Saturday, March 8, 2014

गौ आधारित शून्य लागत, आध्यात्मिक खेती - लोक भारती प्रतिनिधि

सुभाष पालेकर सतत साधना का नाम है। प्रारम्भिक जीवन से ही आध्यात्म के साथ सामाजिक भाव होने के कारण वह प्रायः विनोवा जी से मिलने जाया करते थे। अतः कृषि विज्ञान से स्नातक करने के बाद एक दिन जब वह विनोवा जी से मिलने गये, तो विनोवा जी ने पूछा, अब पढ़ाई के बाद क्या करना? पालेकर जी ने सहज, स्वाभाविक उत्तर दिया ‘नौकरी’। पर! इस उत्तर के बाद विनोवा जी ने पालेकर जी को नौकरी न करने की प्रेरणा दी। इसके बाद नौकरी का विचार त्याग कर पालेकर जी अपने घर पर खेती के कार्य में लग गये, जहांँ उनके पिताजी जी परम्परागत ढ़ंग से खेती करते थे। परन्तु पालेकर जी ने आधुनिक कृषि विज्ञान पढ़ा था, अतः पिता जी के मना करने के बाद भी आधुनिक विधि से ही खेती करना प्रारम्भ कर दिया। प्रारम्भ में तो खेती में फसल बहुत अच्छी हुई, उत्पादन भी बढ़ा, लेकिन 80 का दशक पूरा होते-होते उत्पादन घटने लगा। पालेकर जी को चिन्ता होने लगी, यदि आधुनिक विधि ठीक है, तो सभी प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी उत्पादन में कमी क्यों? समाधान के लिए अपने कृषि महाविद्यालय के प्रचार्य जी से सम्पर्क किया, और उनसे उत्पादन में आ रही कमी के विषय में पूछा, तो उनका एक ही उŸार था, ‘‘इनपुट बढ़ाओ’’। इससे पालेकर जी का समाधान नहीं हुआ।
विद्यार्थी जीवन में वह एक बार एक प्रोजेक्ट ‘‘वनवासी जीवन पर प्रकृति का प्रभाव’’ के अध्ययन हेतु वनवासी क्षेत्र में गये थे, उसकी स्मृति से प्रश्न के समाधान की एक किरण दिखाई दी। इसलिए वह फिर से जगलों में गये और देखा, वहांँ सैकड़ो साल से बड़े-बड़े पेड़ खड़े हैं, उन्हें कोई रासायनिक या कम्पोस्ट खाद नहीं देता, न कोई बीमारी से बचाने के लिए किसी कीटनाशी का छिड़काव करता है, फिर भी उनकी उत्पादकता में कोई कमी नहीं। इससे वह इस निष्कर्ष पर पहुँंचे कि धरती अन्नपूर्णा है और इसमें पोषणता बनी रहे, इसकी व्यवस्था प्रकृति करती रहती है, बशर्ते हम उसमें बाधक न बनें। इसी सिद्धान्त के आधार पर उन्होनें अपने कृषि कार्य को आगे बढ़ाया और उसके लिए उन्होने आध्यात्मिक आधार पर सतत् रूप से आवश्यक अध्ययन व शोध किए तथा उन्हें विज्ञान की कसौटी पर सिद्ध करते हुए ‘‘गौ आधारित, शून्य लागत, आध्यात्मिक खेती’’ का सूत्रपात किया।
भारतीय मानस की आध्यात्मिक धारणा है, कि धरती हमारी मांँ है और वह अन्नपूर्णा है। ईश्वर ने जिसे भी पैदा किया है, उसके पैदा होने से पहले ही उसके पोषण की व्यवस्था भी की है, जो उसके पास ही होती है। जो चीज जहांँ से आई है, वह लौट कर वहीं जायेगी। प्रकृति व्यवस्था में तीन शक्तियांँ निरन्तर कार्य करती रहती हैं, एक - गुरूत्वाकर्षण शक्ति, दो-केषाकर्षण शक्ति, तीन-नियामक शक्ति।
