Tuesday, March 25, 2014

‘नगाधिराज’ क्यों हैं ‘नाराज’!!

राज्य निर्माण के बाद से ही उत्तराखण्ड के राजनैतिक तबके में विकास माडल के दृष्टिकोण का सर्वथा अभाव और स्वार्थप्रेरित विकास की अंधी होड़ ही है इस आपदा की मुख्य जनक-
देवभूमि उत्तराखण्ड में चार धाम यात्रा को प्रारम्भ हुए अभी एक माह भी नहीं बीता कि बरसात की पहली दस्तक ने भीषण तबाही का रूप धारण कर लिया और एक साथ नगाधिराज हिमालय की केदारनाथ, बद्रीनाथ और गंगोत्री घाटियों में तबाही का वज्रपात हुआ, साथ ही यमुनोत्री से काली नदी तक भीषण आपदा का रूप देखने में सामने आया। आपदाओं के दर्ज इतिहास में पहली बार चार धाम यात्रा के गंगा-क्षेत्र में इतनी बड़ी विनाशलीला को दुनियाँ ने देखा। विगत वर्षों से देखने में आ रहा है कि गंगा के क्षेत्र में लगातार बादल फटने, भूस्खलन, भू-धंसाव की घटनाएं बढ़ती जा रही थी। 2010 के बरसात में आई बाढ़, 2011 में भारी भूस्खलन और नुकसान के बाद पिछले वर्ष 2012 में तो बादल फटने से आई बाढ़ में गंगोत्री घाटी में असी गंगा और केदारघाटी के उखीमठ में भारी तबाही के साथ ही कई जाने गई और इस प्रकार विगत वर्ष से ही पहाड़वासी में एक असुरक्षा और भय की भावना घर करने लगी थी। वर्ष 2006 से लगातार गंगा व हिमालय संरक्षण का प्रश्न गहराता रहा, गंगोत्री घाटी में बांधों के निर्माण के चलते सुरंग खुदान, विस्फोटों जैसी गतिविधियाँ व गंगा को रोके जाने का विरोध जोर पकड़ा व 2008 में राज्य को अपनी दों बाँध परियोजनाएं पाला-मनेरी व भैरोंघाटी बंद करनी पड़ी, इसके बाद केन्द्र में गंगा प्राधिकरण व पर्यावरण मंत्रालय ने गंभीर संज्ञान लेते हुए 600 करोड़ खर्च हो जाने के बावजूद लोहारीनाग-पाला बाँध परियोजना को भी 2010 में निरस्त कर दिया व गंगोत्री घाटी को इको-सेंसिटिव जोन बनाने की एक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक पहल की। बावजूद इसके यहाँ राजनीतिक सूबा नहीं चेता और संस्कृतिक-पर्यावरणीय सरकारों को सिरे से नजरअंदाज कर बड़ी-बड़ी कम्पनियों को उत्तराखण्ड का दामाद बना उन्हें गंगा व हिमालय के संवेदनशील क्षेत्र सौंप कर अधाधुंध विकास की होड़ में अपना निजी स्वार्थ साधता रहा।
हिमालय अभी कच्चा पहाड़ है, भूकम्प एवं भूस्खलन के प्रति अत्यन्त संवेदनशील जोन है, जलश्रोतों एवं नदियों से भरपूर है, दिव्य वन एवं औषधियों का भण्डार है, साथ ही सदियों से ऋषि-मुनियों एवं अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों की साधनास्थली रही है। यह सब विशेषता ही गंगा के इस क्षेत्र को अत्यन्त पवित्र एवं आस्था का केन्द्र बनाती है, किन्तु पिछले कुछ समय से पर्यावरण एवं संस्कृति की कीमत पर विकास करने वाले तथाकथित विकासवादी राज्य के मुखिया का स्वर इतना कटु हो चुका था कि उनके कई वक्तव्य अखबारांे की सुर्खियों में देखे जा सकते हैं, जैसे .........पर्यावरण को विकास के आड़े नहीं आने देंगे............. आस्था को विकास में बाधा नहीं बनने देंगे........आदि। यहाॅं तक कि गंगा हिमालय की रक्षा हेतु आवाज उठाने वाले जनों को उत्तराखण्ड से बाहर का पता, राज्य के भीतर टकराहट और अराजकता का वातावरण पैदा करवा यहाॅं की शांत संस्कृति को भी कलंकित करने का कार्य वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हुआ है। जिसका ज्वलंत उदाहरण विगत माह चार-धाम यात्रा प्रारंभ के दिन अक्षय-तृतीया को जब हम धारी देवी मंदिर में दुर्गा-सप्तशती पाठ कर रहें थे, तो षड़यन्त्र पूर्वक प्रशासन की नाक के नीचे दिन-दहाड़े शराब पीकर मंदिर परिसर में घुस आये बाध कंपनी के गुण्डों से उत्पाद करवाकर हमारा पाठ भंग करवाया गया, अभद्रता के साथ ही जान से मारने की नियत से हमले भी हम पर हुए, जिसके विरूद्व दर्ज हमारी एफ.आई.