भारतीय संस्कृति में सृष्टि को त्रिगुणा कहा है और उसके नियन्ता को त्रिगुण के प्रभाव से मुक्त ‘त्रिगुणातीत’’ कहा गया है। वह त्रिगुण हैं; जन्म, पालन-पेाषण और मृत्यु अर्थात जिसका जन्म हुआ है, उसका पालन-पोषण होगा और एक निश्चित अवधि के बाद उसकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। इन तीनों कार्यों के लिए त्रिदेव हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश। जिसमें ब्रह्मा का कार्य है उत्पत्ति, विष्णु का कार्य है उसका पालन-पोषण और विकास तथा सदाशिव अर्थात सदैव कल्याणकारी महेश का कार्य है उसकी अवधि की पूर्णता पर संहार अर्थात मृत्यु, जो इस सृष्टि का परम सत्य है। सृष्टि में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है और जब तक चलता रहेगा तब तक सृष्टि चलती रहेगी।
यह त्रिआयामी कार्य सृष्टि के प्रत्येक अणु, परमाणु एवं प्रत्येक घटक में निरन्तर चलता रहता है। जैसे कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में हर क्षण नई कोशिकायें जन्म लेती हैं और पुरानी कोशिकाये मरती रहती हैं। जब तक शरीर में यह प्रक्रिया अपने स्वस्थ स्वरूप में चलती रहती है, तव तक जीवन स्वस्थ रहता है और इस प्रक्रिया के रूकते ही व्यक्ति के जीवन का भी अन्त हो जाता है।
भारतीय संस्कृति में जहां इस सृष्टि नियन्ता शक्ति को त्रिदेव ब्र्रह्मा, विष्णु, महेश कहा है, विज्ञान की भाषा में इन्हें एलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्युट्रान कहते हैं, वहीं पाश्चात्य संस्कृति में उसे GOD कहा है, जिसमें ‘जी’ से जनरेटर, ‘ओ’ से आपेरटर और ‘डी’ से डिस्ट्रवाय का भाव है। अर्थात ब्रह्या, विष्णु, महेश और ‘GOD’ एक ही है, केबल भाषा का अन्तर है। भारतीय मनीषियों ने उसका साक्षात्कार किया और उसकी अभिव्यक्ति इस प्रकार की।
‘‘तद्देजति तन्नेजति तद्दूरे तद्दन्तिके।
तदद्न्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य वाहयतः।।’’
इन तीनों शक्तियों की इस सृष्टि का त्रिगुण सम्पन्न मूल स्वभाव सत्यं-शिवमं-सुन्दरम’ है और जिनके मूल में ‘सत-रज-तम’ युक्त त्रिगुणी ऊर्जा विद्यमान रहती है। इस सृष्टि में समय अर्थात काल भी त्रिआयामी है; जिसे भूत-वर्तमान-भविष्य और दैनन्दिनि उसे त्रिकाल अर्थात ‘प्रातः-दोपहर-सन्ध्या’ के रूप में हम सब जीते हैं। प्रातः अर्थात जागरण-काल, दोपहर अर्थात क्रिया-काल और संध्या अर्थात अवसान या पुर्नजागरण हेतु निद्रा-काल है।
सृष्टि की त्रिगुणात्मकता और त्रिदेव महत्व को अपने जीवन-सूत्र के रूप में समझने हेतु त्रिदेवी-शक्ति को भी जान लेना आवश्यक है। उत्पत्ति के देव ब्रह्मा की शक्ति सरस्वती, पालक विष्णु की शक्ति लक्ष्मी और संहार के देव सदाशिव की शक्ति दुर्गा देवी है। प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन में ब्रह्मा के कार्य सृजन के लिए सरस्वती अर्थात ‘बुद्धि’, विष्णु के कार्य पालन हेतु लक्ष्मी अर्थात ‘धन’ और जीवन अवरोध को हटाने के लिए शिव के कार्य हेतु दुर्गा अर्थात ‘शारीरिक बल’ रूपी शक्ति आवश्यक है।
यहीं पर भारतीय मनीषियों नें इन तीनो शक्तियों के बाहनों की समाज-विज्ञान के आधार पर संरचना की है। सरस्वती का वाहन नीर-क्षीर विवेकी ‘हंस’, लक्ष्मी का वहान रात्रि में विचरण करने वाला उल्लू और दुर्गा का वाहन वनराज सिंह है। सभी शक्तियों के वाहनों की अपनी-अपनी प्रवृत्तियां है, जिनको साधने से सुफल और न साधने से कुफल मिलना अवश्यम्भाभी है।
यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में इन तीनों शक्तियों की नितान्त आवश्यकता है और आज हर व्यक्ति उनको एन-केन प्रकारेण प्राप्त कर लेने के लिए प्रयत्नशील रहता है। अतः उन्हें प्राप्त करने और उनके सुफल हेतु इस त्रिगुणा-सृष्टि में मानव को अपने जीवन-लक्ष्य ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ की चतुष्पदी को कभी नहीं भूलना चाहिए।
यह त्रिआयामी कार्य सृष्टि के प्रत्येक अणु, परमाणु एवं प्रत्येक घटक में निरन्तर चलता रहता है। जैसे कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में हर क्षण नई कोशिकायें जन्म लेती हैं और पुरानी कोशिकाये मरती रहती हैं। जब तक शरीर में यह प्रक्रिया अपने स्वस्थ स्वरूप में चलती रहती है, तव तक जीवन स्वस्थ रहता है और इस प्रक्रिया के रूकते ही व्यक्ति के जीवन का भी अन्त हो जाता है।
भारतीय संस्कृति में जहां इस सृष्टि नियन्ता शक्ति को त्रिदेव ब्र्रह्मा, विष्णु, महेश कहा है, विज्ञान की भाषा में इन्हें एलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्युट्रान कहते हैं, वहीं पाश्चात्य संस्कृति में उसे GOD कहा है, जिसमें ‘जी’ से जनरेटर, ‘ओ’ से आपेरटर और ‘डी’ से डिस्ट्रवाय का भाव है। अर्थात ब्रह्या, विष्णु, महेश और ‘GOD’ एक ही है, केबल भाषा का अन्तर है। भारतीय मनीषियों ने उसका साक्षात्कार किया और उसकी अभिव्यक्ति इस प्रकार की।
‘‘तद्देजति तन्नेजति तद्दूरे तद्दन्तिके।
तदद्न्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य वाहयतः।।’’
इन तीनों शक्तियों की इस सृष्टि का त्रिगुण सम्पन्न मूल स्वभाव सत्यं-शिवमं-सुन्दरम’ है और जिनके मूल में ‘सत-रज-तम’ युक्त त्रिगुणी ऊर्जा विद्यमान रहती है। इस सृष्टि में समय अर्थात काल भी त्रिआयामी है; जिसे भूत-वर्तमान-भविष्य और दैनन्दिनि उसे त्रिकाल अर्थात ‘प्रातः-दोपहर-सन्ध्या’ के रूप में हम सब जीते हैं। प्रातः अर्थात जागरण-काल, दोपहर अर्थात क्रिया-काल और संध्या अर्थात अवसान या पुर्नजागरण हेतु निद्रा-काल है।
सृष्टि की त्रिगुणात्मकता और त्रिदेव महत्व को अपने जीवन-सूत्र के रूप में समझने हेतु त्रिदेवी-शक्ति को भी जान लेना आवश्यक है। उत्पत्ति के देव ब्रह्मा की शक्ति सरस्वती, पालक विष्णु की शक्ति लक्ष्मी और संहार के देव सदाशिव की शक्ति दुर्गा देवी है। प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन में ब्रह्मा के कार्य सृजन के लिए सरस्वती अर्थात ‘बुद्धि’, विष्णु के कार्य पालन हेतु लक्ष्मी अर्थात ‘धन’ और जीवन अवरोध को हटाने के लिए शिव के कार्य हेतु दुर्गा अर्थात ‘शारीरिक बल’ रूपी शक्ति आवश्यक है।
यहीं पर भारतीय मनीषियों नें इन तीनो शक्तियों के बाहनों की समाज-विज्ञान के आधार पर संरचना की है। सरस्वती का वाहन नीर-क्षीर विवेकी ‘हंस’, लक्ष्मी का वहान रात्रि में विचरण करने वाला उल्लू और दुर्गा का वाहन वनराज सिंह है। सभी शक्तियों के वाहनों की अपनी-अपनी प्रवृत्तियां है, जिनको साधने से सुफल और न साधने से कुफल मिलना अवश्यम्भाभी है।
यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में इन तीनों शक्तियों की नितान्त आवश्यकता है और आज हर व्यक्ति उनको एन-केन प्रकारेण प्राप्त कर लेने के लिए प्रयत्नशील रहता है। अतः उन्हें प्राप्त करने और उनके सुफल हेतु इस त्रिगुणा-सृष्टि में मानव को अपने जीवन-लक्ष्य ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ की चतुष्पदी को कभी नहीं भूलना चाहिए।





