Monday, March 3, 2014

लोकतंत्र: एक दृष्टि- डा॰ अलका

देश की प्रगति, विकास, सुख-शान्ति, निर्माण और सम्पन्नता के लिए सर्वाधिक आवश्यक है कि वहाँ के नागरिक अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति सजग और सचेत हों। वो अपने उत्तरदायित्वों को भली-प्रकार अनुभव करते हो क्योंकि लोकतंत्र ऐसा तंत्र अथवा प्रशासन है जो लोगों द्वारा बनाया गया हो और लोक कल्याण के लिए हो। किसी भी देश के लोकतंत्र का आदर्श होना उसके नागरिकों पर ही निर्भर करता है क्यांेकि यही लोकतंत्र देश के नागरिकों को अपना नेता, मुखिया चुनने का अधिकार देता है। देश के नागरिकों को लोकतंत्र यह अधिकार देता है कि वे अपने नेता का चयन कर सकें, जिसमें बहुत से व्यक्ति, उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते हैं और लोग अर्थात् देश का नागरिक इसी अधिकार का प्रयोग कर उनमें से किसी एक के पक्ष में मत देता है। इसीलिए अब्राहम लिंकन ने कहा था ‘लोकतंत्र लोगों का, लोगों के लिए और लोगों द्वारा है।’ इसीलिए लोकतंत्र को जनतंत्र भी कहते हैं।
लोकतंत्र जनता का प्रतिनिधि तंत्र है। इसमें समस्त जन समुदाय की सद्भावना और सद्विचार प्रकट होते हैं। इसीलिए लोकतंत्र को लोकनिष्ठा तथा लोकभावना का घर माना गया है। भारत का लोकतंत्र भी जनता की सेवा, जनता की सुरक्षा, जनता के अधिकारों की रक्षा करने एवं उन्हें सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक सभी दृष्टिकोण से सुविधा उपलब्ध कराना है।
लोकतंत्र वह वातावरण है जिसमें व्यक्ति को अपने अस्तित्व में रहकर जीने का सुअवसर प्राप्त होता है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता ही यही है कि यह व्यक्ति को जीने के लिए प्रेरित करता है। राजतंत्र में भी जीवन है, स्वतंत्रता है लेकिन एक अज्ञात भय है जो इस प्रकार पीछा करता है मानों व्यक्ति अपना सेवाकार्य करते हुए तथा अपना उत्तरदायित्व निभाते हुए भी कोई अपराध कर रहा है।
भारत में प्राचीनकाल से ही लोकतंत्र के महत्व को समझा गया है। केन्द्र में राज सिंहासन पर तो अनुवांशिक राजा आरूढ़ होता था किन्तु शासन का संचालन जन-भावना का सम्मान करते हुए जनहित में होता था। कालान्तर में राजा आदि भ्रष्ट एंव निरंकुश हो गए। उसके बाद भारत में विदेशी शासकों का अधिनायकवाद रहा। इस अधिनायकवाद के विरोध में लोकतंत्र का अभ्युदय हुआ।
लोकतंत्र की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें शासक को भी संविधान में उल्लेखित अधिकार समान रूप से प्राप्त होते हैं। शासक को किसी प्रकार के विशेषाधिकार केवल शासकीय सुविधा के रूप में प्राप्त होते हैं लेकिन मानवाधिकारों की दृष्टि से उन्हें किसी अलोकतांत्रिक तथा संविधान में वर्णित शक्तियों के अतिरिक्त अन्य शक्ति सृजित करने का कोई अधिकार नहीं होता है।
विश्व में कई तानाशाही शक्तियों का अन्त भी विद्रोह या आत्महत्या से हुआ। जहाँ राजतंत्र है वहाँ के शासकों ने भी अपने देश के नागरिकों को इतने अधिकार अवश्य प्रदान किए हैं कि वे अपने जीवन का विकास कर सकें। जहाँ इस प्रकार के अधिकार प्रदान नहीं किए गए हैं वहाँ लोगों ने विद्रोह किए हैं। हिन्दी कवि जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में इड़ा के माध्यम से यही  बताया है -
‘किन्तु नियामक नियम न माने,
तो फिर सब कुछ नष्ट हुआ सा निश्चय जाने’
इड़ा के ये शब्द मनु पर अंकुश लगाने के लिए हैं। जब मनु अपनी सीमा तथा समस्त मर्यादायें लांघ जाना चाहते हैं, तब इड़ा उन्हें चेतावनी भरे शब्दों में सावधान करती है कि नियामक ही यदि नियम नहीं मानेगा तो आम व्यक्ति से क्या आशा रखी जा सकती है या फिर यह भी कि नियामक द्वारा बनाये जाने वाले नियम केवल जनता के लिए ही नहीं हैं उनके अनुसरण शासक तथा शासित दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
अधिकार किसी को भी प्रदान किये जाएं लेकिन वे किसी बंधन में भी अवश्य बंधे होते हैं। अधिकार स्वेच्छाचारी नहीं हो सकते। भारत के संविधान में अनुच्छेद उन्नीस प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता प्रदान करता है। किन्तु अनुच्छेद 19(2) यह भी निर्धारित करता है कि यह स्वतंत्रता उन परिस्थितियों में युक्तियुक्त विधि से प्रतिबंधित या बाधित की जा सकती है जबकि देश पर किसी प्रकार का खतरा हो, लोक व्यवस्था तथा अन्य विदेशी कारणों से भी इसे बाधित किया जा सकता है। प्रसाद की इड़ा भी मनु को इसी प्रकार निरंकुशता से बचने का आग्रह करती है -
आह प्रजापति यह न हुआ है, कभी न होगा
निर्बाधित अधिकार आज तक किसने भोगा?
