1. उत्पत्ति - हिमालय की उत्पत्ति प्लेटटेक्टोनिक सिद्धान्त के अनुसार इण्डो-आस्टेलियन और यूरेशियन प्लेट की टकराहट के चलते हुई है। करीब सात करोड़ साल पहले इण्डो-आस्टेलियन प्लेट उत्तर की ओर हर साल 15 सेमी की दर से खिसक रही थी। बाद में इसने टेथीस सागर को पूरी तरह खत्म कर दिया। यहां तक कि उत्तर-पूर्व में अभी तक भी जमीन के नीचे समुद्री जीवन के अवशेष मिल जाते हैं। अभी भी प्लेटों के दबाव की वजह से हिमालय की ऊंँचाई लगातार बढ़ रही है। धरती पर हिमालय सबसे युवा पर्वत श्रंखला है और सेन्डीमेटरी व मेटामार्फिक चट्टानों से निर्मित है। पश्चिम में सिंन्धु नदी के पास नागा पर्वत से लेकर, पूर्व में व्रह्मपुत्र नदी के निकट नमचा बरवा तक इसका विस्तार है।
2.श्रेणियां- हिमालय को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है -
अ. बृहत्तर (ग्रेटर) हिमालय - पर्वत श्रंखला का सबसे ऊँंचा और उउत्तरी हिस्सा। इसका विस्तार पाकिस्तान, उउत्तरी भारत, नेपाल, भूटान से लेकर पूर्व में अरूणांचल प्रदेश तक है। उउत्तर में यह पूरी लम्बाई में तिब्बत स्वायŸा के दक्षिणी हिस्से से सटा हुआ है। इसकी कुल लम्बाई लगभग 2500 किमी और औसत ऊंचाई 6,100 मी॰ से अधिक है। इस पर दुनियाँं की सबसे ऊंची चोटी माउन्ट एवरेस्ट (8,848 मी॰) है।
ब. लोअर हिमालय - इसे लघु हिमालय या महाभारत श्रंखला भी कहा जाता है। 1800-4,600 मी॰ ऊंची पूर्व-पश्चिम दिशा में ग्रेटर हिमालय के समानान्तर सिन्धु नदी से लेकर उŸारी भारत, नेपाल और सिक्किम से होती हुई भूटान के पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के आस-पास तक है।
स. शिवालिक हिमालय - इसको बाहरी हिमालय या सब हिमालय रेंज भी कहा जाता है। इनकी औसत ऊंँचाई 1500-2000 मी॰ और चैड़ाई 10-15 किमी है। यह हिमालय का सबसे दक्षिणी हिस्सा है। इनका विस्तार कश्मीर, हिमांचल, उŸाराखण्ड, नेपाल, पश्चिम बंगाल, भूटान और अरूणांचल प्रदेश तक है।
3.पारिस्थितिकी -हिमालय की पारिस्थितिकी अत्यन्त नाजुक व विविधता से परिपूर्ण है। प्राकृतिक भू-सम्पदा, औषधीय सम्पदा, जंगल, वन्यजीव, पादप प्रजातियाँं, जैवविविधता, ग्लैशियर और जल स्रोत आदि विशेषतायें इसको खास बनाती हैं। इसकी अपनी एक जलवायु है, जो एशिया की अधिकांश जलवायु को प्रभावित करती है। इसके टिकाऊपन पर एशिया के 1.3 अरब लोगों की आजीविका निर्भर है।
4. परिवर्तन - पारिस्थितिकी तन्त्र नाजुक होने के कारण हिमालय पर किसी भी प्रकार का गैर टिकाऊ बदलाव भारत सहित पूरे एशिया सहित 130 करोड़ लोगों को प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन से ग्लोबल वार्मिंग होगी, जिससे तापमान में वृद्धि और ग्लेशियरों पर प्रभाव होगा और उससे नदियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जायेगा। नदियों के प्रभावित होने से वह बड़ा भू-भाग व वहां के निवासी प्रभावित होगे, जिसे नदियां सींचकर धनधान्य से परिपूर्ण करती हैं। आईपीसीसी के अनुसार अगले 100 साल में दुनियां का औसत तापमान 1.6 से 3 डिग्री सेल्शियस तक बढ सकता है।
5. विस्तार - भारतीय क्षेत्र में हिमालय का भौगोलिक विस्तार 5.3 लाख वर्ग किमी तक फैला है। इसके अन्र्तगत व्यापक पर्वत श्रंखलायें सिन्धु और ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र के बीच 2500 किमी तक फैली हैं। हिमालय 80 से 300 किमी तक चैड़ाई के क्षेत्र में फैला है, जिसकी ऊंँचाई 8 हजार मीटर तक है और उसकी जलवायु भारतीय क्षेत्र के एक बड़े भू-भाग को प्रभावित करती है। यह भारत के समस्त उत्तरी सीमा का प्रहरी है, जिसके भौगोलिक क्षेत्र का 41.5 फीसदी हिस्सा वनों से आच्छादित है, जो देश के कुल वन क्षेत्र का एक