‘युवा’ शक्ति से बना ..... एक करोड़पतियों का गांव -
एक दिन महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में बसे, हिवड़े बाजार के युवकों ने अपने गांव की बदहाली के विषय में विचार किया कि, ‘हमारे गांव के अधिकांश लोग मजदूरी करने शहर चले जाते हैं, 90 फीसदी लोग गरीब हैं, शराब का बोलबाला है, झगड़ा मार-पिटाई आम बात है, अपने गाव का नाम बताने में शर्म आती है, ऐसा क्यों?’ उक्त प्रश्नों के उत्तर में, गांव की जमीन पथरीली थी, बारिश काफी कम होती थी, सूखा सिर पर सवार रहता था, रोजगार का कोई और साधन नहीं था, अतः नौजवानों ने हालत बदलने की कोशिश के अन्तर्गत विचार किया कि, ‘क्यों न एक नौजवान को सरपंच बनाकर देखा जाए, जो एक जोश और नई सोच लेकर आए।
यह 1989 की बात है, गांव में पोपटराव पवार एक अकेले ऐसे युवा थे जो पोस्टग्रेजुयट थे। पोपटराव के परिवार के लोग उन्हें चुनाव लड़ाने के पक्ष में न थे, वे उन्हें शहर भेज कर कोई अच्छी नौकरी कराना चाहते थे, जैसा कि आज अधिकांश युवाओं के घरवाले चाहते हैं। पवार क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी थे अतः वह स्वयं इस खेल में कैरियर बनाना चाहते थे। युवाओं का आग्रह भी पक्का था, अन्ततः पवार युवाओं के आग्रह को टाल न सके और चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गये। पहले तो बुजुर्ग इससे सहमत नहीं थे, वे सोचते थे कि यह कल के लड़के हैं, ये क्या कर पायेंगे। लेकिन फिर सहमति बनी कि चलो एक साल इन्हें भी देख लेते हैं, अतः सरपंच पद पर पोपटराव का चुनाव निर्विरोध हुआ और फिर बदलाव का क्रम शुरू हुआ।
पोपटराव ने गाव बालों से कहा, अपना विकास उन्हें खुद करना है। गांव में शराब की 22 भट्ठियांँ थीं, सबसे पहले फसाद की यह जड़ खत्म की गई। फिर पानी सहेजने और बरतने का काम शुरू हुआ। पवार का मन्त्र था, यह सबका काम है, अतः सबको इसमें जुटना चाहिए। पवार कहते हैं, जल्द ही गांव में चेक डैमों और तालाबों का जाल बिछ गया। इसमें महाराष्ट्र बैंक के सहयोग से गरीब परिवारों को सहजता से कर्ज मिला, सरकारी योजनाओं के पैसे का सही इस्तेमाल हुआ और लोगों ने खुद मेहनत की, जिससे दो फायदे हुए, मजदूरी बची और काम भी बढि़या दर्जे का हुआ। हिवड़े बाजार जिस भौगोलिक क्षेत्र में है, वृष्टि छाया क्षेत्र यानी रैन शैड़ो जोन कहा जाता है, यहाँ साल भर में 15 इन्च से ज्यादा बरसात नहीं होती, तालाब और चेकडैम बने तो बारिश का पानी ठहरा और धीरे-धीरे स्थिति सुधरने लगी। 1995 से पहले गांव में जहाँ 90 खुले कुएँ थे, पानी का स्तर 80 से 125 फुट नीचे था, वहीं आज गांव में 294 खुले कुएँ हें और पानी का स्तर 15 से 40 फुट तक आ गया है। जबकि इसी अहमदाबाद जिले के दूसरे गावों में आज पानी के लिए 200 फुट तक बोरिंग करनी पड़ती है।
गांव के ही हबीब सैयद बताते हैं, ‘2010 में जब केवल 190 मि.मी. बारिश हुई और 2013 में जब पूरा महाराष्ट्र सूखे की मार से कराह राह था, तब भी पानी की व्यवस्था बनाने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।
पानी आया तो खुशहाली आने में ज्यादा देर न लगी। पहले मानसून के बाद ही सिंचित क्षेत्र 20 हेक्टैयर से 70 हेक्टेयर हो गया। जहां चारा-बाजरा उगाना मुश्किल था, वहाँ कई फसलें होने लगीं। किसानी बढ़ी तो काम भी बढ़ा। मजदूरी मंहगी थी तो पवार ने एक सामूहिता का तरीका निकाला, एक किसान की बुआई में सारे गांव के किसान शामिल हो जाते, जिससे मजदूरी भी बची और आपस में समझदारी की भावना भी मजबूत हुई। पवार कहते हैं, ‘गाव में बदलाव पैसे से नहीं आया, यह आया क्योंकि लोग जाति और राजनीति की तमाम दीवारों को तोड़ कर एक साझा मकसद के लिए साथ आये।
