Monday, March 3, 2014

स्वस्थ लोकतंत्र के लिये जरूरी है न केवल मतदान वरन् नैतिक मतदान - डा॰ अन्शु केडिया

जनमत लोकतंत्र का प्रमुख स्तम्भ है। किसी भी लोकतांत्रिक देश की सफलता उस देश विशेष की जागरूक जनता में निहित है। वोट जनता के पास वह हथियार है जिससे वह यदि चाहे तो देश को खूबसूरत दिशा की तरफ मोड़ सकता है, वह दिशा जो उसके सपनों को साकार करती हो। इसके लिए जरूरी है कि वह अपनी इस ताकत को पहचाने, ‘वोट देकर योग्य प्रतिनिधि को चुनने की ताकत’। यदि नहीं पहचानता तो उसे व्यवस्था को दोष देने का अधिकार भी नहीं बनता।
ज्ञातव्य है कि जनप्रतिनिधियों के चयन हेतु 25 जनवरी 1950 को चुनाव आयोग की स्थापना के साथ इसे संवैधानिक शक्ति दी गयी। चुनाव आयोग के निर्देशन में केन्द्र व राज्य सरकारों के 1950 से अनवरत स्वतंत्र व पारदर्शी चुनाव कराने के प्रयास किये गये। निःसंदेह  चुनाव आयोग द्वारा तो प्रयास किया गया, परन्तु गिरते मतदान प्रतिशत ने लोकतंत्र शब्द को ही बेमानी बना दिया। ऐसा नहीं था कि जनता देश से प्रेम नहीं करती, परन्तु राजनीति के दलदल में इतनी गंदगी फैलती गयी कि जनता समझ ही नहीं पायी कि किसके समर्थन में खड़े हों। पैसे के प्रदर्शन, भ्रष्टाचार, राजनीतिक लाम्बिंग, अपराधियों केा प्रश्रय ने राजनीति को आम आदमी की पहुँच से बहुत दूर कर दिया, यहां तक की शरीफ आदमी के लिए कभी-कभी जमानत बचाना भी मुश्किल हो गया। जनता इस महासमर में अपने आप को जब ठगा महसूस करती है, तो उसे यही बेहतर लगता है कि इस प्रक्रिया से अपने आप को बाहर ही कर लो। युवाओं में जो उत्साह ड्राइंविंग लाइसेन्स, एटीएम कार्ड के लिए दिखता है वह वोटर कार्ड के लिए नदारद ही रहता है, परन्तु किसी समस्या का समाधान यह नहंी होता कि उससे पलायन किया जाये। समस्या है कि राजनीति के गिरते स्तर के बीच भी जनता को जोड़ने के लिए क्या किया जाय?
क्या मतदान को अनिवार्य बना दिया जाय- जैसा कि आज हमारे बीच विभिन्न देशो के उदाहरण भी हैं। ज्ञातव्य है अगस्त 2013 तक 22 देशो में अनिवार्य वोटिंग का कानून था, जिनमें से कुछ प्रमुख देश है- आस्ट्रेलिया, अर्जेण्टीना, ब्राजील, सिंगापुर इत्यादि। भारत में इस प्रक्रिया पर बहस चली। इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क भी आये। अनिवार्य मत के पक्ष में 19 दिसम्बर 2009 को गुजरात के शहरी विकास मंत्री नितिन पटेल ने गुजरात के स्थानीय सत्तामण्डल कानून (सुधार विधेयक-2009) प्रस्तुत किया। इसके अन्तर्गत प्रावधान किया गया कि बिना किसी उचित कारण से मतदान से वंचित रहने पर नागरिक को अयोग्य घोषित कर दिया जाय। यह विधेयक विधान सभा में तो पारित हो गया, परन्तु दण्डात्मक स्वरूप के कारण राज्यपाल ने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे रोक दिया। लोकतांत्रिक ढांचे की शुचिता इसी में है कि लोग स्वयं इसे अपनाएं न कि किसी दण्ड के भय से। प्रसिद्ध राजनीतिक अर्थशास्त्री चाणक्य लिखते हैं, ”किसी देश को बर्बाद करने में सबसे बड़ा योगदान उन युवाओं का होता है, जो कहते हैं मुझे राजनीति से नफरत है।’’ याद रखना राजनीति ही किसी देश का भविष्य तय करती है। यदि वास्तव में देश से प्रेम है तो इसको स्वस्थ रखने वाली परम्परा में भागीदार होना जरूरी है।