लोकतंत्र में जनता के सामान्य हित का पूरा ध्यान रखा जाता है, किसी वर्ग-विशेष के हित का नहीं। जनता की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं का ध्यान रखा जाता है तथा नागरिकों के वक्तव्य का समुचित आदर किया जाता है जिससे वे भी उत्तरदायित्व का अनुभव करें और उसमें बंधुत्व, समाजसेवा तथा देश प्रेम की भावना पुष्ट होती है। सरकार जनता द्वारा निर्वाचित होने तथा उसके प्रति उत्तरदायी होती है और जनता भी  सरकार को अपना समझकर सहानुभूति रखती है।
लोकतंत्र बल प्रयोग का विरोधी है और व्यक्ति के गौरव को स्वीकारता है जबकि सैनिकवाद सत्ता को केन्द्रित करने तथा असीमित राजसत्ता के पक्ष में है। आर्थिक विषमता की स्थिति में भी लोकतंत्र नहीं पनप सकता। लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों में शिक्षा का समुचित प्रसार होना भी अत्यावश्यक है। इसके अभाव में सरकार पर नियंत्रण असम्भव है। प्रेस और मीडिया को लोकतंत्र का चैथा खम्भा माना गया है उसके बिना भी लोकतंत्र निरर्थक है। इसे केन्द्र तक सीमित न रखकर स्थानीय स्तर पर भी लागू करना चाहिए ताकि नागरिक सक्रिय रूप से सार्वजनिक कार्यों में भाग ले सकें, इन सबके साथ शक्तिशाली विरोधी दल के बिना भी लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता।
यदि भारत के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डाली जाए तो सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के चिह्न प्राप्त होते हैं। सिंधु घाटी की खुदाई से प्राप्त अवशेषों के आधार पर यह कहा गया है कि चूंकि उसमें किसी राजतंत्र या राजा के सम्बन्ध मे कोई संकेत या प्रमाण नहीं मिले, इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस युग के लोग व्यापार करते होंगे और वहाँ भी जनतंत्रात्मक शासक ही कार्य करता होगा। वी॰सी॰ पांडे के अनुसार - ‘सम्भवतः केन्द्रीय शासन सत्ता का विकेन्द्रीकरण कर दिया गया था और केन्द्रीय शासन की ओर से अनेक पदाधिकारी भिन्न-भिन्न नगरों में शासन करते थे।’
उक्त कथन से यह प्रमाणित होता है कि किसी शासक के अधिकार भी निर्बन्धन से मुक्त नहीं हो सकते। निर्बाधित अधिकार आज तक किसी प्रशासक देवता को भी प्राप्त नहीं हुआ। पृथ्वी पर जिसका निवास हुआ है। उसे मर्यादा बंधन तथा काल बंधन में ही रहना पड़ा है।
राजतंत्र हो या लोकतंत्र किन्तु मानव तथा अन्य जीवों के प्रति संवेदना रखना मानवीयता है। यह न केवल शासक में, अपितु प्रत्येक मानव में भी होनी चाहिए। भारतीय संविधान में भी इस मनमाने आचरण को निषिद्ध किया गया है। जनता पर किसी प्रकार का ऐसा प्रतिबंध या घोषणा जिससे मानव अधिकारों या मूल-स्वतंत्रता का हनन होता हो भारतीय संविधान में असंवैधानिक माने गए हैं।
शासक का पद वैसे भी महत्वपूर्ण होता है। जैसा आचरण शासक का होगा वैसा ही प्रजा या जनता अनुसरण करेगी। वर्तमान युग में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा मानकर इसके उन्मूलन हेतु कार्य किया जा रहा है लेकिन चिन्ताजनक बिन्दु यह है कि इसमें शासन की भूमिका भी संदिग्ध रहती है। मंत्री शासक होते हैं और कर्मचारियों से कितनी आशा की जा सकती है इसलिए शासक को सार्वजनिक हित देखना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र ने अत्यल्प समय में अनेक अनुभव प्राप्त किये अनेक अग्निपरीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। आज लोकतंत्र का जो रूप भारत में दिखाई दे रहा है उसे देखकर उसके भविष्य को लेकर आशंका होने लगी है कि सम्भवतः इन दशाओं में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। अशिक्षा, निर्धनता, बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक वैमनस्य, भाषागत एवं प्रादेशिक विषमताएं, जाति-पाँति, अपरिपक्व लोकतांत्रिक संस्थाएं, भ्रष्टाचार - आदि ऐसे बिन्दु हैं, जिनकी व्यापकता में लोकतंत्र की सफलता की आशा नहीं की जा सकती। ऐसी स्थिति में भारत के लोकतंत्र की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। 
- एसोसिएट प्रोफेसर,
हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय।