Monday, March 3, 2014

भारतीय लोकतंत्र में पुनर्विन्यास - अरूण कान्त त्रिपाठी

भारतीय लोकतंत्र का पद विन्यास उत्कृष्ट प्रदर्शन है। इसकी संस्थाओं का कामकाज दुर्गति के स्मारक हैं। यह त्रासदी बिलकुल स्पष्ट हैं। चुनाव में मतदाताओं की भागीदारी बढ़ रही है, तीखा और धारदार मुकाबला भी हो रहा है। सबसे बढ़कर उसका स्वर सुसंस्कृत नही रहा है। तथापि गणतंत्र नाजुक रूप से फटेहाल हो  रहा है। सरकार इसको बेशर्मी के साथ छोड़ सकती है। लेकिन ऐसा करते हुए वह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर संकट भी सिरज रही है, जैसा कि आपातकाल के बाद से देखने में नहीं आया है। इसके पहले हमने शायद ही किसी सरकार को अपने जनादेश को जहर पिलाते देखा हो? प्रधानमंत्री ईमानदार हंै, हम सुनेंगे लेकिन इसके पहले किसी प्रधानमंत्री ने अपने अधिकारों को त्याग करके लगातार समझौता भी नहीं किया।
द्वितीय जन ज्वार:
लोकतंत्र में प्रत्येक चरण का प्रारम्भ राजनीति में जनता की बढ़ती सहभागिता व सक्रियता से आरम्भ होता है। पर 1993 से 1995 के मध्य और उसके बाद 2000 से 2013 के मध्य के चुनाव केवल इतना ही इंगित नहीं करते, वरन् चार दशक पूर्व वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक क्रांति के सत्य को भी दर्शाते है। जिसमें समाज के नए वर्ग और क्षेत्र बराबर जुड़ते चले आ रहे हैं।
राजनीतिक एजेंडे में कोई परिवर्तन न होने के बाद भी ऐसे नूतन वर्गों और क्षेत्रों का जुड़ाव ही लोकतात्रिक प्रक्रिया को रेखांंिकत करता है। यद्यपि इस लोकतंत्र की प्रक्रिया में ऐसी जन सहभागिता स्वागत योग्य कदम है तथापि इसको ही राजनीतिक सहभागिता का पर्याय मानना उचित नहीं है। यह एक क्षणिक प्रयोग मात्र है। इसमें बढ़ती हिस्सेदारी सम्भवतः इस बात की द्योतक है कि ऐसे लोगों को गैर चुनावी राजनीतिक सहभागिता के लिए संस्थाओं में वांक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा है। 1952 से 1993-95 और 2000-2013 के मध्य के चुनावों को देखंे तो पता चलता है कि इसमे मतदाताओं की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत से बढ़कर 64 प्रतिशत तक पहुंच गई। साठ के दशक में भी ये हिस्सेदारी 60 प्रतिशत रही है। पर उसके बाद उसमें भारी गिरावट आयी थी। इसी प्रकार इन चुनावों में प्रत्याशियों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। 1952 में प्रति सीट 4.7 प्रतिशत की दर से प्रत्याशियों का औसत बढ़कर 1993-95 में 14.7 प्रतिशत हो गया जबकि 2000 से 2013 के बीच के चुनावों में ये प्रतिशत बढ़कर 19.7 प्रतिशत हो गया। अगर साठ के दशक को प्रथम लोकतांत्रिक उफान की संज्ञा दी जाए तो नब्बे के दशक को दूसरा लोकतांत्रिक जन उफान कहा जाना चाहिए। राज्य स्तर पर मतदाताओं की हिस्सेदारी 1993 से 2013 के चुनावों में बढ़ी है। यद्यपि यह बढ़ोत्तरी समरूप नहीं रही। जहां उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और सिक्किम में इसे एक नए सामाजिक वर्ग के राजनीतिक अभ्युदय की संज्ञा दी जा सकती है, वहीं उड़ीसा में कड़ी राजनीतिक स्पर्धा एवं आन्ध्र प्रदेश व हिमाचल प्रदेश में एक तरफा जनादेश इसके कारण हो सकते हैं। हालांकि चुनावों की गहराई में जाने पर यह मात्र कल्पना ही कही जा सकती है कि दूसरे लोकतांत्रिक जन उफान के पीछे पिछड़ी जातियों का बढ़ता मतदान है। विभिन्न राज्यों में इसके अलग-अलग कारण व मार्ग हो सकते हंै। वांक्षित सर्वे के आंकड़ों के अभाव में इसकी पुष्टि मुश्किल ही होगी पर विभिन्न राज्यों में मतदाताओं की भिन्न-भिन्न हिस्सेदारी इसको समर्थन देती है। लगभग सभी क्षेत्रों में ग्रामीण मतदाताओं की हिस्सेदारी शहरी मतदाताओं की तुलना में अधिक रही। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुस्लिमों की बढ़ी हिस्सेदारी प्रमाणित रूप से जाहिर न हो सकी। जबकि आरक्षित क्षेत्रों में मतदाताओं की हिस्सेदारी लगातार कम रही। इसे हम मान सकते हैं कि ऐसा गैर दलितों की उपेक्षा के कारण हुआ होगा। कुछ पिछड़े गैर आदिवासी क्षेत्रों जैसे आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में अधिक मतदान हुआ। कुछ पिछड़े क्षेत्रों में से महराष्ट्र के विदर्भ व मराठवाड़ा, पूर्वी दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड आदि में भी अधिक मतदान हुआ। जबकि अन्य पिछड़े क्षेत्रों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, विन्ध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में 1993 से 1995 के बीच कम मतदान हुआ। अतः क्षेत्र के पिछड़ेपन और बढ़ी चुनावी सहभागिता में कोई अन्तर्सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता है।
राज्य स्तर पर प्रत्याशियों की बढ़ती संख्या को संभालना अपेक्षाकृत सरल है। यद्यपि वह राज्यों की दलीय व्यवस्था से प्रभावित होती है। जहां पर एक दलीय वर्चस्व है जैसे कि अरुंणाचल में, वहां पर प्रत्याशियों की संख्या प्रति सीट औसत काफी कम है। जहां पर द्विदलीय प्रतिस्पर्धा की राजनीति है वहां पर ये औसत अधिक रहा है। और जहां पर बहुदलीय प्रतिस्पर्धा है जैसे उत्तर प्रदेश व बिहार में तो यहां पर प्रत्याशियों की संख्या का औसत बहुत अधिक रहा पर इसके अलावा अतिरिक्त पिछड़ी जातियों के राजनीतिक उभार से भी प्रत्याशियों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। चुनावों में बढ़ती हिस्सेदारी का अर्थ तलाश करना अभी भारतीय राजनीति में एक चुनौती ही है तथापि ऐसा कहा जा सकता है कि भारत में पद, प्रतिष्ठा और पैसा इसके पीेछे का एक प्रमुख कारण हो सकता है। हालांकि इसकी आंतरिक भिन्नताओं और प्रवृत्तियांें को स्पष्ट करने के लिए काफी गुणात्मक व व्यवहारवादी शोध की आवश्यकता है। इसके प्रकरण पर केवल ध्यान आकर्षित करने के लिए ये विचार प्रस्तुत किए जा रहे हंै। पर इससे भी ज्यादा इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के लिए इस प्रकरण का क्या महत्व है?
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मात्र सहभागिता से हम सहभागी लोकतंत्र की अवधारणा तक नहीं पहुंचते हैं। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि, नए सहभागी  किन नए अर्थांे के साथ आते हैं। इसके अलावा क्या इस जन उफान को कोई संस्थापक रूप प्रदान किया जा सकता है। चूंकि, बढ़ती सहभागिता दलीय निष्ठाओं से जुड़ी है अतः इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति निष्ठा के रूप में नहीं देखा जा सकता है। वस्तुतः नए सहभागियों की विशिष्ट अपेक्षाएं होती हैं जो उनकी विशिष्ट संस्कृतियों से संनिद्ध होती हंै, न कि वर्तमान लोकतांत्रिक संस्थाओं से। अतः द्वितीय जन उफान लोकतंत्रीकरण के भविष्य के लिए नई चुनौतियां पेश करता है। ये चुनौतियां लोकतंत्र की असफलता से नहीं वरन् उसकी सीमित पर सतत् सफलता से निकलती हैं।
चुनाव का परिवर्तनकारी स्वरूप:
1993 से 2013 के आम और विधानसभा चुनाव राज्य स्तर पर सत्ता परिवर्तन की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। यद्यपि अरुणांचल, गोवा, मध्य प्रदेश, बिहार इसके अपवाद रहे। मतदाताओं से तत्कालीन सरकार से नाराजगी इसका एक स्पष्टीकरण है। राजस्थान व गोवा में भी अभिजनों की अधिक सहभागिता से सरकारें किसी तरह से बच गई लेकिन उसके बाद दोनों ही राज्यों में जन उफान की नाराजगी सत्ता दल को भुगतनी पड़ी। इससे ऐसा लगा है कि भारतीय राजनीति चंचल मतदाताओं एवम् दलीय विखंडन की विकसित अवस्था में पहुंच गई है। 2013 में दिल्ली की सरकार का हश्र इसका बड़ा उदाहरण हो सकता है। किस तरह से जन उफान ने एक नए अपरिपक्व राजनीतिक दल को सत्ता के निकट लाकर खड़ा कर दिया। राज्यों में इस चंचलता सूचकांक का अध्ययन बताता है कि 1989-90 और 1993-95 के मध्य यह सूचकांक लगभग 15 प्रतिशत की चंचलता प्रदर्शित करता है। पीडरसन चंचलता सूचकांक यानि पीडरसन वालेटिलिटि इन्डेक्स का निर्धारण करने में विगत चुनावों के मुकाबले वर्तमान चुनावों में सभी दलों को प्राप्त हुए मतांें में अभिवृद्धि के प्रतिशत को जोड़ लेते हैं। विदेशों के मुकाबले ये चचंलता भारत में अधिक लगती है। पर इसका कारण ये है कि यहां पर मतदाता विभिन्न दलों से निरंतर संवाद में रहते हैं। किसी एक दल से स्थायी निष्ठा न रखने में कोई गंभीर बुराई नहीं है। वरन् सहभागी लोकतंत्र का óोत है। वैसे कई राज्यों में 1989-90 में ही इस प्रवृत्ति का प्रारंभ हो गया था जबकि 1993-95 के चुनावों में इसको मजबूत बनते देखा गया और 2000-2013 के बीच इसे सरकारी  अभिकरण के रूप में देखा गया। चूंकि इससे जातीय चंचलता के बारे में अधिक अनुमान नहीं लगता है। अतः भावी लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया के लिए इसका क्या परिणाम होगा ये कहना मुश्किल है। जहां पर कम चंचलता दिखायी देती है वहां पर हो सकता है कि कुछ व्यक्तियों या जातियों द्वारा दलीय निष्ठाओं में परिवर्तन किया गया हो। वहां पर संभवतः नए बने मतदाताओं का नए दलों के प्रति रूझान हो सकता है। फिर भी बढ़े हुए चंचलता सूचकांक और मतदाताओं की दलीय निष्ठाओं में परिवर्तन में कुछ अन्तर्सबंध अवश्य लगता हैं। इसलिए मतदाताओं की चुनावी चंचलता में रूपान्तरकारी राजनीति की संभावनाएं छिपी दिखती हैं।
कांग्रेस राज के बाद का लोकतंत्र:
प्रथम चरण कांग्रेस सिस्टम था जिसमें विभिन्न दलों के बावजूद प्रधानता एवम् वर्चस्व कांगे्रस का ही रहता था। ये दौर 1950 से 1970 के बीच का था। द्वितीय चरण सत्तर के दशक के बाद आरंभ हुआ और इसमें कांग्रेस को टक्कर देने वाले अनेक दलों का अभ्युदय हुआ। राज्यों में द्विदलीय व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई सम्भावना नहीं दिखायी दी। बिहार और उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के सफाए के बाद 1993-95 के चुनावों ने अपरिवर्तनीय दलीय व्यवस्था की प्रक्रिया का प्रारम्भ कर दिया। तृतीय, कांग्रेस द्वारा पैदा की गई रिक्तता से राष्ट्रीय स्तर पर एक शून्य पैदा हो गया। और राष्ट्रीय राजनीति में वामदलों व दक्षिणपंथ के मध्य के स्थान को प्राप्त करना किसी भी दल के लिए कठिन साबित होने लगा। चतुर्थ, कांग्रेस के ह्रास से सीमित एजेंडा वाली जातिवादी पार्टियों का अभ्युदय हुआ। इसमें कुछ तो समय के साथ समाप्त हो जाएंगी पर कुछ बहुजन समाज पार्टी जैसी स्थायित्व में आ जाएंगी। पर लोकतंत्र के इन नूतन अवतारों का वर्तमान संगठानात्मक स्वरूप व कार्यशैली अत्यन्त गैर लोकतांत्रिक है और अन्ततः उपरोक्त विशिष्टताओं को संगठित राजनीति के संवाहक के रूप में दलों की गिरती भूमिका के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
