Tuesday, March 25, 2014

अब सधे कदमों की दरकार है। - डा॰ दाताराम पुरोहित

उत्तराखण्ड की आपदा के बाद हमें ऐसी रणनीति अपनानी होगी जिससे क्षेत्र के तबाह हो गये रोजगारों व यहां की अर्थव्यवस्था का पुनर्निमाण किया जा सके। दूसरा यहां के लोगों के बीच जकड़ गई असुरक्षा की भावना को दूर करना होगा। आधारभूत सुविधायें सड़क, संचार, बिजली, अस्पताल एवं स्कूल आदि सुव्यवस्थित करने के साथ ही सरकार को हिमांचल सरकार की तरह एग्रो आधारित बिजनेस को वरीयता देनी होगी। हमें ऐसी रणनीति अपनानी होगी ताकि कृषि, बागवानी, पशुपालन और औषधीय जड़ी-बूटियों से रोजगार उत्पन्न हो सके।
उत्तराखण्ड में चारधाम यात्रा का राष्ट्रीय महत्व है और इस आपदा में वही क्षेत्र विशेष प्रभावित हुए है। अतः भविष्य में चारधाम यात्रा को खतरा मुक्त बनाने आवश्यक है और इस हेतु निम्न सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए।
  • वैकल्पिक मोटर रोड का निर्माण किया जाये, जिससे यदि किसी आपदा में एक मार्ग बाधित हो दूसरे मार्ग का उपयोग किया जा सके।
  • वैकल्पिक पगडण्डी या खच्चर मार्गों को पुनर्जीवित व नये मार्गों का निर्माण किया जाना चाहिए। क्योंकि यदि चैमासी केदारनाथ और तौसी, रामबाड़ा टेक बाढ़ के दौरान काम कर रहे होते तो सुविधा होती। यही बात गंगोत्री, यमुनोत्री और बद्रीनाथ पर लागू होती है।
  • जहाँ पुल बह गये हैं या नये पुलो का निर्माण हो वहाँ पर उनकी ऊँचाई बढ़ाई जाये जिससे बाढ़ की विभीषिका में वह सुरक्षित रहें। क्योंकि 1970 की बाढ़ में अलकनन्दा पर बने सभी पुल बह गये थे, उनके पुनः निर्माण के समय ऊंचाई नहीं बढ़ाई गई, जिसके परिणाम स्वरूप वह सब पुल पुनः बाढ़ में बह गये।
  • बरसात के दिनों में खाद्यान्न व जरूरी चीजों का अतिरिक्त भण्डारण किया जाना चाहिए, जिससे आपदा के समय भोजन आदि जरूरी चीजों का संकट न पैदा हो।
  • स्थानीय कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि भोजन, सब्जी और फलों की आपूर्ति के लिए नीचे के क्षेत्रों पर निर्भर न रहना पड़े। - हिमालयी सरोकारों के चिन्तक व गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है।