Monday, March 3, 2014

‘सेक्यूलरवाद’ भारत की समस्त राजनीतिक चेतना को भ्रमित करने का शोर? - अवधेश कुमार

विश्व के लोकतांत्रिक देशों में भारत अकेला ही है जहाँ तथाकथित सेक्यूलरवाद को लेकर राजनीति के इतने महानतम व्यक्तित्व एक साथ चीत्कार करते रहते हैं। इस समय बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस चीत्कार परम्परा का सबसे बड़ा हीरो बनाने की कोशिश हो रही है। इस कोशिश में उनका स्वयं का योगदान सबसे ज्यादा है। इस तरह की पंक्तियाँ कुछ लोगों को शायद एकपक्षीय सोच की उत्तेजित अभिव्यक्ति नजर आएं। लेकिन जरा हम सब अपने आप से यह प्रश्न करें कि क्या वाकई इस समय सेक्यूलरवाद पर इतना बड़ा खतरा पैदा हो गया है जिसके लिए नीतीश कुमार को पहले नरेन्द्र मोदी पर हमला करते रहने और फिर भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ने का कदम उठाना पड़ा? क्या सेक्यूलरवाद की सोच और व्यवहार को भाजपा एवं मोदी रौंदकर भारत को किसी नस्ल या सम्प्रदाय के उन्मूलन के फासीवादी रास्ते पर ले जाने को आमादा हो गए हैं? और सबसे बढ़कर यह कि क्या वाकई भारत की राजनीति के लिए इस समय सबसे ज्वलंत एवं अपरिहार्य एजेंडा सेक्यूलरवाद की रक्षा की मोर्चाबंदी ही है?
अगर आप भारत की वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक, वित्तीय, सामाजिक, न्यायिक और कानूनी परिस्थितियों तथा सेक्यूलरवाद के नाम पर अभिनीत राजनीतिक मोर्चाबंदियों के इतिहास के आलोक में इन तीनों प्रश्न का उत्तर तलाशेंगे तो इस राजनीतिक पाखण्ड का चीर उतर कर घृणित नंगापन सामने आ जाएगा। इसके बगैर हमारे लिए सही निष्कर्ष पर पहुँचना तथा सच और झूठ का अंतर करना भी कठिन होगा। यह अदना आदमी भी बता सकता है और स्वयं नीतीश के जनता दल-यू के साथी व्यक्तिगत बातचीत में बताते हैं कि सेक्यूलरवाद बिहार में लंबे समय से मुद्दा नहीं है। पहले लालू प्रसाद यादव सेक्यूलरवाद के सुरंग में अपने कुशासन, अशासन, नासमझी, पाखंड और भ्रष्टाचरणों को धकेलकर बिहार और देश की राजनीति के हीरो बने रहे। भाजपा के साथ से लालू यादव को धक्का देकर सत्ता तक पहुँचने के बाद नीतीश कुमार ने अपनी कुटिल और परिवर्तित रणनीति से लालू प्रवृत्ति को नए रुप में अपना लिया। भारत में ऐसे नेता एवं दल हैं जिनकी कु-राज-नीति संघ, भाजपा विरोध पर टिकी है, और उनमें से अनेक इस समय राष्ट्रीय राजनीति में महत्वहीन हैं। उनके लिए नीतीश ऐसे महापुरुष हो गए जिनको लेकर फिर से वे राष्ट्रीय पटल पर सुर्खियाँ व महत्व पा सकते हैं। और कांग्रेस के लिए तो इनकी ऐसी राजनीति मुँह माँगा वरदान की तरह है, क्योंकि इससे उसके रिकार्ड भ्रष्टाचार, रिकार्ड महँगाई, देश को आर्थिक रसातल में पहुचाकर दुनिया में भारत की इज्जत गिराने का मुद्दा सेक्यूलरवाद के शोर में दब रहा है।
वास्तव में नीतीश के एक कदम से भारत के ये असली मुद्दे नेपथ्य में चले गए हैं। देश की राजनीति की प्राथमिकता होनी चाहिए थी भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद, महँगाई पर सामूहिक हमला, देश के सम्पूर्ण आर्थिक चीरहरण के अपराधों की सजा के लिए जनमत निर्माण करना। इस नाते विचार करें तो नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक व्यवहार से भारत के लिए अपरिहार्य मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का अपराध किया है। ध्यान रखिए, अमेरिका प्रवास से लौटते समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सेक्यूलर ताकतों को नरेन्द्र मोदी के आनस्लाट यानी अभ्याघात के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए। देख लीजिए, राजधानी दिल्ली में एकजुट होने के नाटक का प्रथम दृश्य मंचित हो चुका है। यह पहली बार नहीं हो रहा है। 