जल प्रबन्धन की उचित व्यवस्था न होने से जो वर्षा जल वह कर नदी-नालों द्वारा समुद्र मे चला जाता है और फिर वर्ष भर लोग पानी के लिए तरसते रहते हैं। यदि इस पानी का प्रबन्ध ठीक से कर लिया जाये तो क्षेत्र का भू-जल स्तर भी ठीक रहता है और जल भण्डार भी भरे रहते हैं, जिनका उपयोग पूरे वर्ष आवश्यकता के अनुसार होता रहता है। अन्ना हजारे ने जब महारष्ट्र के पूना जिले के अपने गांव रालेगणसिद्धी में ग्राम विकास का कार्य प्रारम्भ किया, तब उस गांव में पीने के लिए भी पर्याप्त पानी की उपलब्धता वर्ष भर नहीं रहती थी, ऐस में खेती-वारी व बागवानी आदि क्या होती? वहाँ अन्ना हजारे ने गांव वालों के श्रमदान से पानी की व्यवस्था ठीक करने के लिए, गांव की दोनो पहाडियों पर ऊपर की ओर से नीेचे तक ढ़ाल पर खाइयां (ट्रैंच) बनवाई और वर्षा काल में उनमें पौधों के बीज ड़ाल दिये। इससे वर्षा काल में जब पानी बरसा तो पहले पानी उस खाई में रूका। रूकने से उस खाई में स्थित दरारों ने पानी को सोखा और बचा हुआ पानी खाई भरने के बाद ऊपर से बहकर नीचे वाली खाई में गया और यह क्रम नीचे तक चलता गया। अन्त में बचा हुआ पानी दोनो पहाडि़यों केा जोड़ कर बनाये गये तालाब में भर गया। इस प्रकार पहाड़ी पर बनी खाइयों में वर्षा काल में ड़ाले गये बीज उग आये और बरसात के बाद खाई में सोखी गई नमी से पूरे वर्ष हरे-भरे बने रहे तथा जो घास जमी वह पशुओं के चारे के काम आयी। नीचे तालाब में इकट्ठे हुए पानी का उपयोग पूरे वर्ष अपने गांव में पीने के लिए ही नहीं तो आस-पास के गावों के लिए भी पर्याप्त हो गया। इसके लिए उन्हें गांव में पशु खुले छोड़ने की (अन्ना) प्रथा को कड़ाई से बन्द करना पड़ा। इससे पूरा गांव, पहाड़ी सहित हरा-भरा हो गया , पशुओ के लिए पर्याप्त चारा तैयार होने से पशुधन तथा उनके उत्पादों में वृद्धि हो गई और गांव पानी की समस्या से मुक्त हो गया। इतना ही नही तो उन्होने गांव की पथरीली भूमि पर बागवानी और वृक्षारोपड़ के लिए अनोखी तकनीक अपनाई। उन्होने बरसात से पहले वर्मा से पथरीली भूमि में छेद करके, उसमें बारूद से पलीता लगाकर गड्ढ़े बना दिये, और फिर उनमें कुछ घास-फूस-खाद डाल कर उसमें पौधों के बीज डाल दिये। वर्षा के समय पानी गड्ढ़े में गया, जो धीरे-धीरे गड्ढ़े में आई दरारों ने सोख लिया। वर्षा की नमी से बीज जमे, जिनकी जड़ें गड्ढों की उन दरारों में चली गई जहाँं सोखी गई नमी से पौधे को पूरे वर्ष भर जीवन मिलता रहा। इस प्रकार वर्षा जल के उचित प्रबन्ध से गांव हराभरा हो गया, पशुओं के लिए उपलब्ध पर्याप्त चारे के कारण दूध-दही, ईंधन व खाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ण होने लगी, जिससे गांव के लोगों के साथ ही खेतों का भी स्वास्थ्य सुधर गया। राजेन्द्र सिंह ने भी जब राजस्थान के अलवर जिले में कार्य प्रारम्भ किया तव वहाँ पर भी पानी की बड़ी समस्या थी। अरवरी नदी बरसात के बाद सूख जाती थी, इसलिए वर्षा के बाद पानी न होने से खेत भी खाली पड़े रहते थे। राजेन्द्र सिंह ने यहाँ जल प्रबन्धन के लिए गांव के लोगों को तैयार किया और फिर उनको मिलाकर गांव-गांव जल संसदों का गठन किया। इन जल संसदों के साथ मिलकर अरवरी नदी के जल क्षेत्र (वाटर कैचमेन्ट एरिया) में बहाव के छोटे-छोटे पवाह नालों पर छोटे-छोटे बंधे बनाये और फिर मुख्य नदी में उपयुक्त स्थान देख कर कई-बड़े बंधे (चेक डैम) बनवाये। बरसात में सभी छोटे-बड़े बंन्धों पर पानी ठहरा, जमीन ने सोखा और अतिरिक्त पानी ही बहकर आगे गया। इससे जमीन में नमी बढ़ी, भू-जल स्तर बढ़ा और रूका हुआ पानी पूरे वर्ष फसलों की सिचाई के काम आया। इससे किसानो की आय बढ़ी, भू-जल स्तर बढ़ा और सूखी नदी ‘अरवरी’ पुनः सजला हो गई। यह प्रक्रिया राजस्थान के अन्य जिलों में भी दुहराई गई। गुजरात