पूर्ण भारत के साथ विश्व के 25 देशों में फैल गई। ऽ चेकडैम योजना से अन्य लाभ - (1) सबसे कम खर्च में जल समस्या का निदान। (2) प्रति एकड़ सबसे कम खर्च में सिचाई का पानी। (3) एक वर्ष में ही अपेक्षित परिणाम। (4) वर्षा के कारण आने वाली बाढ़ से मुक्ति और पर्यावरण युक्त आर्थिक समृद्धि का मार्ग खुला। (5) देश में सर्वाधिक रोजगार उत्पादक योजना। (6) गोवंश एवं जैवविविधता संरक्षण की योजना। (7) प्रत्येक गांव के लिए जल संरक्षण की स्वावलंबी व कामयाव योजना। 2. प्रकृति रक्षा - भारत भूमि पर लगभग 2.5 लाख जाति-प्रजाति की वनस्पितियों का भण्डार है। वनस्पतियों का इतना विराट वैविध्य मानव जाति की समृद्धि का मूलाधार है। देसी कुल वृक्ष, देसी फल वृक्ष, वन-औषधियां, सब्जी-अन्न-दलहन-तिलहन की असंख्य प्रजातियां भारत की अमूल्य प्राकृतिक विरासत हैं। इनसे भारत सुख-स्वास्थ्य एवं समृद्धि प्राप्त कर समस्त विश्व व्यापार हासिल कर सकता है। परन्तु दुर्भाग्य से इस ओर ध्यान न देने से अनेक दुर्लभ प्रजातियां समाप्त हो गई हैं। गुजरात में ही अकेले आम की ही 145 प्रजातियांँ लुप्त हो चुकी हैं, ऐसा हर एक वनस्पति के साथ हुआ है। अतः उन समस्त प्रजातियों को बचाना और उनका संवर्धन करना, आज की आवश्यकता ही नहीं तो राष्ट्र धर्म और समाजकर्म मान कर संस्था ने प्रकृति की इस अमूल्य विरासत को बचाने का संकल्प लिया। ऽ कार्य और परिणाम - संस्था ने 100 आम की प्रजातियों के पेड़ों के साथ ही अनेक वानस्पतिक, औषधीय एवं फलदार प्रजातियों के संरक्षण के अतिरिक्त देसी फल-अन्न-सब्जी-दलहन व तिलहन की लगभग 100 दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण व संवर्धन हेतु उनकी बुवाई तथा सामाजिक जागरूकता हेतु प्रशिक्षण एवं प्राकृतिक आहार-विहार, जीवन शैली पर कार्य हुआ है। संस्था अगले 10 वर्षों में 10 लाख देसी कुल के पेड़ों का रोपड़ व उनकी परवरिश करेगी। (3). गोरक्षा - गीर गाय हमारे आंगन में राष्ट्रीय योजना-गीर गाय भारत की सबसे अधिक दूध देने वाली शान्त व सुघर गाय है। स्वातन्त्र काल से पूर्व अकेले सौराष्ट्र में 10 से 12 लाख गीर गाय थी, जो 2003 तक घट कर केवल 5000 रह गई। संस्था ने 2000 गावों में गोवंश विनाश के कारणों की खोज की तो ज्ञात हुआ कि - (1) भारत के लोगों को देसी गाय के दूध, घी एवं अन्य उत्पादों के शिक्षण का अभाव, (2) गोसंवर्धन की अक्षमता, (3) जल समस्या, (4) गाय का वर्ण संकरण, (5) गोचर का अभाव, (6) खेती में ट्रैक्टरों पर निर्भरता, (7) दिशा विहीन गो सेवा। ऽ कार्य योजना - उपरोक्त अध्ययन के बाद (1) आंगन में उत्तम नस्ल की गाय, (2) गांव में उत्तम नस्ल का नन्दी, (3) गाय आधारित सामाजिक विकास, (4) गाय आधारित कृषि, (5) जल समस्या मुक्त गांव, (6) अकाल में गो प्रबन्धन, (7) गाय के दूध-धी की शुद्धता हमारा गो-धर्म, (8) गाय का वर्णसंकरण निषेध, (9) बांगर सांड़ मुक्त गांव, (10) गोबर का सदुपयोग, (11) गाय उत्पाद आधारित उद्योग, (12) प्रत्येक गांव में गोरक्षा संस्था, (13) लोगों को गाय एवं प्रकृति की शिक्षा जैसे विषयों के आधार पर कार्य प्रारम्भ किया गया। ऽ गीर गाय हमारे आंगन में राष्ट्रीय योजना का प्रारम्भ - एक फरवरी, 2004 को जामका गांव में 15000 लोगों द्वारा गीर गाय रक्षा का संकल्प लेकर गो क्रान्ति का बिगुल बजा। दिनांक 5 नवम्बर, 2004 के दिन 500 गांव के लागों ने गिरनार पर्वत की परिक्रमा की तथा 10 लाख गीर गाय तैयार करने का संकल्प लिया। ऽ परिणाम - गीर गाय का मूल्य 50 हजार रू॰ हो गया। गाय का दूध 21रू॰ प्रति लीटर व घी 400-500रू॰ प्रति किलो में लेकर लोग खाने लगे। पहले जिन गावों के परिवारों में 100 ग्राम दूध प्रति व्यक्ति उपलब्ध नहीं था, अब उन परिवारों में आधा लीटर से एक लीटर तक दूध-घी प्रति व्यक्ति आहार में लेने लगे। राज्य के 2000 गावों एवं अन्य 12 राज्यों में गीर गाय योजना का अमल होने लगा। गीर गाय को राष्ट्रीय सम्मान मिला तथा गो-संस्कृति का विकास हुआ। ु