Sunday, March 2, 2014

नीर, नदी तथा पर्यावरण के संवर्धन का मूल-इं॰ विश्वनाथ खेमका

1. प्रस्तावना- भारत अपने उद्भव काल से ही कृषि एवं ऋषि प्रधान देश रहा है। भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत मानव मात्र का कल्याण करने वाले के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की विशिष्ट परम्परा रही है। इस देश में वातावरण को शुद्ध करने वाली तुलसी, जीवन दायिनी गंगा नदी एवं सबकी पालन हार गाय को माता कहा जाता है; इन्हें जाति, पंथ, भाषा आदि की सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। कृषि देश की जीवनशैली है इस नाते इसे गांवों का देश भी कहा जाता है। कृषि अर्थ व्यवस्था का आधार और कृषक अन्नदाता के रूप में जाना जाता है।
सनातन काल से ही देश के महर्षियों, मनीषियों एवं विचारकों ने पर्यावरण संरक्षण हेतु गो वंश के साथ नीर, नदी, नारी के संरक्षण एवं संवर्द्धन की न केवल व्यवस्था दी है अपितु इनके आदर्श भी प्रस्तुत किए हैं। पंडित मदनमोहन मालवीय जी अपनी विदेश यात्रा में दैनिक उपयोग हेतु गंगा जल साथ ले जाते थे। वर्ष 1924 ई॰ में हरिद्वार में निर्माणाधीन झण्डू वियर में गंगा की निर्मल धारा के अविरल प्रवाह हेतु रामधारा को छुड़वाने में मालवीय जी का सार्थक प्रयास रहा है, जो उनके नीर, निर्मलधारा-अविरलधारा के चिन्तन का एक सकारात्मक उदाहरण है।
भारतीय ग्रन्थों में स्वच्छ निर्मल जल की धारा को गंगा के नाम से भी जाना जाता है तथा गंगा नदी को जो विश्व की पवित्रतम नदी है के किनारे पली, पोषित श्रेष्ठ भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की दिशा व दृष्टि आज पुनः समाज के सामने प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता है ताकि भारत सुजलां, सुफलामं, मलयज शीतलाम की कसौटी पर खरा उतर सके।
2. सृष्टि का विकास क्रमशः आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी की संरचना का है। जल में जीव की उत्पत्ति लगभग तीन अरब वर्ष पूर्व कही जाती है। यह पृथिवी पहले गर्म थी, धीरे-धीरे ठण्ढ़ी हुई, समुद्र बने, उनसे भूमि निकली और जीवन प्रारम्भ हुआ। संसार में सबसे ऊँचा हिमालय पर्वत है। भारतीय वैदिक सभ्यता एवं विश्व के महान विद्वानों के मतानुसार मानव जाति के आदि पुरूष की उत्पत्ति का स्थल हिमालय में ‘मानस स्थान’ है, जो कि एक झील है तथा चलने वाली, वहनेवाली, वेगवती गंगा, यमुना नदियों का उद्गम स्थल भी हिमालय है।
आज गंगा, यमुना सहित समस्त नदियाँ प्रदूषण युक्त हैं। इनमंे जल की कमी है, जो जल है भी वह प्रदूषित है, पीने व स्नान योग्य नहीं है। हिमालय का हिम व पर्यावरण भी कुप्रभावित है। विश्व के लिए यह चिन्ता व चुनौती का विषय है; इसे स्वीकार कर समाधान की आवश्यकता है।
अन्य प्राणियों की भांति मानव शरीर भी पांच तत्वों से निर्मित है। ‘भगवान’ शब्द भी इन तत्वों के प्रथमाक्षरों (भ-भूमि, ग-गगन, वा-वायु, अ-अग्नि, न-नीर) से बना है। देवता निष्पक्ष देता है। भगवान रूपी यह तत्व भी बिना किसी भेदभाव के सभी को देते हैं। भारतीय संस्कृति ने इन्हें देव तुल्य स्वीकार किया है।  पानी के महत्व के कारण ही नारायण (नारा-पानी, अयन-निवास) का निवास पानी में है। अतएव मनुष्य जीवन में यदि भगवान की प्राप्ति करनी है तो उसे पानीदार मनुष्य बनना पड़ेगा तभी परमपिता परमेश्वर की उस पर अनुकम्पा होगी और वह पानी की शून्यता से बच पायेगा।
 नीर, नदी एवं पर्यावरण हेतु इतना अवश्य करें -
