Monday, March 24, 2014

विश्व शान्ति हेतु ’जल जन जोड़ो’ -राजेन्द्र सिंह, जल पुरूष

समुदायों के जलाधिकार छिनने के कारण तथा राजनेताओं के वोट के बदले पानी देने के आश्वासन ने समाज को बेपानी बना दिया। जहाँ का समाज राजनेताओं के आश्वासन में नहीं फंसा तथा ’अपना हाथ जगन्नाथ’ मानकर बादल से निकली हर जल बूँद को अपना जीवन मानकर सहेजने लगा तो, फिर उसके हाथ में पानी आ गया। अनुशासित होकर उपयोग करने लगा। वह समुदाय आज 21 वीं शताब्दी के दूसरे दशक में पानीदार बन गया है।
भारत पानीदार राष्ट्र था। सभी को सब जगह जीने और जल पीने तथा जरूरतें पूरी करने का स्वंतत्र अवसर प्राप्त था। जब भी हम नदी या बादल से जल लेते थे तो उनको सम्मान करने के लिए नदी को ’मां’ और बादल को ’देवता’ कहते थे। हमारे प्रकृतिमय जीवन को अंग्रेजीयत ने बदला। हमारी जनसंख्या बढी, सुख सुविधाऐं, पानी का भोग और लालच बढ़ा। हम लालची बनकर दूसरों पर निर्भर रहने के आदी हो गए और यदि हम शक्तिशाली है तो पानी का अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण करने वाले बन गए हैं। पूरे राष्ट्र में ऐसे भी बहुत सारे समुदाय हैं जिन्होंने ’सूर्य देवता’ को जल देने और लेने वाला मानकर उसके काम में मदद की और जब भी सूर्य देवता समुद्र के खारे पानी का वाष्पीकरण करके बादल बनाकर जल देता तो उसे समुदाय अपना जीवन मानकर फिर उस सूर्य देवता की नजरों से बचाने के लिए धरती के पेट में रख देते। जब कभी ’प्रकृति क्रोध’ हुआ और वर्षा नहीं हुई तो धरती के पेट से पानी निकालकर अपने प्राण बचा लेते थे।
राजस्थान के हजारों समुदायों ने बादलांे की बूदों को पकड़कर सूरज की नजरों से बचाकर अपना जीवन चलाया तथा इसी विधि से सात नदियों अरवरी, रूपारेल, सरसा, साबी, महेश्वरा, भगाणी और जहाजवाली को पुनर्जीवित करके शुद्व सदानीरा बना दिया।
उक्त अनुभव का पूरे देश को अहसास कराने और वैसा काम करने के लिए विश्वास बनाकर काम का आभास देने के लिए ’जल जन जोड़ो अभियान’ शुरू करने का निर्णय तरूण भारत संघ, भीकमपुरा, राजस्थान में हुआ। उसके बाद दिल्ली से 18-19 अप्रैल 2013 को विधिवत शुरूआत हुई।
समुद्र किनारे, कन्नूर से शुरू होकर अभी तक केरल, तमिलनाडू, पांडीचेरी, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखण्ड़, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में दिनाँक 20 अप्रैल से 6 मई 2013 तक इस अभियान की पूर्व तैयारी, बैठकंे और कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इसके साथ ’जल जन जोड़ो अभियान’ का पहला कदम पूर्ण हुआ। अब इसे आगे देश भर में स्थानीय समुदाय ही चलायेंगे। परन्तु इस समय उŸाराखण्ड में आई आपदा में फंसे लोगों के तत्काल बचाव तथा उसके बाद आपदा के कराण व निवारण पर विचार करने की आवश्यकता है।
ऽ बसाने और बचाने की जरूरत -‘देवभूमि’ भारतीय समाज में सबसे अधिक सम्माननीय है। उसी सम्मान को एक बार फिर से बनाने और बचाने की जरूरत है। उŸाराखण्ड को राष्ट्रीय शुभ् की चाह बनानी होगी। ऐसा होगा तो हिमालय को बुखार नहीं चढ़ेगा, आपदा नही आयेगी। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि सरकार के साथ ही समाज जाग्रत हो।
सरकार को तीर्थ और पर्यटन में भेद कर हिमालय प्रबन्धन करना चाहिए। तीर्थ यात्री सरकार से ज्यादा सुुविधा नहीं चाहता, उन्हें सम्मान और संरक्षण चाहिए। तीर्थ यात्रियों को सुविधा देने के नाम पर हिमालय की हरियाली कतई नष्ट नहीं की जानी चाहिए। हिमालय की हरियाली राष्ट्रीय शुभ् है।
आपदा में बहुत नुकसान हुआ है। ऐसे में आध्यात्मिक सुख, सन्तोष, समृद्धि देने वाले हिमालय को सम्मानजनक स्वरूप में पुनः खड़ा करने के लिए, पूरे देश का दायित्व बनता है। इसके साथ ही उŸाराखण्ड के पुनर्निमाण में कुछ एहतियात जरूरी हैं -
 नदियों की भूमि को संरक्षित घोषित करें व इस भूमि में परिवर्तन का अधिकार किसी भी पंचायत, नगर पालिका व राज्य सरकार को न हो तथा नदी किनारे बसावट पर रोक लगे।
 संवेदनशील जगहों की पहचान हो और नदी घाटियों में 200 मी॰ तक हरी पट्टी स्थापित किया जाना सुनिश्चित हो।
 नदियों के उद्गम से 50-100 किमी तक के क्षेत्र को इकोसेन्सटिव घोषित किया जाय।
पहाड़ों पर सड़क बनाने के बाद मलबा नदी व गदेरे में न छोड़ा जाय।
हमल आधारित बिजली परियोजनाओं व बड़े बांँधों की नीति बदलने की जरूरत है।
आर्थिक मदद का उपयोग प्रकृति के संरक्षण, प्रभावितों के पुनर्वास व युवाओं को रोजगार प्रदान करने में हो। 
लेखक मैगसेसे पुरस्कृत, व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् हैं।