Monday, March 3, 2014

क्या भारत एक और महाभारत की तैयारी कर रहा है? - हृदयनारायण दीक्षित

संप्रभुता अभद्र नहीं होती। संसद सर्वोच्च संप्रभु संस्था है। राज्यों के ंविधान माडल इसी की प्रतिछाया हैं, लेकिन वे स्वयं अपनी बनाई कार्यसंचालन नियमावली का अनुपालन नहीं कर पाते। 18 फरवरी, 2014 मंगलवार को लोकसभा में मर्यादा का हनन हुआ, उसे लोकासभा चैनल ने नहीं दिखाया। बुधवार को राज्यसभा में मन्त्रिगण ही मर्यादा हनन में आगे रहे तो उŸार प्रदेश विधानमंडल में निर्वस्त्र प्रदर्शन और जम्मू-कश्मीर विधान सभा में थप्पड़। अधिकांश विधान सभाओं में कार्य संचालन की स्थित चिन्ताजनक है।
पहली तीन लोक सभाओं (1952-1967) ने औसत 600 दिन बैठकें की थीं। 3700 घंटे काम हुआ था।  भारत में बिटिश लोकसभा का अध्यक्ष चुने जाते ही दल छोड़ देता है। यहां विट्ठल भाई जे पटेल 1925 में केन्द्रीय विधानसभा के अध्यक्ष चुने गए। उन्होने अपनी स्वाराज पार्टी छोड़ दी। परन्तु, मई 1952 में लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष मावलंकर ने पार्टी नहीं छोड़ी और कहा कि मैं तटस्थ रहूंगा और दल से ंऊपर उठकर काम करूूँगा। अध्यक्ष आयंगर (1956) ने कहा- मैं एक दल और दूसरे दल मे भेद नहीं करता। 1959 में आंध्र प्रदेश, मद्रास सीमा परिवर्तन विधेयक आया। अयंगर ने कहा- विषय मेंरे निर्वाचन क्षेत्र संबन्धी भी है, मैं अध्यक्षता नहीं करूंगा।
संसदीय लोकतन्त्र का मूल दलतन्त्र है। दलतन्त्र ही प्रत्याशी देता है। वही सदन सदस्य बनते हैं। दलतन्त्र में जनतन्त्र है नहीं। संसदीय व्यवस्था के शपथी ही यह व्यवस्था तोड़ रहे हैं। जनतन्त्र भारत की जीवनशैली है। जीवनशैली पर हमला बर्दाश्त करना मृत्यु से भी बदतर हैे।
महाभारत सभापर्व में विदुर ने कहा, ‘सभा में हुए पाप का आधा भाग सभाध्यक्ष पर, एक चैथाई पाप कर्मियों पर और शेष एक चैथाई पाप मौन रहने वालों पर होता है।’ सभा की नैतिक शक्ति घटने से ही महाभारत हुआ था। सभा की शक्ति फिर से घटी है। क्या भारत एक और महाभारत की तैयारी कर रहा है?