वर्तमान परिदृष्य में शहरीकरण एवं बढ़ती हुई आबादी के कारण प्राकृतिक जल स्त्रोतों का अत्यधिक एवं अव्यवस्थित ढंग से दोहन हो रहा है, जिससे स्वच्छ जल का संकट गहराता जा रहा है। जल मूल्यवान है, वर्तमान एवं भविष्य की पीढि़यो के अस्तित्व हेतु जल संरक्षण की नितान्त आवश्कता है। जल ंसंचयन एवं संरक्षण हेतु वर्षा जल एक प्राकृतिक सम्पदा है जिससे जल संकट को दूर किया जा सकता है। वर्षा के जल से मुनष्य की दैनिक आवश्यकता के बड़े भाग की पूर्ति की जा सकती है एवं गिरते हुए जल स्तर को रोकने के लिये वर्षा जल से भूगर्भ जल-स्रोत्र (स्ट्रेटा) भी चार्ज किया जा सकता है। अतः स्वच्छ जल की कमी को दूर करने हेतु वर्षा जल संग्रहण सर्वाधिक उपयुक्त उपाय है। उ0 प्र0 सरकार ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु यह अनिवार्य कर दिया है कि 200 वर्ग मीटर एवं इससे अधिक क्षेत्रफल के सभी प्रकार के भूखण्डों तथा सभी ग्रुप हाउजिंग योजनाओं की छतों एवं खुले स्थानो से प्राप्त होने वाले बरसाती जल को परकोलेशन पिट्स के माध्यम से ग्राउण्ड वाटर चार्जिंग के लिए प्राविधान किया जाय तथा भविष्य में निर्मित होने वाले सभी शासकीय भवनों में ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’’ की व्यवस्था की जाय। इसके साथ ही पूर्व निर्मित शासकीय भवनों में भी ‘रूफ टाप रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ प्रणाली को अपनाया जाय। भू-जल स्तर में गिरावट के कारण:- 1. जल की बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिये स्थानीय स्तर पर व्यापक रूप से भू-जल का अति दोहन अथवा अत्याधिक भू-जल निकासी। 2. जल के अन्य स्त्रोतों का उपलब्ध न होना, जिसके फलस्वरूप भू-जल पर पूर्ण निर्भरता। 3. जल की उचित मात्रा एवं जल को निश्चित स्तर पर उपलब्ध न करा पाने की दृष्टि से नगरपालिका कीे अविश्वसनीय जल आपूर्ति जिसके कारण लोगों द्वारा अपने संसाधनों की व्यवस्था करना। 4. ग्राम-तालाबों, टैंकों जैसे जल संरक्षण के प्राचीन साधनों का उपयोग न करना तथा उसके परिणामस्वरूप भू-जल निकासी पर अत्यधिक दबाव होना। भू-जल संसाधनों के अति-दोहन का प्रभाव:- 1. कुछ क्षेत्रों में जल स्तर में भारी गिरावट। 2. कुओं/बोरबैल का सूखना। 3. ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि होना। 4. तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल का प्रवेश। 5. भूमि जल की गुणवत्ता में गिरावट आना। जल संकट की पराकाष्ठा:- ‘नासा’ (अमेरिका स्थित नेशनल एरोनोटिकल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) द्वारा प्रक्षेपित उपग्रह के आंकड़ों के अनुसार वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछले दशक में उत्तरी भारत में भूगर्भ जल के स्तर में 33 से0मी0 (एक फुट) प्रतिवर्ष की दर से गिरावट आई है। अन्वेषकों ने निष्कर्ष निकाला है कि लगभग पूर्णरूप से मानवीय क्रिया-कलापों के कारण ही यह गिरावट आई है एवं वर्ष 2002 से 2008 तक हरियाणा, पंजाब, राजस्थान एवं दिल्ली प्रान्तों में 108 घन किलोमीटर से भी अधिक भूगर्भ जल गायब हो गया है। पानी की यह मात्रा विश्व