1. प्रजातन्त्र में यदि प्रजा जाग्रत होकर पंचायत के चुनावों से लेकर संसद तक के सभी चुनावों में शत-प्रतिशत भाग लेकर केवल उन्हीं प्रतिनिधियों का चयन करे, जिनके जीवन में जीव के जीवन के प्रतिविम्ब का दर्शन हो।
2. सीमान्त कृषक जिनके खेत का क्षेत्रफल एक हेक्टेयर से अनधिक होता है उनको अपने खेतों की जुताई बैलचालित हल से करनी चाहिए ताकि खेत की मेड़ तथा खेत का जीवाश्म सुरक्षित रहे।
3. खेती में रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का न्यूनतम प्रयोग हो।
4. प्रत्येक गांव में कम से कम दो तालाब बनें और उनके चारो ओर बरगद, पीपल, पाकड़ आदि के बड़े छायादार, शोभाकार वृक्ष लगाये जायें।
5. वर्षा जल का संचयन किया जाये। इसके लिए बरसाती नालों तथा नदियों में मिलने वाले नालों में स्थान-स्थान पर ठोकर, चेकडैम बनाये जायें, जिससे धरा के पेट में पानी भरे।
6. गोवंश पालन, संरक्षण व संवर्द्धन करें, जिससे खेती को खाद, परिवार को पोषण, स्वास्थ्य के लिए पंचगव्य  आदि प्राप्त हो और पर्यावरण संरक्षित हो।
7. देश और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में नारी की भूमिका का कोई विकल्प नहीं। मातृ शक्ति का योगदान अद्वितीय है, अवर्णनीय है, अकथनीय है एवं पूजनीय है। अतएव नारी को सम्मान, समान अवसर, प्रतिभा प्रदर्शन का समुचित व यथोचित अवसर दिया जाय। कन्या के भू्रण हत्या के दोषियों को जीव हत्या का अपराधी मानते हुए उन्हें दण्डि़त किया जाये।
8. उपभोगवादी जीवन शैली के स्थान पर उपयोगवादी संस्कृति अपनाऐं। प्राकृतिक संसाधानों का आवश्यकता के अनुसार दोहन करें, इनका शोषण न करें।
9. सरकारी (भारत एवं राज्य) संबन्धित विभागों तथा जनता द्वारा नीर, नदी तथा पर्यावरण संवर्द्धन हेतु दिये गये आदेशों, अधिनियमों की जानकारी रखें तथा उनका पालन करें, कराऐं।
ऽ वैदिक सभ्यता वनाम विज्ञान काल - वाल्मिीकि रामायण में राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति हेतु अथर्ववेद के अनुसार ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ किए जाने का वर्णन है। इससे स्पष्ट है कि वैदिक सभ्यता का काल भगवान राम के जन्म से पूर्व का है। मानव उत्पत्ति का वैज्ञानिक आधार 60 लाख वर्ष पूर्व का जूते के आकार का प्राप्त पत्थर (फासिल) है, अतः इस प्रकार वैज्ञानिक आधार पर भी वैदिक सभ्यता आदि सभ्यता है। वैदिक सभ्यता का उद्गम हिमालय है अतः इसे हिन्दू सभ्यता भी कहा जाता है; जिसका विस्तार पूरी दुनियाँ में हुआ; जिसका सम्बन्ध किसी पंथ, जाति अथवा किसी पूजा पद्धति से नहीं है। यद्वपि वेदों में निहित ज्ञान एंव विज्ञान सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है; तदापि वर्तमान इक्कीसवीं शताब्दी में इस बात की नितान्त आवश्यकता है कि वेदों के ज्ञान-विज्ञान को देश और काल के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अविलम्व सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय प्रस्तुत किया जाय। यह कार्य शोधार्थी, जिज्ञासु युवा पीढ़ी के द्वारा वखूबी निष्पादित किया जा सकता है। ऐसा होने पर नीर, नदी, पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्द्धन में भारत के आत्मिक, स्वाभाविक एवं स्थिर विकास कोे बल मिलेगा।
 निर्मल धारा गंगा - विश्व की पवित्रतम नदी गंगा को  ‘‘राष्ट्रीय नदी’’ की उद्घोषणा, राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन तथा भारत के आई.आई.टी. के माध्यम से गंगा की निर्मल, अविरल धारा बने इस हेतु वर्ष 2020 तक पूर्ण करने की परियोजनाऐं बनाई जा रही हैं। अतः नदियों को सदानीरा, स्वच्छनीरा बनाए रखने हेतु बेसिन के समस्त क्षेत्रीय निवासियों से सहयोग एवं सहभागिता की नितान्त आवश्यकता है। हिमालय के पिघलते हिमनदों (ग्लेशियर) को बचाने तथा वर्षा आधारित खेती के लिए वर्षा के जल की शत-प्रतिशत मात्रा के संरक्षण किए जाने की आवश्यकता है। वर्षा आधारित खेती से अभिप्राय है नालों में चेकडैम (बांध) बनाकर, छोटे खेतों की जुताई  बैलों द्वारा चालित हल से करके; खेतों की मेंड़ों को सुरक्षित रखकर, तालाब/कुण्ड़ों/झील/झरनों/वृक्षों की संस्कृति अपनाने से है। प्रत्येक गांव के बरसाती नालों पर वगैर सीमेन्ट का प्रयोग किए एक सौ की संख्या तक चेकडैम बनाकर के वर्षा जल को धरती के अन्दर पहुँचाने से नदियाँ पुनः सदानीरा हो सकेंगी। नदियों को स्वच्छ बनाये रखने हेतु यह आवश्यक है कि उद्योगों, नगरों/ं कस्बों के प्रदूषित कचरे व जल के प्रवाह को शोधित कर के उसे कृषि/पेड़-पौधों की सिंचाई हेतु उपयोग करें न कि उसे नदी में ड़ालें। नदियों के आस-पास  क्षेत्र में नलकूप लगाना प्रतिबन्धित हो।
सत्य व संस्कार - विकास का पथ विज्ञान सम्मत है।  विकासवाद ने ईश्वर, जीव, पुनर्जन्म आदि आध्यात्मिक ज्ञान पर प्रहार किया है; यह विज्ञान प्रयोग, प्रयोगशाला एवं साक्ष्यों की वैशाखी पर टिका है। तथापि विज्ञान एवं आध्यात्म समान रूप से और साथ-साथ चलने वाली धाराऐं हैं। प्रकृति के प्रति मानव को उनके कर्तव्यों का वोध कराके उनमें चेतना जगाना भी इनका उद्देश्य है। विज्ञान भौतिक तथ्यों पर आधारित है; जवकि आध्यात्म आस्था, भावना, विश्वासपरक है। परमात्मा, प्रकृति  एवं जीवात्मा के अन्तर का संबन्ध आध्यात्मिक है; जो पारस्परिक कल्याण का द्योतक है; जिसमें किसी प्रकार के नकारात्मक् विचार का समावेश नहीं है तथा यह सृजनात्मक है;  जबकि विज्ञान दुधारी तलवार है; जो उसके प्रयोगकर्ता को सृजनात्मक अथवा विनाशकारी कार्यों में समान रूप से सहयोगी रहता है। इस प्रकार विज्ञान वरदान और अभिशाप भी है; जबकि आध्यात्म मनुष्यत्व से देवत्व व देवत्व से अमरत्व की ओर ले जाता है। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति एवं प्रख्यात दर्शन शास्त्री डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन से एक बार एक विदेशी ने अपने देश की उपलब्धियों का बखान करते हुए कहा कि ‘‘हमारे देश के लोग आकाश में पक्षियों की भांति उड़ सकते हैं, पानी में मछलियों की भांति तैर सकते हैं, जमीन पर सैकड़ों मील की रफ्तार से दौड़ सकते हैं’’-इस पर डा0 राधाकृष्णन ने कहा ‘‘भारतीय संस्कृति न तो हमे हवा में पक्षियों की भांति उड़ना, पानी में मछलियों की भांति तैरना और न सिर्फ जमीन पर सैकड़ों मील की रफ्तार से दौड़ना सिखाती है; अपितु हमारी संस्कृति हमें इस धरती पर इन्सान की तरह रहना सिखाती है।’’
विभिन्न अवसरों पर वैज्ञानिकों के दलों ने भारतीय संस्कृति एव दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर विचार एवं मंथन किया तथा पुष्टि की है कि वे भी भारत के ऋषी-मुनियों की जीव के अस्तित्व, नित्यत्व एवं जन्म-जन्मान्तर से मुक्ति आदि के तत्वों को स्वीकार करते हैं। अतएव विश्व का नीर, नदी एवं पर्यावरण के प्रदूषण से मुक्त करना है तथा आम आदमी की गरीबी दूर कर उसे आर्थिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक समृद्धि के पथ पर अग्रसर करना है तो सनातन संस्कारों, सदाचरण, आध्यात्म एवं विज्ञान पर आधारित विकास के पथ पर चलना पड़ेगा और साथ ही केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों एवं साधु-सन्तों को आपसी सहयोग से लक्ष्य प्राप्ति हेतु तन-मन-धन से जुटना पड़ेगा तभी सुजलाम, सुफलाम..... का स्वप्न साकार होगा।