सहसा दल बादल फटे, सरक गिरे चट्टान।
श्रीकेदार अडिग डटे, मिटे अनेक निशान।।
धाराएँ सब धिक् बनी, ऐसा मुखर उफान।
पानी के सैलाभ में, बहे कितने इन्सान।।
भोलेभाले भक्त भव, आस धरे मजबूर।
देश विदेश परिवार रव, भावी आशा चूर।।
भोजन साधन धन बिना, लोग विवश लाचार।
समाचार सन्देश बना, अनगिन भाव विचार।।
दिवस सोलह माह जून, भीषण ध्वंश विनाश।
वर्ष दो हजार तेरह, विस्मित शैल विकास।।
अकस्मात् कान्हें फटा, बादल रूप अनूप।
सुषमाघाटी भव घटा, धूमिल जीवन धूप।।
भूस्खलन और जल प्रलय, विकल रूप केदार।
सुन्दरघाटी के शरण, मानव शव अम्बार।।
बहती धर्मशालाएं, बहे गाँव के गाँव।
मन्दाकिनी मालाएं, प्रकृति आपदा छाँव।।
उत्तरकाशी चमोली, चारितर चारों धाम।
रामबाड़ा विकृतवेश, नाम अज्ञात अनाम।।
देवी आपदा सम्मुख, टूटे दर्पण सार।
आकुल आतंक आमुख, सरिता साज श्रृंगार।।
शंकर समाधि पुरातन, ढही बही कित काम।
अतिशय भोग विलास तन, विघटित पावन धाम।।
जल श्रोत नग शैल खंड, व्याकुलदिव्य महेश।
ध्वस्त लोक मान घमंड, दुर्लभ प्रवेश।।
- भारतीय वन सेवा
श्रीकेदार अडिग डटे, मिटे अनेक निशान।।
धाराएँ सब धिक् बनी, ऐसा मुखर उफान।
पानी के सैलाभ में, बहे कितने इन्सान।।
भोलेभाले भक्त भव, आस धरे मजबूर।
देश विदेश परिवार रव, भावी आशा चूर।।
भोजन साधन धन बिना, लोग विवश लाचार।
समाचार सन्देश बना, अनगिन भाव विचार।।
दिवस सोलह माह जून, भीषण ध्वंश विनाश।
वर्ष दो हजार तेरह, विस्मित शैल विकास।।
अकस्मात् कान्हें फटा, बादल रूप अनूप।
सुषमाघाटी भव घटा, धूमिल जीवन धूप।।
भूस्खलन और जल प्रलय, विकल रूप केदार।
सुन्दरघाटी के शरण, मानव शव अम्बार।।
बहती धर्मशालाएं, बहे गाँव के गाँव।
मन्दाकिनी मालाएं, प्रकृति आपदा छाँव।।
उत्तरकाशी चमोली, चारितर चारों धाम।
रामबाड़ा विकृतवेश, नाम अज्ञात अनाम।।
देवी आपदा सम्मुख, टूटे दर्पण सार।
आकुल आतंक आमुख, सरिता साज श्रृंगार।।
शंकर समाधि पुरातन, ढही बही कित काम।
अतिशय भोग विलास तन, विघटित पावन धाम।।
जल श्रोत नग शैल खंड, व्याकुलदिव्य महेश।
ध्वस्त लोक मान घमंड, दुर्लभ प्रवेश।।
- भारतीय वन सेवा