दलांे का मात्र चुनावी चरित्र, टिकट आवंटन में उनके द्वारा प्रत्याशियों के दावों का सम्यक् निपटान न होने और दलों का अपने मतदाताओं से कोई सातत्यपूर्ण सम्बन्ध न होने आदि की प्रवृत्तियों को वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य पर गहराती प्रवत्तियों के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे दलों की वैधता और उनके प्रति नागरिकों के विश्वास में कमी आयी है। पिछले एक दशक के दौरान इस बढ़ते आक्रोश से समाज के अनेक तबको में चुनावी राजनीति के प्रति उपेक्षा का भाव भर गया है। वे सामाजिक और गैर दलीय राजनीतिक आंदोलनों में अधिक रूचि लेने लगे हैं। कहीं दलों के प्रति मध्यवर्गीय आक्रोश दिखता है, तो कहीं स्थापित दलों के विकल्प की तलाश में लोग दिखते हंै। 2013 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली इसका सटीक उदाहरण बनकर उभरा है जहां के मतदाताओं के 30 प्रतिशत हिस्से ने एक साल पुरानी पार्टी आम आदमी पार्टी को व्यापक समर्थन देकर बताया कि वे विकल्प चाहते हैं। यद्यपि कोई भी दल प्रभावी बहुमत के निकट नहीं आ सका तथापि उत्तर प्रदेश में 2007 में बहुजन समाज पार्टी और 2012 में समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत लोगों ने प्रदान किया तथापि इसके पीछे के कारण सामाजिक नहीं बल्कि  आम मतदाताओं को कुछ दलों से नाराजगी रही। इससे खास बात ये हुई कि दलों के संस्थानीकरण पर प्रभाव पड़ा। कहीं पर इसका अनुकूल तो कहीं पर प्रतिकूल प्रभाव दृष्टिगोचर होता है तो अधिकांश मतदाताओं की दलीय निष्ठा पर मतदान में कमी दिखती है? इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर आम और विधानसभा चुनावों के अत्यन्त अव्यवस्थित स्थानिक चरित्र वाले चुनाव परिणामों का अर्थ कुछ हद तक स्पष्ट होने लगता है। इसके अलावा विविधदलों की उपलब्धियां एक विन्यास का आभास देती हैं।
अगर हम पिछला चुनावी विष्लेषण करें तो पाते हैं कि, कांग्रेस का ह्नास लगातर हो रहा है। कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लग गई हैं।
1993-2013 के बीच के चुनावों से ये भी पता चलता है कि, कांग्रेस में सत्ता प्राप्त करने की संस्थात्मक इच्छा में कमी आयी है। परिवारवाद, अनियन्त्रित गुटबाजी आदि का हावी होना इसका संकेत है।
राजनीति की मांग व पूर्ति के अंतराल को तीसरी शक्ति के अभ्युदय के परिप्रेक्ष्य से समझा जा सकता है। इस शक्ति के प्रमुख दल तत्व जनता दल का जहां द्वितीय जन उफान के कारण जनाधार बढ़ा वहीं इसके चुनावी समर्थन में गिरावट आई। 1993 से 2013 के चुनावों की पूर्ववर्ती चुनावों से तुलना करें तो ज्ञात होता है कि, चुनावी राजनीति को प्रभावी करने वाले कुछ स्थायी संरचनात्मक परिवर्तन चुपके से हो गए। इसमें तीन प्रमुख है। प्रथम, राजनीतिक परिदृष्य का क्षेत्रीयकरण और समरूपीकरण, द्वितीय नूतन सामाजिक सीमांकनों की खोज और नूतन राजनीतिक संबद्धताएं तथा तृतीय राजनीतिक संवाद की शब्दावली में परिवर्तन।
क) 1993 से 2013 तक के चुनावों में कोई ऐसा स्पष्ट विन्यास नहीं दिखायी दिया जो विभिन्न राज्यों में पाया जाए। संख्या व विचारधारा की दृष्टि से शासन करने वाले दलों की विविधता ऐसी कभी नहीं रही। कोई अखिल भारतीय चुनावी लहर नहीं दिखी। और 1971 में राज्यों में आरम्भ हुए एक युग का अंत हो गया। पूर्ववर्ती चुनावों में विधानसभा के चुनाव भी आम चुनावों के संस्करण होते थे पर इन चुनावों ने विधानसभा चुनावों को प्रांतीय राजनीति का संदर्भ दे दिया। यहां तक कि हिंदी प्रदेश तक की अवधारणा छिन्न-भिन्न हो गई। इस क्षेत्र के चार बड़े राज्यों में चार परस्पर विरोधी राजनीतिक दल शासन में आ गए। ऐसा नहीं कि अखंडता व समरूपीकरण की प्रक्रिया विपरीत दिशा में घूम गई उलटे अनेक राज्यों हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात में अनेक लहरंे दिखायी पड़ीं। लेकिन ये अवश्य है कि इन लहरों का केंन्द्र बिंदु राष्ट्रीय से हटकर प्रांतीय हो गया। पर इस प्रांतीयता की प्रवृति को भारतीय राजनीति में दलीय स्पर्धा की भारतीय शैली के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके अंर्तगत पहले विखंडन होता है फिर प्रत्येक खंड के अंदर समरूपीकरण की प्रक्रिया आरम्भ होती है। जाहिर है कि इस खंड का दूसरे खंडों के साथ विभेद बना रहता है।