उन्होने सबसे पहले वैज्ञानिकता के आधार पर खोजना प्रारम्भ किया कि क्या धरती अन्नपूर्णा है? तो उन्होने पाया कि, 1924 में डा॰ क्लार्क व डा॰ वाशिंगटन भारत में वर्मासेल (तेल कम्पनी) द्वारा अध्ययन करने आये, कि यहांँ धरती में कितनी गहराई तक कौन-कौन से तत्व, कितनी मात्रा में हैं। इसके लिए उन्हें प्रति 6-6 इन्च के नमूने लेकर 100 फिट गहराई तक का प्रयोगशाला परीक्षण करना था। उनके परीक्षण और अध्ययन का निष्कर्ष था, ‘‘धरती की जितनी गहराई में जायेंगे, उतनी मात्रा में सूक्ष्म तत्व बढ़ते जायेंगे। अर्थात हमारी धरती माँ सूक्ष्म तत्वों का महासागर और अन्नपूर्णा है।
दूसरा प्रश्न था, जब धरती अन्नपूर्णा है और सूक्ष्म तत्वों का अनन्त महासागर है, तब खेत में सूक्ष्म तत्वों की कमी क्यों हो जाती है तथा प्रकृति ने उन्हें पूरा करने की क्या व्यवस्था बनाई है? उन्हांेने अध्ययन और अभ्यास से पाया कि प्रकृति ने भूमि को सदासर्वदा अन्नपूर्णा बनाये रखने के लिए दे महत्वपूर्ण व्यवस्थायें की हुई हैं, ‘‘एक-केंचुवा और दूसरे- सूक्ष्म जीवाणु’’। परन्तु आधुनिक व तथाकथित वैज्ञानिक कृषि पद्यति ने रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग द्वारा प्रकृति की दोनो व्यवस्थाओं को गम्भीर आघात पहुँचाया, जिससे खेत में सू़क्ष्म जीवाणुओं के साथ ही केंचुवे भी धरती की गहारई में समाधिस्थ होकर कार्यविरत हो गये हैं। अतः कृषि की उत्पादकता बनाये रखने के लिए हमें पुनः केंचुवों व सूक्ष्म जीवाणुओं को जानने व उनकी कार्यपद्धति को समझना आवश्यक है।
केचुवा क्या है व वह कैसे कार्य करता है?- केंचुवा को अंगे्रजी में अर्थवर्म कहते हैं, जिसका अर्थ होता है, मिट्टी खाने वाला जीवाणु। यह कार्य भारतीय केंचुवा ही करता है, जो शून्य डिग्री तापमान से लेकर 48 डिग्री तापमान तक कार्य करता है, इसकी आयु सामान्यावस्था में 15 वर्ष है। भारतीय केंचुवा मिट्टी, बालू, कच्चा पत्थर व चूना पत्थर खाता हुआ धरती के नीचे से ऊपर तथा ऊपर से नीचे निरन्तर अनन्त छिद्र करता हुआ गतिमान रहता है। धरती के नीचे से वह ऊपर की और खाता और छिद्र बनाता हुआ आता है तथा फसल की जड़ के पास धरती के ऊपर अपनी विष्टा छोड़ता है, जिसमें फसल के लिए आवश्यक सूक्ष्म तत्वों का अनन्त भण्डार होता है, जिससे खेत में कम हुए सूक्ष्म तत्वों की निरन्तर पूर्ति होती रहती है। केंचुवे की विष्टा में सूक्ष्म तत्वों की मात्रा इस प्रकार है- मिट्टी से 7 गुना नाइट्रोजन, 9 गुना फास्फेट, 11 गुना पोटाश, 6 गुन कैल्शियम, 8 गुना मेगनीशियम, 10 गुना सल्फर के अतिरिक्त अन्य सभी सूक्ष्म तत्व भी कई गुना मात्रा में पाये जाते हैं।
परन्तु जो प्राणी देखने में केंचुवा (आईसिनोफेटिडा) जैसा है, पर मिट्टी नहीं खाता वह केंचुवा नहीं है।  जिसका प्रयोग वर्मी कम्पोस्ट में किया जाता है, जो गोबर व अन्य सड़ने-गलने वाले पदार्थ खाकर वर्मीकम्पोस्ट बनाते हैं, जिसमें खाये हुए अपशिष्ट पदार्थों में उपस्थित हैवी मैट्ल्स एकत्र होते है, जो हानिकारक हैं। अतः वह प्राणी वास्तव में ‘वायो मानीटर’ है, जो यह वताता है कि किस फसल में कौन-कौन से अपशिष्ट, कितनी मात्रा में हैं। भारतीय केंचुवें का कार्य कृषि के लिए अत्यन्त महत्वपूण है, परन्तु उस कार्य के लिए केचुवों को धरती के अन्दर व बाहर सूक्ष्म पर्यावरण की आवश्यकता होती है।
