Sunday, March 2, 2014

जल संकट से उबरने के लिए जल-संस्कृति चाहिए - डा० विशेष गुप्ता

दिल्ली में पानी को लेकर हाहाकार मचा है। मध्य प्रदेश के भोपाल और इन्दौर जैसे शहर पानी का भीषण संकट झेल रहे हंै। सतना की दोनों नदियां सूख गई हैं और वहाँ पानी एक कारोबार की शक्ल ले रहा है। पानी के टैंकर बनाने वाली कम्पनियाॅ चांदी काट रही हैं। राजस्थान में पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया है। वास्तविक स्थिति यह है कि नदियों के किनारे बसे शहर भी जल संकट से बच नहीं सके हैं। सतना से लेकर दिल्ली तक जिस प्रकार भू-जल हड़प कर हम पी रहे है निःसन्देह उससे जल का प्राकृतिक चक्र टूटकर अब उससे आम जीवन प्रभावित होने लगा है। इस चक्र के बिगड़ने से धरती की गरमाहट भी लगातार बढ़ रही है। यह इसी का दुष्परिणाम है कि हिमालय पर भी ग्लेशियरों के पिघलनें की खबरे तेजी से आ रही हंै। जल इस समय संकट में है और अपने बचाव के लिये एक परम्परागत संस्कृति की मांग कर रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जल संकट से उबरने के एहतियाती उपाय न करने से जल के लिए युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई है। सच्चाई यह है कि जल के संकट की यह घटना प्राकृतिक आपदा की तुलना में सरकार द्वारा निर्मित मानवीय कुप्रबंधन और हमारे द्वारा जल की संस्कृति विकसित न करने का परिणाम अधिक है। पिछले पाँच दशक का इतिहास साक्षी है कि इस प्रकार के जल संकटों से निबटने के लिए सरकारों ने राहत कार्यो के तदर्थवाद से प्रभावित होकर रोग पर सतही मरहम तो लगाया, परन्तु जल संकट जैसी आपदा से निबटने के स्थायी समाधान ढूंढने के प्रयास नहीं किये। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस पृथ्वी पर पर्याप्त मात्रा में जल होने के बावजूद लोग प्यास से तड़प रहे हैं। पृथ्वी की दो तिहाई सतह पानी से ढकी है और इसका मात्र एक तिहाई भाग भूमि के रूप में है। इस धरती के कुल जल भण्डार का 97 फीसदी भाग समुद्र है। यहाँ पृथ्वी के कुल जल का 3 फीसदी भाग विभिन्न श्रोतों से आता है। सामान्यतः भूजल का यही भाग साफ पानी कहलाता है। इसके अलावा दो तिहाई पानी ग्लेशियर हिमाच्छादित पहाड़ों और नदियों से मिलता है। इस जल के मानवीय कुप्रबंधन से ही जल संकट उत्पन्न होता है। पिछले पांच दशकों में विकास के आयातित माॅडल के तहत नगरों के विकास पर ही अधिक ध्यान देने से लोगों का गांव से शहर की ओर पलायन तेज हुआ है। पलायन की इस तीव्रता में गांवों की अर्थव्यवस्था को ही चैपट नहीं किया, बल्कि इससे ग्रामीण संस्कृति भी प्रभावित हुई है। इसलिए यहाँ यह कहना अति प्रासंगिक होगा कि विकसित देशों का अंधानुकरण करने से अपने देश में भी उपभोग की आक्रामक प्रवृत्ति बढ़ी है। जिससे जल के असमान उपभोग और उसके दुरूपयोग को भी बल मिला है। इस शहरी संस्कृति के आक्रामक उपभोग ने तो गाॅव की जल संस्कृति को भी अपनी चपेट में ले लिया है। पानी से जुडे़ अध्ययन बताते हैं कि एक आदमी को वर्ष में औसतन 1700 घन मीटर से भी अधिक जल की आवश्यकता होती है। यदि व्यक्ति के लिये जल की उपलब्धता 1000 घन मीटर प्रतिवर्ष से नीचे चली जाती है तो यह मान लिया जाता है कि वहाॅ पानी का अभाव हो चला है। पानी के उपभोग का यही गणित जब 500 घन मीटर से भी नीचे प्रतिवर्ष चला जाता है तो उस क्षेत्र में जल अकाल जैसे लक्षण पैदा होने लगते हैं। पिछले दिनों राजस्थान, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश और उड़ीसा एवं उत्तर प्रदेश में जब सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी तो वहाँ प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 400 घन मीटर से भी नीचे चली गई। देश की आजादी के बाद जल की प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति उपलब्धता 6000 घन मीटर के आस-पास थी, जो पिछले पांच दशकों में घटकर 2200 घन मीटर के आस-पास रह गई है, जिसका एक कारण बढ़ती जनसंख्या भी है। आंकडे बताते हैं कि यदि जल की उपलब्ध मात्रा के घटने का यही हाल रहा तो आने वाले दशकों में देश के अधिकांश हिस्से सूखे की गिरफ्त में आ जायेगें। पिछले कई वर्षो के आंकलन के आधार पर ग्रीनलैंड की रपट-2047 ने तो आने वाले दशकों में जल संकट की विस्फोटक स्थिति की ओर संकेत किया है। इस जल संकट का एक आश्यर्चजनक पहलू यह भी है कि भारत में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 2000 घन मीटर से भी अधिक होने के बावजूद यहाॅ जल संकट जैसी त्रासदी से गुजरना पड़ रहा है। जिन प्रदेशों में आज जल का संकट है वहाँ जल के निरंतर दोहन से आज जल स्तर 500 फुट से लेकर 1500 फुट नीचे चला गया है। निश्चित ही यह हमारे पिछले पांच दशक में भूजल के मनमाने दोहन का ही नतीजा रहा है। 