Monday, March 3, 2014

बुन्देलखण्ड जल समस्या और समाधान - ई॰ विश्वनाथ खेमका

बुन्देलखण्ड़ में उत्तर प्रदेश के दक्षिण पश्चिम के छः जिले झाँसी, ललितपुर, बाँदा, जालौन, हमीरपुर, चित्रकूट, महोबा एवं मध्य प्रदेश के उत्तर क्षेत्र के छः जिले सागर, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया एवं दमोह आते हैं। बुन्देलखण्ड का कुल क्षेत्रफल 26000 वर्ग कि॰मी॰ है। बुन्देलखण्ड में औसतन वर्षा 936 मि॰मी॰ मानी जाती है। यहाँ की जलवायु शुष्क व अर्धशुष्कता के कारण अधिक वाष्पोर्जन से नमी नष्ट हो जाती है। वर्षा का लगभग 55 प्रतिशत भाग नदियों में बहकर चला जाता है तथा वर्षा जल का लगभग 24 प्रतिशत वाष्पीकरण हो जाता है। यहाँ के अलग-अलग क्षेत्रों में लाल, काली एवं दोमट मिट्टी है, जिसमें रवी में गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, अलसी व मसूर तथा खरीफ में ज्वार, बाजरा, मूंग, मूंगफली, उड़द, तिल, अलसी व देसी अरहर आदि उगाई जाने वाली मुख्य फसलें हैं। इस क्षेत्र में पशुधन की बहुतायत है। परन्तु चारे की कमी, अन्ना प्रथा (चार महीने पशुओं को छुट्टा छोड़ना) तथा कुप्रबन्धन के कारण वह संसाधन होते हुए भी अलाभकरी है। इस क्षेत्र में उपलब्ध पशुधन के समुचित उपयोग से जैविक (विषमुक्त) खेती की अपार सम्भावनाऐं हैं। इस क्षेत्र की मुख्य नदियाँ पहुज, सिन्ध, बेतवा, धसान एवं जेमिनी, केन, गरारा, भूपरार, सहजाद, बागिन, गूना, पालसनी हैं जो उत्तर पूर्व मंे यमुना में मिल जाती हैं। यहाँ का क्षेत्र पठारी, पहाड़ी एवं खड्ढ़़ानुमा होने के कारण इस क्षेत्र में जल संसाधनों का उचित प्रबन्धन करना एक प्रमुख चुनौती है। बुन्देलखण्ड क्रियान्वयन गोष्ठी के आधार पर जल समस्या समाधन - जल प्रकृतिक धरोहर है, जिस पर सभी का अधिकार है। जल का प्रयोग खेती में सबसे अधिक होता है। अच्छी फसल हेतु खेती की मांग के अनुसार सिंचाई हेतु जल समय पर प्राप्त हो, इस हेतु सिंचाई हेतु जल का संरक्षण खेत के ऊपरी (ऊँचे) हिस्से में तथा अतिरिक्त जल को खेत के निचले हिस्से में सरक्षण करने की अत्यन्त आवश्कता है। ऐसा करने से ही क्षेत्र में सजीव खेती, पर्याप्त फसल और सामाजिक खुशहाली लाई जा सकती है। बुन्देलखण्ड में (2001 से 2009 तक) वर्षा जल की स्थिति इस प्रकार है- क्र.क्षेत्र अधिकतम न्युनतम औसत 1. म.प्र.क्षे. 1682.69(1990) 595.45/2007 110368 2. उ.प्र.क्षे. 1444.18(1996) 482.6/2007 1010.73 3. बु.ख.क्षे. 1557.85(1990) 534.71/2007 1054.73़ वर्ष 1901 से 2009 तक बुन्देलखण्ड क्षेत्र के तापमान में 0.5 डिग्री सेल्सियस से 1.0 डिग्री सेल्सियस वृद्धि हुई तथा लगातार सूखे एवं खनिज पदार्थें के अनियोजित दोहन के कारण स्थानीय लोगों का पलायन तो हुआ ही, साथ-साथ खेती पर आधारित जीविका होने के कारण गरीबी, बेरोजगारी तथा भुखमरी बढ़ी है। जल, जंगल, चरागाह, जलावन लकड़ी एवं खेतीबारी के प्रबन्धन हेतु लोक भारती उत्तर प्रदेश ने ‘‘बुन्देलखण्ड जल संकट समाधान’’ हेतु एक गोष्ठी का लखनऊ में दिनांक 27.01.2008 में आयोजन किया गया था, जिसमें स्थानीय एवं बुन्देलखण्ड तथा देश-प्रदेश के विशेषज्ञों तथा लगभग 200 प्रतिनिधियों नें भाग लेकर, परिचर्चा के माध्यम से समस्या के निदान हेतु निम्न सुझाव व संस्तुतियाँ प्रस्तुत की - 1. