Tuesday, March 25, 2014

विनाश का माडल - एम॰सी॰ मेहता

उत्तराखण्ड या दूसरे पहाड़ी राज्यों में प्राकृतिक आपदा का आना अस्वभाविक बात नहीं है, लेकिन जिस तरह केदारनाथ और बद्रीनाथ में प्रकृति का रौद्र रूप देखने-सुनने को मिला वह हमारी चिन्ता को बढ़ाता है। यह चिन्ता इसलिए कहीं अधिक है, क्योंकि यह प्रकृति से कहीं ज्यादा मानवीय आपदा है, जो दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। ऐसी आपदायें भविष्य में और बढ़ें तो कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि हमारी सरकार ने जो विकास का माडल चुना है, वह विकास का नहीं विनाश का है। वन क्षेत्र में चलती अन्धाधुन्ध आरी, पहाड़ों पर बढ़ती होटलों की संख्या, नदियों के बहाव क्षेत्र का अतिक्रमण करके बस्तियों की बसावट आपदाओं को आमन्त्रित करती है। विकास के नाम पर नियमों को ताक पर रखकर दुकानें और भवन खड़े किए जा रहे हैं और बड़ी कारपोरेट कंपनियों को प्राकृतिक संपदा दोहन की खुली छूट दी जा रही है। तीर्थ स्थलों को पर्यटक स्थल के रूप में तब्दील कर दिया गया है और इसे पर्वतीय राज्य के विकास का नया आर्थिक आधार बताया जा रहा है। सरकार हर साल संख्या बढ़ाने का प्रचार करती है, लेकिन यह सब करते हुए वह विशेषज्ञों के सुझावों को भूल जाती है कि इस तरह के कार्यों से राज्य में नई आपदाओं का आगमन होगा, जिसका कई गुना ज्यादा खामियाजा भुगतना होगा और वास्तव में यही सब हो भी रहा है।
उदाहरण के तौर पर उत्तराखण्ड की आबादी करीब एक करोड़ है, लेकिन करीब दो करोड़ लोग बतौर पर्यटन यहां आते हैं, जो अपने पीछे गंदगी का अम्बार छोड़ जाते हैं, जिसकी साफ-सफाई की व्यवस्था शायद ही की जाती है, जिससे प्राकृतिक असन्तुलन बढ रहा है।
ऊर्जा उत्पादन के नाम पर बांधों और पनबिजली परियोजनाओं की बाढ़ सी आ गई है, लेकिन पर्यावरण मन्त्रालय को इसमें कोई खामी नजर नहीं आती। यह मन्त्रालय प्रधानमन्त्री कार्यालय के इशारे पर काम करता है और कोई भी निर्णय सरकार के हित और इच्छा के अनुरूप करता है। भारत एवं विश्व के तमाम विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद बार-बार अग्रह करते रहते है, कि उत्तराखण्ड का पहाड़ कच्चा है और यह अधिक भार वहन करने के योग्य नही है, लेकिन इस सुझावों को लगातार अनसुना किया जा रहा है।
उत्तराखण्ड की तबाही के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अखिरकार इसके लिए जिम्मेदार कौन है? राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण और राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण का अध्यक्ष होने के नाते प्रधानमन्त्री की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसकी निगरानी करें और समुचित कदम उठायें, लेकिन उत्तराखण्ड में 2007 से आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण गठित होने के बाबजूद आज तक इसकी एक भी बैठक नहीं हुई। न ही इस दिशा में केन्द्र ने कोई दिशानिर्देश दिये।
जब मौसम विभाग ने 16 जून को भारी बारिश के आसार जताये थे, तो तीर्थ यात्रियों को रोका क्यों नहीं गया? इसका दोषी कौन है? निश्चित रूप से यह प्रधानमन्त्री की सीधे-सीधे जिम्मेदारी थी, जिसका निर्वाह करने में वह विफल रहे। राज्य सरकार भी बराबर की दोषी है, जिसके लिए न तो पीएम ने और न राज्य सरकार ने त्रासदी के शिकार लोगों के परिजनों से माफी माँगी है।
मेरा मानना है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा की भांति सीमित संख्या में लोगों को अनुमति दी जाय और बाकायदा उनका चिकित्सीय परीक्षण भी किया जाए तथा उसी तरह बाकी तीर्थ स्थलों के लिए भी नीति बनाई जानी चाहिए।
यह सही है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का चक्र अनियमित हुआ है और प्राकृतिक आपदाओं की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन केदारनाथ और बद्रीनाथ में जो कुछ हुआ है उसके लिए सरकार अधिक जिम्मेदार है।
हमने गंगा को राष्ट्रीय नदी तो घोषित कर दिया है लेकिन बांध बनाकर गला दबाने का काम भी कर रहे हैं, उन्हे न तो पहाड़ों की चिन्ता है ओर न नदियों की और न ही राज्य और देश की जनभावनाओं की। आम लोगों के विरोध को दबा दिया जाता है और विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की बात को अनसुना कर दिया जाता है और तबाही होने पर इसे प्राकृतिक आपदा का नाम दे दिया जाता है। टिहरी बांध को लेकर कहा जा रहा है कि  यदि किसी कारण से यह टूटा तो न केवल उत्तराखण्ड अपितु दिल्ली को भी डूबने से कोई नहीं बचा पायेगा। पर इस सब पर चिन्ता करने के लिए सरकार के पास समय कहां है? शायद हम किसी और बड़ी तबाही के इन्तजार में है। - लेखक प्रख्यात पर्यावरविद् और मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित हैं।