तिहाई है और अच्छे वन के रूप में इसकी हिस्सेदारी लगभग आधी (47 फीसदी) है। इसके वन क्षेत्र में पुष्पीय पौधों की 8000 प्रजातियां, 816 से अधिक वृक्षों की प्रजातियां, 775 खाने योग्य पौधे और 1740 के करीब औषधीय महत्व की प्रजातियां हैं। इसका विस्तृत हरियाली से आच्छादित क्षेत्र कार्बन डाईआक्साइड अवशोषण का एक बड़ा स्रोत्र है। इसका हमेशा बर्फ से ढ़का रहने वाला ग्लैशियर क्षेत्र 17 फीसदी और मौसमी बर्फ से ढ़का रहने वाला क्षेत्र 30-40 फीसदी है। देश की करीब चार फीसदी आबादी भारतीय हिमालयी क्षेत्र में निवास करती है, जिसकी आजीविका इसी हिमालय पर निर्भर है। इसके कैलाश पर्वत के निकट से निकने वाली दुनियांे की तीन प्रमुख नदियां सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र हिमालय को पार करती हैं और इनके सामूहिक अपवाह तन्त्र से करीब 60 करोड़ लोग जुड़े हैं।
6. परिणाम - भौगोलिक कारणों, आबादी के बढ़ते दबाब, विकास की अंधी दौड़, संसाधनों के अत्यधिक दोहन तथा हिमालयीन अन्य चुनौतियों नें हिमालय को अत्यन्त संवेदनशील तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या ने इन कारकों को और भयावह कर दिया है। मानव जनित कारकों और जलवायु परिवर्तन से हिमालयीन पारिस्थितिकी के सामने संकट खड़ा हो चुका है। परिणामस्वरूप अनियमित और असंतुलित वर्षा, भू-स्खलन, नदियों के पानी और बहाव में अनियमितता, जैव विविधता कां क्षरण, सिकुड़ते ग्लेशियर, घटते और कटते जंगल, प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि, पलायन और हिमालयी पारिस्थितिकी पर आश्रित जनजीवन के दरबदर जैसी समस्यायें दिखाई दे रही हैं, निदान खोजना है।
2.श्रेणियां- हिमालय को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है -
अ. बृहत्तर (ग्रेटर) हिमालय - पर्वत श्रंखला का सबसे ऊँंचा और उउत्तरी हिस्सा। इसका विस्तार पाकिस्तान, उउत्तरी भारत, नेपाल, भूटान से लेकर पूर्व में अरूणांचल प्रदेश तक है। उउत्तर में यह पूरी लम्बाई में तिब्बत स्वायŸा के दक्षिणी हिस्से से सटा हुआ है। इसकी कुल लम्बाई लगभग 2500 किमी और औसत ऊंचाई 6,100 मी॰ से अधिक है। इस पर दुनियाँं की सबसे ऊंची चोटी माउन्ट एवरेस्ट (8,848 मी॰) है।
ब. लोअर हिमालय - इसे लघु हिमालय या महाभारत श्रंखला भी कहा जाता है। 1800-4,600 मी॰ ऊंची पूर्व-पश्चिम दिशा में ग्रेटर हिमालय के समानान्तर सिन्धु नदी से लेकर उŸारी भारत, नेपाल और सिक्किम से होती हुई भूटान के पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के आस-पास तक है।
स. शिवालिक हिमालय - इसको बाहरी हिमालय या सब हिमालय रेंज भी कहा जाता है। इनकी औसत ऊंँचाई 1500-2000 मी॰ और चैड़ाई 10-15 किमी है। यह हिमालय का सबसे दक्षिणी हिस्सा है। इनका विस्तार कश्मीर, हिमांचल, उŸाराखण्ड, नेपाल, पश्चिम बंगाल, भूटान और अरूणांचल प्रदेश तक है।
3.पारिस्थितिकी -हिमालय की पारिस्थितिकी अत्यन्त नाजुक व विविधता से परिपूर्ण है। प्राकृतिक भू-सम्पदा, औषधीय सम्पदा, जंगल, वन्यजीव, पादप प्रजातियाँं, जैवविविधता, ग्लैशियर और जल स्रोत आदि विशेषतायें इसको खास बनाती हैं। इसकी अपनी एक जलवायु है, जो एशिया की अधिकांश जलवायु को प्रभावित करती है। इसके टिकाऊपन पर एशिया के 1.3 अरब लोगों की आजीविका निर्भर है।
4. परिवर्तन - पारिस्थितिकी तन्त्र नाजुक होने के कारण हिमालय पर किसी भी प्रकार का गैर टिकाऊ बदलाव भारत सहित पूरे एशिया सहित 130 करोड़ लोगों को प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन से ग्लोबल वार्मिंग होगी, जिससे तापमान में वृद्धि और ग्लेशियरों पर प्रभाव होगा और उससे नदियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जायेगा। नदियों के प्रभावित होने से वह बड़ा भू-भाग व वहां के निवासी प्रभावित होगे, जिसे नदियां सींचकर धनधान्य से परिपूर्ण करती हैं। आईपीसीसी के अनुसार अगले 100 साल में दुनियां का औसत तापमान 1.6 से 3 डिग्री सेल्शियस तक बढ सकता है।
