गांव का पैसा गांव में गांव का पैसा शहर में नहीं शहर का पैसा गांव में
भारत में हरित क्रान्ति के नाम पर अन्धाधुन्ध रासायनिक उर्वरकों हानिकारक कीटनाशकों हाइब्रिज बीजों एवं अधिकाधिक भूजल उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति उत्पादन भूजल स्तर और मानव स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आयी है। किसान बढ़ती लागत बाजार पर निर्भरता एवं सरकार की कृषि विरोधी नीति के कारण खेती छोड़ रहे है और आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो रहे है। बाद में आयी विदेशी तकनीक जैविक खेती (बर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट बायोडायनामिक) भी जटिल होने के कारण अन्ततः किसान को बाजार पर ही निर्भर बनाती है। अतः आवश्यकता है ऐसी कृषि पद्धति जिसमें किसान को बार-बार बाजार न जाना पडे़, उत्पादन न घटे, खेत उपजाऊ बने रहे व मानव रोगी न बने। ऐसी कृषि पद्धति है शून्य लागत प्राकृतिक खेती जिसमें 1 देशी गाय से 10-30 एकड़ खेती सम्भव है।
भारत में हरित क्रान्ति के नाम पर अन्धाधुन्ध रासायनिक उर्वरकों हानिकारक कीटनाशकों हाइब्रिज बीजों एवं अधिकाधिक भूजल उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति उत्पादन भूजल स्तर और मानव स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आयी है। किसान बढ़ती लागत बाजार पर निर्भरता एवं सरकार की कृषि विरोधी नीति के कारण खेती छोड़ रहे है और आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो रहे है। बाद में आयी विदेशी तकनीक जैविक खेती (बर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट बायोडायनामिक) भी जटिल होने के कारण अन्ततः किसान को बाजार पर ही निर्भर बनाती है। अतः आवश्यकता है ऐसी कृषि पद्धति जिसमें किसान को बार-बार बाजार न जाना पडे़, उत्पादन न घटे, खेत उपजाऊ बने रहे व मानव रोगी न बने। ऐसी कृषि पद्धति है शून्य लागत प्राकृतिक खेती जिसमें 1 देशी गाय से 10-30 एकड़ खेती सम्भव है।
शून्य लागत कैसे?
1- मुख्य फसल का लागत मूल्य साथ में उत्पादित सह फसलों के विक्रय से निकाल लेना और मुख्य फसल को बोनस (शून्य लागत) के रुप में लेना।
2- खेती के लिये कोई भी संसाधन (बीज, खाद, कीटनाशक आदि) बाजार से न लेकर इसका निर्माण अपने घर या खेत में करके बाजारी लागत शून्य करना जिससे गांव का पैसा गांव में रहेगा बाहर नहीं जायेगा। किसान बाजार से कुछ खरीदेगा नहीं तो कर्ज भी नहीं लेगा।
शून्य लागत खेती का आधार -
प्रकृति में सभी जीव एवं वनस्पति इकाईयों के भोजन की एक स्वालम्बी व्यवस्था है जिसमेें मानव की भूमिका नहीं है जिसका प्रमाण है बिना किसी मानवीय सहायता के जंगलों में खड़े हरे भरे पेड़ व उनके साथ रहने वाले लाखों जीव जन्तु इस प्राकृतिक व्यवस्था को समझना व उसके अनुरुप खेती करना।
क्या है प्राकृतिक व्यवस्था? -
पौधों के पोषण के लिये आवश्यक सभी 16 तत्व प्रकृति में उपलब्ध रहते है उन्हें पौधे के भोजन रुप (।अंपसंइसम थ्वतउद्ध में बदलने का कार्य मिट्टी में पाये जाने वाले करोड़ो सूक्ष्म जीवाणु करते है। यदि यह सूक्ष्म जीवाणु पर्याप्त संख्या में मिट्टी में उपलब्ध रहे तो किसी बाहरी पदार्थ की जरुरत नहीं पडेगी। इस पद्धति में पौधों को भोजन न देकर भोजन बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु की उपलब्धता पर जोर दिया जाता है। प्रकृति में इस सूक्ष्म जीवाणु की भी उपलब्धता एक विशिष्ट व्यवस्था है?
