Monday, March 3, 2014

दोहरी सत्ता के परिणाम - ए॰ के॰ त्रिपाठी

अरसा हो चला जब हमने अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को असहाय बनकर धराशायी होते देखा। समस्या के गहराते जाने से हम गुमसुम से हो गए थे। अपनी ही बेचारगी में डूब गए। इस भारी गिरावट के कारण हमको कुछ सुनायी नहीं पड़ रहा था। हालात इतने खराब हो गए कि, कोई समाधान ही नजर नहीं आ रहा है। समस्या व्यापक थी और इस कदर असहनीय भी कि हमने करीब-करीब अपने हथियार डाल दिए। भारतीय राजनीति के स्वर्णिम पृष्ठ के प्रमुख आचार्य चाणक्य ने अपने समय में कुछ ऐसा ही वक्त देखा था, लेकिन उन्होंने स्वयं को बेचारा नहीं बनने दिया बल्कि समाधान के तमाम रास्तों को लेकर उन्होंने राजनीति की शुचिता को भारतीयता के महती यज्ञ में बदल दिया। उस समय राजनीति के उस महापण्डित ने ये जाना था कि उन समाप्त होती व्यवस्थाओं में समाधान के रास्ते मौजूद हंै। जिसको भुलाया जा सकता है उसको वापस भी किया जा सकता है। चाणक्य ने इस सच्चाई को जाना था क्योंकि उन्होंने राष्ट्रीय एकता के सूत्र को ही समस्याओं का समाधान बना दिया था। राजनीति के हर विकल्प का बेहतर प्रयोग करके उन्होंने भारत को अराजक शासन से छुटकारा दिलाकर भारत के स्वर्णिम शिखर की राह को प्रशस्त किया था। वह केवल प्रयोग मात्र नहीं था अपितु साधन और साध्य का अनोखा सम्मिलन था जिसमें केन्द्र में भारत और परिधि पर आम आदमी था। वर्तमान में एक बार फिर से भारत उसी परिधि की ओर वापस चला गया है। सयानी दुनिया की दृृष्टि में पाखंड के कारण दोष आ गया है। हिन्दुस्थान के भीतर फिर से दोहरी सत्ता का खेल खेला जा रहा है।
पश्चिमी माॅडल वाले आधुनिक लोकतंत्र में से शक्तियों का पृथककरण और अंकुश एवं संतुलन एक मान्य सिद्धांत है। इसमें संवैधानिक तौर पर विधायिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता विभाजित रहती है। मगर भारत में कांगे्रस और उसकी सत्ता के मामले में दोहरे शासन का अर्थ एकदम भिन्न है। इसमें अनौपचारिक नहीं अपितु संविधानेत्तर सत्ता का संकेत है। इसीलिए आरम्भ में त्रिमूर्ति भवन, फिर सात रेसकोर्स रोड और पुनः दस जनपथ सत्ता का प्रमुख अंग बनकर उभरा। वर्तमान में सात रेसकोर्स और दस जनपथ की व्यंजना कोई घोषित शक्तियों के पृथक्करण की नहीं अघोषित दोहरी सत्ता से सम्बन्धित है। जिसमें एक देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा प्रधानमंत्री को नियंत्रित करने वाला केन्द्र बिन्दु। इस बिन्दु से न केवल देश का पीएमओ अपितु राज्यों के सत्ता केन्द्र भी शामिल है। कांग्रेस की इस दोहरी सत्ता चलाने के खेल को कुछ दूसरे क्षेत्रीय दलों ने भी अपना लिया है।
दोहरी सत्ता का उदय बिन्दु :
दक्षिण अफ्रीका में गांधी भारतीयों के निर्विवाद नेता थे। उनसे किसी की प्रतिद्वंदिता नहीं थीं। क्योंकि वहां पर प्रायः सभी भारतीय अशिक्षित और दुर्बल थे। निस्वार्थ समाजसेवी गांधी को वे अपना सर्वमान्य प्रतिनिधि मानते थे। इस स्थिति में वर्षों काम करने वाले गांधी को इसकी आदत पड़ चुकी थी कि दूसरे लोग उनकी बात मानकर चलेंगे। इसके बाद गांधी जी ने आम लोगों को स्वयं के साथ जोड़ने की नीति पर काम आरम्भ किया। नई अपनाई गई वेष-भूषा और धार्मिक किस्म की भाषा ने उनको भारतीयों का भक्त बना दिया। उनकी इस महात्मा छवि ने कांग्रेस को उनकी इच्छाओं का दास बनाकर रख दिया था। चाहंे पूरा संगठन किसी बात के विरुद्ध हो लेकिन अगर गांधी उसी पर आमादा हों तो सबको उनकी बात माननी ही पड़ती थी। 