रामराज्य एक ऐसे लोकहितकारी एवं लोकतान्त्रिक राज्य व्यवस्था की अवधारणा है, जो हर भारतीय जनमानस का एक सुनहरा सपना है। राम भारतीय मानस के रग-रग में गहराई से बसे हैं। व्यक्ति विशेष की सीमा लाँघकर राम का नाम सबके लिए एक आदर्श प्रतीक के रूप मे स्थापित हो चुका है। यही कारण है कि हमारे समाज मंे व्यापक रूप से एक दूसरे का अभिवादन ‘राम-राम’ द्वारा ही किया जाता है। राम को किसी साम्प्रदायिक सीमा में नहीं बाँधा जा सकता, बल्कि वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप मंे हम सबके लिए आदर्श हैं। राम का नाम आज हमारे लिए शुभ, पूज्य एवं अनुकरणीय बन चुका है। सन्त कबीर, जो साम्प्रदायिक कुरीतियों, सामाजिक विषमता एवं मूर्ति पूजा के घोर विरोधी थे, अपना आराध्य राम को मानते थे। यह अलग बात है कि उनके राम दशरथ के पुत्र नहीं बल्कि सर्वव्यापक, सर्व शक्तिमान निराकार ब्रह्म स्वरूप थे। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी हमारे देश मंे राम राज्य स्थापित करना चाहते थे। गाँधी जी ने जिस राम राज्य का सपना देखा था, उसकी अवधारणा बहुत पहले गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा प्रस्तुत की गई थी।
किसी भी राज्य की महत्ता मुख्य रूप से राजा या शासक के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति यदि कर्मठ, सशक्त और ईमानदार है तो उसके द्वारा जनता का कल्याण होगा। राम का व्यक्तित्व उन्हें अन्य शासकों से बहुत ऊपर स्थापित करता है। रामराज्य यद्यपि राजा के अधीन था किन्तु आन्तरिक लोकतन्त्र तथा प्रजा की इच्छा का वहाँ पर विशेष महत्व था। यहाँ तक कि स्वयं जनता ही राजा को भी कोई जन विरोधी निर्णय लेने से रोक सकती थी। राज्य- सत्ता सँभालने के बाद जनता के बीच अपने प्रथम सम्बोधन मंे श्री राम ने निम्न अपेक्षा की-
सुनहुॅं सकल मम पुरजन बानी।
कहउॅं न कछु ममता उर आनी।।
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई।
सुनहु करहु जो तुमहिं सुहाई।।
सोइ सेवक मम प्रियतम सोई।
मम अनुशासन माने जोई ।।
जौ अनीति कछु भाखहुं भाई।
तौ मोहि बरजेहु भय विसराई ।।
(उत्तर; 42-43)
प्रथम आश्वासन जो श्री राम ने जनता को दिया, वह यह था कि वे कभी भी मोह (लालच), अनीति या सत्ता के अहंकार के अधीन नहीं होंगे। राजा श्रीराम द्वारा जनता के बीच ली गई यह एक महान शपथ थी। यदि आज शासक यह संकल्प ले ले कि वह सत्ता के अहंकार एवं लालच के वशीभूत नहीं होगा तो भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होगा। श्रीराम ने केवल ऐसा कहा ही नहीं, बल्कि अपने कृत्यों द्वारा ऐसा किया भी। उनकी कथनी एवं करनी में भेद नहीं था इसलिए वे जनता के विश्वास पात्र थे। जनता यह देख चुकी थी कि किस प्रकार उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अयोध्या की राज्य सत्ता को ठोकर मारकर वनवास को स्वीकार किया था। इसके अतिरिक्त जनता यह भी देख चुकी थी कि लंका के राजा रावण एवं किश्किन्धा के राजा बालि को मारकर उन्होंने वहाँ की सत्ता स्थानीय प्रतिनिधियों को सौंप दी। उनका ध्येय कुशासन के स्थान पर सुशासन की स्थापना मात्र था। इन उदाहरणों से जन साधारण के बीच यह स्थापित हो चुका था कि उनके राजा श्रीराम को सत्ता का लेशमात्र मोह नहीं है। सत्ता से निर्विकार व्यक्ति जब सत्तासीन होता है जो स्वाभाविक रूप से जन कल्याण होता है।
सत्ता सन्चालन के लिए राजा का निर्विकार होना आवश्यक है परन्तु पर्याप्त नहीं। राजा की स्पष्ट सोच, सन्देश के माध्यम से जन सामान्य तक पहुँचना चाहिए, जिसके आधार पर सत्ता सन्चालित की जाएगी। श्री रामचन्द्र जी ने अपने सम्बोधन में दो सन्देश दिए। पहला सन्देश सेवकों (राज्य कर्मचारियों) से सम्बन्धित था। राज्य कर्मचारियों को राजाज्ञा का पालन करना अनिवार्य था। उन्हें अनुशासित रहने का स्पष्ट निर्देश दिया गया। चाहे लोकतन्त्र हो या राजतन्त्र, यदि सरकारी कर्मचारी राजाज्ञा का पालन नहीं करेंगे तो अराजकता की स्थिति होगी। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे अनुशासित होते हैं तो सत्ता का सन्चालन अच्छी प्रकार से होता रहता है। अनुशासन ही विकास के मार्ग को सुदृढ़ करता है।
श्रीरामचन्द्र जी का दूसरा सन्देश जनसामान्य के लिए था। वे तानाशाही व्यवस्था के घोर विरोधी थे। अपने प्रथम सम्बोधन मे उन्होंने सम्पूर्ण जनता को यह अधिकार दिया कि यदि उनके स्तर से कोई भी जन विरोधी कृत्य (अनीति) हो, तो जनता का कोई भी प्रतिनिधि सीधे उन्हें ऐसा करने से रोक दे। श्री राम ने जनता को विश्वास दिलाया कि ऐसा करने के लिए वे उनकी ओर से भयमुक्त रहें। भयमुक्त जन प्रतिनिधि ही राजा के विरोध में कुछ कह सकने का साहस कर सकता है। इसलिए श्री राम ने अपने तथा अपनी सत्ता की ओर से जनता को भयमुक्त कर दिया।
श्रीरामचन्द्र जी ने अपने प्रथम सम्बोधन में जनता को यह अधिकार दिया कि वे अपने जीवन में सम्यक विचारोपरान्त जैसा उचित समझें वैसा करें। इस प्रकार राम राज्य में श्रीराम ने प्रत्येक नागरिक को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की। उन्होंने हर एक व्यक्ति से कहा कि उन्हें सम्यक विचारोपरान्त जो ठीक लगे वही करें। प्रत्येक नागरिक अपने विवेकानुुसार स्वयं महत्वपूर्ण निर्णय ले एवं निर्भय होकर अपना कार्य करे। श्रीराम ने जनसामान्य पर अपना कोई मत न थोपते हुए उसे विचार, अभिव्यक्ति तथा तदनुसार आचरण की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की। भयग्रस्त व्यक्ति कभी भी स्वविवेकानुसार कार्य नहीं कर सकता। इसलिए श्रीराम ने राज्यसत्ता की ओर से सबको निर्भय करते हुए उन्हें स्वविवेक के अनुसार कार्य करने का आदेश दिया। श्रीराम ने जनसामान्य को यहाॅं तक अधिकार दिया कि उनकी दृष्टि में यदि स्वयं राजा से कोई गलती हो रही है तो वे निर्भय होकर तत्काल उसे रोक दें। इस प्रकार श्रीराम ने प्रारम्भ से ही सत्ता पर जनता का नियन्त्रण स्थापित करते हुए राज्य के प्रत्येक नागरिक को विचार अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान कर दी।
यद्यपि श्रीराम ने जनसामान्य को अपने विवेकानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी किन्तु व्यावहारिक जीवन में कई बार ऐसी असमंजस पूर्ण स्थिति आ जाती है कि व्यक्ति यह निर्णय नहीं ले पाता कि वह क्या करे? किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी आती ही है। तुलसीदास जी ने ऐसी विषम परिस्थिति में निर्णय लेने की प्रक्रिया की ओर संकेत किया है। जब भरत जी श्रीराम को मनाने अयोध्या से चित्रकूट पहुँचते हैं और श्रीराम से वापस अयोध्या लौटने का अनुरोध करते हैं तो श्रीराम के समक्ष अत्यन्त विषम परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। थोड़ी देर के लिए वे किंकर्तव्यविमूढ़ से हो उठते हैं। फिर वशिष्ठ जी उनका पथ प्रदर्शन करते हुए कहते हैं-
भरत विनय सादर सुनिय करिय विचार बहोरि।
करब साधुमत, लोकमत, नृपनय, निगम निचोरि।।
(अयोध्या; 258)
गुरु वशिष्ठ श्रीराम से कहते हैं कि वे पहले भरत के मन की पूरी बात विस्तार से सुने तथा सुनकर उस पर गम्भीरता पूर्वक विचार करें। विचार करते समय वशिष्ठ जी ने चार बातों पर ध्यान देना आवश्यक बताया है-