पौधों के पोषण की प्रकृति में चक्रीय व्यवस्था है। पौधा अपने पोषण के लिये मिट्टी से सभी तत्व लेता है। फसल के पकने के बाद काष्ठ प्रदार्थ (कूड़ करकट) के रुप में मिट्टी में मिलकर, अपघटित (क्मबवउचवेम) होकर मिट्टी को उर्वरा शक्ति के रुप में लौटाता है।
देशी गाय का कृषि में महत्व -
एक ग्राम देशी गाय के गोबर में 300-500 करोड़ उपरोक्त सूक्ष्म जीवाणु पाये जाते है। गाय के गोबर में गुड़ एवं अन्य प्रदार्थ डालकर किण्वन (थ्मतउमदजंजपवद) से सूक्ष्म जीवाणु बढ़ाने की क्रिया तेज कराके तैयार जीवामृत/घनजीवामृत जब खेत में पड़ता है तो करोड़ो सूक्ष्म जीवाणु भूमि में पौधो का भोजन निर्माण करते है एवं किसी बाहरी पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती।
देशी कंचुओ का कृषि में महत्व
केचुआ मिट्टी बालू पत्थर (कच्चा व चूना) खाता हुआ धरती के नीचे 15 फुट गहराई तक भूमि के नीचे जाता है। धरती के नीचे से पोषक तत्वों को उपर लाता है तथा पौधे की जड़ के पास धरती के ऊपर अपनी विष्टा छोड़ता है जिसमें फसल के लिये सभी आवश्यक तत्वों का भण्डार होता है। केंचुआ जिस छेद से नीचे जाता है कभी उससे ऊपर नहीं आता है। भूमि में दिन रात करोड़ो छिद्र कर भूमि की जुताई करता रहता है। भूमि को मुलायम बनाता है एवं जब बारिश होती है तो इन्हीं छिद्रों से पूरा वर्षा जल भूमि में संग्रहित होता है।
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के चरण -
1- बीजामृत (बीज शोधन)
5 किलो देशी गाय का गोबर, 5 ली0 गोमूत्र, 50 ग्राम चूना, एक मुट्ठी खेती की मिट्टी 20 ली0 पानी में मिलाकर 24 घंटे रखे। दिन में दो बार लकड़ी से घोले। तैयार बीजामृत को 100 किलो बीजो पर उपचार करें। छांव में सुखाये एवं बोयें।
2- जीवामृत -
जीवामृत सूक्ष्म जीवाणु का महासागर है जो पेड़ पौधों के लिए कच्चे पोषक तत्वों को पकाकर पौधो के लिये भोजन तैयार करते है। गौमूत्र 5-10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ 1-2 किलो, दलहन आटा 1-2 किलो, एक मुट्ठी जीवाणुयुक्त मिट्टी (100 ग्राम), पानी 200 लीटर, इन सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर, ड्म में जूट की बोरी से ढककर छाया में रखें। सुबह व शाम डंडा से घड़ी की सुई की दिशा में घोलें। 48 घंटे बाद छानकर निम्न प्रकार से दें। इसका प्रयोग सात दिन के अन्दर ही करें।
(क) सिंचाई पानी के साथः-
1 एकड़ में 200 लीटर जीवामृत सिंचाई करते समय पानी के साथ टपक विधि से या धीमे-धीमे बहा दें।
(ख) छिड़काव द्वाराः-
पहला छिड़काव बुवाई के 1 माह बाद 1 एकड़ में 100 लीटर पानी 5 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। दूसरा छिड़काव 21 दिन बाद 1 एकड़ में 150 लीटर पानी व 10 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। तीसरा व चैथा छिड़काव 21-21 दिन बाद 1 एकड़ में 200 लीटर पानी व 20 लीटर जीवामृत मिलाकर दं। आखिरी छिड़काव दाने की दूध की अवस्था (डपसापदह ैजंहम) में प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी, 5-10 लीटर खट्टी छाछ (मट्ठा) मिलाकर छिड़काव करें।
घन जीवनामृत-
घन जीवनामृत जीवाणुयुक्त सुखा खाद है जिसे बुवाई के समय या पानी के तीन दिन बाद भी दे सकते हैं। गोबर 100 किलो, गुड़ 1 किलो, आटा दलहन 1 किलो, मिट्टी जीवाणुयुक्त 100 ग्राम उपर्युक्त सामग्री में इतना गौमूत्र (लगभग 5 ली0) मिलायें जिससे हलवा/पेस्ट जैसा बन जाये, इसे 48 घंटे छाया में बोरी से ढककर रखें। इसके बाद छाया में ही फैलाकर सुखा लें, बारीक करके बोरी में भरे। इसका 6 माह तक प्रयोग कर सकते हैं। 1 एकड़ में 1 कुन्तल तैयार घन जीवामृत देना चाहिए।
अच्छादन ;-
1- मुख्य फसल का लागत मूल्य साथ में उत्पादित सह फसलों के विक्रय से निकाल लेना और मुख्य फसल को बोनस (शून्य लागत) के रुप में लेना।
2- खेती के लिये कोई भी संसाधन (बीज, खाद, कीटनाशक आदि) बाजार से न लेकर इसका निर्माण अपने घर या खेत में करके बाजारी लागत शून्य करना जिससे गांव का पैसा गांव में रहेगा बाहर नहीं जायेगा। किसान बाजार से कुछ खरीदेगा नहीं तो कर्ज भी नहीं लेगा।
शून्य लागत खेती का आधार -
प्रकृति में सभी जीव एवं वनस्पति इकाईयों के भोजन की एक स्वालम्बी व्यवस्था है जिसमेें मानव की भूमिका नहीं है जिसका प्रमाण है बिना किसी मानवीय सहायता के जंगलों में खड़े हरे भरे पेड़ व उनके साथ रहने वाले लाखों जीव जन्तु इस प्राकृतिक व्यवस्था को समझना व उसके अनुरुप खेती करना।
क्या है प्राकृतिक व्यवस्था? -
पौधों के पोषण के लिये आवश्यक सभी 16 तत्व प्रकृति में उपलब्ध रहते है उन्हें पौधे के भोजन रुप (।अंपसंइसम थ्वतउद्ध में बदलने का कार्य मिट्टी में पाये जाने वाले करोड़ो सूक्ष्म जीवाणु करते है। यदि यह सूक्ष्म जीवाणु पर्याप्त संख्या में मिट्टी में उपलब्ध रहे तो किसी बाहरी पदार्थ की जरुरत नहीं पडेगी। इस पद्धति में पौधों को भोजन न देकर भोजन बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु की उपलब्धता पर जोर दिया जाता है। प्रकृति में इस सूक्ष्म जीवाणु की भी उपलब्धता एक विशिष्ट व्यवस्था है?
