Tuesday, March 25, 2014

प्रकृति से छेड़छाड़़ विनाशक - दिनेश रावत

हम इस प्रकृति से जुड़े हैं, जिसे रोज अनुभव करते हैं, जो कभी हमें अपने सौंदर्य से लुभाती है तो कभी अपने रौद्र रूप से भयभीत भी करती है। प्रकृति के बारे में कहा जाता हे कि वह न तो किसी पर दया करती है और न किसी से दया की उम्मीद करती है, क्योंकि प्रकृति निरपेक्ष है। हर हाल में अन्ततः जीत प्रकृति की ही होती है, क्योंकि वह अजेय है। यही बजह है कि मानव ने प्रकृति की अकल्पनीय शक्ति को अच्छी तरह समझा  और उसके सामने नतमस्तक हो गया। उसी दौर में प्रकृति के विभिन्न रूपों को उसने पूजना शुरू किया और पराशक्ति के रूप में उसने ईश्वर की खोज की जो प्रकृति के समस्त क्रियाकलापों को संचालित करता है।
हाल ही में उत्तराखण्ड में प्रकृति का जो विनाशक रूप दिखा, उसे आम तौर पर ‘कुदरत’ का ‘कहर’ कहा जारहा है। लेकिन अगर जानकारों और पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो विनाश के इस ताण्डव के पीछे सिर्फ प्रकृति ही जिम्मेदार नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ कुदरत के साथ मानवीय खिलवाड़ है, प्रकृति के साथ अनावश्यक हस्तक्षेप है। जिस तरह पिछले कुछ दशकों से पहाड़ों के विकास के नाम पर अन्धाधुन्ध छेड़खानी हुई है, उसका हश्र इस विनाश में होना स्वाभाविक-सा था। जिस तरह नदियों के तटों पर इमारते बनाकर नदियों के स्वाभाविक रास्तों को रोक दिया गया या रोका जा रहा है। जिस तरह  संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में दर्जनो बांध बने हैं और बनाये जा रहे हैं, जिस तरह हर साल वहां पर्यटकों का दबाव बढ़ रहा है, विविध विकास कार्यों के लिए पहाड़ को छलनी किया जा रहा है और अन्धाधुन्ध खनन किया जा रहा है, जिस तरह अनियोजित, अनियन्त्रित शहरी करण बढ़ रहा है, जिस तरह लगातार वन क्षेत्र घट रहा है, जिस तरह वहां दौडती गाडि़यों की संख्या हजारों से बढ़ कर लाखों में हो रही है- ऐसी तमाम परिस्थितियों में अतिवृष्टि, बादल फटना, भू-स्खलन, बाढ़ और भूकम्प जैसी घटनाओं का बढ़ना स्वभाविक ही है। पिछले दो दशकों में जिस तरह उŸाराखण्ड में भू-स्खलनों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है, उससे साफ है कि पहाड़ अब और अधिक छेड़खानी सहने की स्थिति में नहीं है। अतः अब इसे इको सेन्सटिव जोन घोषित करने की जरूरत है।
उŸाराखण्ड में जो भयावह रूप दिखा और जिसे हिमालयन सुनामी कहा जा रहा है, उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ मूसलाधार वर्षा या ‘क्लाउड वसर्ट’ या जिसे बादल फटना कहते हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार बादल फटने की घटना अप्रत्याशित, आकस्मिक व डुवो देने बाली वर्षा होती है। ऐसी वारिश कुछ मिनटों या कुछ घंटों तक होती है और इस दौरान बड़ी-बड़ी बूंदों बाली 5 इन्च या 13 सेमी से भी अधिक बारिश हो जाती है। इस प्रकार की वारिश का पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल होता है।
भारी वर्षा में यूं तो पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन आम बात है, लेकिन इस बार का भू-स्खलन अप्रत्याशित, अकल्पनीय व भयावह था। उत्तराखण्ड में नदियों के किनारे जो इमारतें बन रही हैं, विजलीघर बनाने के लिए जो सुरगें बन रही हैं या बनाई जा रही हैं, उन सब का मलवा पहाड़ की ढ़लान पर ड़ाल दिया जाता है, जो बर्षा के साथ भूस्खलन का कारण बनता है और पानी के साथ मिलकर भारी तबाही लाता है। मलबे का यह सैलाब पेड़ों, घरों, गाडि़यों, बड़ी-बड़ी चट्टानों और जो कुछ इसके मार्ग में पड़ता है उसे बहाकर ले जाता है और मार्ग में पड़ने बाली सहायक नदियों में गिराकर उसका रास्ता रोक देता है, जिससे बाढ़ और भयावह रूप ले कर, कभी-कभी बड़े बांध टूटने का भी कारण बनती है।
हिमालय क्षेत्र भूगर्भीय फाल्ट जोन में आता है, इसलिए भूकम्प की दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है। अतः पर्यावरण की परवाह किये बिना किया जा रहा विकास इस समूचे क्षेत्र के जन-जीवन के लिए खतरनाक है। उत्तराखण्ड की यह ताजा तबाही एक चेतावनी है, संभलने की, सीख लेने की। यदि वक्त रहते पहाड़ों व उसके पर्यावरण पर ध्यान नही दिया गया तो आने बाले वक्त में न जाने कितनी ऐसी ही घटनाओं को हमें झेलना पड़ेगा, जिसके जुम्मेदार हम खुद होगे।