Wednesday, March 26, 2014

एक मन्दिर से जागा: लोक सेवा का मंगल भाव - आचार्य सोम दीक्षित

‘‘चलती को ‘गाड़ी’ कहते हैं, ‘गाड़ी’ को कहें ‘उखाड़ी’।’’ यह कैसी उलटवांँसी हैं समाज की? प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक ओर जहां लोगों के पास अपनों के लिए भी समय कठिनाई से ही निकल पाता है; वहीं जेठ की तपती धूप में मंगल के दिन मानो पूरा समाज ही यहां के लोगों को अपना लगने लगता है। जी हां! इस दिन यहाँ के लोगों का मन बड़ा होता है, इसलिए इस दिन को शायद बड़ा मंगल कहते हैं। वैसे तो ‘मंगल’ का अर्थ ही शुभ् होता है, परन्तु लखनऊ में जेठ के मंगल का अर्थ हैं मंगलकारी, संकटमोचक हनुमान जी का दिन। कहते हैं कि ‘जेठ के महीने में ही हनुमान जी की भेंट श्रीराम से प्रथम बार हुई थी। हनुमान जी ने श्रीराम से जुड़कर अपने को बड़ा (गौरवशाली) अनुभव किया था, वहीं रामचन्द्र सीता हरण के पश्चात् तीन संख्या से घट कर दो रह गये थे, इस जेठ मास में हनुमान जी के मिलन के पश्चात् वानर राज सुग्रीव से मिलकर दो चार हो गये थे और बालि वध के बाद तो उनके सहयोगियों की संख्या बड़ी ही होती चली गई थी। अतः श्रीराम-हनुमान मिलन को यदि हम लोक मंगलकारी बड़ा दिन मान लें तो जेठ मास के बडे़ मंगल की सार्थकता और भी सिद्ध हो जाती है।’ एक बात और जेठ मास के बड़े मंगल को लोकभाषा में बुढ़वा मंगल भी बोलते हैं। महाभारत की एक कथा के अनुसार वनवास भोग रहे पाण्डवों में एक पवनपुत्र भीम की भेंट अत्यन्त बूढ़े शरीर वाले पवनपुत्र हनुमान जी से ज्येष्ठ मास में तब हुई थी जब भीम जल की तलाश में वन में भटक रहे थे। सम्भव है वह दिन भी मंगल रहा हो या एक युवा पवन पुत्र की एक वृहद पवन पुत्र की इस भेंट को ही मांगलिक मान लिया जाय।
इसीलिए इस दिन लखनऊ नगर के हर गली मोहल्ले में हनुमान भक्तों के द्वारा जगह-जगह सबेरे से ही शामियाना सज जाते हैं और फिर पूरे दिन प्रसाद, शर्बत और शीतल जल के साथ चलता है। अपनेपन का वह महाप्रयोग जिसकी केवल अनुभूति ही की जा सकती है।
लखनऊ में बड़े मंगल के दिन छोटे बड़े सभी लोग इन ‘मंगल पंडालों’ से प्रसाद लेकर अपने को धन्य मानते हैं। अपनेपन के इस मंगल प्रसाद में कहीं गरमागरम पूड़ी-सब्जी, कहीं बूँदी-पूड़ी तो कहीं देशी घी का हलुवा और शीतल जल या कहीं-कहीं शर्बत लिए ये हनुमान भक्त बड़े प्रेमभाव से सेवा में तत्पर रहते हैं। इस दिन लोगों में इस प्रेम प्रसाद के साथ लोगों में मस्ती का भाव भी जाग जाता है और फिर उन्हें दो-दो, तीन-तीन पण्डालों से प्रसाद लेने में कोई गुरेज नहीं होता। अनेक परिवारों को इस दिन चूल्हा जलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि दिन भर चलने वाले ऐसे असंख्य भण्डारों में मानो लखनऊ का हृदय बुला रहा हो। यह दृश्य लखनऊ में जेठ मास के सभी मंगलों को रहता है, जो किसी वर्ष चार तो किसी वर्ष पांच पड़ते हैं। इन बडें मंगल का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि पहले मंगल के दिन लखनऊ के सरकारी दफ्तरों में सार्वजनिक अवकाश रहता है।
सामान्यतः एक पण्डाल से पूरे दिन में कम से कम दो हजार लोग प्रसाद लेकर अपनी प्यास बुझाते हैं। पूरे लखनऊ में पांच सौ के लगभग पण्डाल सजते हैं, जिनके माध्यम से एक दिन में लगभग दस लाख लोगों की सेवा होती है, जिसका मूल्य अमूल्य है, पर इस आर्थिक युग में जब पीने का पानी भी पन्द्रह रू॰ बोतल बेचने की फितरत पैदा हुई है, ऐसे में डेढ़ से दो करोड़ रूपया एक दिन में समाज सेवा पर उल्लास पूर्वक खर्च कर देने वाला हमारा समाज अद्भुत है।