पौधों के पोषण की प्रकृति में चक्रीय व्यवस्था है। पौधा अपने पोषण के लिये मिट्टी से सभी तत्व लेता है। फसल के पकने के बाद काष्ठ प्रदार्थ (कूड़ करकट) के रुप में मिट्टी में मिलकर, अपघटित (क्मबवउचवेम) होकर मिट्टी को उर्वरा शक्ति के रुप में लौटाता है।
देशी गाय का कृषि में महत्व -
एक ग्राम देशी गाय के गोबर में 300-500 करोड़ उपरोक्त सूक्ष्म जीवाणु पाये जाते है। गाय के गोबर में गुड़ एवं अन्य प्रदार्थ डालकर किण्वन (थ्मतउमदजंजपवद) से सूक्ष्म जीवाणु बढ़ाने की क्रिया तेज कराके तैयार जीवामृत/घनजीवामृत जब खेत में पड़ता है तो करोड़ो सूक्ष्म जीवाणु भूमि में पौधो का भोजन निर्माण करते है एवं किसी बाहरी पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती।
देशी कंचुओ का कृषि में महत्व
केचुआ मिट्टी बालू पत्थर (कच्चा व चूना) खाता हुआ धरती के नीचे 15 फुट गहराई तक भूमि के नीचे जाता है। धरती के नीचे से पोषक तत्वों को उपर लाता है तथा पौधे की जड़ के पास धरती के ऊपर अपनी विष्टा छोड़ता है जिसमें फसल के लिये सभी आवश्यक तत्वों का भण्डार होता है। केंचुआ जिस छेद से नीचे जाता है कभी उससे ऊपर नहीं आता है। भूमि में दिन रात करोड़ो छिद्र कर भूमि की जुताई करता रहता है। भूमि को मुलायम बनाता है एवं जब बारिश होती है तो इन्हीं छिद्रों से पूरा वर्षा जल भूमि में संग्रहित होता है।
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के चरण -
1- बीजामृत (बीज शोधन)
5 किलो देशी गाय का गोबर, 5 ली0 गोमूत्र, 50 ग्राम चूना, एक मुट्ठी खेती की मिट्टी 20 ली0 पानी में मिलाकर 24 घंटे रखे। दिन में दो बार लकड़ी से घोले। तैयार बीजामृत को 100 किलो बीजो पर उपचार करें। छांव में सुखाये एवं बोयें।
2- जीवामृत -
जीवामृत सूक्ष्म जीवाणु का महासागर है जो पेड़ पौधों के लिए कच्चे पोषक तत्वों को पकाकर पौधो के लिये भोजन तैयार करते है। गौमूत्र 5-10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ 1-2 किलो, दलहन आटा 1-2 किलो, एक मुट्ठी जीवाणुयुक्त मिट्टी (100 ग्राम), पानी 200 लीटर, इन सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर, ड्म में जूट की बोरी से ढककर छाया में रखें। सुबह व शाम डंडा से घड़ी की सुई की दिशा में घोलें। 48 घंटे बाद छानकर निम्न प्रकार से दें। इसका प्रयोग सात दिन के अन्दर ही करें।
(क) सिंचाई पानी के साथः-
1 एकड़ में 200 लीटर जीवामृत सिंचाई करते समय पानी के साथ टपक विधि से या धीमे-धीमे बहा दें।
(ख) छिड़काव द्वाराः-
पहला छिड़काव बुवाई के 1 माह बाद 1 एकड़ में 100 लीटर पानी 5 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। दूसरा छिड़काव 21 दिन बाद 1 एकड़ में 150 लीटर पानी व 10 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। तीसरा व चैथा छिड़काव 21-21 दिन बाद 1 एकड़ में 200 लीटर पानी व 20 लीटर जीवामृत मिलाकर दं। आखिरी छिड़काव दाने की दूध की अवस्था (डपसापदह ैजंहम) में प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी, 5-10 लीटर खट्टी छाछ (मट्ठा) मिलाकर छिड़काव करें।