1918 में प्रथम विश्व युद्ध के लिए ब्रिटिश सेना में भारतीय सैनिकों की भर्ती कराना हो या 1919 में तुर्की के इस्लामी खलीफा के पक्ष में आंदोलन, लगभग पूरा कांगे्रस संगठन इसको गलत मानता था मगर गांघी ने उन पर अपनी बात थोपी थी। जो ऐसी भूमिका नहीं मान सके वे उनसे किनारे हो गए। जिसमें एनी बेंसेट, जिन्ना और स्वामी सहजानंद प्रमुख रहे। कांगे्रस ने हमेशा गांघी जी की हर उलूल जुलूल चीज को स्वीकार किया। हालांकि रविन्द्र नाथ टैगोर, श्री अरविंद और आंबेडकर ने इसका विरोध किया था। गांधी जी का नियम पार्टी के किसी नियम से कभी बंधा नहीं रहा। जिसको बाद में उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी जवाहर लाल नेहरू ने भी आगे चलाया और फिर इंदिरा गांधी ने और अब सोनिया गांधी ने। इस तरह से दोहरी सत्ता कायम हुई। सही मायने में गांधी बिना कोई पद लिए कांग्रेस के डिक्टेटर थे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता चाहे कुछ भी चाहे गांधी की इच्छा सब पर भारी रहती थी। मौलाना, नेहरू आदि कई बाद में इसी तरह से अध्यक्ष बने। गांधी की इच्छा के खिलाफ सुभाष चंद्र बोस के चुने जाने के बाद उनको अध्यक्ष पद छोड़ना ही पड़ा था। जब अध्यक्ष पद पर सीता रमैया हार गए तब गांधी ने उनकी हार को अपनी हार कहा था। इसी प्रकार सरदार पटेल को उन्होंने कभी अध्यक्ष नहीं बनने दिया। क्योंकि गांधी हमेशा किसी और को आगे कर देते थे। अगर कांगे्रस के दूसरे लोग गांधी का अनुपालन नहीं करते थे तो गांधी असहयोग करके उसे हैरान कर देते थे। उनका असहयोग खुला और बंद दोनों ही होता था।
मगर इस दोहरी सत्ता के खेल में दो दशक तक गांधी कांग्रेस में बिना सदस्य रहे ही हर बिंदु पर हस्तक्षेप करते रहे। देश विभाजन जैसा भयावह फैसला भी उन्होंने ही कांग्रेस से पास कराया था। वे न तो कार्यसमिति के सदस्य थे न ही समिति विभाजन के पक्ष में थी मगर नेहरू के गांघी प्रेम में बंदी होकर उनकी मदद के लिए बैठक में गए और विभाजन प्रस्ताव को जबरन पारित करवा दिया। 14 जून, 1947 को स्वयं गांघी ने ये बात मनु को बतायी थी। यानि कांगे्र्रस में दोहरी सदस्यता की परम्परा महात्मा के अवतरण से जुड़ी हुई है जिसको उनके उत्तराधिकारी नेहरू और इंदिरा ने आगे बढ़ाया  जो सोनिया एंव राहुल तक कायम है।
स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के इस राजनीतिक चलन ने दोहरी सत्ता से होने वाली दुश्वारियों को सबसे ढंककर रखा। लेकिन अगर कांग्रेस में गांधी के प्रवेश से लेकर अंत तक के सारे अभियानों का अन्वेषण करे तो प्रतीत होगा कि, गांधी के सारे अभियान विफल या प्रतिकूल फल देने वाले ही रहे हैं। प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भारतीय सैनिकों की भर्ती, इस्लामी खलीफा के लिए खिलाफत आंदोलन, गांधी इरविन पैक्ट, मुसलिम लीग की विभाजक राजनीति का प्रतिकार, 1942 का भारत छोड़ों आंदोलन, भारत विभाजन रोकने में असफलता और विभाजन मेरी लाश पर होगा की घोषणा से पलटना, कांग्रेस को भंग करके नवीन राजनीतिक संगठन बनाने की सलाह आदि कुछ ऐसे उदाहरण जो गांधी की विफलता के द्योतक हैं।  अगर जापान, इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी से तुलना करें तो दिखता है कि, कहीं भी नया नेतृत्व उभरने में देर नहीं लगती है न उसकी दुबर्लता देखकर उसको बदलने में। मगर भारत में दोहरी सत्ता कांग्रेस को यह करने नहीं देती है, क्योंकि इसने निरंकुश मनमानी स्वीकार करवाने की आदत डाल दी है। आज जैसी परिभाषा शक्ति दस जनपथ दे रहा है और जैसा वह व्यवहार करता है जिसको कांग्रेस अब सहज मानती है उसकी सबसे हानि ये है कि कांग्रेस कभी किसी नीति प्रश्न पर वास्तविक चिंतन नहीं कर पाती है, अपितु नीति शोधन कर पाने में स्वयं को अक्षम बनाती है। विश्व के किसी भी सफल लोकतंत्र में शायद ऐसा नहीं है? परन्तु यह दोहरी सत्ता भारतीय राजतंत्र पर एक बोझ बनकर रह गई है जिसका अनुसरण कई दूसरे दल करने लगे हैं।