भारत में यदि सूत्रपात करना है लोक सुधार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।1।।
दिव्य देश के दिग्दिगन्त में स्वर्ण किरण संचार हो।
चारूचित्र पावन चरित्रगत चन्दन का सुविचार हो।
भूख-भ्रान्ति-भय-भ्रष्ट आचरण-शोषण का प्रतिकार हो।
योगेश्वर का शंखनाद हो-गीता का उच्चार हो।
तो फिर समय आगया है अनुबन्धों के एपचार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।2।।
संस्कृति के रंग में जन-मन का रंजन परमावश्यक है।
लोक समाहित विक्रतियों का वर्जन परमावश्यक है।
शास्त्र मनन के साथ शस्त्र का चिन्तन परमावश्यक है।
धर्मचक्र का फिर से क्रान्ति प्रवर्तन परमावश्यक है।
अगर लक्ष्य है दिव्य दृष्टि से सृष्टि के द्वार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।3।।
जन-मन ऊबा, राजनीति के दोषों के दुर्गन्धों से।
घिरती जाती धुन्ध देश में, वेधर्मी के धन्धों से।
होने लगा रिसाव धर्म की धारा के तटबन्धों से।
अब विश्वास उठगया घर के धृतराष्ट्रों से अन्धों से।
यदि नेतृत्व नियत करना है अवसर दो सरकार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।4।।
मेरा नहीं विरोध, शान्ति करूणा औ प्रेमप्रसार पर।
मेरा नहीं विरोध, नागरिक-समानता की धार पर।
है विरोध, कायरता भरे समर्पण के व्यवहार पर।
धर्म नाम पर आतंकी अपसंस्कृति के विस्तार पर।
मूल्य चुकाना है यदि मां के ममता भरे दुलार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।5।।
(1)सिन्धु नदी की लहरें फिर से बड़ी व्यथा से बोली हैं।
(2)लौहकोट-मुल्तान राज्य की धरती फिर से डोली है।
(3)सबल सपादलक्ष्य ने फिर से रची भाल पर रोली है।
किसी वीर ने सोमनाथ पट्टन की खिड़की खोली है।
यदि सटीक उत्तर देना है गजनी की तलवार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।6।।
यदि हमको (4) गुर्जर के गौरव सोमनाथ से आपा है।
भोग भूमि औ मातृभूमि के अन्तर को यदि भांपा है।
तो देखो फिर शिखर महालय (5) पर केशरिया कांपा है।
सनो, कक्ष के रन से गरजे फिर से घोघाबापा (6) है।
परिस्कार यदि करना है फिर संसद के संस्कार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।7।।
उपरोक्त कविता के चिन्हांकित वाक्यांशों का विवरण दिया जा रहा है, जिससे कविता के भाव और उसके संदर्भ को समझा जा सके -
(1) सोमनाथ मन्दिर पर आक्रमण करने वाला मोहम्मद गजनवी अपनी साठ हजार सेना के साथ सिन्धु नदी पार कर आया था।
(2) उसने (गजनी ने) लौहकोट और मुल्तान (मूलस्थान) के राजाओं को पहले से भेजे गये छद्मवेशी फकीरों व औलियों के माध्यम से बरगलाकर, अपने मार्ग को बाधा रहित बना लिया था।
(3) आमेर और अजमेर का संयुक्त राज्य उस समय सपादलक्ष नाम से बोला जाता था, यह नाम सवा लाखरूपये का राजस्व देने वाले राजा के रूप में जाना जाता था। यहां के राजा धर्मगज देव थे जिनसे मोहम्मद गजनवी की सेना पराजित हो गई थी, किन्तु युद्ध के बाद रात में पुनः अपनी सेना को संगठित कर धोखे से धर्मगज देव के सोते हुए सैनिकों पर हमला कर दिया था और आगे बढ़ गया था।
(4) गुर्जर प्रदेश, गुजरात का ही नाम है।
(5) सोमनाथ मन्दिर की विशालता के कारण उसे महालय कहा जाता था।
(6) कच्छ के रेगिस्तान में स्थित घोघा गढ़ के पच्चासी वर्षीय घोघाबापा केवल पांच सौ सैनिकों को लेकर गजनबी की साठहजार सेना से कई दिनों तक अकेले युद्धकर अपना बलिदान दिया था।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।1।।
