Monday, March 3, 2014

भारतीय लोकतन्त्र के सम्बन्ध में महापुरूषों के विचार - संकलित



हमारे प्रथम राष्ट्रपति डा॰राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था - ‘‘हमारे गणतन्त्र का यह उद्देश्य है कि अपने नागारिकों को न्याय, स्वतन्त्रता और समानता प्राप्त करायें तथा इसके विशाल प्रदेशों में बसने वाले तथा भिन्न-भिन्न आचार-विचार वाले लोगों में भाईचारे की अभिवृद्धि हो।’’
गणतन्त्र का प्रहरी है हमारा संविधान, जिसके संबन्ध में डा॰ बी॰आर॰ अम्बेडकर ने सटीक ही कहा था- 
‘‘मैं समझता हूं कि संविधान लचीला और बेहतर है। यह इतना शक्तिशाली है कि शान्ति एवं युद्ध काल में देश को एक सूत्र में बांधे रख सकता है। यदि नए संविधान के अधीन चीजें सही ढ़ंग से काम नहीं करती तो उसका कारण यह नहीं होगा कि हमारे पास खराब संविधान है। हम कहेंगे कि लोग खराब हैं।’’
प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू का संविधान के संबन्ध में चुनौतीपूर्ण कथन था - ‘संविधान के रूप में हम बड़े साहस के साथ देश के सपने एवं आकांक्षाओं को छपे हुए लिखित अक्षरों में शक्ल देने का बड़ा जोखिम ले रहे हैं।’
 प्रथम गृहमन्त्री, लौहपुरूष सरदार पटेल का कहना था-‘‘हमारा संविधान भारतीय लोगों की वास्तविक एकता को प्रदर्शित करता है, जो लोगों की संप्रभुता की मूल भावना पर आधारित है।’’ वहीं संविधान सभा के सदस्य कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के संबन्ध में कहा था-‘संघ के भीतर कानून की दृष्टि से सभी नागरिक समान होंगे। संघ की सीमाओं के भीतर किसी भी व्यक्ति को उसको मिली कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकेगा। जाति, धर्म, भाषा या लिंग के आधार पर किसी के साथ भेद-भाव नहीं किया जायेगा।’