Saturday, March 8, 2014

जीवन में सफलता का राज..., चित्र में चरित्र चाहिए? - संकलित

मैनें एक युवक से पूछा - ‘तुम क्या करते हो? उसने कहा - ‘मैं पढ़ता हूँ।’ मैने पूछा - ‘क्यों पढ़ते हो?’ उसने कहा - ‘नौकरी के लिए।’ मैने फिर पूछा- नौकरी क्यों चाहिए?’ उसने कहा- ‘पैसा कमाने के लिए।’ मैने फिर पूछा - ‘पैसा क्यों वाहिए?’ उसने कहा - ‘खाने के लिए।’ मैने फिर पूछा - खाना क्यों चाहते हो? तो उसका उत्तर था- ‘जीने के लिए।’ जीना क्यों चाहते हो? इस पर वह चुप रह गया, क्योंकि उसके पास अब कोई जवाब नहीं था।
दुनियाँ में ऐसे लाखों, करोड़ों लोग होंगे, जिनके पास इस प्रश्न का आज भी कोई जवाब नहीं होगा, और मैं उनसे यही कहना चाहता हूँ ‘व्यक्ति के लिए जीने का एक पवित्र उद्देश्य होना चाहिए।’ जीवन की एक मंजिल व लक्ष्य होना चाहिए, तभी जिन्दगी के कोई मायने हैं।
अभी तो तुम्हारी जिन्दगी का बस इतना मतलब  है, सोमवार को जन्में, मंगल को बड़े हुए, बुधवार को विवाह हुआ, गुरूवार को बच्चो पैदा किए, शुक्रवार को बीमार पड़े, शनिवार को अस्पताल गये और रविवार को चल बसे। पर! ध्यान रखना, यह जिन्दगी का सबसे विकृत व भद्दा चित्र है। इस चित्र में कोई खूबसूरती नहीं है। जिन्दगी के चित्र में चरित्र की खूबसूरती चाहिए। फूलो का सार इत्र है, जीवन का सार चरित्र है। जिसने ‘इत्र’ बटोर लिया, उसने जीवन का सार पा लिया, जिसने ‘चरित्र’ बटोर लिया, उसने जीवन का समस्त वैभव पा लिया।
चरित्रवान बनो, वैभववान बनो। तुम्हारे इसी चरित्र और वैभव से विश्व में राष्ट्र का गौरव बढ़ेगा, यश बढ़ेगा। ु
-‘मुनि श्री तरूण सागर जी महाराज।