सूक्ष्म पर्यावरण (माइक्रो क्लाइमेट) - भूमि की सतह के ऊपर फसल के मध्य जिस हवा का संचरण होता है, उसका तापमान 25 से 32 डिग्री के मध्य होना चाहिए और उस हवा में नमी की मात्रा 65 से 72 प्रतिशत तक होनी चाहिए। इसके साथ ही भूमि के अन्दर अंधेरा व वाफसा तथा भूमि के ऊपर काष्ठ आच्छादन होना चाहिए। इस एकात्मिक स्थिति को सूक्ष्म पर्यावरण कहते हैं।
वाफसा - भूमि के अन्दर मिट्टी के दो कण समूहों के बीच में जो खाली जगह होती है, उसमें पानी बिल्कुल नहीं चाहिए, बल्कि उसमें 50 प्रतिशत हवा और 50 प्रतिशत वाष्प का समिश्रण चाहिए। पौधों की जड़ें पानी नहीं, वाफसा को ही ग्रहण करती हैं।
काष्ठ आच्छादन -  जब भू-माता के ऊपर काष्ठ आच्छादन कर ‘साड़ी’ पहनाते हैं, तो सूक्ष्म पर्यावरण अपने आप निर्माण होता है। हर सजीव का मृत शरीर काष्ठ होता है, जिसमें फसलों के अवशेष, भूमि में जड़ों के अवशेष, जीवाणु, कीट एवं केचुवों के मृत अवशेष, मरे पक्षी, प्राणिओं व मानव के मृत शरीर सभी काष्ठ हैं। यह भूमि की सतह पर गिरने और उसके बाद सूखने पर अनन्त कोटि सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा विघटित होकर ह्यूमस का निर्माण करता है, जो फसल का खाद्य भण्डार है।
अतः हम कह सकते हैं कि अन्नपूर्ण भूमि के लिए धरती में गतिमान केंचुवा और अनन्तकोटि सूक्ष्म जीवाणु चाहिए, उसके लिए भूमि में सूक्ष्म पर्यावरण तथा उसके लिए भूमि के अन्दर अंधेरा एवं वाफसा तथा भूमि के ऊपर काष्ठ आच्छादन आवश्यक है, जिससे भूमि में अनन्तकोटि सूक्ष्मजीवाणुओं द्वारा फसलों के खाद्य भण्डार ह्यूमस का निर्माण होता है। उन सूक्ष्म जीवाणुओं का अद्भुत जामन देशी गाय का गोबर है, क्योंकि एक ग्राम देशी गाय के गोबर में 3 से 5 हजार करोड़ तक सूक्ष्म जीवाणु होते हैं। यह जामन ही ‘जीवामृत’ है।
जीवामृत निर्माण विधि - 200 लीटर की एक टंकी में 10 किग्रा देशी गाय का ताजा गोबर, 10 ली॰ गोमूत्र, 1 किग्रा बेसन (कोई भी दलहनी फसल का आटा), 1 किग्रा गुण तथा शेष पानी डालकर ठीक से मिलायें तथा दिन में सुबह, शाम डण्डे से 2-3 मिनट चलायें। 24 घंटे में जीवामृत तैयार हो जायेगा, जिसका प्रयोग 10 गुने पानी के साथ 5 एकड़ खेत में किया जाता है। यह जीवामृत एक सप्ताह तक प्रयोग हेतु उपयोगी रहता है।
जीवामृत प्रयोग विधि - खाली खेत या फसल के समय पानी देते समय टपक विधि से नाली पर पानी के साथ इसका प्रयोग करना उपयोगी रहता है। इसके अतिरिक्त छानकर, 10 गुना पानी मिलाकर फसल या खेत में स्पे्र, छिड़काव किया जा सकता है। नीम आदि की पत्तेदार टहनियों से भी छिड़काव कर सकते हैं।  फसल बुवाई के एक माह बाद प्रति एकड़ 100 ली॰ पानी में 5 ली॰ कपड़छन जीवामृत, उसके 21 दिन बाद प्रति एकड़ 150 ली॰ पानी व 10 ली॰ कपड़छन जीवामृत,  उसके 21 दिन बाद प्रति एकड़ 200 ली॰ पानी व 20 ली कपड़े से छना जीवामृत तथा आखिरी छिड़काव दाने की दूधावस्था या फलों की बाल्यावस्था में आने पर प्रति एकड़ 200 ली॰ पानी में 5 से 10 ली॰ छने हुए खट्टे मट्ठे का प्रयोग करें।