घन जीवनामृत-
घन जीवनामृत जीवाणुयुक्त सुखा खाद है जिसे बुवाई के समय या पानी के तीन दिन बाद भी दे सकते हैं। गोबर 100 किलो, गुड़ 1 किलो, आटा दलहन 1 किलो, मिट्टी जीवाणुयुक्त 100 ग्राम उपर्युक्त सामग्री में इतना गौमूत्र (लगभग 5 ली0) मिलायें जिससे हलवा/पेस्ट जैसा बन जाये, इसे 48 घंटे छाया में बोरी से ढककर रखें। इसके बाद छाया में ही फैलाकर सुखा लें, बारीक करके बोरी में भरे। इसका 6 माह तक प्रयोग कर सकते हैं। 1 एकड़ में 1 कुन्तल तैयार घन जीवामृत देना चाहिए।
अच्छादन ;-
देशी केंचुओं एवं सूक्ष्म जीवाणुओं के कार्य करने के लिये आवश्यक ‘‘सूक्ष्म पर्यावरण’’ उपलब्ध कराने हेतु एवं भूमि की नमी को सुरक्षित करने हेतु भूमि को ढं़कना (आच्छादन) पड़ता है। सूक्ष्म पर्यावरण का आशय है पौधों के बीच हवा का तापमान 25-32 डिग्री, नमी 65-72 प्रतिशत व भूमि सतह पर अंधेरा। जब हम भूमि का काष्ठ प्रदार्थो से या अन्य प्रकार से आच्छादन करते है तो सूक्ष्म पर्यावरण का निर्माण होता है जिसमें देशी केंचुओं व सूक्ष्म जीवाणु को उपयुक्त वातावरण मिलता है एवं भूमि की नमी का वाष्पन नहीं हो पाता। बाद में काष्ठाच्छादन भूमि में अपघठित होकर उर्वरा शक्ति का निर्माण करता है।
सह फसलों द्वारा भी भूमि को सजीव आच्छादन के द्वारा ढका जा सकता है।
बेड व नाली व्यवस्था द्वारा जल की बचत-
पौधों की जड़े सीधे पानी नहीं लेती बल्कि मिट्टी कणों के बीच 50 प्रतिशत हवा व 50 प्रतिशत वाष्प के मिश्रण (वाफसा) को लेती हैं। अतः सतह से ऊचे तैयार बेड पर फसलो को नालीयों द्वारा पौधों की आवश्यक सिंचाई वाफसा के रुप में उपलब्ध कराने से पानी की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। नालीयों को भी आच्छादन से ढक दिया जाता है।
बहुफसली पद्धति-
उचित मिश्रित फसलों को लेने पर फसलों की जड़े अलग-अलग स्तर से उचित खुराक ले लेती हैं एवं सहअस्तित्व के आधार पर रोगों एवं कीटों से बचाव तथा नाइट्रोजन का बटवारा कर लेती है। उचित फसल चक्र अपनाने से भूमि को नाइट्रोजन स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा। ऊपर से यूरिया देने की आवश्यकता नहीं होगी।
फसल सुरक्षा-
इस पद्धति में कीट नियंत्रको की आवश्यकता ही नहीं पड़ती क्योंकि कीट आते ही नहीं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर गोबर गौमूत्र, छाछ एवं वनस्पतियों द्वारा तैयार नीमास्त्र, ब्रहमास्त्र, अग्नियास्त्र, फफूदनाशक, दशपर्णी अर्क आदि बनायी जाती है।
ध्यान देने योग्य बातें-
प्राकृतिक कृषि में देशी बीज ही प्रयोग करें।
प्राकृतिक कृषि में किसी भी भारतीय नस्ल का देशी गोवंश ही प्रयोग करें। जर्सी या होलस्टीन का प्रयोग हानिकारक है।
जीवाणुयुक्त मिट्टी हेतु बट वृक्ष पीपल के नीचे या मेंढ़ की मिट्टी लें।
पेड़ पौधों व फसल की पक्ंित की दिशा उत्तर दक्षिण होगी।
दलहन फसलों की सह फसली खेती करना अच्छा रहता है।
बर्मी कम्पोस्ट बनाने में जो आयसेनिया फीटिडा नामक जन्तु प्रयोग होता है जो केंचुआ नहीं है। यह जन्तु (कैडमीयम, आर्सेनिक, पारा सीसा) आदि विषैले तत्व छोड़ता है, जो कि भूमि के लिये अत्यन्त हानिकारक है।