सर्वप्रथम यह ध्यान देना आवश्यक है कि हम जो करने जा रहे हैं उस पर साधुमत क्या है? हर समाज में कुछ ऐसे निःस्वार्थ समाजसेवी या विद्वान अथवा किसी विधा के विशेषज्ञ होते हैं जो सदैव अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से परे रहते हुए सृष्टि के हित में तल्लीन रहते हैं। ऐसे लोग किसी भी समाज के लिए विशेष आदर के पात्र होते हैं। ऐसे सत्पुरुषों की सोच सदैव कल्याणकारी होती है। अतः राजा हो या प्रजा, प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे महापुरुषों की सम्मति को पर्याप्त महत्व देना चाहिए। भारतीय संविधान के अन्तर्गत राज्यसभा के गठन के मूल में यही भावना निहित है।
सत्पुरुषों के मत के उपरान्त लोकमत पर ध्यान देना आवश्यक बताया गया है। हम जो कुछ करने जा रहे हैं उस पर जनसामान्य की क्या राय है? आज विश्व के समस्त लोकतान्त्रिक देशों में लोकमत या जनमत को पर्याप्त महत्व दिया जाता है। जनमत के महत्व का प्रतिपादन आज से बहुत समय पूर्व तुलसीदास जी द्वारा किया गया है। भारतीय संविधान के अन्तर्गत लोकसभा के गठन के मूल में यही भावना निहित है।
साधुमत एवं लोकमत के उपरान्त नृपनय अर्थात् राजनीति को स्थान दिया गया है। राजा के लिए राजनीति पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है। इसे हम कूटनीति भी कह सकते हैं। हमारे दैनिक जीवन में भी समय-समय पर कूटनीति की आवश्यकता पड़ती है किन्तु इसका स्थान साधुमत एवं लोकमत के बाद ही आता है।
जीवन में पुस्तकीय ज्ञान का विशेष महत्व है। अतः कोई कार्य करते समय साधुमत, लोकमत एवं राजनीति के अतिरिक्त सद्ग्रन्थों के अनुशीलन से बहुत सहायता मिलती है।
उपर्युक्त चारों उपाय निर्णय में सहायता मात्र के लिए हैं। निर्णय तो हमें अन्ततः अपने स्वविवेक से ही लेना है। हमें सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर किया जाने वाला कार्य सदैव कल्याणकारी होता है। श्रीराम अपने राज्य के प्रत्येक नागरिक को सशक्त, स्वतन्त्र एवं समर्थ बनाना चाहते है। इसलिए उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि दूसरों का आश्रय न ग्रहण करते हुए प्रत्येक नागरिक स्वयं सोच विचार कर अपनी स्वमति के अनुरूप निर्णय लेकर कार्य करे। प्रायः यह देखा जाता है कि कभी-कभी व्यक्ति की स्वतन्त्रता स्वच्छन्दता एवं उच्छृंखलता में बदल जाती है। प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर निर्णय लेने की इस प्रक्रिया का पालन करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता कभी भी स्वच्छन्दता में नही बदल सकती।
किसी भी राष्ट्र या समाज के विकसित होने का मूल मन्त्र है कि उसका प्रत्येक नागरिक अपने को पूर्ण स्वतन्त्र समझे एवं कठिन से कठिन परिस्थिति में यथोचित कार्यवाही करने में समर्थ हो। वर्ष 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के समय भारत में रामराज्य स्थापित करने का सपना देखने वाले महात्मा गाँधी ने कहा था-
‘‘परन्तु इससे भी अधिक कुछ आपको करना है जो आपके कार्यक्रम में जान डाल देगा। इसी क्षण से आप सब लोगों को अपने को स्वतन्त्र पुरुष या स्त्री समझना और इस तरह काम करना चाहिए जैसे कि आप स्वतन्त्र हैं और आप पर किसी साम्राज्यवाद का अंकुश नहीं है। यह कोई कपोल कल्पना नहीं है। भौतिक रूप में इसकी प्राप्ति के पहले आपको स्वतन्त्रता की भावना पैदा करनी पड़ेगी। एक दास की जंजीरें तभी टूट जाती हैं, जैसे ही वह अपने को स्वतन्त्र व्यक्ति समझने लगता है।’’
गाँधी जी ने आगे कहा कि बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद हर व्यक्ति स्वंय अपना सेनापति होगा और उससे यह आशा की जायगी कि ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ को कार्यरूप देने के लिए अहिंसा की सीमा के अन्दर ‘करूँगा या मरूँगा’ का व्रत लेगा।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जिस प्रकार के स्वतन्त्र व्यक्तित्व की परिकल्पना महात्मा गाँधी ने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के समय की, वैसा ही स्वतन्त्र एवं समर्थ नागरिक बनने का सन्देश रामराज्य के आरम्भ में श्रीराम ने प्रजा को दिया। इस दृष्टि से हम गाँधी जी के विचारों को तुलसीदास जी के निकट पाते हैं।
रामराज्य में स्वतन्त्रता के इसी अधिकार एवं लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कारण वीर सावरकर ने कहा था-
‘‘आखिर रामायण में ऐसा क्या है कि वह गंगा की तरह भारतवासियों के अन्तःकरण में आज तक बहती ही चली आ रही है? मेरी सम्मति में रामायण लोकतन्त्र का आदि शास्त्र है- ऐसा शास्त्र जो लोकतन्त्र की कहानी ही नहीं सुनाता, लोकतन्त्र का प्रहरी, पे्ररक एवं निर्माता भी है। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि अगर मैं इस देश (ब्रिटेन) का डिटेक्टर (तानाशाह) होता तो सबसे पहले रामायण पर प्रतिबन्ध लगाता क्योंकि जब तक यहाँ रामायण है तब तक इस देश में कोई डिटेक्टर पनप नहीं सकता तथा स्वाधीनता की भावना को कोई कुचल नहीं सकता।’’
इसी प्रकार अनेक स्वाधीनता सेनानियों द्वारा रामायण एवं रामचरितमानस में वर्णित अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक मर्यादा की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है।
किसी भी सत्ता के कुशल संचालन हेतु मजबूत आर्थिक व्यवस्था आवश्यक है। राजकोष हेतु जनता से कर लेना राजा की मजबूरी है। आर्थिक रूप से सम्पन्न होने पर ही शासन सुदृढ़ एवं प्रभावी हो सकता है। तुलसीदास जी ने इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। राजा को प्रजा से कर इस प्रकार लेना चाहिये कि प्रजा को लेश मात्र कष्ट न हो, तुलसीदास जी ने जनहितकारी राज्य को सूर्य के समान माना है जो पृथ्वी से जल खींचता है तो उससे किसी को कष्ट नहीं होता तथा वर्षाकाल में वही जल धरती का भरण-पोषण करता है-
बरसत हरसत लोग सब, करसत लखै न कोइ।
तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सम होइ।।
श्री राम का व्यक्तित्व इतना महान था कि उनके सामने आने वाला व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था। रावण द्वारा ठुकराए जाने पर जब विभीषण श्री राम के पास आते हैं तो उनके हृदय के किसी कोने में राज्य की अभिलाषा थी किन्तु श्री राम को देखते ही उनकी सारी वासना दूर हो जाती है -
उर कछु प्रथम वासना रही।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
(सुन्दर; 48-49)
ऐसा वासनाहीन व्यक्ति राज्य सन्चालन हेतु सर्वाधिक उपयुक्त होता है। इसीलिए विभीषण से मिलते ही श्री राम ने उन्हें लंका का राजा घोषित कर दिया -
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरस अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहिं सारा।
सुमन वृष्टि नभ भई अपारा ।।
(सुन्दर; 48-49)
राजा का एक मुख्य गुण यह है कि जो भी उसकी शरण में जाय, उसकी तत्काल सहायता करे तथा उसे अपना ले। यदि प्रजा को कोई कष्ट है और वह निदान हेतु राजा से अनुरोध करती है तो अपना व्यक्तिगत हित भूलकर राजा को उसकी समस्या का समाधान तत्काल करना चाहिए। जो राजा ऐसा नहीं करता, वह पाप का भागीदार है तथा उसे राजा बने रहने का अधिकार नहीे है। स्वयं श्री राम का यही मत था तथा उन्होंने तदनुसार ही आचरण किया-
सरनागत कहुॅं जे तजहिं, निज अनहित अनुमानि।
ते नर पाॅवर पापमय, तिन्हहिं विलोकत हानि।।
(सुन्दर; 43)
राज्य सन्चालन हेतु चित्रकूट से भरत को अयोध्या वापस भेजते समय श्री राम ने भरत को संक्षेप मे राजा का गुण बताते हुए कहा-
मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान कहुॅं एक।
पालइ पोशइ सकल अॅंग, तुलसी सहित विवेक।।
(अयोध्या; 315)