यदि लोकतंत्र को जीवित रखना है तो मतदान की आदर्श स्थिति अर्थात 80 से 90 प्रतिशत तक मतदान की सुनिश्चितता जरूरी है। गिरते मतदान से चिन्तित चुनाव आयोग ने मतदाता में चुनाव के प्रति सकारात्मक रूझान हेतु गम्भीर प्रयत्न किये हैं, इन्ही प्रयत्नों में से एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है- स्वीप (सिस्टमेटिक वोटर्स एजुकेशन व इलेक्टोरल पार्टीशिपेशन)। 2009 से प्रभावी स्वीप के माध्यम से ऐसी नीतियों व कार्यक्रम की शुरूआत की गयी, जो जन सामान्य को मतदान प्रक्रिया से जोड़ सकें। इस कार्यक्रम के तीन चरण हैं- प्रथम चरण मतदाताओं के अधिक से अधिक पंजीकरण से जुड़ा है। द्वितीय जागरूकता के कार्यक्रमों व तृतीय चुनाव के दिन मतदाताओं की पोलिंग बूथ तक आसान पहुँच में सहायता से। मतदान के प्रति जन जागरूकता बढ़ाने की दृष्टि से ही पिछले चुनाव में ‘पप्पू फेल हो गया’ या ‘पप्पू वोट क्यों नही डालता’ जैसे अभियान चलाए गए जो सराहे भी गए। स्वीप कार्यक्रम के अन्तर्गत जगह-जगह पंजीकरण मेले, स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी, शैक्षिक संस्थाओं में जागरूकता गतिविधियां अनवरत जारी हैं। 25 जनवरी, 2014 को लगातार चैथी बार राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर सभी राज्यों में कार्यक्रम के साथ मत देने की शपथ भी ली गयी। मत देते समय जाति, धर्म, सम्प्रदाय, अगड़ा-पिछड़ा़ या लोक लुभावन नारों पर आधारित क्षुद्र सोच को परे रखकर केवल योग्य उम्मीदवार के पक्ष में मत देने के लिये पे्ररित करते हुऐ इस बार की थीम नैतिक वोटिंग भी रखी गयी। चैथे मतदाता दिवस तक 80 करोड़ मतदाता पंजीकृत हो गए थे जिसमें 3.91 करोड़ नए मतदाता जुड़े। इनमें भी 1.27 करोड 18 से 19 वर्ष के हैं। पहली फरवरी को उ॰प्र॰ की जारी नई वोटर लिस्ट में भी कुल 82 लाख 51 हजार 115 नए वोटर जुड़े हैं।
लोक सभा के चुनावों पर नजर डालें तो अभी तक सर्वाधिक वोटिंग हुई है 1984 के 8वें लोकसभा चुनाव में 63.56 प्रतिशत व सबसे कम हुई है 2004 के 14वें लोकसभा चुनाव में 48.74 प्रतिशत। 2009 में जब वोटिंग का राष्ट्रीय प्रतिशत था 56.97 तब उ॰प्र॰ का मात्र 46.45 प्रतिशत ही था। राहत देने की बात यह है कि विधानसभा चुनावों में सभी राज्यों में वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। उ॰प्र॰ में 2012 के विधानसभा चुनाव में 59.48 प्रतिशत वोटिंग हुई, गोवा में 81.74 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 77.06 प्रतिशत, दिल्ली में 67 प्रतिशत, म॰प्र॰ में 72.52 प्रतिशत, मिजोरम में 81.29 प्रतिशत, राजस्थान में 75.20 प्रतिशत। इस उत्साहजनक वृद्धि में  स्वीप का योगदान महत्वपूर्ण माना गया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में नए मतदाताओं का जुड़ना व मतदान करना एक सकारात्मक संकेत है, जिससे आशा जगती है कि लोकतंत्र की भारत में अभी भी गहरी जड़े हैं।  उम्मीद है आने वाले लोकसभा चुनाव में लोकतंत्र में आस्था जताते हुए जनता अपने इस अधिकार के प्रयोग से व नैतिक वोटिंग के माध्यम से इसे और मजबूती ही देगी।
- ए॰पी॰ सेन मेमोरियल गल्र्स महाविद्यालय, लखनऊ।