खेती के बाद पवार ने आजीविका के लिए एक और स्रोत पर ध्यान दिया। उन्होनें जंगल में पशुओं की मुक्त चराई बंद करवाई, क्योंकि इसका पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ रहा था। उन्होनें किसानों को चारे का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया, चारे का उत्पादन बढ़ा तो पशुओं की संख्या भी बढ़ी और धीरे-धीरे दुग्ध उत्पादन भी। 1990 में गांव में मात्र डेढ़ सौ लीटर प्रतिदिन दूध का उत्पादन था, जो अब चार हजार लीटर से अधिक रोजाना है। रोजगार बढ़ा तो आर्थिक प्रगति भी हुई, 1995 में गांव के 182 परिवारों में से 168 लोग गरीबी रेखा के नीचे थे, जो अब सरकारी रिकार्ड में तीन बताते है। पवार का कहना है, ‘‘गांव को बीपीएल फ्री बनाने के लिए हमें बस एक साल और चाहिए।’
पूरे देश की तुलना में ‘जहां अपने आप को बीपीएल बनाने की होड़ लगी है, यह कितना सुखद अनुभव है। दूसरे गावों में जहां लोग पलायन करके शहर जा रहे हैं, वहीं हिवड़े बाजार में सीधी गंगा बहने लगी है। 1007 से लेकर अब तक गांव के 93 परिवार अलग-अलग शहरों से गांव वापस आ चुकेे हैं। यह खुशहाली आगे भी चलती रहे इसके लिए भी बीज बोये गये हैं। यहांँ प्राथमिक विद्यालय के विद्यर्थियों के लिए जल प्रवन्धन का अनिवार्य कोर्स रखा गया है। पानी जरूरत सेे ज्यादा खर्च न हो इसके लिए जल बजट बनाया जाता है। पानी की उपलब्धता के आधार पर तय किया जाता हे कि इस साल कौन-कौन सी फसलें बोनी हैं।
अच्छी चीजों का सिलसिला कई मोर्चों पर शुरू हुआ है। गांव पंचायत ने अब फैसला किया है कि परिवार की दूसरी लड़की की शिक्षा और शादी का खर्च पूरा गांव मिलकर उठायेगा। सात सदस्यों वाली पंचायत में तीन महिलाएँ हैं, सुनीता शंकर इस साल सरपंच बनी हैं और पवार ने उपसंरपंच की जुम्मेदारी संभाली है। गांव में दहेज नहीं लिया जाता, किसी भी तरह का नशा बंद है, गांव के स्कूल का स्तर अच्छा है, आगे की पढ़ाई का सिलसिला भी मजबूत हुआ है, गांव के 43 विद्यार्थी मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं।
भविष्य की सोचने में भी हिवड़े बाजार आगे है। 2008 में ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पारित कर यह तय किया है कि गांव के अन्दर कार की जगह सायकिल के इस्तेमाल के लिए कहा गया है जिससे ईंधन की बचत हो सके और पर्यावरण व स्वास्थ्य दोनो सुरक्षित रहे। 17 किमी दूर अहमदनगर यदि जाना हो तो गांव के लोग कारपूल कर लेते हैं। गाव की खेती पूरी तरह रसायन मुक्त हो, यह प्रयत्न है। जबकि अभी अधिकांशतः किसान जैविक खेती कर रहे हैं, केवल 20 प्रतिशत बची रसायनिक खेती से मुक्त होकर पूर्णतः जैविक उत्पादों का बाजार बनाने का लक्ष्य है।
हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीव से बने गुलावी मकान, साफ और चैड़ी सड़कें, बन्द नालियां, जगह-जगह लगे कूड़ेदान और हर जगह आपको एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होंगे। शराब और तम्बाकू के लिए गांव में अब कोई जगह नहीं, हर घर में पक्का शौचालय, और चारो ओर फसलों से लहलहाते खेत दिखाई देंगे। महाराष्ट्र में सूखे से जूझते इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं है। गरीबी जैसे कलंक से मुक्त 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी बाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं।
महात्मा गाँधी ने कहा था, ‘सच्ची लोकशाही दिल्ली में बैठे 20 लोग नहीं ला सकते, चह तो नीचे से हर एक गांव से लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।’ हिवड़े बाजार के युवाओं ने यही कर दिखाया है, जो पूरे देश के लिए एक ‘प्रेरणा दीप’ है।