अर्थात् मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने पीने को तो अकेला है परन्तु विवेक पूर्वक सब अंगों का पालन पोषण करता है। भाव यह है कि यद्यपि राज्य के सारे संसाधन राजा के अधीन रहते हैं किन्तु उसे उसका प्रयोग विवेक सहित समस्त जनता के हित में करना चाहिये। मुख के रूपक से तुलसीदास जी ने इस विचार को प्रभावी अभिव्यक्ति प्रदान की है। जिस प्रकार मुख द्वारा स्वीकार की जाने वाली प्रत्येक खाद्य सामग्री का उपयोग पूरे शरीर के लिये समान रूप से होता है उसी प्रकार राजा के द्वारा ग्रहण किए जाने वाले संसाधन तथा उसकी सत्ता का उपयोग समस्त जनता के हित में किया जाना चाहिए। राजा ही नहीं, पूँजीपतियों के लिए भी यही सिद्धान्त हितकर है। पूँजीपति एवं समृद्ध वर्ग को अपनी सम्पत्ति का उपयोग गरीबों के हित में करना चाहिये। वस्तुतः पूँजीपति को अपनी सम्पत्ति का मालिक नहीं बल्कि संरक्षक मात्र समझना चाहिए। इससे अहिंसक तरीके से सामाजिक समानता की स्थापना में सहायता मिलेगी। इस प्रकार श्री राम ने भरत को दिए गए अपने सन्देश में आर्थिक विकेन्द्रीकरण की आधार शिला रखी है। यही महात्मा गाँधी का ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त है। आचार्य कृपलानी जी गाँधी जी की विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
‘‘ट्रस्टी शब्द का अर्थ ही है कि वह मालिक नहीं है। मालिक तो वही है जिसके हित संरक्षण का कार्य उसके सुपुर्द हुआ है। अहमदाबाद की कपड़ा मिलों के मजदूरों के साथ बातचीत करते हुए गाँधी जी ने उनसे कहा था कि मिलों के असली मालिक तो तुम्हीं हो, क्योंकि पूँजीपति के धन-सम्पत्ति के मुकाबले तुम्हारा श्रम कहीं बहुमूल्य है।’’
इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए कृपलानी जी कहते हैं-
‘‘ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त का गाँधी जी ने प्रतिपादन किया, जिसे ठीक से समझने की जरूरत है। जीवन के सभी क्षेत्रों पर यह लागू होता है। माता-पिता बालकों के ट्रस्टी के रूप में ही कार्य करते हैं। सरकार भी जनता के ट्रस्टी के रूप में कार्य करती है अथवा उसे करना चाहिए।’’
गाँधी जी के ट्रस्टीशिप के इसी सिद्धान्त को तुलसीदास जी ने मुख के उदाहरण से बहुत पहले ही समाज के सामने रखा।
संक्षेप मे राजा का उद्देश्य है- प्रजा को स्वस्थ, सम्पन्न एवं प्रसन्न बनाए रखना। सुराज की स्थापना हेतु शासक को अपना तन, मन और धन सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिए। यही राजा के लिए शुभ एवं कल्याणकारी है। जिस राजा के राज्य में प्रजा दुःखी रहती है, उसे जीवन में तो अशान्ति मिलती ही है, मृत्यु के उपरान्त भी उसकी प्रताड़ना समाप्त नहीं होती-
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।
(अयोध्या; 70-71)
श्रीराम की यही स्पष्ट अवधारणा थी तथा उन्होने अपने कार्यकलापों मे इस बात का सदैव ध्यान रखा। किसी भी परिवार, राष्ट्र अथवा समाज की उन्नति तभी सम्भव है जब उसके सारे सदस्य परिश्रमी हों। आलस्य प्रगति का दुश्मन है तथा परिश्रम सफलता की कुंजी है। प्रायः यह देखा जाता है कि लोग परिश्रम कर भौतिक उन्नति करते हैं तथा उसके बाद विलासी हो जाते हैं। यहीं से उनका पतन प्रारम्भ हो जाता है। विकसित राष्ट्र वह है जहाँ अमीर और गरीब, राजा और प्रजा सभी परिश्रम करते हों। परिश्रमी व्यक्तित्व सर्वदा सुखी और प्रसन्न रहता है। परिश्रम से भौतिक समृद्धि तो बढ़ती ही है, शरीर भी स्वस्थ रहता है। इसलिए तन, मन और धन तीनों के विकास के लिए परिश्रम आवश्यक है। रामराज्य में श्रम की महत्ता सर्वोपरि थी। स्वयं सीता जी, जो महारानी थीं तथा जिनके घर मंे कार्य करने के लिए अनेक सेवक थे, अपने घर के समस्त कार्य स्वयं करती थीं-
यद्यपि गृह सेवक सेवकिनी।
विपुल सदा सेवा विधि गुनी।।
निज कर गृह परिचरजा करई।
रामचन्द्र आयसु अनुसरई।
(उत्तर; 23-24)
जिस राज्य की महारानी ऐसी परिश्रमी होगी, वहाँ की प्रजा तो उसका अनुसरण करेगी ही। इस प्रकार ‘श्रमेव जयते’ रामराज्य का स्वाभाविक आदर्श था जिसे राजा तथा प्रजा सभी ने हृदयंगम कर रखा था।
रामराज्य की सबसे बड़ी विशेषता थी, बैर भाव का अभाव। श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे एवं सभी से पे्रम करते थे। उनकी न तो कोई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा थी और न ही कोई लालच। जिस कैकेई ने उनसे राज्य सिंहासन छीना, उस कैकेई को उन्होंने माँ से बढ़कर माना। राज्यसत्ता तो उनके और भरत के बीच फुटबाल जैसी एक दूसरे की ओर फेंकी जाती रही। ऐसी स्थिति की परिकल्पना भी आज के युग में कठिन है। रामराज्य मे विषमता एवं बैर का पूर्णतः अभाव था-
बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विशमता खोई।।
(उत्तर; 20-21)
एक ऐसा राज्य जहाँ न कोई बैर हो और न ही कोई विषमता, आश्चर्यजनक लगता है। कैसे स्थापित हो सका ऐसा राज्य? वस्तुतः राम का व्यक्तित्व इसका मूल कारण है। इसी व्यक्तित्व के कारण समाज ने राम को इन्सान से भगवान तथा रामराज्य को हर भारतीय का सपना बना दिया। किन्तु केवल राजा का व्यक्तित्व रामराज्य स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रजा का सहयोग हर कदम पर अपेक्षित है। राम के राज्य मंे सभी एक दूसरे से पे्रम करते हैं तथा नीति का पालन करते हुए अपने जीवन पथ पर दृढ़ता से चलते हैं-
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।
(उत्तर; 20-21)
समाज में व्याप्त यह अनुकरणीय प्रेम, जाति, धर्म एवं अन्य सभी भेदों से परे है। जिस समाज के सभी व्यक्ति अपने-अपने जीवन पथ पर दृढ़ता से चलेंगे, एक दूसरे के मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेंगे तथा एक दूसरे से पे्रम करेंगे, वह समाज अनुकरणीय एवं आदर्श होगा, इसमे कोई सन्देह नहीं है। यह एक दुःखद सत्य है कि राम, कृष्ण से लेकर गौतम बुद्ध, ईसा एवं महात्मा गाँधी तक सभी ने धरती पर पे्रम का सन्देश देने का प्रयास किया किन्तु पे्रम का पाठ सम्यक रूप से मानव द्वारा आज तक हृदयंगम नहीं किया जा सका। पे्रम के अभाव में चरम भौतिक समृद्धि भी पूर्णतः सुख शान्ति को स्थापित नहीं कर सकती। आज की दुनियाँ धीरे-धीरे इस तथ्य को समझ रही है। शायद इसीलिए अति विकसित राष्ट्रों का रुझान अब अध्यात्म की ओर हो रहा है और अब उनको महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तित्व याद आने लगे हैं। राम राज्य में परस्पर प्रेम की यह अवधारणा उसे उत्कृष्ट बनाती है।
रामराज्य वस्तुतः प्रेम का साम्राज्य था। आधुनिक युग में व्याप्त विषमता, छल एवं स्वार्थ के वातावरण मंे बहुत से लोग सम्भवतः ऐसे राज्य की परिकल्पना भी न कर सकेंगे। ऐसा प्रेम किसी जादुई शक्ति के कारण नहीं था बल्कि एक दूसरे से प्रगाढ़ रूप से जुड़ने के मूल मंे प्राचीन उदात्त दर्शन था, जिसे सारे लोग जानते और मानते थे। राम मंे सारी प्रजा परमात्मा का दर्शन करती थी तथा समस्त जीवों की आत्मा मंे उसे परमात्मा का ही अंश दृष्टिगोचर होता था। जिस व्यक्ति को समस्त जीवों की आत्मा में परमात्मा का दर्शन होने लगे, वह किसी का विरोध कर ही नहीे सकता। यही रामराज्य का आध्यात्मिक आदर्श था जिसे उनकी समस्त प्रजा ने हृदयंगम किया। तुलसीदास जी ने इसकी सशक्त अभिव्यक्ति निम्न पंक्तियों में की है-
उमा जे राम चरन रत, विगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत, केहिं सन करहिं विरोध।।
(उत्तर; 112)
ऐसा महान व्यक्तित्व सभी से नतमस्तक होता है तथा सभी को प्रणाम करता है-
सीय राम मय सब जग जानी।
करउॅं प्रणाम जोरि जुग पानी।।
(बाल; 7-8)
