Monday, March 3, 2014

हमें सम्पूर्ण गणतन्त्र की पगडन्डी दिख गई है - किरण बेदी

हमारे प्रजातन्त्र की सवसे महत्ववूर्ण विशेषता हमारी गणतन्त्रात्मक् व्यवस्था है, जिसे अपनाये छह दशक से अधिक अर्सा हो चुका है, लेकिन आदर्श गणराज्य से आज हम कोसों दूर हैं। गण और तन्त्र के रिश्ते रोज टूट रहे हैं आर इनके बीच खाईं गहराती जा रही है।
वर्तमान समय में तन्त्र के केन्द्रीय नेतृत्व का क्षरण हो रहा है, उनकी कथनी और करनी में बहुत फर्क आ चुका है और इस अन्तर को अब गण ने सबूतों के साथ जाना और समझा है। सेवा से जुड़े लोग अब दूसरी सेवा में लग गए हैं। यह सब शीर्ष नेतृत्व की कमजोर रीढ़ का खमियाजा है।
इस सबके बाद भी हाल के कुछ वर्षों के घटनाक्रमों से एक उम्मीद बंधती दिख रही है कि हमें सम्पूर्ण गणतन्त्र की पगडन्डी दिख गई है और हम चलने की कोशिश करने लगे हैं। पिछले तीन चार साल के दौरान इस संबन्ध में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिले जो गण और तन्त्र के रिश्ते को मजबूती देते हैं। नई युवापीढ़ी जाग चुकी है जिसमें हमारी संवैधानिक संस्थाओं में सर्वाधिक रूप से सकारात्मक सक्रियता देखी गई है। चाहें वह सूचना आयोग हो, चुनाव आयोग हो, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट हों या फिर कैग हो। इन संस्थाओं ने अपने एक के बाद एक ऐतिहासिक फैसलों में गण और तन्त्र के बीच की दूरी को पाटने का काम किया है।
सिविल सोसायटी भी किसी से पीछे नहीं रही है। जब तन्त्र की जवाबदेही और जिम्मेदारी पर सवाल उठे हैं, उसने अपने घरों से निकल कर सड़कों पर मोर्चा खोला है। अब हमें संकल्प लेना चाहिए कि- ‘हम न्यायपूर्ण रहेंगे, हक मांगते हुए अपनी जिम्मेदारी नहीं भूलेंगे।