गणतंत्र भारत का,
मूलमंत्र लोकतंत्र,
सभी लोग इसको ही,
अक्षुण बनाइये,
प्रजा की भलाई हित, प्रजातंत्र बचा रहे,
ऐसी रीति नीति बन्धु! शुचि अपनाइये।।
सबकोे ही बढ़ने का, अधिकार जो है मिला,
कर्म बुद्धि द्वारा उसे, मत बिनसाइये,
प्रतीक सामान्तवाद, का रहा है वंशवाद,
वंशवाद की न बेल, फिर पनपाइये।।
प्रजा की भलाई हेतु, प्रजातंत्र लाया गया,
कर्म संग अधिकार, जिसमें हमारे हैं,
जनतंत्र रक्षा हित, रहना सजग नित,
भ्रष्टाचारी सारे अब, करना किनारे हैं।।
भारतीय संस्कृति सुरक्षित हो जिन हाथ,
मजबूत वही बनें, ध्येय यही धारे हैं,
मत के प्रदाता लोकतंत्र को बढ़ाओ आन,
तुम पे ‘अबोध’ निज दृष्टि आज वारे हैं।।
पिता बने पी॰एम॰, हैं बेटा मुख्यमंत्री आज,
साँसद है वधू भाई मंत्री क्या दिखाता है,
पिता बाद पुत्री और तत् पुत्र नेता देश,
अब अधिकार सुत अपना जनाता है।।
कहते ‘‘अबोध’’ बन्धु! क्या है लोक तंत्र यही,
जिसमें कि सत्ता सुख, वंश एक पाता है,
ऐसे लोक तंत्र में प्रजा की बात कौन सुने,
ऐसे जनतंत्र का तो रक्षक विधाता है।।
मूलमंत्र लोकतंत्र,
सभी लोग इसको ही,
अक्षुण बनाइये,
प्रजा की भलाई हित, प्रजातंत्र बचा रहे,
ऐसी रीति नीति बन्धु! शुचि अपनाइये।।
सबकोे ही बढ़ने का, अधिकार जो है मिला,
कर्म बुद्धि द्वारा उसे, मत बिनसाइये,
प्रतीक सामान्तवाद, का रहा है वंशवाद,
वंशवाद की न बेल, फिर पनपाइये।।
प्रजा की भलाई हेतु, प्रजातंत्र लाया गया,
कर्म संग अधिकार, जिसमें हमारे हैं,
जनतंत्र रक्षा हित, रहना सजग नित,
भ्रष्टाचारी सारे अब, करना किनारे हैं।।
भारतीय संस्कृति सुरक्षित हो जिन हाथ,
मजबूत वही बनें, ध्येय यही धारे हैं,
मत के प्रदाता लोकतंत्र को बढ़ाओ आन,
तुम पे ‘अबोध’ निज दृष्टि आज वारे हैं।।
पिता बने पी॰एम॰, हैं बेटा मुख्यमंत्री आज,
साँसद है वधू भाई मंत्री क्या दिखाता है,
पिता बाद पुत्री और तत् पुत्र नेता देश,
अब अधिकार सुत अपना जनाता है।।
कहते ‘‘अबोध’’ बन्धु! क्या है लोक तंत्र यही,
जिसमें कि सत्ता सुख, वंश एक पाता है,
ऐसे लोक तंत्र में प्रजा की बात कौन सुने,
ऐसे जनतंत्र का तो रक्षक विधाता है।।