इस आध्यात्मिक धरातल पर पहुँचने पर काम, क्रोध एवं लोभ आदि बहुत पीछे छूट जाते हैं। आज के युग की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि सभी जानते हैं कि हर जीव में ईश्वर का निवास है, फिर भी हम में केवल सभी जीवों का अपने स्वार्थ हेतु निष्ठुरता से उपभोग करते हैं बल्कि उनका जीवन तक समाप्त कर देने मंे कोई संकोच नहीं करते।
आपस मंे निश्छल प्रेम रामराज्य की मूल विशेषता है। जिस समाज में छल और कपट न हो, वहाँ प्रेम स्वयमेव स्थापित हो जाता है। श्रीराम का व्यक्तित्व इतना विराट है कि उनके सानिध्य मे आने वाला व्यक्ति भी छल कपट से मुक्त हो जाता है। श्रीराम के लंका पहुँचने के उपरान्त रावण ने राम की सेना का समाचार लेने के लिए गुप्तचर भेजा। वह दूत कपट कर कपि देह धारण कर राम की सेना मे भ्रमण करने लगा। श्रीराम के गुणों से वह इतना प्रभावित हुआ कि वह सारा छल कपट भूल गया और अपने मूल स्वरूप में आ गया-
जबहिं विभीषन प्रभु पहिं आए। पाछे रावन दूत पठाए।।
सकल चरित तिन्ह देखे, धरे कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदय सराहहिं, सरनागत पर नेह।।
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
(सुन्दर; 51)
आज हम प्रगति के अहंकार में चाहे जितना मतवाले हो जांय, धरती पर वास्तविक सुख-शान्ति, पे्रम और भाई चारे के बिना सम्भव नहीं है। आध्यात्मिक उत्थान के बिना भौतिक प्रगति बन्दर के हाथ में तलवार के सदृश है। आज दुनियाँ बारूद के ढेर के समान हो गई है, जिसे छोटी सी चिनगारी भी क्षणमात्र मे भस्म कर सकती है। वैज्ञानिक प्रगति ने वह आत्मघाती चिनगारी मानव के हाथ मे दे दी है। पे्रम ही वह शक्ति है जो मानव को इस चिनगारी का प्रयोग करने से रोक सकती है। अतः आज के युग का सबसे बड़ा ज्ञानी और विज्ञानी वही है जो मानव से मानव के बीच की दूरी कम कर सके। महान कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने इस ओर बहुत पहले समाज का ध्यान आकृष्ट किया था-
व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय।
पर न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय।
श्रेय उसका बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत।
श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीति।
एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान।
तोड़ दे जो बस, वही ज्ञानी वही विद्वान।
प्राचीन काल मंे पुरुष लोग प्रायः एक से अधिक विवाह करते थे। स्वयं श्रीराम के पिता महाराज दशरथ ने तीन विवाह किये थे। राजा, महाराजा एवं सम्पन्न लोगों का बहु विवाह, उस काल में सामान्य बात थी। बहुपत्नी प्रथा के उस युग में भी श्रीराम द्वारा एक पत्नी व्रत का आदर्श जनता के सामने रखा गया। स्वयं श्रीराम एवं उनके भाइयों ने मात्र एक विवाह किया। श्रीराम के आदर्श का अनुसरण करते हुए सारी प्रजा ने भी एक पत्नी व्रत के आदर्श का पालन किया-
एक नारि व्रत रत सब झारी।
ते मन वच क्रम पति हितकारी।।
(उत्तर; 21-22)
पतिव्रत धर्म के साथ पत्नी व्रत धर्म की अवधारणा उस युग के पुरुष प्रधान समाज के लिए क्रान्तिकारी विचार था जिससे पुरुष प्रधान समाज प्रायः कतराता था। किन्तु तुलसीदास जी ने मजबूती के साथ समानता के आधार पर इसे प्रस्तुत किया। जब पति अपनी पत्नी के प्रति पूर्णतः समर्पित होगा तो पत्नी उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देगी, यह स्वाभाविक ही है। पारिवारिक सम्बन्धों की मजबूत डोर का यही दृढ़ आधार है।
असामान्य रूप से बढ़ती जनसंख्या तीव्रतम विकास को भी निष्प्रभावी बना देती है। श्रीराम ने इसके महत्व को समझते हुये स्वयं सीमित परिवार के आदर्श को अपनाया। श्रीराम एवं उनके सभी भाइयों के दो ही पुत्र थे-
दुइ सुत सुन्दर सीता जाए। लवकुश वेद पुरानन गाए।
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।
(उत्तर; 24-25)
श्रीराम के राज्य मंे विद्वानों, ऋषियों एवं मुनियांे का विशेष सम्मान था। प्राचीन काल में ऋषि एवं मुनि जंगल में रहकर तपस्या एवं ज्ञानार्जन करते थे। ऐसे मनीषियों को न तो सांसारिक सुखों की लिप्सा थी और न ही भौतिक समृद्धि अथवा यश की चाह। ऐसे महान ऋषि ज्ञान के आलोक से सृष्टि को आलोकित करते थे। समस्त प्रजा एवं यहाँ तक कि राजा भी ऐसे ऋषियों के चरणों में अपना मस्तक झुकाता था। श्रीराम को जब वनवास दिया गया, तो उन्हें इसलिये विशेष प्रसन्नता हुई कि वहाँ मुनियों के दुर्लभ दर्शन होंगे-
मुनि गन मिलन विशेष वन सबहिं भाॅंति हित मोर।
(अयोध्या; 41)
राम के राज्य में ऋषियों एवं मुनियों को विशेष सम्मान एवं संरक्षण प्राप्त था। जिस समाज में प्रतिभा का सम्मान होता है, वह समाज सदैव उन्नति करता है। श्रीराम के काल के ये ऋषि ज्ञान, विज्ञान एवं दर्शन के केन्द्र तो थे ही, इनका आचरण भी महान था। इनके समस्त कार्य जनता के हित के लिए ही होते थे। इन ऋषियों का किसी भी कार्य मंे कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता था। तुलसीदास जी नें कपास के उदाहरण से साधु पुरुषों के चरित्र की बड़ी प्रभावी अभिव्यक्ति की है-
साधु चरित शुभ चरित कपासू।
निरस विसद गुनमय फल जासू।।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।
वन्दनीय जेहिं जग जस पावा।।
(बाल; 1-2)
भाव यह है कि जैसे कपास का धागा सुई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढकता है अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने एवं बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप मे परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढकता है, उसी प्रकार सन्त भी स्वयं कष्ट सहकर दूसरों के दोषों को ढकते हैं तथा उसका निवारण करते हैं।
वास्तव मंे सम्पन्न व्यक्ति का धन, श्रेष्ठ मनीषियों की कीर्ति एवं विद्वानों का सृजन तभी सार्थक है जब उससे सभी का कल्याण हो-
कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कर हित होई।।
(बाल; 13)
जिस समाज के ज्ञान, विज्ञान एवं शोध के समस्त केन्द्र जन हित से जुड़ जाएँ, उस समाज की उन्नति को कोई रोक नहीं सकता।
जब राजा और प्रजा ऐसे गुणों से सम्पन्न होगी तो भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास अवश्यम्भावी है। रामराज्य आदर्श राज्य इसलिए है कि उसमें भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक समृद्धि भी है। सब प्रकार की सम्पन्नता का वर्णन तुलसीदास जी ने इन शब्दों में किया है-
अल्प मष्त्यु नहिं कवनिउॅं पीरा।
सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब निर्दभ्ंा धरमरत पुनी।
नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।
सब गुनग्य पण्डित सब ग्यानी।
सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ।।
(उत्तर; 20-21)
राम राज्य में सभी शिक्षित थे। अशिक्षा का घना अन्धकार विकास के प्रकाश को सदैव अवरुद्ध करता है। अशिक्षा के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के अन्ध विश्वास एवं कुरीतियाँ व्याप्त होकर धीरे-धीरे समाज के पतन का कारण बनती हैं। चूँकि राम राज्य में अशिक्षा का अभाव था अतः वह एक विकसित समाज था।
राम राज्य की एक प्रमुख विशेषता सबका कृतज्ञ होना है। समाज में सभी का विकास एक दूसरे की सहायता से होता है। जिस समाज के हर व्यक्ति में एक दूसरे की सहायता करने का भाव विद्यमान हो, वह समाज उत्कृष्ट होगा, इसमे कोई सन्देह नहीं है। सहअस्तित्व की भावना का विकास, प्रगति का मूल मन्त्र है।