भी पानी के संकट से जूझ रहा था। ऐसे में मनसुखभाई सुभागिया ने जलक्रान्ति ट्रस्ट के माध्यम व शतप्रतिशत सामाजिक सहभाग से छोटे-बडे सैकड़ों चेकडैम व वाटर शेड़ों का जाल बुनकर पानी की समस्या का समाधान करने के साथ ही गौ संवर्धन का अद्भुत व अनुकरणीय कार्य कर दिखाया। इस कार्य की सफलता देख कर गुजरात सरकार नें जल प्रबन्धन की इस तकनीक से पूरे गुजरात में जल समस्या का समाधान कर दिखाया। गुजरात मे ही प्रेम भाई पटेल ने वृक्ष प्रेम सेवा ट्रस्ट के माध्यम से जल प्रबन्धन और वृक्षारोपड़ का साथ-साथ बीड़ा उठा कर अद्भुत पराक्रम कर दिखाया। महाराष्ट्र के जल गांव के पास जैनहिल पर जल प्रबन्धन का प्रेरक कार्य कर दिखाया है। सम्पूर्ण पहाड़ी जलप्रबन्धन, उन्नत तकनीक, उन्नत खेती, वागवानी, फल व खाद्यान्न प्रसंस्करण, वानिकी व हरियाली के सुप्रबन्धन के कारण पर्यटन केन्द्र बन गया है। पहाड़ी पर सिचाई हेतु टैंकरो से पानी पहुँचाना पड़ता है, इस लिए न्युनतम जल से उन्नत वागवानी के लिए बूंद-बूंद सिचाई विधि (ड्रिप इरीगेशन) का प्रयोग किया गया है। वर्षा जल के अधिकतम उपयोग के लिए बागवानी में ट्रैन्च विधि का प्रयोग कर वर्षा जल को बहने से जहाँ बचाया गया है, वहीं बाग की सिंचाई पर होने वाले खर्च को बचाने और उत्पादन वृद्धि में बड़ी सफलता पाई है। उŸार प्रदेश में बुन्देल खण्ड के जिलों में जल की गंभीर समस्या रहती है। यहाँ पर चित्रकूट जिले में नाना जी के प्रयास से दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से अनेक वाटर शेड़ व पहाडि़यों की तलहटी में खाइयां (ट्रैंच) बनाये गये जिनके कारण उन क्षेत्रों में वनीकरण हुआ, हरियाली बढ़ी तथा खेती में भी अधिक उत्पादन के कारण किसानो की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई। इसी जिले में परमार्थ सेवा ट्रस्ट के माध्यम से गोपाल भाई ने दस्यु प्रभावित वनवासी क्षेत्र के गावों में जाकर जल प्रबन्धन का कार्य किया। बरसाती नदियों पर वाटर शेड़ बनाये और फिर उनका प्रबन्धन स्थानीय गांव वासियों को सिखा कर, उन्हें तकनीक, जल, फसल, हरियाली व भू-जल की दृष्टि से आत्म निर्भर बनाया। जल समस्या के निदान के लिए सामाजिक ट्रस्ट भी सहयोगी बनकर आगे आये। मुंबई की बहन अमलारूइया ने आकार ट्रस्ट के माध्यम से 2005-06 में राजस्थान के अलवर,जिले में 1.लाज दयाली, 2.मानावास, 3.थाना गाजी, 4.बइरावास, 5.इन्दोक, 6.बिच्छू की ध्यानी (ग्यानपुर), 7.गुर्जरो की भाल, एवं 8.काला खायरा सहित कुल आठ चेकडैम़ बनाये गये, जिनसे क्षेत्र में पानी की उपलब्धता बढ़ी जिससे क्षेत्र को अप्रत्याशित रूप से आर्थिक लाभ हुआ। चेक डैम बनने से पूर्व पानी की कमी के कारण इन आठो गावों में कुल खेती 59 एकड़ मे 18.50 लाख रू0 की होती थी, जो चेक डैम बनने के बाद, पानी की सुविधा के कारण ख्ेाती का क्षेत्रफल बढ़कर 334 एकड़ हो गया और उसमें 1.06 लाख रू0 मूल्य का उत्पादन होने लगा। इसके बाद सीकर, झंुझनूं, सीकर, खेतरी, बीकानेर एवं नीम का थाना में चेकडैम बने। नीम का थाना क्षेत्र में छोटे पांच - 1.वन्शी, 2.गिरधारी, 3.उपली, 4.खजुरी एवं 5.पदवंन्दी के चेकडैम बने, जिन पर पहले 120 परिवार कुल 10.6 एकड़ खेत में ही रबी की फसल ले पाते थे, जो चेकडैम बनने के बाद 123 एकड़ में होने लगी। इसके अतिरिक्त उŸार प्रदेश (बुन्देलखण्ड) में झांसी के अनेक स्थानों पर जल प्रबन्ध का प्रभावी कार्य कराया गया। इस प्रकार सम्पूर्ण देश में जल संकट के निदान के लिए स्थानीय आवश्यकता एवं उपयुक्तता के अनुसार जल प्रबन्धन की अनेक विधियों का विकास हुआ है और सरकारों के साथ ही समाज भी अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी सामथ्र्य के अनुसार इस समस्या के समाधन के लिए तत्पर है, यह शुभ् लक्षण हैं। ु





