‘सच्चे लोकतन्त्र के लिए व्यक्ति को केवल संविधान के उपबन्धों अथवा विधान मण्डल में कार्य संचालन हेतु बनाये गये नियमों और विनियमों के अनुपालन तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि विधान मण्डल के सदस्यों में लोकतन्त्र की सच्ची भावना भी विकसित करनी चाहिए। यदि इस मौलिक तथ्य को ध्यान में रखा जाए तो स्पष्ट हो जायेगा कि, यद्यपि मुद्दों पर निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जायेगा, फिर भी यदि संसदीय सरकार का कार्य केवल उपस्थित सदस्यों की संख्या और उनके मतों की गिनती तक ही सीमित रखा गया तो इसका चल पाना सम्भव नहीं हो पायेगा। यदि हम केवल बहुमत के आधार पर कार्य करेंगे, तो हम फास्ज्मि, हिंसा और विद्रोह के बीज बोयेंगे। यदि इनके विपरीत, हम सहनशीलता की भावना, स्वतन्त्र रूप से चर्चा की भावना और समझदारी की भावना का विकास कर पाये तो हम लोकतन्त्र की भावना को पोषित करेंगे।’’
प्रथम लोकसभा अध्यक्ष, गणेश वासुदेव मावलंकर ने कहा था -
‘‘भारतीय संसद हमारे लोकतन्त्र की गंगोत्री है। यह एक अरब से भी अधिक लोगों की महात्वाकांक्षा और अभिलाषा का प्रतिनिधित्व करती है और जनता एवं सरकार के बीच की कड़ी है। यदि गंगोत्री ही दूषित होगी तो न गंगा पवित्र रहेगी न ही इसकी सहायक नदियां अपनी निर्मलता बरकरार रख पायेंगी। यह सभी सांसदों पर निर्भर करता है कि वे लोकतन्त्र की संसदीय कार्यप्रणाली के सर्वोच्च मानदंड़ों को बनाए रखें। सरकार के दूसरे अंगों की तरह संसद संप्रभु नहीं है और इसका मूल और प्राधिकार संविधान के पास है। संसद का प्रमुख कार्य कार्यपालिका पर नियन्त्रण और उसे जवाबदेह बनाने के लिए जनता सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक मंचों पर सशक्त बनाने के लिए कानून बनाना है। चर्चा और निर्णयों के माध्यम से काम करती है न कि बार-बार के व्यवधान से। संसद एवं दूसरे लोकतान्त्रिक संस्थानों और उनकी कार्यवाही को सशक्त बनाने के लिए जरूरी है कि सरकार, राजनैतिक पार्टियां, नेता और सांसद आत्मनिरीक्षण करें और संसदीय परम्परा और नियमों का पालन करें।’’