एक दिन महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में बसे, हिवड़े बाजार के युवकों ने अपने गांव की बदहाली के विषय में विचार किया कि, ‘हमारे गांव के अधिकांश लोग मजदूरी करने शहर चले जाते हैं, 90 फीसदी लोग गरीब हैं, शराब का बोलबाला है, झगड़ा मार-पिटाई आम बात है, अपने गाव का नाम बताने में शर्म आती है, ऐसा क्यों?’ उक्त प्रश्नों के उत्तर में, गांव की जमीन पथरीली थी, बारिश काफी कम होती थी, सूखा सिर पर सवार रहता था, रोजगार का कोई और साधन नहीं था, अतः नौजवानों ने हालत बदलने की कोशिश के अन्तर्गत विचार किया कि, ‘क्यों न एक नौजवान को सरपंच बनाकर देखा जाए, जो एक जोश और नई सोच लेकर आए।
यह 1989 की बात है, गांव में पोपटराव पवार एक अकेले ऐसे युवा थे जो पोस्टग्रेजुयट थे। पोपटराव के परिवार के लोग उन्हें चुनाव लड़ाने के पक्ष में न थे, वे उन्हें शहर भेज कर कोई अच्छी नौकरी कराना चाहते थे, जैसा कि आज अधिकांश युवाओं के घरवाले चाहते हैं। पवार क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी थे अतः वह स्वयं इस खेल में कैरियर बनाना चाहते थे। युवाओं का आग्रह भी पक्का था, अन्ततः पवार युवाओं के आग्रह को टाल न सके और चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गये। पहले तो बुजुर्ग इससे सहमत नहीं थे, वे सोचते थे कि यह कल के लड़के हैं, ये क्या कर पायेंगे। लेकिन फिर सहमति बनी कि चलो एक साल इन्हें भी देख लेते हैं, अतः सरपंच पद पर पोपटराव का चुनाव निर्विरोध हुआ और फिर बदलाव का क्रम शुरू हुआ।
पोपटराव ने गाव बालों से कहा, अपना विकास उन्हें खुद करना है। गांव में शराब की 22 भट्ठियांँ थीं, सबसे पहले फसाद की यह जड़ खत्म की गई। फिर पानी सहेजने और बरतने का काम शुरू हुआ। पवार का मन्त्र था, यह सबका काम है, अतः सबको इसमें जुटना चाहिए। पवार कहते हैं, जल्द ही गांव में चेक डैमों और तालाबों का जाल बिछ गया। इसमें महाराष्ट्र बैंक के सहयोग से गरीब परिवारों को सहजता से कर्ज मिला, सरकारी योजनाओं के पैसे का सही इस्तेमाल हुआ और लोगों ने खुद मेहनत की, जिससे दो फायदे हुए, मजदूरी बची और काम भी बढि़या दर्जे का हुआ। हिवड़े बाजार जिस भौगोलिक क्षेत्र में है, वृष्टि छाया क्षेत्र यानी रैन शैड़ो जोन कहा जाता है, यहाँ साल भर में 15 इन्च से ज्यादा बरसात नहीं होती, तालाब और चेकडैम बने तो बारिश का पानी ठहरा और धीरे-धीरे स्थिति सुधरने लगी। 1995 से पहले गांव में जहाँ 90 खुले कुएँ थे, पानी का स्तर 80 से 125 फुट नीचे था, वहीं आज गांव में 294 खुले कुएँ हें और पानी का स्तर 15 से 40 फुट तक आ गया है। जबकि इसी अहमदाबाद जिले के दूसरे गावों में आज पानी के लिए 200 फुट तक बोरिंग करनी पड़ती है।
गांव के ही हबीब सैयद बताते हैं, ‘2010 में जब केवल 190 मि.मी. बारिश हुई और 2013 में जब पूरा महाराष्ट्र सूखे की मार से कराह राह था, तब भी पानी की व्यवस्था बनाने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।
पानी आया तो खुशहाली आने में ज्यादा देर न लगी। पहले मानसून के बाद ही सिंचित क्षेत्र 20 हेक्टैयर से 70 हेक्टेयर हो गया। जहां चारा-बाजरा उगाना मुश्किल था, वहाँ कई फसलें होने लगीं। किसानी बढ़ी तो काम भी बढ़ा। मजदूरी मंहगी थी तो पवार ने एक सामूहिता का तरीका निकाला, एक किसान की बुआई में सारे गांव के किसान शामिल हो जाते, जिससे मजदूरी भी बची और आपस में समझदारी की भावना भी मजबूत हुई। पवार कहते हैं, ‘गाव में बदलाव पैसे से नहीं आया, यह आया क्योंकि लोग जाति और राजनीति की तमाम दीवारों को तोड़ कर एक साझा मकसद के लिए साथ आये।