5. विस्तार - भारतीय क्षेत्र में हिमालय का भौगोलिक विस्तार 5.3 लाख वर्ग किमी तक फैला है। इसके अन्र्तगत व्यापक पर्वत श्रंखलायें सिन्धु और ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र के बीच 2500 किमी तक फैली हैं। हिमालय 80 से 300 किमी तक चैड़ाई के क्षेत्र में फैला है, जिसकी ऊंँचाई 8 हजार मीटर तक है और उसकी जलवायु भारतीय क्षेत्र के एक बड़े भू-भाग को प्रभावित करती है। यह भारत के समस्त उत्तरी सीमा का प्रहरी है, जिसके भौगोलिक क्षेत्र का 41.5 फीसदी हिस्सा वनों से आच्छादित है, जो देश के कुल वन क्षेत्र का एक तिहाई है और अच्छे वन के रूप में इसकी हिस्सेदारी लगभग आधी (47 फीसदी) है। इसके वन क्षेत्र में पुष्पीय पौधों की 8000 प्रजातियां, 816 से अधिक वृक्षों की प्रजातियां, 775 खाने योग्य पौधे और 1740 के करीब औषधीय महत्व की प्रजातियां हैं। इसका विस्तृत हरियाली से आच्छादित क्षेत्र कार्बन डाईआक्साइड अवशोषण का एक बड़ा स्रोत्र है। इसका हमेशा बर्फ से ढ़का रहने वाला ग्लैशियर क्षेत्र 17 फीसदी और मौसमी बर्फ से ढ़का रहने वाला क्षेत्र 30-40 फीसदी है। देश की करीब चार फीसदी आबादी भारतीय हिमालयी क्षेत्र में निवास करती है, जिसकी आजीविका इसी हिमालय पर निर्भर है। इसके कैलाश पर्वत के निकट से निकने वाली दुनियांे की तीन प्रमुख नदियां सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र हिमालय को पार करती हैं और इनके सामूहिक अपवाह तन्त्र से करीब 60 करोड़ लोग जुड़े हैं।
6. परिणाम - भौगोलिक कारणों, आबादी के बढ़ते दबाब, विकास की अंधी दौड़, संसाधनों के अत्यधिक दोहन तथा हिमालयीन अन्य चुनौतियों नें हिमालय को अत्यन्त संवेदनशील तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या ने इन कारकों को और भयावह कर दिया है। मानव जनित कारकों और जलवायु परिवर्तन से हिमालयीन पारिस्थितिकी के सामने संकट खड़ा हो चुका है। परिणामस्वरूप अनियमित और असंतुलित वर्षा, भू-स्खलन, नदियों के पानी और बहाव में अनियमितता, जैव विविधता कां क्षरण, सिकुड़ते ग्लेशियर, घटते और कटते जंगल, प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि, पलायन और हिमालयी पारिस्थितिकी पर आश्रित जनजीवन के दरबदर जैसी समस्यायें दिखाई दे रही हैं, निदान खोजना है।
दूर से देखने पर पहाड़ जितने कठोर प्रतीत होते है, अन्दर से वे उतने ही नाजुक होते हैं। उनकी पारिस्थितिकी छुई-मुई जैसी होती है। इसकी पारिस्थतिकी तन्त्रों के बीच एक तादातम्य स्थापित होता है। इस पारिस्थितिकी तन्त्र के तहत पहाड, झरने, झील, छोटी-बड़ी नदियांँ, जंगल जीव-जन्तु एवं वनस्पितियांँ आदि आती हैं। इस तन्त्र में से अगर किसी एक को भी छेड़ा जाता है तो पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र गड़बड़ा जाता है। वर्तमान हिमालयीन ‘सुनामी’ पारिस्थितिकी तन्त्र के साथ किए जा रहे खिलवाड़ का परिणाम है।
पहाड़ अपने आकार के बराबर ही लाभकारी हैं। इनकी पारिस्थितिकी को बिगाड़ कर इन्सान सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को मार कर एक बार में ही सभी अण्डे लेने के उपक्रम कर रहा है।
पहाड़ अपने आकार के बराबर ही लाभकारी हैं। इनकी पारिस्थितिकी को बिगाड़ कर इन्सान सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को मार कर एक बार में ही सभी अण्डे लेने के उपक्रम कर रहा है।