राम राज्य में सभी विद्वान, गुणी एवं सम्पन्न थे किन्तु किसी में कोई अहंकार न था। सभी दम्भ रहित थे। अहंकार अच्छे से अच्छे व्यक्ति का विनाश कर देता है। इसलिए उदात्त व्यक्ति अहंकार से रहित होता है। प्राचीन काल की शिक्षा ही ऐसी थी जो व्यक्ति को अहंकार से दूर करती थी जैसा कि ‘विद्या ददाति विनयम्’ के सूत्र से स्पष्ट होता है।
श्री रामचन्द्र एवं उनकी प्रजा के इन्हीं दुर्लभ गुणों के कारण राम राज्य में सभी स्वस्थ, सम्पन्न एवं प्रसन्न थे। इसी रामराज्य का सपना राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी देखा करते थे।
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख वन संरक्षक, उत्तर प्रदेश,17, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ।
किसी भी राज्य की महत्ता मुख्य रूप से राजा या शासक के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति यदि कर्मठ, सशक्त और ईमानदार है तो उसके द्वारा जनता का कल्याण होगा। राम का व्यक्तित्व उन्हें अन्य शासकों से बहुत ऊपर स्थापित करता है। रामराज्य यद्यपि राजा के अधीन था किन्तु आन्तरिक लोकतन्त्र तथा प्रजा की इच्छा का वहाँ पर विशेष महत्व था। यहाँ तक कि स्वयं जनता ही राजा को भी कोई जन विरोधी निर्णय लेने से रोक सकती थी। राज्य- सत्ता सँभालने के बाद जनता के बीच अपने प्रथम सम्बोधन मंे श्री राम ने निम्न अपेक्षा की-
सुनहुॅं सकल मम पुरजन बानी।
कहउॅं न कछु ममता उर आनी।।
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई।
सुनहु करहु जो तुमहिं सुहाई।।
सोइ सेवक मम प्रियतम सोई।
मम अनुशासन माने जोई ।।
जौ अनीति कछु भाखहुं भाई।
तौ मोहि बरजेहु भय विसराई ।।
(उत्तर; 42-43)
प्रथम आश्वासन जो श्री राम ने जनता को दिया, वह यह था कि वे कभी भी मोह (लालच), अनीति या सत्ता के अहंकार के अधीन नहीं होंगे। राजा श्रीराम द्वारा जनता के बीच ली गई यह एक महान शपथ थी। यदि आज शासक यह संकल्प ले ले कि वह सत्ता के अहंकार एवं लालच के वशीभूत नहीं होगा तो भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होगा। श्रीराम ने केवल ऐसा कहा ही नहीं, बल्कि अपने कृत्यों द्वारा ऐसा किया भी। उनकी कथनी एवं करनी में भेद नहीं था इसलिए वे जनता के विश्वास पात्र थे। जनता यह देख चुकी थी कि किस प्रकार उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अयोध्या की राज्य सत्ता को ठोकर मारकर वनवास को स्वीकार किया था। इसके अतिरिक्त जनता यह भी देख चुकी थी कि लंका के राजा रावण एवं किश्किन्धा के राजा बालि को मारकर उन्होंने वहाँ की सत्ता स्थानीय प्रतिनिधियों को सौंप दी। उनका ध्येय कुशासन के स्थान पर सुशासन की स्थापना मात्र था। इन उदाहरणों से जन साधारण के बीच यह स्थापित हो चुका था कि उनके राजा श्रीराम को सत्ता का लेशमात्र मोह नहीं है। सत्ता से निर्विकार व्यक्ति जब सत्तासीन होता है जो स्वाभाविक रूप से जन कल्याण होता है।
सत्ता सन्चालन के लिए राजा का निर्विकार होना आवश्यक है परन्तु पर्याप्त नहीं। राजा की स्पष्ट सोच, सन्देश के माध्यम से जन सामान्य तक पहुँचना चाहिए, जिसके आधार पर सत्ता सन्चालित की जाएगी। श्री रामचन्द्र जी ने अपने सम्बोधन में दो सन्देश दिए। पहला सन्देश सेवकों (राज्य कर्मचारियों) से सम्बन्धित था। राज्य कर्मचारियों को राजाज्ञा का पालन करना अनिवार्य था। उन्हें अनुशासित रहने का स्पष्ट निर्देश दिया गया। चाहे लोकतन्त्र हो या राजतन्त्र, यदि सरकारी कर्मचारी राजाज्ञा का पालन नहीं करेंगे तो अराजकता की स्थिति होगी। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे अनुशासित होते हैं तो सत्ता का सन्चालन अच्छी प्रकार से होता रहता है। अनुशासन ही विकास के मार्ग को सुदृढ़ करता है।
श्रीरामचन्द्र जी का दूसरा सन्देश जनसामान्य के लिए था। वे तानाशाही व्यवस्था के घोर विरोधी थे। अपने प्रथम सम्बोधन मे उन्होंने सम्पूर्ण जनता को यह अधिकार दिया कि यदि उनके स्तर से कोई भी जन विरोधी कृत्य (अनीति) हो, तो जनता का कोई भी प्रतिनिधि सीधे उन्हें ऐसा करने से रोक दे। श्री राम ने जनता को विश्वास दिलाया कि ऐसा करने के लिए वे उनकी ओर से भयमुक्त रहें। भयमुक्त जन प्रतिनिधि ही राजा के विरोध में कुछ कह सकने का साहस कर सकता है। इसलिए श्री राम ने अपने तथा अपनी सत्ता की ओर से जनता को भयमुक्त कर दिया।
श्रीरामचन्द्र जी ने अपने प्रथम सम्बोधन में जनता को यह अधिकार दिया कि वे अपने जीवन में सम्यक विचारोपरान्त जैसा उचित समझें वैसा करें। इस प्रकार राम राज्य में श्रीराम ने प्रत्येक नागरिक को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की। उन्होंने हर एक व्यक्ति से कहा कि उन्हें सम्यक विचारोपरान्त जो ठीक लगे वही करें। प्रत्येक नागरिक अपने विवेकानुुसार स्वयं महत्वपूर्ण निर्णय ले एवं निर्भय होकर अपना कार्य करे। श्रीराम ने जनसामान्य पर अपना कोई मत न थोपते हुए उसे विचार, अभिव्यक्ति तथा तदनुसार आचरण की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की। भयग्रस्त व्यक्ति कभी भी स्वविवेकानुसार कार्य नहीं कर सकता। इसलिए श्रीराम ने राज्यसत्ता की ओर से सबको निर्भय करते हुए उन्हें स्वविवेक के अनुसार कार्य करने का आदेश दिया। श्रीराम ने जनसामान्य को यहाॅं तक अधिकार दिया कि उनकी दृष्टि में यदि स्वयं राजा से कोई गलती हो रही है तो वे निर्भय होकर तत्काल उसे रोक दें। इस प्रकार श्रीराम ने प्रारम्भ से ही सत्ता पर जनता का नियन्त्रण स्थापित करते हुए राज्य के प्रत्येक नागरिक को विचार अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान कर दी।
यद्यपि श्रीराम ने जनसामान्य को अपने विवेकानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी किन्तु व्यावहारिक जीवन में कई बार ऐसी असमंजस पूर्ण स्थिति आ जाती है कि व्यक्ति यह निर्णय नहीं ले पाता कि वह क्या करे? किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी आती ही है। तुलसीदास जी ने ऐसी विषम परिस्थिति में निर्णय लेने की प्रक्रिया की ओर संकेत किया है। जब भरत जी श्रीराम को मनाने अयोध्या से चित्रकूट पहुँचते हैं और श्रीराम से वापस अयोध्या लौटने का अनुरोध करते हैं तो श्रीराम के समक्ष अत्यन्त विषम परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। थोड़ी देर के लिए वे किंकर्तव्यविमूढ़ से हो उठते हैं। फिर वशिष्ठ जी उनका पथ प्रदर्शन करते हुए कहते हैं-
भरत विनय सादर सुनिय करिय विचार बहोरि।
करब साधुमत, लोकमत, नृपनय, निगम निचोरि।।
(अयोध्या; 258)
गुरु वशिष्ठ श्रीराम से कहते हैं कि वे पहले भरत के मन की पूरी बात विस्तार से सुने तथा सुनकर उस पर गम्भीरता पूर्वक विचार करें। विचार करते समय वशिष्ठ जी ने चार बातों पर ध्यान देना आवश्यक बताया है-
सर्वप्रथम यह ध्यान देना आवश्यक है कि हम जो करने जा रहे हैं उस पर साधुमत क्या है? हर समाज में कुछ ऐसे निःस्वार्थ समाजसेवी या विद्वान अथवा किसी विधा के विशेषज्ञ होते हैं जो सदैव अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से परे रहते हुए सृष्टि के हित में तल्लीन रहते हैं। ऐसे लोग किसी भी समाज के लिए विशेष आदर के पात्र होते हैं। ऐसे सत्पुरुषों की सोच सदैव कल्याणकारी होती है। अतः राजा हो या प्रजा, प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे महापुरुषों की सम्मति को पर्याप्त महत्व देना चाहिए। भारतीय संविधान के अन्तर्गत राज्यसभा के गठन के मूल में यही भावना निहित है।
सत्पुरुषों के मत के उपरान्त लोकमत पर ध्यान देना आवश्यक बताया गया है। हम जो कुछ करने जा रहे हैं उस पर जनसामान्य की क्या राय है? आज विश्व के समस्त लोकतान्त्रिक देशों में लोकमत या जनमत को पर्याप्त महत्व दिया जाता है। जनमत के महत्व का प्रतिपादन आज से बहुत समय पूर्व तुलसीदास जी द्वारा किया गया है। भारतीय संविधान के अन्तर्गत लोकसभा के गठन के मूल में यही भावना निहित है।