आर. के बावजूद राजनीतिक शह के चलते अभी तक ये आरोपी खुले घूम रहे हैं। इस व्यवसायिक खिलवाड़ द्वारा अपमानित व तिरस्कृत होती हमारी संस्कृति के प्रतीक के रूप में पीडि़त की जा रही धारी माॅं के स्थान को खण्डित करते ही जैसे केदार शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया हो। राज्य के झूठे विकास की पैरवी करते यहा के मुखिया और राजनेता राज्य से बाहर के गंगा प्रेमियों को यहा का विकास रोकने हेतु दोषी ठहराते रहे हैं। शायद इसी आस्था के अनादर का ही एक रूप यह भी है कि आज प्रकृति उन्हीं राजनेताओं को राज्य के बाहर से आये श्रद्धालुओं की रक्षा-सुरक्षा और त्रासदी के भार की कठिन जिम्मेदारी का अनुभव भी करवा रही है।
यदि पिछले वर्षों की त्रासदियों पर नजर डालें तो टिहरी बाध सहित, मनेरी भाली, कोटेश्वर और विष्णुप्रयाग बांधों के बनने के बाद से ही इन बांधों के प्रभाव में आने वाले उत्तरकाशी से लेकर रूद्रप्रयाग और चमोली जिले तक के क्षेत्र में भीषण भूस्खलन, भूधंसाव, बादल फटने जैसी घटनाओं ने सर्वाधिक तबाही मचाई है। यही वह क्षेत्र भी है जहाँ गंगा-भागीरथी सहित अलकनंदा और मंदाकिनी पर दर्जनों बाध परियोंजनाएं प्रस्तावित है तथा कई बांध परियोजनाओं जैसे श्रीनगर, सिंगोली-भटवाडी, फाटा-ब्युंग, विष्णुगाड-पीपलकोटी, तपोवन-विष्णुगाड आदि इसी क्षेत्र में निर्माणाधीन हैं। टिहरी बांध का विशालकाय जलाशय, सुरंगों में डाली जा रही गंगा की धाराएं, बेतरतीब सड़कों और भवनों को निर्माण, अवैध वन कटान, खनन आदि हिमालय के पर्यावरण को दुष्प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन इन सबको नजरंअदाज कर सुरंग और जलाशय युक्त बाँधों के निर्माण की होड़ मची है जिसके चलते उत्तराखण्ड के गंगा क्षेत्र में निर्मम वन कटान, विस्फोटों, सुरंगों के खुदान और भारी भरकम निर्माण व मशीनी गतिबिधियां संवेदनशील पारिस्थितिकीय तंत्र पर निश्चित रूप से गंभीर दुष्प्रभाव उत्पन्न कर रही हैं। इन क्षेत्रों में जहाॅं पानी के प्राकृतिक श्रोत व झरनों को सुखाती जा रही हैं वहीं भूस्खलन, भूधंसाव के साथ ही बादल फटने से आई बाढ़ का रूप लेकर भीषण तबाही का पर्याय भी ये मानवीय गतिविधियांँ बनती जा रही हैं।
यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि यह वही क्षेत्र है जहां टिहरी और मनेरी बांध निर्माण के नक्शे में आने के समय से ही 1978 में आई उत्तरकाशी की विनाशकारी बाढ़ के रूप में प्रकृति ने यह स्पष्ट संकेत किया। इसके बाद से ही जगह-जगह भूस्खलन, 1991 में उत्तरकाशी व 1998 में चमोली के विनाशकारी भूकंप, 2003 में वरूणावत त्रासद और हालिया वर्षों में तो उत्तरकाशी के भटवाडी, टिहरी में कोटेश्वर से लगे गावों जोशीमठ के चाई गाँव सहित कई कस्बों के जमींजोद हो जाने के साथ ही बादल फटने की घटनाओं ने व्यापक और विनाशकारी रूप गंगा के इस क्षेत्र में ले लिया है। जिन्होंने भी गंगा के इस क्षेत्र का निरीक्षण किया है वे यह जानते हैं कि सम्पूर्ण क्षेत्र में भारी तादात में वनों का कटान हुआ है, सुरंगों के खुदान और विस्फोटों के दुश्प्रभाव से जल-श्रोत सूख गये हैं, चारा-चुगान और वनस्पतियों का नाश और स्थानीय संस्कृति एवं परम्पराओं को गंभीर रूप से क्षति पहुंची है। कई किलोमीटर तक गंगा, अलकनंदा की धाराएं बांधों की सुरंगों और जलाशयों में बांधे जाने के कारण सूख गयी हैं, वर्षा काल को छोड़कर अन्य समय तो वहाॅं इतना पानी भी उपलब्ध नहीं रहता कि लोग आचमन ले सकें, मृतकों के अंतिम संस्कार हेतु जल के लिए भी ग्रामीणों को बाॅंध कंपनियों से जल छोड़ने की गुहार लगानी पड़ती है और अब 70 बाॅध केवल गंगा के इसी क्षेत्र में गंगा-भागीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी पर लादे जाने की तैयारियां चल रही है। विगत वर्षों से गंगा-हिमालय संरक्षण हेतु चल रहे आन्दोलन और इन बांधों के प्रबल वैचारिक और सैद्धंातिक विराध के उपरान्त भी राज्य के सभी प्रमुख