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में वर्षा जल अधिकतम संरक्षण प्रत्येक वाटरशेडवाइज किया जाये। 2. पुराने तालाबों को पाटने से रोका जाये। जो तालाब बचे हैं, उन्हें गहरा किया जाये तथा तालाबों से खुदाई में निकली मिट्टी का प्रयोग खेतों में किया जाये। 3. नये तालाबों का निर्माण किया जाये। 4. प्राकृतिक जल स्रोतों को बर्षा जल से भरा जाये। 5. जिस-जिस मार्ग से वर्षा जल धाराऐं बहती हैं उनमे छोटे-छोटे जल संरक्षण व्यवस्थाओं का निर्माण किया जाये। 6. भू-क्षरण को रोकने का कार्य किया जाये। 7. पहाडि़यों पर जहाँ ढाल कम हो तथा जल बहाव की गति कम हो, अथवा पानी ठहरता/रूकता हो, वहाँ पर उपयुक्त आकार के गड्ढ़े बनाकर पानी रोका जाये। 8. जिन स्थानों पर मुलायम चट्टानें हों ऐसे स्थानों पर बड़े व्यास के कुँओं का निर्माण किया जाये। 9. बुन्देलखण्ड में वर्षा जल 55 प्रतिशत नदियों में बह जाता है, जिसके कारण नदियों में अचानक बाढ़ आ जाती है। ऐसे स्थानों पर वर्षा जल भण्डारण की परियोजनायें बनाई जायें। 10. जिन नालों में फरवरी तक पानी का बहाव रहता है, ऐसे नालों को चिन्हित करके उन पर चेकडैम निश्चित रूप से बनाये जायें। 11. उपग्रहीय चित्रों की सहायता से मृदा की किस्म, वर्षा जल का कैचमेन्ट ऐरिया, ड्रैनेज सिस्टम, बेदरड जैसे राक का पता लगाया जाये तथा उसी अनुसार वाटरशेड प्रबन्धन किया जाये। करणीय अन्य कार्य- स जल के अनुशाषित उपयोग हेतु जन जागरण एवं प्रशिक्षण आयोजित किए जायें। स परंपरागत जल श्रोतों की उपेक्षा न करके उन्हें उपयोगी बनाया जाये। स विभिन्न सरकारी/अर्धसरकारी विभाग जो जल संरक्षण/उपयोग के लिए ़बुन्देलखण्ड में कार्यरत हैं, उनका आपस में तालमेल बनाया जाये, नितान्त आवश्यक है। स सरकारी संस्थाओं/विभागों/स्थानीय समुदायों के बीच सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए जलगम विकास कार्यों जनसहभागिता का कानून बने तथा अनुपालन हो। स प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर जल-मित्र समूह/संगठन खड़ा किया जाये, जो अपनी-अपनी पंचायत के अन्र्तगत जलसंरक्षण/संवर्धन के होने वाले प्र्रत्येक विभाग के कार्यों की सामाजिक मनीटरिंग करें तथा उसका लेखा-जोखा रखकर उसे जिला पंचायत स्तर तक सूचित करें। स मृदा का प्राकृतिक संतुलन एवं उसकी उर्वरता बढ़ाने हेतु गौ-पालन, गौ-संवर्धन व उसके सुप्रबन्धन की व्यवस्थायें सुनिश्चित की जायें। स बुन्देलखण्ड क्षेत्र में वर्षा जल का 24 प्रतिशत वाष्पीकरण होता है, इससे बचाव हेतु पर्यावरण पुनस्र्थापना ;म्बव त्मेजवतंसपवदद्ध आवश्यक है, अतः जहाँ-जहाँ संभव हो परती भूमि, नदी-नालों के किनारे, तालाबों के बंधनों तथा पहाड़ी पर भी वृक्षारोपण किया जाये। स नलकूपों के बीच उचित दूरी रखी जाये तथा नये नलकूप लगाने तथा जल दोहन करने की उचित सीमा निर्धारित की जाये। स पानी के दुबारा प्रयोग के संबन्ध में योजनाऐं बनाई जायें। स औद्योगिक प्रवाह तथा मल-मूत्र युक्त प्रदूषित जल बिना शोधित किए नदी व जलाशयों में न डाला जाये। स ट्यूबवेल तथा नहरों की गूलों को पक्का किया जाये। स सिंचाई की नई तकनीकों (ड्रिप, स्प्रिंकलर आदि) का विकास व प्रसार किया जाये। ु