साधुमत एवं लोकमत के उपरान्त नृपनय अर्थात् राजनीति को स्थान दिया गया है। राजा के लिए राजनीति पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है। इसे हम कूटनीति भी कह सकते हैं। हमारे दैनिक जीवन में भी समय-समय पर कूटनीति की आवश्यकता पड़ती है किन्तु इसका स्थान साधुमत एवं लोकमत के बाद ही आता है।
जीवन में पुस्तकीय ज्ञान का विशेष महत्व है। अतः कोई कार्य करते समय साधुमत, लोकमत एवं राजनीति के अतिरिक्त सद्ग्रन्थों के अनुशीलन से बहुत सहायता मिलती है।
उपर्युक्त चारों उपाय निर्णय में सहायता मात्र के लिए हैं। निर्णय तो हमें अन्ततः अपने स्वविवेक से ही लेना है। हमें सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर किया जाने वाला कार्य सदैव कल्याणकारी होता है। श्रीराम अपने राज्य के प्रत्येक नागरिक को सशक्त, स्वतन्त्र एवं समर्थ बनाना चाहते है। इसलिए उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि दूसरों का आश्रय न ग्रहण करते हुए प्रत्येक नागरिक स्वयं सोच विचार कर अपनी स्वमति के अनुरूप निर्णय लेकर कार्य करे। प्रायः यह देखा जाता है कि कभी-कभी व्यक्ति की स्वतन्त्रता स्वच्छन्दता एवं उच्छृंखलता में बदल जाती है। प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर निर्णय लेने की इस प्रक्रिया का पालन करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता कभी भी स्वच्छन्दता में नही बदल सकती।
किसी भी राष्ट्र या समाज के विकसित होने का मूल मन्त्र है कि उसका प्रत्येक नागरिक अपने को पूर्ण स्वतन्त्र समझे एवं कठिन से कठिन परिस्थिति में यथोचित कार्यवाही करने में समर्थ हो। वर्ष 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के समय भारत में रामराज्य स्थापित करने का सपना देखने वाले महात्मा गाँधी ने कहा था-
‘‘परन्तु इससे भी अधिक कुछ आपको करना है जो आपके कार्यक्रम में जान डाल देगा। इसी क्षण से आप सब लोगों को अपने को स्वतन्त्र पुरुष या स्त्री समझना और इस तरह काम करना चाहिए जैसे कि आप स्वतन्त्र हैं और आप पर किसी साम्राज्यवाद का अंकुश नहीं है। यह कोई कपोल कल्पना नहीं है। भौतिक रूप में इसकी प्राप्ति के पहले आपको स्वतन्त्रता की भावना पैदा करनी पड़ेगी। एक दास की जंजीरें तभी टूट जाती हैं, जैसे ही वह अपने को स्वतन्त्र व्यक्ति समझने लगता है।’’
गाँधी जी ने आगे कहा कि बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद हर व्यक्ति स्वंय अपना सेनापति होगा और उससे यह आशा की जायगी कि ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ को कार्यरूप देने के लिए अहिंसा की सीमा के अन्दर ‘करूँगा या मरूँगा’ का व्रत लेगा।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जिस प्रकार के स्वतन्त्र व्यक्तित्व की परिकल्पना महात्मा गाँधी ने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के समय की, वैसा ही स्वतन्त्र एवं समर्थ नागरिक बनने का सन्देश रामराज्य के आरम्भ में श्रीराम ने प्रजा को दिया। इस दृष्टि से हम गाँधी जी के विचारों को तुलसीदास जी के निकट पाते हैं।
रामराज्य में स्वतन्त्रता के इसी अधिकार एवं लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कारण वीर सावरकर ने कहा था-
‘‘आखिर रामायण में ऐसा क्या है कि वह गंगा की तरह भारतवासियों के अन्तःकरण में आज तक बहती ही चली आ रही है? मेरी सम्मति में रामायण लोकतन्त्र का आदि शास्त्र है- ऐसा शास्त्र जो लोकतन्त्र की कहानी ही नहीं सुनाता, लोकतन्त्र का प्रहरी, पे्ररक एवं निर्माता भी है। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि अगर मैं इस देश (ब्रिटेन) का डिटेक्टर (तानाशाह) होता तो सबसे पहले रामायण पर प्रतिबन्ध लगाता क्योंकि जब तक यहाँ रामायण है तब तक इस देश में कोई डिटेक्टर पनप नहीं सकता तथा स्वाधीनता की भावना को कोई कुचल नहीं सकता।’’
इसी प्रकार अनेक स्वाधीनता सेनानियों द्वारा रामायण एवं रामचरितमानस में वर्णित अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक मर्यादा की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है।
किसी भी सत्ता के कुशल संचालन हेतु मजबूत आर्थिक व्यवस्था आवश्यक है। राजकोष हेतु जनता से कर लेना राजा की मजबूरी है। आर्थिक रूप से सम्पन्न होने पर ही शासन सुदृढ़ एवं प्रभावी हो सकता है। तुलसीदास जी ने इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। राजा को प्रजा से कर इस प्रकार लेना चाहिये कि प्रजा को लेश मात्र कष्ट न हो, तुलसीदास जी ने जनहितकारी राज्य को सूर्य के समान माना है जो पृथ्वी से जल खींचता है तो उससे किसी को कष्ट नहीं होता तथा वर्षाकाल में वही जल धरती का भरण-पोषण करता है-
बरसत हरसत लोग सब, करसत लखै न कोइ।
तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सम होइ।।
श्री राम का व्यक्तित्व इतना महान था कि उनके सामने आने वाला व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था। रावण द्वारा ठुकराए जाने पर जब विभीषण श्री राम के पास आते हैं तो उनके हृदय के किसी कोने में राज्य की अभिलाषा थी किन्तु श्री राम को देखते ही उनकी सारी वासना दूर हो जाती है -
उर कछु प्रथम वासना रही।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
(सुन्दर; 48-49)
ऐसा वासनाहीन व्यक्ति राज्य सन्चालन हेतु सर्वाधिक उपयुक्त होता है। इसीलिए विभीषण से मिलते ही श्री राम ने उन्हें लंका का राजा घोषित कर दिया -
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरस अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहिं सारा।
सुमन वृष्टि नभ भई अपारा ।।
(सुन्दर; 48-49)
राजा का एक मुख्य गुण यह है कि जो भी उसकी शरण में जाय, उसकी तत्काल सहायता करे तथा उसे अपना ले। यदि प्रजा को कोई कष्ट है और वह निदान हेतु राजा से अनुरोध करती है तो अपना व्यक्तिगत हित भूलकर राजा को उसकी समस्या का समाधान तत्काल करना चाहिए। जो राजा ऐसा नहीं करता, वह पाप का भागीदार है तथा उसे राजा बने रहने का अधिकार नहीे है। स्वयं श्री राम का यही मत था तथा उन्होंने तदनुसार ही आचरण किया-
सरनागत कहुॅं जे तजहिं, निज अनहित अनुमानि।
ते नर पाॅवर पापमय, तिन्हहिं विलोकत हानि।।
(सुन्दर; 43)
राज्य सन्चालन हेतु चित्रकूट से भरत को अयोध्या वापस भेजते समय श्री राम ने भरत को संक्षेप मे राजा का गुण बताते हुए कहा-
मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान कहुॅं एक।
पालइ पोशइ सकल अॅंग, तुलसी सहित विवेक।।
(अयोध्या; 315)
अर्थात् मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने पीने को तो अकेला है परन्तु विवेक पूर्वक सब अंगों का पालन पोषण करता है। भाव यह है कि यद्यपि राज्य के सारे संसाधन राजा के अधीन रहते हैं किन्तु उसे उसका प्रयोग विवेक सहित समस्त जनता के हित में करना चाहिये। मुख के रूपक से तुलसीदास जी ने इस विचार को प्रभावी अभिव्यक्ति प्रदान की है। जिस प्रकार मुख द्वारा स्वीकार की जाने वाली प्रत्येक खाद्य सामग्री का उपयोग पूरे शरीर के लिये समान रूप से होता है उसी प्रकार राजा के द्वारा ग्रहण किए जाने वाले संसाधन तथा उसकी सत्ता का उपयोग समस्त जनता के हित में किया जाना चाहिए। राजा ही नहीं, पूँजीपतियों के लिए भी यही सिद्धान्त हितकर है। पूँजीपति एवं समृद्ध वर्ग को अपनी सम्पत्ति का उपयोग गरीबों के हित में करना चाहिये। वस्तुतः पूँजीपति को अपनी सम्पत्ति का मालिक नहीं बल्कि संरक्षक मात्र समझना चाहिए। इससे अहिंसक तरीके से सामाजिक समानता की स्थापना में सहायता मिलेगी। इस प्रकार श्री राम ने भरत को दिए गए अपने सन्देश में आर्थिक विकेन्द्रीकरण की आधार शिला रखी है। यही महात्मा गाँधी का ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त है। आचार्य कृपलानी जी गाँधी जी की विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