70 के दशक के बाद ट्यूबवैल लगाने की खुली छूट, पंच सितारा होटलों एवं विस्तारित कालोनियों का निर्माण तथा महानगरों व नगरो के फैलाव इत्यादि से भूजल का बहुत अधिक दोहन हुआ है। चार दशक पश्चात् उसी का नतीजा आज गम्भीर जल संकट के रूप में हमारे सामने है। इसके अतिरिक्त गहराते जल संकट के लिए वनों की कटाई भी कम उत्तरदायी नहीं है। देश की आजादी के बाद जब-जब देश में सूखा पड़ा है तब-तब करोड़ों लोग प्रभावित हुए हंै। साथ ही उससे देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई है। पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा पेयजल आपूर्ति हेतु राष्ट्रीय स्तर पर जलनीति बनाकर अरबांे-खरबों रूपयों की योजना बनाई गई, परन्तु पेयजल संकट आज भी हमारे सामने मुँह बाये खड़ा है। इस जल संकट से छुटकारे के लिए आखिर हमें जल संग्रहण की अपनी स्वदेशी परम्परागत संस्कृति और उसके मितव्ययी उपभोग पर ही लौटकर आना पड़ेगा । गौरतलब है कि वर्ष के कुल 8760 घण्टों में से मात्र 100 घण्टे ही बारिस होती है। आज की हमारी सारी परेशानी इन 100 घण्टों के पानी का विधिवत संग्रहण, कुशल प्रयोग और सुप्रबंधन न करने को लेकर ही है। जल संग्रहण और उसके कम खर्च की प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए 133 एकड़ में फैले राष्ट्रपति भवन के साथ साथ देश के अन्य बड़े भवनों आवास-विकास परिषदों और विकास प्राधिकरणों के लिए बारिस के पानी को एकत्रित करने हेतु परम्परागत जल संग्रहण की योजनाएंे तैयार की गई हैं। इसके साथ-साथ जल संग्रहण के परम्परागत तौर-तरीकों को बढ़ावा देने के लिए केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने भी तमाम योजनायें तैयार करते हुए देश के कई प्रदेशों में जल संग्रह करने के ढांचों को विकसित करने के लिए अधिक से अधिक अनुदान देने का प्राविधान किया है। आखिरकार जल संग्रहण के ये सभी परम्परागत तरीके हमारी पुरातन संस्कृति से पहले से ही जुड़े हैं, परन्तु हमनें अपनी उपभोगी संस्कृति के सामने इन्हें अनुपयोगी समझकर छोड़ दिया था। विकास की अंधी दौड़ और उसमें हमारी संलिप्तता ने प्रगति की नई-नई परिभाषाऐं गढनी शुरू कर दीं। वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में हमने स्वयं को विकसित कहलाने के प्रयास तो किये, परन्तु दूसरों की कीमत पर। गांव की संस्कृति छोड़कर हम शहरी तो कहलाये, परन्तु शहर में रहने के तौर-तरीके नहीं सीखे । रातांे-रात हम अमीर तो बने परन्तु गरीबी की वेदनाओं को अनुभव करना हमने बंद कर दिया। जल के दुरूपयोग से हम शारीरिक स्वच्छता के भ्रम में तो रहे, मगर उसके संग्रहण के लिए मन से हम लापरवाह ही बने रहे। आज का यह जल संकट भी हमारे आधुनिक होने की ललक, लापरवाही और कृत्रिम जीवन जीने का ही नतीजा है। अब यह जल और अधिक उपेक्षा सहने की स्थिति में नहीं है। नदियों की कलकल बंद होने से नदी संस्कृति टूट गई है। वायु को प्रदूषित करने से उसके घातक परिणाम हम झेल रहे हैं। भूमिगत जल को बचाने के लिए जहाॅ सरकारी नीति बनाने और उसके उचित प्रबंधन करने के उपायांे की आवश्यकता है। वहीं मानव के व्यवहार में जल संस्कृति को न केवल पुनर्जीवित करने, वरन उसे समृद्ध करना भी समय की मांग है। जल संरक्षण की जन चेतना के साथ ही मानवीय जीवन में जल से जुड़ा अनुशासन भी आना आवश्यक है, जिसमें दूसरों के जीवन की चिंता ही न हो, एक भविष्यबोध भी शामिल हो। जल के बचाव और उसके रखरखाव के साथ ही हमारा अस्तित्व बच पायेगा और तभी बचेगी यह धरती, जंगल, हमारा पशुधन और हमारा यह पर्यावरण। ु - एसोसिएट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, एम॰एच॰(पी॰जी॰) कालेज, मुरादाबाद। ई-मेल हनचजंअपेीमेी56/हउंपसण्बवउ