दिव्य देश के दिग्दिगन्त में स्वर्ण किरण संचार हो।
चारूचित्र पावन चरित्रगत चन्दन का सुविचार हो।
भूख-भ्रान्ति-भय-भ्रष्ट आचरण-शोषण का प्रतिकार हो।
योगेश्वर का शंखनाद हो-गीता का उच्चार हो।
तो फिर समय आगया है अनुबन्धों के एपचार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।2।।
संस्कृति के रंग में जन-मन का रंजन परमावश्यक है।
लोक समाहित विक्रतियों का वर्जन परमावश्यक है।
शास्त्र मनन के साथ शस्त्र का चिन्तन परमावश्यक है।
धर्मचक्र का फिर से क्रान्ति प्रवर्तन परमावश्यक है।
अगर लक्ष्य है दिव्य दृष्टि से सृष्टि के द्वार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।3।।
जन-मन ऊबा, राजनीति के दोषों के दुर्गन्धों से।
घिरती जाती धुन्ध देश में, वेधर्मी के धन्धों से।
होने लगा रिसाव धर्म की धारा के तटबन्धों से।
अब विश्वास उठगया घर के धृतराष्ट्रों से अन्धों से।
यदि नेतृत्व नियत करना है अवसर दो सरकार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।4।।
मेरा नहीं विरोध, शान्ति करूणा औ प्रेमप्रसार पर।
मेरा नहीं विरोध, नागरिक-समानता की धार पर।
है विरोध, कायरता भरे समर्पण के व्यवहार पर।
धर्म नाम पर आतंकी अपसंस्कृति के विस्तार पर।
मूल्य चुकाना है यदि मां के ममता भरे दुलार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।5।।
(1)सिन्धु नदी की लहरें फिर से बड़ी व्यथा से बोली हैं।
(2)लौहकोट-मुल्तान राज्य की धरती फिर से डोली है।
(3)सबल सपादलक्ष्य ने फिर से रची भाल पर रोली है।
किसी वीर ने सोमनाथ पट्टन की खिड़की खोली है।
यदि सटीक उत्तर देना है गजनी की तलवार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।6।।
यदि हमको (4) गुर्जर के गौरव सोमनाथ से आपा है।
भोग भूमि औ मातृभूमि के अन्तर को यदि भांपा है।
तो देखो फिर शिखर महालय (5) पर केशरिया कांपा है।
सनो, कक्ष के रन से गरजे फिर से घोघाबापा (6) है।
परिस्कार यदि करना है फिर संसद के संस्कार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।7।।
उपरोक्त कविता के चिन्हांकित वाक्यांशों का विवरण दिया जा रहा है, जिससे कविता के भाव और उसके संदर्भ को समझा जा सके -
(1) सोमनाथ मन्दिर पर आक्रमण करने वाला मोहम्मद गजनवी अपनी साठ हजार सेना के साथ सिन्धु नदी पार कर आया था।
(2) उसने (गजनी ने) लौहकोट और मुल्तान (मूलस्थान) के राजाओं को पहले से भेजे गये छद्मवेशी फकीरों व औलियों के माध्यम से बरगलाकर, अपने मार्ग को बाधा रहित बना लिया था।
(3) आमेर और अजमेर का संयुक्त राज्य उस समय सपादलक्ष नाम से बोला जाता था, यह नाम सवा लाखरूपये का राजस्व देने वाले राजा के रूप में जाना जाता था। यहां के राजा धर्मगज देव थे जिनसे मोहम्मद गजनवी की सेना पराजित हो गई थी, किन्तु युद्ध के बाद रात में पुनः अपनी सेना को संगठित कर धोखे से धर्मगज देव के सोते हुए सैनिकों पर हमला कर दिया था और आगे बढ़ गया था।
(4) गुर्जर प्रदेश, गुजरात का ही नाम है।
(5) सोमनाथ मन्दिर की विशालता के कारण उसे महालय कहा जाता था।
(6) कच्छ के रेगिस्तान में स्थित घोघा गढ़ के पच्चासी वर्षीय घोघाबापा केवल पांच सौ सैनिकों को लेकर गजनबी की साठहजार सेना से कई दिनों तक अकेले युद्धकर अपना बलिदान दिया था।
- प्रधानाचार्य, गुरूगोविन्द सिंह विद्या मन्दिर इण्टर कालेज, रिखौना, सीतापुर