‘‘ट्रस्टी शब्द का अर्थ ही है कि वह मालिक नहीं है। मालिक तो वही है जिसके हित संरक्षण का कार्य उसके सुपुर्द हुआ है। अहमदाबाद की कपड़ा मिलों के मजदूरों के साथ बातचीत करते हुए गाँधी जी ने उनसे कहा था कि मिलों के असली मालिक तो तुम्हीं हो, क्योंकि पूँजीपति के धन-सम्पत्ति के मुकाबले तुम्हारा श्रम कहीं बहुमूल्य है।’’
इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए कृपलानी जी कहते हैं-
‘‘ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त का गाँधी जी ने प्रतिपादन किया, जिसे ठीक से समझने की जरूरत है। जीवन के सभी क्षेत्रों पर यह लागू होता है। माता-पिता बालकों के ट्रस्टी के रूप में ही कार्य करते हैं। सरकार भी जनता के ट्रस्टी के रूप में कार्य करती है अथवा उसे करना चाहिए।’’
गाँधी जी के ट्रस्टीशिप के इसी सिद्धान्त को तुलसीदास जी ने मुख के उदाहरण से बहुत पहले ही समाज के सामने रखा।
संक्षेप मे राजा का उद्देश्य है- प्रजा को स्वस्थ, सम्पन्न एवं प्रसन्न बनाए रखना। सुराज की स्थापना हेतु शासक को अपना तन, मन और धन सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिए। यही राजा के लिए शुभ एवं कल्याणकारी है। जिस राजा के राज्य में प्रजा दुःखी रहती है, उसे जीवन में तो अशान्ति मिलती ही है, मृत्यु के उपरान्त भी उसकी प्रताड़ना समाप्त नहीं होती-
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।
(अयोध्या; 70-71)
श्रीराम की यही स्पष्ट अवधारणा थी तथा उन्होने अपने कार्यकलापों मे इस बात का सदैव ध्यान रखा। किसी भी परिवार, राष्ट्र अथवा समाज की उन्नति तभी सम्भव है जब उसके सारे सदस्य परिश्रमी हों। आलस्य प्रगति का दुश्मन है तथा परिश्रम सफलता की कुंजी है। प्रायः यह देखा जाता है कि लोग परिश्रम कर भौतिक उन्नति करते हैं तथा उसके बाद विलासी हो जाते हैं। यहीं से उनका पतन प्रारम्भ हो जाता है। विकसित राष्ट्र वह है जहाँ अमीर और गरीब, राजा और प्रजा सभी परिश्रम करते हों। परिश्रमी व्यक्तित्व सर्वदा सुखी और प्रसन्न रहता है। परिश्रम से भौतिक समृद्धि तो बढ़ती ही है, शरीर भी स्वस्थ रहता है। इसलिए तन, मन और धन तीनों के विकास के लिए परिश्रम आवश्यक है। रामराज्य में श्रम की महत्ता सर्वोपरि थी। स्वयं सीता जी, जो महारानी थीं तथा जिनके घर मंे कार्य करने के लिए अनेक सेवक थे, अपने घर के समस्त कार्य स्वयं करती थीं-
यद्यपि गृह सेवक सेवकिनी।
विपुल सदा सेवा विधि गुनी।।
निज कर गृह परिचरजा करई।
रामचन्द्र आयसु अनुसरई।
(उत्तर; 23-24)
जिस राज्य की महारानी ऐसी परिश्रमी होगी, वहाँ की प्रजा तो उसका अनुसरण करेगी ही। इस प्रकार ‘श्रमेव जयते’ रामराज्य का स्वाभाविक आदर्श था जिसे राजा तथा प्रजा सभी ने हृदयंगम कर रखा था।
रामराज्य की सबसे बड़ी विशेषता थी, बैर भाव का अभाव। श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे एवं सभी से पे्रम करते थे। उनकी न तो कोई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा थी और न ही कोई लालच। जिस कैकेई ने उनसे राज्य सिंहासन छीना, उस कैकेई को उन्होंने माँ से बढ़कर माना। राज्यसत्ता तो उनके और भरत के बीच फुटबाल जैसी एक दूसरे की ओर फेंकी जाती रही। ऐसी स्थिति की परिकल्पना भी आज के युग में कठिन है। रामराज्य मे विषमता एवं बैर का पूर्णतः अभाव था-
बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विशमता खोई।।
(उत्तर; 20-21)
एक ऐसा राज्य जहाँ न कोई बैर हो और न ही कोई विषमता, आश्चर्यजनक लगता है। कैसे स्थापित हो सका ऐसा राज्य? वस्तुतः राम का व्यक्तित्व इसका मूल कारण है। इसी व्यक्तित्व के कारण समाज ने राम को इन्सान से भगवान तथा रामराज्य को हर भारतीय का सपना बना दिया। किन्तु केवल राजा का व्यक्तित्व रामराज्य स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रजा का सहयोग हर कदम पर अपेक्षित है। राम के राज्य मंे सभी एक दूसरे से पे्रम करते हैं तथा नीति का पालन करते हुए अपने जीवन पथ पर दृढ़ता से चलते हैं-
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।
(उत्तर; 20-21)
समाज में व्याप्त यह अनुकरणीय प्रेम, जाति, धर्म एवं अन्य सभी भेदों से परे है। जिस समाज के सभी व्यक्ति अपने-अपने जीवन पथ पर दृढ़ता से चलेंगे, एक दूसरे के मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेंगे तथा एक दूसरे से पे्रम करेंगे, वह समाज अनुकरणीय एवं आदर्श होगा, इसमे कोई सन्देह नहीं है। यह एक दुःखद सत्य है कि राम, कृष्ण से लेकर गौतम बुद्ध, ईसा एवं महात्मा गाँधी तक सभी ने धरती पर पे्रम का सन्देश देने का प्रयास किया किन्तु पे्रम का पाठ सम्यक रूप से मानव द्वारा आज तक हृदयंगम नहीं किया जा सका। पे्रम के अभाव में चरम भौतिक समृद्धि भी पूर्णतः सुख शान्ति को स्थापित नहीं कर सकती। आज की दुनियाँ धीरे-धीरे इस तथ्य को समझ रही है। शायद इसीलिए अति विकसित राष्ट्रों का रुझान अब अध्यात्म की ओर हो रहा है और अब उनको महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तित्व याद आने लगे हैं। राम राज्य में परस्पर प्रेम की यह अवधारणा उसे उत्कृष्ट बनाती है।
रामराज्य वस्तुतः प्रेम का साम्राज्य था। आधुनिक युग में व्याप्त विषमता, छल एवं स्वार्थ के वातावरण मंे बहुत से लोग सम्भवतः ऐसे राज्य की परिकल्पना भी न कर सकेंगे। ऐसा प्रेम किसी जादुई शक्ति के कारण नहीं था बल्कि एक दूसरे से प्रगाढ़ रूप से जुड़ने के मूल मंे प्राचीन उदात्त दर्शन था, जिसे सारे लोग जानते और मानते थे। राम मंे सारी प्रजा परमात्मा का दर्शन करती थी तथा समस्त जीवों की आत्मा मंे उसे परमात्मा का ही अंश दृष्टिगोचर होता था। जिस व्यक्ति को समस्त जीवों की आत्मा में परमात्मा का दर्शन होने लगे, वह किसी का विरोध कर ही नहीे सकता। यही रामराज्य का आध्यात्मिक आदर्श था जिसे उनकी समस्त प्रजा ने हृदयंगम किया। तुलसीदास जी ने इसकी सशक्त अभिव्यक्ति निम्न पंक्तियों में की है-
उमा जे राम चरन रत, विगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत, केहिं सन करहिं विरोध।।
(उत्तर; 112)
ऐसा महान व्यक्तित्व सभी से नतमस्तक होता है तथा सभी को प्रणाम करता है-
सीय राम मय सब जग जानी।
करउॅं प्रणाम जोरि जुग पानी।।
(बाल; 7-8)
इस आध्यात्मिक धरातल पर पहुँचने पर काम, क्रोध एवं लोभ आदि बहुत पीछे छूट जाते हैं। आज के युग की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि सभी जानते हैं कि हर जीव में ईश्वर का निवास है, फिर भी हम में केवल सभी जीवों का अपने स्वार्थ हेतु निष्ठुरता से उपभोग करते हैं बल्कि उनका जीवन तक समाप्त कर देने मंे कोई संकोच नहीं करते।
आपस मंे निश्छल प्रेम रामराज्य की मूल विशेषता है। जिस समाज में छल और कपट न हो, वहाँ प्रेम स्वयमेव स्थापित हो जाता है। श्रीराम का व्यक्तित्व इतना विराट है कि उनके सानिध्य मे आने वाला व्यक्ति भी छल कपट से मुक्त हो जाता है। श्रीराम के लंका पहुँचने के उपरान्त रावण ने राम की सेना का समाचार लेने के लिए गुप्तचर भेजा। वह दूत कपट कर कपि देह धारण कर राम की सेना मे भ्रमण करने लगा। श्रीराम के गुणों से वह इतना प्रभावित हुआ कि वह सारा छल कपट भूल गया और अपने मूल स्वरूप में आ गया-