1977 में देश ने एक करवट ली थी। उस समय सेक्यूलरवाद शब्द इतना प्रचलित नहीं था, क्योंकि इंदिरा गाँधी ने आपातकाल में संविधान संशोधित कर यह शब्द डाला था। लेकिन इन्हीं चेहरां या इनके पूर्वजों ने संघ की दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाकर सरकार गिराई और फिर से इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में सरकार के आने का रास्ता तैयार कर दिया, जो भ्रष्टाचार, वंशवाद एवं राजनीति के अपराधीकरण का जीवित समूह बन चुका था। 1989 में देश ने भ्रष्टाचार एवं वंशवाद के खिलाफ दूसरी करवट ली तो लालू यादव ने सेक्यूलर हीरो के नाम पर लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर सरकार की इहलीला कराई एवं चुनाव में फिर कांग्रेस वापस आई। आडवाणी रथयात्रा पर थे तो उनका घोर राजनीतिक विरोध समझ में आता है। गिरफ्तार करने का कोई कारण नहीं था। इससे बिहार में लालू यादव का कुशासन 15 सालों के लिए पुख्ता हो गया और प्रदेश हर स्तर पर जर्जर व तंगहाल। 1996 में इनने दोनों प्रमुख पार्टियों को बाहर रखकर सेक्यूलरवाद के नाम पर कांग्रेस समर्थन की सरकार बनवाई जो कांग्रेस के दबाव में ठीक से एक दिन भी काम नहीं कर सकी और डेढ़ साल में ही मर गई।
साफ है कि इस सेक्यूलरवाद की राजनीति ने हमेशा देश की समस्त राजनीतिक चेतना को भ्रमित और दूषित कर जनता के परिवर्तन के जनादेश को मिट्टी में मिलाया है, देश को राजनीतिक अस्थिरता में झांका है, जिसका दुष्परिणाम आर्थिक, सामाजिक, वैदेशिक एवं सुरक्षा के क्षेत्र में भुगतना पड़ा है। यह है सेक्यूलरवाद के भयानक पड़ावों का क्रूर सच। अब वर्तमान स्थिति पर लौटिए। जरा सोचिए, जिस व्यक्ति ने अपनी नीतियों से बिहार को जेहादी आतंकवादियों का सबसे बड़ा केन्द्र बना दिया, जिसके राज में पिछले पाँच साल के देश भर में हुए विस्फोटों के अपराधी पैदा ही नहीं हुए, बिना रोकटोक के अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ चलाते रहे, देश भर में खून और विध्वंस की होली खेलकर मातम और आतंक पैदा करते रहे, वह व्यक्ति सेक्यूलरवाद का झंडाबरदार बन रहा है! पूर्व गृह सचिव आर॰के॰ सिंह ने खुलासा किया है कि उन्हें भी बिहार के साथ आतंकवाद के मामले में व्यवहार करने में समस्याएँ आतीं थी। सेक्यूलरवाद का ऐसा खतरनाक परिणाम क्या हमें आपको सचेत नहीं करता है? बेशक, इसमें भाजपा का भी योगदान है, क्योंकि वह भी नीतीश के नेतृत्व में सरकार में शामिल थी। लेकिन यह कितनी बड़ी विडम्बना है। राजनीतिक पाखण्ड का इससे घृणित साकार रुप और क्या हो सकता है? नीतीश की रणनीति एक ही है, लालू यादव के मुसलमान मतों को छीनना। इसके लिए लालू से ज्यादा तेज से सेक्यूलर राग अलापना आवश्यक है। यह सेक्यूलरवाद के नाम पर अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता है। दरअसल, सेक्यूलरवाद के नाम पर राजनीति करने वाले सारे दल ऐसा ही कर रहे हैं।