माडल कृषक-
1- हिमांशु गंगवार, फर्रुखाबाद, उ0प्र0-09319856993
2- श्री किशन जाखड़, हनुमानगढ़, राजस्थान-09414091200
3- ठाकुर धरमपाल सिंह, थाना भवन, शामली, उ0प्र0-09627376363
4- आचार्य श्याम बिहारी, झाॅसी, उ0प्र0-09889196787
5- श्री विवेक चतुर्वेदी, कानपुर, उ0प्र0-09839039997
6- श्री कालूरामजी, मुजफ्फरनगर, उ0प्र0-09758571008
7- श्री राजकुमार आर्य, लाडवा, कुरुक्षेत्र-09416914051
8- श्री आर0एस0 यादव, चित्रकूट, उ0प्र0-09455712183
9- श्री नरेन्द्र सिंह ठाकुर, टीकमगढ़, म0प्र0-08720019830
10- श्रीकृष्ण चैधरी, हरैया, बस्ती, उ0प्र0-9919257534
11- श्री गोपाल भाईजी, अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट, उ0प्र0-09450221331
अभियान के नारे-
सह फसलों द्वारा भी भूमि को सजीव आच्छादन के द्वारा ढका जा सकता है।
बेड व नाली व्यवस्था द्वारा जल की बचत-
पौधों की जड़े सीधे पानी नहीं लेती बल्कि मिट्टी कणों के बीच 50 प्रतिशत हवा व 50 प्रतिशत वाष्प के मिश्रण (वाफसा) को लेती हैं। अतः सतह से ऊचे तैयार बेड पर फसलो को नालीयों द्वारा पौधों की आवश्यक सिंचाई वाफसा के रुप में उपलब्ध कराने से पानी की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। नालीयों को भी आच्छादन से ढक दिया जाता है।
बहुफसली पद्धति-
उचित मिश्रित फसलों को लेने पर फसलों की जड़े अलग-अलग स्तर से उचित खुराक ले लेती हैं एवं सहअस्तित्व के आधार पर रोगों एवं कीटों से बचाव तथा नाइट्रोजन का बटवारा कर लेती है। उचित फसल चक्र अपनाने से भूमि को नाइट्रोजन स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा। ऊपर से यूरिया देने की आवश्यकता नहीं होगी।
फसल सुरक्षा-
इस पद्धति में कीट नियंत्रको की आवश्यकता ही नहीं पड़ती क्योंकि कीट आते ही नहीं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर गोबर गौमूत्र, छाछ एवं वनस्पतियों द्वारा तैयार नीमास्त्र, ब्रहमास्त्र, अग्नियास्त्र, फफूदनाशक, दशपर्णी अर्क आदि बनायी जाती है।
ध्यान देने योग्य बातें-
प्राकृतिक कृषि में देशी बीज ही प्रयोग करें।
प्राकृतिक कृषि में किसी भी भारतीय नस्ल का देशी गोवंश ही प्रयोग करें। जर्सी या होलस्टीन का प्रयोग हानिकारक है।
जीवाणुयुक्त मिट्टी हेतु बट वृक्ष पीपल के नीचे या मेंढ़ की मिट्टी लें।
पेड़ पौधों व फसल की पक्ंित की दिशा उत्तर दक्षिण होगी।
दलहन फसलों की सह फसली खेती करना अच्छा रहता है।
बर्मी कम्पोस्ट बनाने में जो आयसेनिया फीटिडा नामक जन्तु प्रयोग होता है जो केंचुआ नहीं है। यह जन्तु (कैडमीयम, आर्सेनिक, पारा सीसा) आदि विषैले तत्व छोड़ता है, जो कि भूमि के लिये अत्यन्त हानिकारक है।
माडल कृषक-
1- हिमांशु गंगवार, फर्रुखाबाद, उ0प्र0-09319856993
2- श्री किशन जाखड़, हनुमानगढ़, राजस्थान-09414091200
3- ठाकुर धरमपाल सिंह, थाना भवन, शामली, उ0प्र0-09627376363
4- आचार्य श्याम बिहारी, झाॅसी, उ0प्र0-09889196787
5- श्री विवेक चतुर्वेदी, कानपुर, उ0प्र0-09839039997
