Sunday, March 2, 2014

जल,नदी और पर्यावरण संरक्षण प्रभा चतुर्वेदी यह सर्वविदित है कि प्राणवायु अर्थात आॅक्सीजन के पश्चात जीवन के लिये अतिआवश्यक है जल। जल के बिना मानव तो क्या जीव जन्तु, पेड़ पौधे आदि किसी की भी कल्पना असम्भव है । इससे यह स्पष्ट है कि जल का पृथ्वी के पर्यावरण से अति गहरा सम्बन्ध है । यह भी ज्ञातव्य है कि पृथ्वी का 72 प्रतिशत भाग जलाच्छादित है जिसका मात्र ढाई प्रतिशत ही पीने योग्य है। यहां यह भी सत्य है कि इस धरती पर बहुत तेज़ी से बढ़ती जन संख्या और बढ़ते औद्योगीकरण के कारण पेयजल की खपत में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। हमारी जल की आपूर्ति मुख्यतया दो स्रोतों से होती है, प्रथम नदियों से और द्वितीय भूजल से; जो कुओं और नलकूपों की सहायता से निकाला जाता है। कहना न होगा कि जल के प्रथम स्रोत के कारण ही विश्व में अधिकांशतया मानव ने नदियों के किनारे ही रहना शुरू किया और तदनन्तर बड़े-बड़े नगर बसे। जैसा कि आमतौर पर होता है बड़ी सरलता से उपलब्ध होने वाले इस जीवनदायी पदार्थ का मूल्य नहीं जाना गया; फलतः इसका दुरूपयोग भी खूब ही हुआ है और निरन्तर हो भी रहा है। परिणामतः आज पेयजल अप्राप्य होता जा रहा है। खेद की बात तो यह है कि इस बहुमूल्य पदार्थ की बरबादी केवल इसके दुरूपयोग से ही नहीं हुई बल्कि मानव ने इसको प्रदूषित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। नदियों के तटों पर नगर बसे और कल कारखाने स्थापित हुए तो मानव मल और घरों के कचरे और कारखानों से निकले जहरीले उत्सर्जन को भी इन्हीं नदियों में डाला गया है। यह केवल भारत में ही नहीं पश्चिम के तथाकथित विकसित देशों में भी हुआ है। परन्तु वे समय रहते चेत गये और उन्होंने जल के प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगा कर अपनी नदियों को साफ कर लिया, पर हमारे देश में स्थिति सुधरने के बजाय गम्भीर होती गयी है । आज करोड़ों रूपये के व्यय के बाद भी पतितपावनी गंगा हो या यमुना, सतलज हो या गोमती हो, वह नदी के स्थान पर गन्दे नाले का रूप ले चुकी हैं। बात यहीं तक नहीं रूकी है। दिन-दूनी बढ़ती जल की प्यास ने भूजल का भी अन्धाधुन्ध दोहन किया है। फलतः हमारा भूजल भण्डार भी तीव्रता से खाली होता जा रहा है। मशीनीकरण से मिली सुविधा के कारण हम सौ-सौ मीटर से भी नीचे भूगर्भ में जाकर जल का दोहन कर बहुमूल्य भण्डार को खाली कर रहे हैं। कितने दुःख की बात है कि देश के कारखानों के रासायनिक उत्सर्जन अनियत्रित तरीके से पेड,़ पौधे, जंगल, खेतों आदि को तो प्रदूषित कर ही रहे हैं इनसे भूजल भी प्रदूषित हो रहा है। आज की स्थिति की तुलना महाकवि कालिदास से सम्बन्धित उस किन्वदन्ती से भली प्रकार की जा सकती है जिसमें उनको पेड़ की उसी डाल को काटते बताया गया था जिस पर वे स्वयं बैठे थे। क्योंकि यदि समय रहते हम नहीं चेते तो हमारे लिये पेयजल तो नहीं ही बचेगा, हमारे जंगल, खेत आदि भी नहीं बचेंगे। इस समय यह नितान्त आवश्यक है कि न केवल सरकार बल्कि देश का प्रत्येक नागरिक जल के दुरूपयोग को रोकने के साथ-साथ जल को प्रदूषित होने से बचाने के भी हर कारगर उपाय करे ताकि हमें कल प्यासे न रहना पड़े। जल को लेकर जहां सरकार की बड़ी-बड़ी योजनायें हैं, जिनपर हजारों करोड़ों का व्यय अनुमानित है वहीं ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो शुद्धजल को लेकर कुछ करने को बहुत गम्भीर हैं पर ज़मीनी तौर पर अभी उन प्रयत्नों का असर दिखाई नहीं दे रहा है। जैसे कहा जाता है कि बून्द-बून्द से घट भरता है वैसे ही छोटे-छोटे प्रयासों का भी बहुत महत्व है। आज यह अत्यावश्यक है कि शासन और जनता दोनों के स्तर पर एकजुट होकर प्रभावीरूप से कार्य हो। जहां तक नदियों का प्रश्न है किसी भी प्रकार का उत्सर्जन, चाहें वह घरों के कचरे का हो अथवा कारखानों का अनुपचारित प्रवाह नदियों में न जाने दिया जाये। अकेले लखनऊ नगर में ही 27 नाले सीधे गोमती नदी में नगर का कचरा लेजा रहे हैं । यह आशाप्रद है कि सीवेज ट्रीटमेण्ट प्लाण्ट पर कार्य किया जा रहा है। जहां तक हो सके भूजल के दोहन पर भी रोक लगे। नियम बनाये जायें जिससे अनियमित दोहन को रोका जासके। आज के परिपेक्ष्य में यह बहुत ज़रूरी है कि वर्षाजल संचयन को प्राथमिकता दी जाये। दरअसल इसे अनिवार्य किया जाना चाहिये। इस सम्बन्ध में शासन का जनता से सीधा संवाद अति आवश्यक है। नगरों में जनता को आकर्षित करने के लिये हज़ारों की संख्या में होर्डिंग और नोटिसबोर्ड लगे रहते हैं परन्तु जलसंरक्षण और उसके संचयन के लिये आम आदमी क्या कर सकता है ऐसा एक भी नोटिस बोर्ड कहीं दिखाई नहीं देता है। इस सम्बन्ध में विशेष प्रयास और विराट स्तरपर प्रचार की जरूरत है। शुद्ध जल न केवल पीने के लिये ही चाहिये इसकी कहीं अधिक आवश्यकता हमारे पर्यावरण को बनाये रखने केे लिये है, क्योंकि जल का कोई विकल्प नहीं है। ु - पेपर मिल कालोनी, लखनऊ।