घन जीवामृत निर्माण विधि - 100 किग्रा देशी गाय का ताजा गोबर, 1 किलो दलहनी फसल का आटा, 1 किग्रा. गुड़ व आवश्यकतानुसार गौमूत्र मिलाकर गुंथें और कण्डे या गोला बनाकर छाया में सुखाने के बाद तोड़कर चूरा (पाउडर) बना कर छाया में बोरांें से ढ़क कर रखें।
घन जीवामृत प्रयोग विधि - 100 किग्रा. घन जीवामृत एक एकड़ के लिए है। जब खेत में नमी हो तो प्रातः या सायंकाल इस पाउडर का खेत में छिड़काव करें। फासल मे फूल की स्थिति में 50 किग्रा. घन जीवामृत का ही प्रयोग करें।
बीजामृत निर्माण विधि - बीजामृत का उपयोग बीज शोधन के लिए किया जाता है। 100 किग्रा बीज शोधन (बीजोपचार) के लिए 20 ली॰ पानी में 20 किग्रा. देशी गाय का ताजा गोबर, 5 ली॰ देशी गाय का गोमूत्र, 100 ग्राम उपजाऊ मिट्टी तथा 50 ग्राम चूना लें। सबको एक साथ अच्छी तरह मिलाकर रात भर ढ़क कर रखें। प्रातः बीजों के साथ मिलाकर बीजोपचार करें और छाया में सुखाकर बुवाई करें।
देशी गाय के गोबर में अनेक विशेषतायें हैं। इसके 1 ग्राम गोबर में 3-5 करोड़ सूक्ष्म जीवाणु होते हैं, जो 20 मिनट में बढ़कर 200 गुना, अर्थात न्यूनतम 60 लाख करोड़ हो जाते हैं, जो पौधे को आवश्यक खाद्य तत्व उपलब्ध कराते हैं, गोबर फफूंँदी नाशक है, अतः फफूंँदी जन्य बीमारियों का रोधक तथा विषाणुरोधी होने के कारण हानिकारक विषाणुओं को रोकता है और बीज का जमाव अच्छा करता है।
जब पालेकर जी से पूछा गया कि इस कृषि पद्धति को शून्य लागत आध्यात्मिक खेती क्यों कहते हैं? तो उन्होने इसकी परिभाषा करते हुए मुख्य बिन्दु बताए-
1. मुख्य फसल का लागत मूल्य, अन्तरवर्ती फसलों के उत्पादन से निकाल लेना और मुख्य फसल बोनस के रूप में लेना शून्य लागत खेती है।
2. खेती के लिए आवश्यक कोई भी संसाधन (बीज, खाद, कीट नियन्त्रक आदि) बाजार से नहीं खरीदना।
3. आवश्यक संसाधनों को निर्मिति अपने घर, खेत में करना, बाजार से नहीं लाना।
4. खेती के लिए कोई भी ऐसा संसाधन तैयार नहीं करना, जिससे जीव, जमीन, पानी और पर्यावरण को हानि पहुंँचे।
इसके अतिरिक्त भारतीय दर्शन एवं आध्यात्म कहता है कि, किसी भी पेड़, पौधों की वृद्धि के लिए  और उनसे इच्छित उत्पादन के लिए जिन-जिन खाद्य तत्वों की आवश्यकता होती है, उन सभी खाद्य तत्वों की उपलब्धता केवल ईश्वर करेगा, मानव नहीं करेगा, इस लिए इसे शून्य लागत आध्यात्मिक खेती कहते हैं।
यदि कृषि का मूल उद्देश्य ‘‘भरपूर उपज व समृद्ध किसान’’, की उपलब्धि प्राप्त करना है, तो कृषि के इन पांँच मूलभूत सिद्धान्तों पर कार्य करना होगा।
1. धरती मांँ है। अन्नपूर्णा है। हमें वह कार्य करना है एवं वह पद्धति अपनानी है, जिससे धरती मांँ सदासर्वदा अन्नपूर्णा बनी रहे।
2. उत्पादन गुणवत्ता युक्त व स्वास्थ्यकर हो।