6- श्री कालूरामजी, मुजफ्फरनगर, उ0प्र0-09758571008
7- श्री राजकुमार आर्य, लाडवा, कुरुक्षेत्र-09416914051
8- श्री आर0एस0 यादव, चित्रकूट, उ0प्र0-09455712183
9- श्री नरेन्द्र सिंह ठाकुर, टीकमगढ़, म0प्र0-08720019830
10- श्रीकृष्ण चैधरी, हरैया, बस्ती, उ0प्र0-9919257534
11- श्री गोपाल भाईजी, अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट, उ0प्र0-09450221331
अभियान के नारे-
1- गांव का पैसा गांव में, गांव का पैसा शहर में नहीं, शहर का पैसा गांव में।
2- एक गाय देशी 10-30 एकड़ खेती।
3- प्राकृतिक खेती के दो उपाय- देशी केंचुआ देशी गाय।
4- सह फसलो से मिलेगी लागत, मुख्य फसल होगी सब लाभ।
कम पानी होगी खेती, किसान बनेगा तब खुशहाल
5- न खाद, न कीटनाशक, न कम्पनी, न बाजार। न होगी किसान को कर्ज की दरकार।
6- बच्चे पियेंगे गाय का दूध, खेती करायेंगा गोबर गौमूत्र।
7- गाय बैल बचेंगे अन्न मिलेगा।
8- गाय बैल बचेंगे-किसान बचेगा, किसान बचेगा- गांव बचेगा।
गांव बचेगा- देश बचेगा।
उपरोक्त जानकारी परिचयात्मक है, पूर्ण जानकारी के लिये श्री सुभाष पालेकर लिखित पुस्तकें उपलब्ध हैं जिन्हें श्री अमोल पालेकर-09881646930, श्री अमित पालेकर-09673162240 पर फोन कर मंगाया जा सकता है। पूर्ण प्रशिक्षण के लिये श्री सुभाष पालेकर के द्वारा समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये जाते है जिनमें भाग लेकर पूरी पद्धति को ठीक से समझा जा सकता है।
2- एक गाय देशी 10-30 एकड़ खेती।
3- प्राकृतिक खेती के दो उपाय- देशी केंचुआ देशी गाय।
4- सह फसलो से मिलेगी लागत, मुख्य फसल होगी सब लाभ।
कम पानी होगी खेती, किसान बनेगा तब खुशहाल
5- न खाद, न कीटनाशक, न कम्पनी, न बाजार। न होगी किसान को कर्ज की दरकार।
6- बच्चे पियेंगे गाय का दूध, खेती करायेंगा गोबर गौमूत्र।
7- गाय बैल बचेंगे अन्न मिलेगा।
8- गाय बैल बचेंगे-किसान बचेगा, किसान बचेगा- गांव बचेगा।
गांव बचेगा- देश बचेगा।
उपरोक्त जानकारी परिचयात्मक है, पूर्ण जानकारी के लिये श्री सुभाष पालेकर लिखित पुस्तकें उपलब्ध हैं जिन्हें श्री अमोल पालेकर-09881646930, श्री अमित पालेकर-09673162240 पर फोन कर मंगाया जा सकता है। पूर्ण प्रशिक्षण के लिये श्री सुभाष पालेकर के द्वारा समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये जाते है जिनमें भाग लेकर पूरी पद्धति को ठीक से समझा जा सकता है।
सम्पर्क-
लोक भारती- कोठी नम्बर-1, चैपड़ अस्पताल परिसर,
नवल किशोर रोड, हजरतगंज, लखनऊ
ईमेल- lokbharti@yahoo.com,
बेवसाइट- lokbhartiup.com
लोक भारती- कोठी नम्बर-1, चैपड़ अस्पताल परिसर,
नवल किशोर रोड, हजरतगंज, लखनऊ
ईमेल- lokbharti@yahoo.com,
बेवसाइट- lokbhartiup.com
सौजन्य से-
अजय प्रकाश, 327, ड्रीम बिला, एल्डिको ग्रीन, गोमती नगर, लखनऊ
मो0-9305882580
ईमेल- ajaiprakash.lko@gmail.com
अभियान समन्वयक - गोपाल उपाध्याय, मो0-7376078725
अजय प्रकाश, 327, ड्रीम बिला, एल्डिको ग्रीन, गोमती नगर, लखनऊ
मो0-9305882580
ईमेल- ajaiprakash.lko@gmail.com
अभियान समन्वयक - गोपाल उपाध्याय, मो0-7376078725





