जब-जब
कविता पढ़ता हूँ,
तब-तब
धरती से जुड़ता हूँ।
जब-जब
पेड़ों से मिलता हूँ,
तब-तब
अपनी जड़ों को
पहचानता हूँ।
जब-जब
नदी से बात करता हूँ,
तब-तब
अपने भीतर
लहराते सागर में
बिखरे मोती पाता हूँ।
जब-जब
बच्चों से मिलता हूँ,
तब-तब
अपने बचपन से मिलता हूँ।
जब-जब
‘मां’ तुम से मिलता हूँ,
तब-तब
विश्व का श्रेष्ठतम
महाकाव्य पढ़ता हूँ
और अपने भीतर
अपने आप बजने लगता हूँ।
- केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, हैदराबाद केन्द्र-500007
कविता पढ़ता हूँ,
तब-तब
धरती से जुड़ता हूँ।
जब-जब
पेड़ों से मिलता हूँ,
तब-तब
अपनी जड़ों को
पहचानता हूँ।
जब-जब
नदी से बात करता हूँ,
तब-तब
अपने भीतर
लहराते सागर में
बिखरे मोती पाता हूँ।
जब-जब
बच्चों से मिलता हूँ,
तब-तब
अपने बचपन से मिलता हूँ।
जब-जब
‘मां’ तुम से मिलता हूँ,
तब-तब
विश्व का श्रेष्ठतम
महाकाव्य पढ़ता हूँ
और अपने भीतर
अपने आप बजने लगता हूँ।
- केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, हैदराबाद केन्द्र-500007