3. उत्पादकता भरपूर हो, जिससे किसान इतना  समृद्ध व खुशहाल बने, जिससे वह न तों बैंकों का कार्जदार बने और न कर्ज के बोझ से उसे आत्महत्या के लिए विवश होना पड़े।
4. बीज, खाद के प्रति स्वावलम्बी रहे, जिससे वह सदैव,, कम्पनियों व बाजार की गुलामी से मुक्त रहे।
5. जल, पर्यावरण एवं जैव विविधता सुरक्षित व सम्वर्धित होती रहे।
अधिक जानकारी या प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए लोक भारती कार्यालय, लखनऊ मो॰- 07376078725 पर सम्पर्क कर सकते हैं या यहांँ प्रस्तुत माॅडल कृषकों से स्वयं अपने खेत में इस विधि का प्रयोग करने सम्बन्धीे अनुभवजन्य जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
प्रयोगधर्मी कृषकों की सूची -
1. ज्ञानेन्द मिश्र अलीगढ़,  मो॰-995649025
2. मोनू उपाध्याय, इगलास, अलीगढ़, मो॰-7500900909
3. विकास चैधरी, हाथरस, मो॰- 9997994493
4. रमेश प्रसाद त्रिवेदी, फतेहपुर, मो॰- 9956494025
5. सरदार हरभजनसिंह, शाहजहांपुर, मो॰- 9956428199
6. आत्मा प्रसाद पाठक, हर्रैया, बस्ती, मो॰- 9415162998
7. उदयवीर सिंह, लखीमपुर खीरी, मो॰- 9919204597
8. हुलास राय, रामपुर, मो॰- 9720064630
9. संजीव कुमार, बुलन्दशहर, मो॰- 9258572443
10. गुरूदŸा चैहान, गगरेट, हिमांचल, मो॰-9805635207
11. नवनीत सिंहल, दिल्ली, मो॰- 9560723234
12. जसवीर सिंह तोमर, गाजियावाद मो॰- 9897909127
13. विश्वास सिंह, ननियारी,सहारनपुर मो॰- 9627034400
14.सुरेन्द्र कुमार, ननियारी, सहारनपुर, मो॰- 9719361318
15.बालेन्दु कुमार, ननियारी,सहारनपुर, मो॰- 9458506077
16. वीर सिंह, थाना भवन, शामली, मो0- 9720064630
17. ज्ञान सिंह, भनारी लिड्डा, शामली, मो0-9719339232
18. कंवरपाल सिंह, महावलपुर, शामली, मो-9761638210
19. यशपाल सिंह, करौंदा, शामली, मो0-8755415400
20. कालूराम, कुम्हेडा, मुजफफरनगर, मो-9758571008
21. सुखपाल सिंह आर्य, मुजफफरनगर,मो-8171315866
22. सतीश कुमार, हरिद्वार, मो0-9758160490
23. चै0 कटार सिंह, झवरेडा, हरिद्वार, मो-9412020641
24. ब्रजनाथ वर्मा, रसाड़ा, बलिया, मो-7376038737
25. नरेन्द्र सिंह ठाकुर, टीकमगढ़,म.प्र.मो-8720019830
26. कैलाश लोधी, टीकमगढ़,म.प्र.मो-08827042515
27. धनीराम यादव, टीकमगढ़,म.प्र.मो-08349349498
28. लवकुश, चित्रकूट, मो- 08859644570
29. राकेश कुमार राजपूत, बांँदा, मो-09918924678
30. हिमांशु गंगवार, फरूखाबाद, मो-09319856993
31. सुरेन्द गुप्ता, कायमगंज, मो॰- 09415124334
32. गोपाल भदौरिया, फरूखाबाद, मो॰- 09450005132
33. श्रीकृष्ण चैधरी, हर्रैया, बस्ती, मो॰- 9919257534
34. संजय उपाध्याय, शाहजहांपुर, मो॰-9532208685
35. राजवीर सिंह यादव, शाहजहांपुर, मो॰-9208214541
36. शिवकुमार, बरखेड़ा, शाहजहांपुर, मो॰-9208736059
37. बल्देव प्रसाद,रमापुर, शाहजहांपुर, मो॰-9005102068
सब्जी करने वाले किसान:-
1. श्याम लाल कुशवाहा, टीकमगढ़,म.प्र.मो॰-09977144486
2. मोहनलाल चड़ार, टीकमगढ़, मो॰-08889029463 ु