ऐसा ही एक पण्डाल लखनऊ के परिवर्तन चैक पर बड़े मंगल के अतिरिक्त दिनों में भी गर्मी के तीन महीने अप्रैल, मई और जून में आम राहगीर की भूख-प्यास बुझाने का नियमित, सेवाभावी एवं प्रेरक उपक्रम है, जिसका संचालन ‘दुर्गा मन्दिर धर्म जागरण सेवा समिति’ द्वारा किया जाता है। इस समिति का केन्द्र लखनऊ के शास्त्री नगर स्थित दुर्गा देवी मन्दिर में है, जिसके माध्यम से कई पे्ररणादायी कार्य चलते हैं।
मन्दिर के समीप ही इस समिति का छः मंजिला सेवा भवन है, जिसकी एक मंजिल में सन् 2004 से प्रातः 9 बजे से 1 बजे तक चलने वाला नियमित चिकित्सालय है, जिसमें एलोपैथी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक एवं फीजियोथेरेपी आदि विभागों के साथ ही एक्सरे एवं ईसीजी की उत्तम व्यवस्था हैं। यहाँ सामान्य मरीजों से दो दिन की दवा हेतु 10 रू॰ पंजीकरण शुल्क लिया जाता है। यदि कोई मरीज 10 रू॰ देने में भी असमर्थ है तो उसकी चिकित्सा निःशुल्क की जाती है और उसे दवा के साथ में राशन का एक पैकेट भी दिया जाता है जिससे भूखे पेट उसे दवा न लेनी पडे़ं। यह सामाजिक स्वास्थ्य का अच्छा प्रकल्प है।
सेवा केन्द्र की एक मंजिल पर कल्याण मण्डप है, जिसमें समय-समय पर कथा, प्रवचन, योग अभ्यास आदि कार्यक्रम चलते रहते हैं। इसमें से एक अभिनव कार्यक्रम है ‘संस्कार-पथ’, जिसमें गर्मियों की छुट्टियों में मन्दिर से जुडे़ विभिन्न परिवारों के बच्चे प्रातः 10 बजे से सायंकाल पांच बजे तक एकत्र होकर सामूहिक संस्कार ग्रहण करते हैं। क्योंकि स्वस्थ समाज के लिए बच्चों में शिक्षा के साथ संस्कार देना भी आवश्यक है। आज जब समाज में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की होड़ लगी है, ऐसे में यह ‘संस्कार-पथ’  समस्त परिवारों के लिए अमृतधारा से कम नहीं है।
इसी भवन में पिछले एक वर्ष से छोटा, पर महत्वपूर्ण आवासीय व्यवस्था युक्त गुरूकुल भी प्रथमा कक्षा से प्रारम्भ हुआ है, जिसमें अभी 11 वटुक एवं उनके शिक्षक हैं। दूसरे खण्ड में सन्तआवास एवं भोजनालय है, तो सबसे ऊपरी मंजिल में तुलसी उद्यान है; जहाँ से जिस किसी को तुलसी पौधे की आवश्यकता हो, दिया जाता है, जिससे प्रत्येक घर तुलसी पौधे से युक्त बना रहे।
इस समिति द्वारा लोकहित का एक महत्वपूर्ण कार्य ‘सामूहिक विवाह’ आज से 23 वर्ष पूर्व 1992 में  से प्रारम्भ हुआ तो आज तक विधिवत् चल रहा है। अभी तक इन वर्षों में 47 विवाह समारोहों का आयोजन सम्पन्न किया जा चुका है जिनके माध्यम से 992 जोडे़ संस्कारपूर्ण विवाह बंधन में जुड़कर अपने दायित्व का निर्वहन करने में समर्थ हुए हैं। इस समिति द्वारा प्रत्येक जोड़े को उसके विवाह के समय ही जीवन संचालन हेतु जहां आवश्यक समस्त भौतिक वस्तुयें भेट स्वरूप दी जाने की व्यवस्था है, वहीं संस्कार स्वरूप उनके जीवन में यह भाव भी विकसित होता है कि समाज में आप अकेले नहीं, सम्पूर्ण समाज तुम्हारे साथ है।
सामूहिक विवाह की प्रेरणा भी श्रीराम-सीता के विवाह से ली जा सकती है, जब चार-चार दूल्हा-दुल्हनों को चार अवस्थाओं और उनके चार स्वामियों के समान एकत्र देखकर जनकराज कहते हैं -‘हम बड़े अब सब विधि भये’। अतः हर बड़ा मंगल हमारी राजधानी लक्ष्मणपुरी का सांस्कृतिक और सामाजिक बडप्पन बनाये रखे, यही मंगल कामना है।
उत्तराखण्ड की प्रकृतिक आपदा में भी अग्रणी - जैसे ही सूचना मिली किउत्तराखण्ड में फंसें लोगों को तत्काल मदद की आवश्यकता है, तत्काल वहां के लिए आवश्यक राशन व अन्य समिग्री तथा भोजन बनाने बानी टीम के साथ पांच गडि़यों में सेवा समिति के कार्यकर्ता 24 जून को ऋषीकेश पहुंच गये और वहोँ पांच दिन रूक कर विपदा पीडि़तों की सेवा की।