ख)  1993 से 2013 के बीच के चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ये है कि उत्तर भारत मेें अन्य पिछड़ी जातियों के सत्ता में आने की अपरिहार्यता को गत्यात्मकता मिली। बिहार में ये प्रक्रिया आरम्भ हुई और बाद में पूरे उत्तर भारत में फैल गई। जिस प्रकार 1995 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान ओबीसी जातियों ने स्थापित राजनीतिक दलों को शिकस्त दी वह इस प्रक्रिया की अनपलटता का संदेश देती है। यद्यपि विभिन्न राज्यों में ओबीसी जातियों की राजनीति भिन्न-भिन्न स्थितियों में है पर राज्यों में इनका सत्तासीन होना अब दूर नहीं रह गया है। संविधान मात्र एक शाब्दिक उपस्थिति से आज ये जातियां अत्यंत गत्यात्मक और अनुभवी राजनीतिक समुदाय के रूप में उभरी हैं। समाज की दूसरी उपेक्षित जातियों को भी इस समुदाय में मिलाने का प्रयास किया गया पर उत्तर प्रदेश में इस दौरान सपा-बसपा गठबंधन का जैसा हश्र हुआ उससे स्पष्ट है कि ऐसी साझेदारी बहुत कठिन और संवेदनशील है। अयोध्या आंदोलन के बाद मुसलिमों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया है। हालांकि हालातों के मददेनजर मुसलिमों का कांगे्रस को 2009 के आम चुनावों में सहयोग मिला तथापि इसके बाद भी मुसलिमों के समर्थन का कोई अखिल भारतीय स्वरूप नहीं उभर पाया है। जातियां भी अपने स्थानिक स्वरूप का त्याग करके राज्य स्तर पर सजातीय उपजातियों से जुड़ने का प्रयास कर रही हैं। कुल मिलाकर नई जातिवादी अवधारणा को और मजबूत करने का प्रयास कर रही हैं। पर यदि गठबंधन सफल नहीं हुआ तो ये नई जातियां अपनी अस्मिता को लेकर कठोर हो जाएंगी और राजनीतिक संवाद की सम्भावना सीमित हो जाएगी।
ग) सोवियत रूस के अवसान, शीतयुद्ध की समाप्ति, उदारीकरण- वैश्वीकरण के आगमन तथा जातियों की बढ़ोŸारी ने विगत कुछ वर्षो में राजनीतिक संवाद की शब्दावली को बदल दिया हैंैै। इससे अभिजात वर्गीय गोष्ठियों में भारतीय राजनीति की चिंताओं, मुद्दों और स्थितियों में फर्क आया है। 1993 से 2013 के सारे चुनावों में यह जानने का अवसर मिला कि क्या जनता की भाषा व संवाद में भी फर्क आया हैं? क्या नए उभरते विन्यास के पीछे कोई मूल्य परिवर्तन है? और क्या विचारधाराओं का प्रादुर्भाव हुआ है? और क्या विचारधाराओं की द्वैधता यानि कि वाम और दक्षिण अधिक कठोर हुई है? जिस आसानी से भारत में समाजवाद के स्थान पर पूंजीवाद को अपनाया गया है वह वास्तव में आज चिन्ता का विषय है। भारतीय समाज में किसी विचारधारा की स्वीकृति व्यक्ति की सामाजिक व शैक्षणिक स्थिति पर निर्भर करती है। अनेक मुद्दे जो विचारधारा के उच्च प्रतिमानों से जुड़े होते हैं वे इसलिए समाज के कमजोर वर्गो में चर्चित नहीं होते पर द्वितीय लोकतंात्रिक जन उफान के साथ अनके ऐसे विचार व विश्वास पैदा हुए हैं, जिनको उदारवादी लोकतत्र में विश्वास रखने वाली श्रेष्ठ विचारधाराएं परिभाषित नहीं करती हैं। मायावती व लालू यादव की संवाद शैली हमको चाहे जैसी लगे लेकिन उनका लोक संस्कृति से जुड़ाव अवश्य है। अगर राजनीति एजेंडे को लोक संस्कृति से जुड़ी आकांक्षाओं से संबद्ध नहीं किया गया तो वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था की वैधता ही संदिग्ध हो जाएगी।
- लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार है।