जबहिं विभीषन प्रभु पहिं आए। पाछे रावन दूत पठाए।।
सकल चरित तिन्ह देखे, धरे कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदय सराहहिं, सरनागत पर नेह।।
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
(सुन्दर; 51)
आज हम प्रगति के अहंकार में चाहे जितना मतवाले हो जांय, धरती पर वास्तविक सुख-शान्ति, पे्रम और भाई चारे के बिना सम्भव नहीं है। आध्यात्मिक उत्थान के बिना भौतिक प्रगति बन्दर के हाथ में तलवार के सदृश है। आज दुनियाँ बारूद के ढेर के समान हो गई है, जिसे छोटी सी चिनगारी भी क्षणमात्र मे भस्म कर सकती है। वैज्ञानिक प्रगति ने वह आत्मघाती चिनगारी मानव के हाथ मे दे दी है। पे्रम ही वह शक्ति है जो मानव को इस चिनगारी का प्रयोग करने से रोक सकती है। अतः आज के युग का सबसे बड़ा ज्ञानी और विज्ञानी वही है जो मानव से मानव के बीच की दूरी कम कर सके। महान कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने इस ओर बहुत पहले समाज का ध्यान आकृष्ट किया था-
व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय।
पर न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय।
श्रेय उसका बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत।
श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीति।
एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान।
तोड़ दे जो बस, वही ज्ञानी वही विद्वान।
प्राचीन काल मंे पुरुष लोग प्रायः एक से अधिक विवाह करते थे। स्वयं श्रीराम के पिता महाराज दशरथ ने तीन विवाह किये थे। राजा, महाराजा एवं सम्पन्न लोगों का बहु विवाह, उस काल में सामान्य बात थी। बहुपत्नी प्रथा के उस युग में भी श्रीराम द्वारा एक पत्नी व्रत का आदर्श जनता के सामने रखा गया। स्वयं श्रीराम एवं उनके भाइयों ने मात्र एक विवाह किया। श्रीराम के आदर्श का अनुसरण करते हुए सारी प्रजा ने भी एक पत्नी व्रत के आदर्श का पालन किया-
एक नारि व्रत रत सब झारी।
ते मन वच क्रम पति हितकारी।।
(उत्तर; 21-22)
पतिव्रत धर्म के साथ पत्नी व्रत धर्म की अवधारणा उस युग के पुरुष प्रधान समाज के लिए क्रान्तिकारी विचार था जिससे पुरुष प्रधान समाज प्रायः कतराता था। किन्तु तुलसीदास जी ने मजबूती के साथ समानता के आधार पर इसे प्रस्तुत किया। जब पति अपनी पत्नी के प्रति पूर्णतः समर्पित होगा तो पत्नी उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देगी, यह स्वाभाविक ही है। पारिवारिक सम्बन्धों की मजबूत डोर का यही दृढ़ आधार है।
असामान्य रूप से बढ़ती जनसंख्या तीव्रतम विकास को भी निष्प्रभावी बना देती है। श्रीराम ने इसके महत्व को समझते हुये स्वयं सीमित परिवार के आदर्श को अपनाया। श्रीराम एवं उनके सभी भाइयों के दो ही पुत्र थे-
दुइ सुत सुन्दर सीता जाए। लवकुश वेद पुरानन गाए।
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।
(उत्तर; 24-25)
श्रीराम के राज्य मंे विद्वानों, ऋषियों एवं मुनियांे का विशेष सम्मान था। प्राचीन काल में ऋषि एवं मुनि जंगल में रहकर तपस्या एवं ज्ञानार्जन करते थे। ऐसे मनीषियों को न तो सांसारिक सुखों की लिप्सा थी और न ही भौतिक समृद्धि अथवा यश की चाह। ऐसे महान ऋषि ज्ञान के आलोक से सृष्टि को आलोकित करते थे। समस्त प्रजा एवं यहाँ तक कि राजा भी ऐसे ऋषियों के चरणों में अपना मस्तक झुकाता था। श्रीराम को जब वनवास दिया गया, तो उन्हें इसलिये विशेष प्रसन्नता हुई कि वहाँ मुनियों के दुर्लभ दर्शन होंगे-
मुनि गन मिलन विशेष वन सबहिं भाॅंति हित मोर।
(अयोध्या; 41)
राम के राज्य में ऋषियों एवं मुनियों को विशेष सम्मान एवं संरक्षण प्राप्त था। जिस समाज में प्रतिभा का सम्मान होता है, वह समाज सदैव उन्नति करता है। श्रीराम के काल के ये ऋषि ज्ञान, विज्ञान एवं दर्शन के केन्द्र तो थे ही, इनका आचरण भी महान था। इनके समस्त कार्य जनता के हित के लिए ही होते थे। इन ऋषियों का किसी भी कार्य मंे कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता था। तुलसीदास जी नें कपास के उदाहरण से साधु पुरुषों के चरित्र की बड़ी प्रभावी अभिव्यक्ति की है-
साधु चरित शुभ चरित कपासू।
निरस विसद गुनमय फल जासू।।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।
वन्दनीय जेहिं जग जस पावा।।
(बाल; 1-2)
भाव यह है कि जैसे कपास का धागा सुई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढकता है अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने एवं बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप मे परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढकता है, उसी प्रकार सन्त भी स्वयं कष्ट सहकर दूसरों के दोषों को ढकते हैं तथा उसका निवारण करते हैं।
वास्तव मंे सम्पन्न व्यक्ति का धन, श्रेष्ठ मनीषियों की कीर्ति एवं विद्वानों का सृजन तभी सार्थक है जब उससे सभी का कल्याण हो-
कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कर हित होई।।
(बाल; 13)
जिस समाज के ज्ञान, विज्ञान एवं शोध के समस्त केन्द्र जन हित से जुड़ जाएँ, उस समाज की उन्नति को कोई रोक नहीं सकता।
जब राजा और प्रजा ऐसे गुणों से सम्पन्न होगी तो भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास अवश्यम्भावी है। रामराज्य आदर्श राज्य इसलिए है कि उसमें भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक समृद्धि भी है। सब प्रकार की सम्पन्नता का वर्णन तुलसीदास जी ने इन शब्दों में किया है-
अल्प मष्त्यु नहिं कवनिउॅं पीरा।
सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब निर्दभ्ंा धरमरत पुनी।
नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।
सब गुनग्य पण्डित सब ग्यानी।
सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ।।
(उत्तर; 20-21)
राम राज्य में सभी शिक्षित थे। अशिक्षा का घना अन्धकार विकास के प्रकाश को सदैव अवरुद्ध करता है। अशिक्षा के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के अन्ध विश्वास एवं कुरीतियाँ व्याप्त होकर धीरे-धीरे समाज के पतन का कारण बनती हैं। चूँकि राम राज्य में अशिक्षा का अभाव था अतः वह एक विकसित समाज था।
राम राज्य की एक प्रमुख विशेषता सबका कृतज्ञ होना है। समाज में सभी का विकास एक दूसरे की सहायता से होता है। जिस समाज के हर व्यक्ति में एक दूसरे की सहायता करने का भाव विद्यमान हो, वह समाज उत्कृष्ट होगा, इसमे कोई सन्देह नहीं है। सहअस्तित्व की भावना का विकास, प्रगति का मूल मन्त्र है।
राम राज्य में सभी विद्वान, गुणी एवं सम्पन्न थे किन्तु किसी में कोई अहंकार न था। सभी दम्भ रहित थे। अहंकार अच्छे से अच्छे व्यक्ति का विनाश कर देता है। इसलिए उदात्त व्यक्ति अहंकार से रहित होता है। प्राचीन काल की शिक्षा ही ऐसी थी जो व्यक्ति को अहंकार से दूर करती थी जैसा कि ‘विद्या ददाति विनयम्’ के सूत्र से स्पष्ट होता है।
श्री रामचन्द्र एवं उनकी प्रजा के इन्हीं दुर्लभ गुणों के कारण राम राज्य में सभी स्वस्थ, सम्पन्न एवं प्रसन्न थे। इसी रामराज्य का सपना राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी देखा करते थे।
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख वन संरक्षक, उत्तर प्रदेश,17, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ।