खेती के बाद पवार ने आजीविका के लिए एक और स्रोत पर ध्यान दिया। उन्होनें जंगल में पशुओं की मुक्त चराई बंद करवाई, क्योंकि इसका पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ रहा था। उन्होनें किसानों को चारे का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया, चारे का उत्पादन बढ़ा तो पशुओं की संख्या भी बढ़ी और धीरे-धीरे दुग्ध उत्पादन भी। 1990 में गांव में मात्र डेढ़ सौ लीटर प्रतिदिन दूध का उत्पादन था, जो अब चार हजार लीटर से अधिक रोजाना है। रोजगार बढ़ा तो आर्थिक प्रगति भी हुई, 1995 में गांव के 182 परिवारों में से 168 लोग गरीबी रेखा के नीचे थे, जो अब सरकारी रिकार्ड में तीन बताते है। पवार का कहना है, ‘‘गांव को बीपीएल फ्री बनाने के लिए हमें बस एक साल और चाहिए।’
पूरे देश की तुलना में ‘जहां अपने आप को बीपीएल बनाने की होड़ लगी है, यह कितना सुखद अनुभव है। दूसरे गावों में जहां लोग पलायन करके शहर जा रहे हैं, वहीं हिवड़े बाजार में सीधी गंगा बहने लगी है। 1007 से लेकर अब तक गांव के 93 परिवार अलग-अलग शहरों से गांव वापस आ चुकेे हैं। यह खुशहाली आगे भी चलती रहे इसके लिए भी बीज बोये गये हैं। यहांँ प्राथमिक विद्यालय के विद्यर्थियों के लिए जल प्रवन्धन का अनिवार्य कोर्स रखा गया है। पानी जरूरत सेे ज्यादा खर्च न हो इसके लिए जल बजट बनाया जाता है। पानी की उपलब्धता के आधार पर तय किया जाता हे कि इस साल कौन-कौन सी फसलें बोनी हैं।
अच्छी चीजों का सिलसिला कई मोर्चों पर शुरू हुआ है। गांव पंचायत ने अब फैसला किया है कि परिवार की दूसरी लड़की की शिक्षा और शादी का खर्च पूरा गांव मिलकर उठायेगा। सात सदस्यों वाली पंचायत में तीन महिलाएँ हैं, सुनीता शंकर इस साल सरपंच बनी हैं और पवार ने उपसंरपंच की जुम्मेदारी संभाली है। गांव में दहेज नहीं लिया जाता, किसी भी तरह का नशा बंद है, गांव के स्कूल का स्तर अच्छा है, आगे की पढ़ाई का सिलसिला भी मजबूत हुआ है, गांव के 43 विद्यार्थी मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं।
भविष्य की सोचने में भी हिवड़े बाजार आगे है। 2008 में ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पारित कर यह तय किया है कि गांव के अन्दर कार की जगह सायकिल के इस्तेमाल के लिए कहा गया है जिससे ईंधन की बचत हो सके और पर्यावरण व स्वास्थ्य दोनो सुरक्षित रहे। 17 किमी दूर अहमदनगर यदि जाना हो तो गांव के लोग कारपूल कर लेते हैं। गाव की खेती पूरी तरह रसायन मुक्त हो, यह प्रयत्न है। जबकि अभी अधिकांशतः किसान जैविक खेती कर रहे हैं, केवल 20 प्रतिशत बची रसायनिक खेती से मुक्त होकर पूर्णतः जैविक उत्पादों का बाजार बनाने का लक्ष्य है।
हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीव से बने गुलावी मकान, साफ और चैड़ी सड़कें, बन्द नालियां, जगह-जगह लगे कूड़ेदान और हर जगह आपको एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होंगे। शराब और तम्बाकू के लिए गांव में अब कोई जगह नहीं, हर घर में पक्का शौचालय, और चारो ओर फसलों से लहलहाते खेत दिखाई देंगे। महाराष्ट्र में सूखे से जूझते इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं है। गरीबी जैसे कलंक से मुक्त 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी बाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं।
महात्मा गाँधी ने कहा था, ‘सच्ची लोकशाही दिल्ली में बैठे 20 लोग नहीं ला सकते, चह तो नीचे से हर एक गांव से लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।’ हिवड़े बाजार के युवाओं ने यही कर दिखाया है, जो पूरे देश के लिए एक ‘प्रेरणा दीप’ है।