दूसरे दलों का व्यवहार देखिए। जो व्यक्ति डेढ़ दशक से ज्यादा राज्य से लेकर केन्द्र और फिर राज्य में भाजपा का साथ लेकर शक्तिशाली राजनीतिक समूह और फिर सत्ता का लाभ उठाता रहा वह भाजपा से अलग होते ही एक दिन में सेक्यूलर हीरो हो गया!!! जिस समाजवादी पार्टी के राज्य में दंगों का रिकार्ड बन गया, वह पार्टी भी इस मंचन का प्रमुख किरदार है। हम न भूलं कि भाजपा से अलग होने का ऐलान करने के पहले नीतीश की सहमति या निर्देश पर जनता दल-यू के एक महासचिव कोलकाता में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिलने गए और उनको सेक्यूलर फ्रंट में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। आज ममता से उनका कोई सरोकार नहीं और उनके राजनीतिक दुश्मन माकपा के साथ इनका हाथ मिल रहा है, क्योंकि राजग से बाहर होते ही केन्द्र में उनकी औकात खत्म एवं अपनी पार्टी में ही विद्रोह की स्थिति है। कम से कम दिल्ली से हीरो बनकर जाने पर पार्टी के असंतुष्ट एवं विरोधी यह सोच सकते हैं कि नीतीश बाबू के नेतृत्व में अभी सम्भावना है। किंतु, बिहार की आम जनता अब सेक्युलरवाद के पाखंड से भ्रमित चेतना का शिकार होगी ऐसा लगता नहीं।
माकपा की समस्या यह है कि पहली बार वह 1977 में विपक्षी दलों के कांग्रेस विरोधी अभियान से प॰ बंगाल की सत्ता में आई, लेकिन केन्द्र में उसकी प्रभावी भूमिका तभी बनी जब सेक्यूलरवाद के नाम पर भाजपा को अछूत बनाकर राजनीतिक धारा से अलग करने की रणनीति अपनायी। वह 1989-90 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के समय केन्द्रीय राजनीति में पहली बार प्रभावी हुआ और दूसरी बार इसी सेक्यूलर राजनीति के नाम पर 1996-97 में संयुक्त मोर्चा सरकार का गठन कराकर। संयुक्त मोर्चा सरकार में शामिल न होते हुए भी असली बागडोर माकपा के हाथों ही थी। साफ है कि बगैर सेक्यूलर अलाप के माकपा एवं उसके साथी वामदलों को राष्ट्रीय राजनीति में कोई पूछने वाला नहीं है। इनने 2004 में कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। समर्थन वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में कहा कि वामदलां ने उनके साथ लगातार गुलामों जैसा व्यवहार किया। कम से कम जो कम्युनिस्ट नेता इस समय दिखते हैं, वे वित्तीय मामले में ईमानदार हैं और उनका जीवन भी सादगी से भरा है। लेकिन सेक्यूलरवाद के नाम पर जिन चेहरों को उनने एकत्रित किया उनमें भ्रष्टाचार के आरोपों से लबरेज ही नहीं, खाकपति से अरबपति-खरबपति होने वाले चेहरे भी हैं। लालू यादव आज जेल से रिहा हो चुके हैं, पर उनने जनता की गाढ़ी कमाई को लूटा यह कोई छिपा तथ्य नहीं है।
सेक्यूलर का संविधान सभा में एक ही अर्थ दिया गया, सर्व धर्म समभाव। इसमें सहिष्णुता, नैतिकता, ईमानदारी, समाज से साम्प्रदायिक सोच का अंत करने के लिए अहिंसक अभियान आदि सब शामिल हैं। जरा इन कसौटियों पर भी सेक्यूलर राजनीति को कसिए और अपना निष्कर्ष निकालिए। मोदी का राजनीतिक विरोध एक बात है, पर सेक्यूलरवाद के नाम पर मुसलमान हितैषी की राजनीति करने वाले ज्यादातर दल भाजपा को अस्पृश्य बनाने के साथ  जातिवादी एवं साम्प्रदायिक राजनीति को मजबूत कर रहे हैं। यह अपने-आपमें फासीवादी राजनीति है। क्या हमें ऐसी सेक्यूलर कु-राज-नीति स्वीकार है?
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