Sunday, March 2, 2014

काली बेई के तारणहार - सन्त सीचेवाल का करिश्मा

किसी समय पंजाब जमीनी पानी के मामले में सबसे अमीर हुआ करता था, परन्तु अब पूरे पंजाब में कपूरथला छोड़ कर सभी जिलों के जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। केवल कपूरथला ऐसा जिला हे जहाँ भू-जल 8.3 से.मी. बढ़ा हुआ दर्ज किया गया है। आखिरकार कपूरथला में ऐसा क्या हुआ जो अन्य जिलों में नहीं हो सका? वो है, ‘‘संत बलवीर सिंह सीचेवाल का वह भगीरथी प्रयास, जिसके अन्र्तगत काली बेई नदी की विधिवत सफाई व वाटर रीचार्जिंग के लिए आवश्यक स्तर तक निकाली गई सिल्ट।’’ आज जब देश की अनेक नदियों का जल या तो प्रदूषित हो गया है या वह वर्षा के अलावा समय में पूरी तरह सूख जाती हैं, काली बेई का शुमार भी उन्हीं में होता था। परन्तु सन्त बलवीर सिंह सीचेवाल से इस नदी की यह दुर्दशा देखी न गई, उन्होने इसके पुनर्जीवन के लिए जब कमर कसी और समाज का आह्वान किया तो समाज के लोग भी उनके साथ जुट गये। पहले चरण में उन्होने सामाजिक सहयोग से पूरी नदी की सफाई कराई, जिससे नदी स्वच्छ हो गई और पूरे वर्ष उसमें जल रहने लगा। इसके पश्चात जब उन्होने देखा कि काली की सफाई के बाद भी तली में अभी भी सिल्ट जमी है और उसके कारण नदी द्वारा जो रिचार्जिंग का कार्य होना चाहिये वह रूका है। अतः दूसरे चरण में उन्होने नदी की सिल्ट निकालने के लिए मशीनों का प्रयोग कर बालू आने तक तली की सफाई कराई। जिससे नदी में रीचार्जिंग प्रारम्भ हो गई और कपूरथला जिले का भू-जल 8.3से.मी बढ़ गया। काली नदी का यह कार्य अभी भी चल रहा है। इसी सप्ताह मैं जब गो ग्रीन इन्टरनेशनल आर्गनाइजेशन के ग्लोबल डाइरेक्टर अश्वनीकुमार जोशी के साथ सुल्तानपुर लोधी स्थित संत बलवीर सिंह सीचेवाल के काम को देखने गया तो पाया कि भरी दोपहरी में स्वयं संत सीचेवाल बेर साहिब के पास कालीबेई की सिल्ट निकलवाने के लिए मोर्चे पर तैनात जनरैल की भांति जी ड़टे हुए थे। एक बड़ी डिच मशीन सिल्ट निकाल रही थी लाइन लगाकर खड़ी पचास ट्रालियों में डाली जा रही थी। संत सीचे बाल खुद निरीक्षण करके कि खुदाई का स्तर रेत तक पहुँचा है कि नहीं, सारी काम कर रही मशीनों व लोगों को निर्देश दे रहे थे। मैं हैरान था कि यदि एक संत अपने काम के प्रभाव से जनता में इतनी पैठ बना सकता है कि उनके पास अत्याधुनिक मशीनरी भी है और काम भी बिलकुल सार्थक हो रहा है, तो सरकार के पास तो बहुत साधन हैं। यदि नदियों की सिल्ट निकलवाकर उनके बांध बनवा दिये जायें तो भू-जल संकट भी दूर हो सकता है और नदियां भी प्रदूषण मुक्त होकर सुजला व सुजला हो सकती हैं। जब हमने संत जी से कालीबेई के प्रारम्भिक सफाई अभियान व निकलने बाली सिल्ट के उपयोग के बारे में पूछा तो उन्होने बहुत रोचक बातंे बताईं। उन्होने बताया कि ‘‘काली बेई पूरी तरह से समतल हो गई थी, उस समय कई स्थानों पर तो यह खोजना भी मुश्किल था कि कहाँ पर नदी है और कहाँ पर खेत है। क्योंकि नदी समतल हो जाने के कारण किसानों नें उसे जोत कर खेती प्रारम्भ कर दी थी। अतः पहले तो नदी की निशानदेई का ही काम कठिन था, लेकिन जनता के सहयोग कारण वह काम पूरा हो गया।’’ उन्होने नदी से निकलने बाली सिल्ट के संबन्ध में रोचक तथ्य बताये- ‘‘उनका कहना था कि यह सिल्ट नदी के लिए तो हानिकारक है, क्योंकि इसमें पानी को रोकने की क्षमता है, परन्तु इसी विशेषता के कारण यह बांध बनाने के लिए बहुत उपयुक्त है। पिछली सफाई के समय निकली सिल्ट से 116 कि.मी. बांध बना था, जो पूरी तरह सुरक्षित है और उस पर अब ट्रक चलने जितना चैड़ा रास्ता बनाया गया।’’ इस मिट्टी (सिल्ट) की चार विशेषतायें उन्होने बताई, वह इस प्रकार हैं- 1. इसकी मजबूती इतनी है कि, मकान बनाने में इसे बालू और सीमेन्ट की जगह प्रयोग किया जा सकता है। 2. सीमेन्ट से मकान जोड़ने पर ईंटो के भिगाने में बहुत पानी खर्च करना पड़ता है। परन्तु सिल्ट की जुड़ाई से उस वेशकीमती पानी की बचत हो जायेगी। 3. यदि किसी कारण 10-20-50 साल के बाद मकान तोड़ना हो तो इसके प्रयोग से ईंटे पूरी तरह साबुत निकल आयेंगी। 4. इसके प्रयोग से गर्मियों में मकान ठंढ़ा और सर्दियों में गरम रहेगा, जिसके कारण सर्दी-गरमी से बचने के लिए उस मकान में प्रयोग की जाने वाली विजली की खपत आधी हो जायेगी। उन्होनें इस मिट्टी के उपयोग के बारे में और भी महत्वपूर्ण बात कही- ‘‘पंजाब सरकार यदि नदी, नालों से विधिवत सिल्ट निकाल कर, भविष्य में सरकारी नियन्त्रण में होने वाले सरकारी भवनों के निर्माण में इसकी चिनाई कराई जाये तो तीन लाभ होंगे।’ 1. निर्माण पर होने वाली लागत में काफी कमी आयेगी। 2. नदी, नाले, नहरें कमसे कम वर्षात के पानी को तो जमीन में जाने देंगे, जिससे पंजाब की जमीन बंजर होने से बच जायेगी। ु