राजनीतिक दल बांधों के निर्माण की पुरजोर पैरवी करते रहे हैं। वर्तमान राज्य सरकार के मुखिया को तो इस कदर विकास की काली पट्टी बाॅंध अधे हो चुके हैं कि उन्हें बाधों के निर्माण के सिवाय राज्य के विकास का और कोई रास्ता ही नही सूझता, तभी तो वे न केवल दल-बल के साथ गंगोत्री घाटी को इको जोन बनाये जाने की अधिसूचना के विरूद्ध अपने ही दल के प्रधानमंत्री के पास शिकायत लेकर पहुँच जाते हैं वरन बांधों के निर्माण को पहाड़ के विकास के लिए अति आवश्यक बताते हुए केन्द्र द्वारा निरस्त की गयी गंगोत्री घाटी की बाध परियोजनाओं को पुनःचालू करवाने की भी निर्लज्जता पूर्वक पैरवी भी करते हैं।
वास्तव में उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद से यहा के राजनीतिक तबके के अधिकांश लोग यहाॅं की संस्कृति से जुड़े दिव्य पर्यावरण और संसाधनों को केवल अपने राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति का पर्याय मात्र देखते रहे हैं। इस क्षेत्र सहित सारे राज्य की प्रतिष्ठा के रूप में विश्व में चार धाम यात्रा को देखा जाता है, लाखों लोगों का रोजगार एवं राज्य की आय का महत्वपूर्ण अंश भी इससे जुड़ा है। देश-विदेश के करोड़ों जनों को यह यात्रा संस्कृति के एक सूत्र में पिरोती आई है, किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से चार-धाम यात्रा सहित पर्वतीय क्षेत्र के अनुकूल विकास के माडल का सर्वथा अभाव हमारे राजनीतिक दृष्टिकोण में पाया जाता है और राज्य निर्माण के बाद से किसी भी राजनीतिक दल अथवा नेता ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई। इसीलिए बेतरतीब सड़कों का निर्माण, अवैध वनों का कटान, खनन, अतिक्रमण आदि में भी राज्य निर्माण के बाद चिंताजनक बढ़ोत्तरी होती रही, देव भूमि की संस्कृति एवं पर्यावरण के प्रति अनादर एवं संवेदनहीनता का ही परिणाम था कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से पूर्व ही विवादास्पद श्रीनगर बाँध परियोजना के मार्ग में रोड़ा बन रही माँ धारी देवी सिद्ध पीठ को 16 जून, 2013 की शाम को खंडित कर प्रतिमा को विस्थापित कर दिया, एवं केदारनाथ के इस रौद्र तांडव का समय भी संयोगवश उसी शाम से प्रारम्भ हुआ।
यहाँ की संस्कृति एवं पर्यावरण को मद्देनजर रखते हुए जहाँ देव-भूमि के अनुकूल विकास नीति का निर्माण होना चाहिए, उसके विपरीत यहाँ की सरकारंे और राजनेता संस्कृति और पर्यावरण की कीमत पर बनाए जा रहे बांधों को ही एक मात्र विकास का रोजगार का साधन देखती हैं। वर्तमान आपदा इसी खोखली और विनाशकारी सोच के साथ गंगा-हिमालय से किये जा रहे व्यावसायिक खिलवाड़ का दुष्परिणाम है। इसी व्यावसायिक नजरिये से प्रेरित नदी तटों के किनारे निर्मित भवन, सड़के, रिर्सोट आदि ने तबाही को और अधिक बढ़ा दिया, जिसके मुख्य दोषी के रूप में इस क्षेत्र की नीति निर्धारक सरकारें, योजना आयोग व राजनेता हैं, जो देव-भूमि उत्तराखण्ड के मूल स्वरूप और संस्कृति को बदलकर इसे बाँध-भूमि (ऊर्जा-प्रदेश) बनाने पर अमादा है। वैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो, यहाँ के पर्यावरण, संस्कृति एवं सामाजिक ताने-बाने के महत्व के प्रति उदासीन व संवेदनहीन हुए लोग देव-भूमि का डी॰एन॰ए॰ परिवर्तन कर इसे बाँध-भूमि बनाने को विकास समझ रहे हैं। वास्तव में मानव द्वारा प्रकृति के साथ मोल लिए द्वन्द का परिणाम इस भीषण तबाही के रूप में नजर आ रहा है।
हमारे नीति-निर्धारको को समझना होगा कि यदि भारत-भूमि की संस्कृति व आस्था के प्रतीक ‘गंगा-हिमालय’ के साथ आदर पूर्वक व्यवहार किया जाता, बांधों में बाँधने का खिलवाड़ न किया होता, नदियों के किनारे इस प्रकार व्यावसायिक अतिक्रमण का शिखर न होते, यात्रा के स्वरूप को पर्यटन के बजाय तीर्थाटन के रूप में विकसित किया जाता तो कदाचित नगाधिराज यों नाराज न होते।