के विशालतम मानव निर्मित जलाशय अमेरिका स्थित ‘मीड झील’ को तीन बार भरने के लिये पर्याप्त है। जल वैज्ञानिकों के एक दल ने पाया है कि उत्तरी भारत के भूगर्भ जल की आपूर्ति को दोहन करके फसलों की सिंचाई व अन्य मानवीय गतिविधियों में खर्च किया जा रहा है जिससे भूजलस्तर तेजी से घट रहा है जिसकी प्रतिपूर्ति प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा नहीं हो सकती है। माह मई, 2010 मेें ससंद को सूचित किया गया कि देश के छः लाख गाँवों में से 1.8 लाख गाँवों में पानी दूषित है। इन गाँवों में लोग जो पानी पी रहे हैं वह धीमा ज़हर है। हमारी सभी प्रमुख नदियों की सहायक नदियाॅं उद्योगों से निकले जहरीले पानी का गंदा नाला बन गई हैं। गोरखपुर के पास से बहने वाली आमी नदी के किनारे रहने वाले करीब 1.5 लाख लोग लम्बे समय से उद्योगों का कचरा और जहरीला पानी नदी में बहाये जाने का विरोध कर रहे हैं। इस नदी के किनारे बसे सैकड़ों गाॅंवों के लिये यह नदी एक जीवन रेखा है। इसी प्रकार मेरठ से होकर गुजरने वाली काली नदी अब काली हो गई है। पिछले 40 वर्षो से इस नदी में गिरने वालेे औद्योगिक कचरे और पानी को बन्द करने के लिये स्थानीय जनता द्वारा किये जा रहे प्रयास सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि सरकारी स्तर से प्रभावी कार्यवाही नहीं हो सकी है। प्रस्तावित भू-जल अधिनियम:- वर्ष 2008 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले चार वर्षो में भू-जल दबाव वाला क्षेत्र दो गुना हो गया है। उत्तर प्रदेश में भूगर्भ जल की स्थिति तेजी से प्रभावित हो रही है। वर्ष 2004 में 40 जनपदों के भूगर्भ जल से प्रभावित 138 विकास खण्डों की तुलना में वर्ष 2008 में भूगर्भ जल बोर्ड द्वारा किये गये सर्वेक्षण के अनुसार ऐसे विकास खण्डों की संख्या 60 जनपदों में 218 हो गई है। परिणामस्वरूप भूगर्भ जल को संरंक्षित करने हेतु एक अधिनियम की आवश्यकता अनुभव की गई। अब भूगर्भ जल संसाधनों को नियमित एवं संरंक्षित करने के उद््देश्य से उ0 प्र0 शासन ने ‘उ0 प्र0 भूगर्भ जल संरक्षण, सुरक्षा एवं विकास (प्रबंधन, नियंत्रण एवं विनियमन) विधेयक, 2010 का प्रारूप तैयार किया है। इस प्रस्तावित अधिनियम के अन्र्तगत भी वर्षा जल संचयन पर अत्यधिक बल दिया गया है। वर्षा जल संचयन के लाभ 1. भूजल स्तर में बढ़ोत्तरी। 2. भूजल की गुणवत्ता में सुधार। 3. सूखा पीडि़त क्षेत्रों में जल की उपलब्धता। 4. भूजल के खारे पन में कमी होना। 5. पेयजल की समस्या का निराकरण। 6. वर्षा जल को बरबाद होने से रोकना। 7. जल-प्लावन में कमी। 8. भू सतह की कटान में कमी। वर्षा जल संचयन हेतु बरती जाने वाली सावधानियाँ:- 1. छतों के ऊपर कोई विषैला पदार्थ नहीं होना चाहिये अन्यथा वर्षा का जल विषाक्त हो जायेगा। 2. दूषित जल संचयन रोकने के लिये प्रथम वर्षा का जल बाई-पास कर बाहर निकाल देना चाहिये। 3. वर्षा ऋतु से पूर्व छतों की अच्छी तरह से सफाई करनी चाहिये ताकि किसी प्रकार की कोई गंदगी न रहे। 4. छतों पर डाउन पाइपों के प्रवेश द्वार पर जाली अवश्य लगी होनी चाहिये, जिसकी समय-समय पर सफाई की जानी चाहिये। 5. रिचार्ज पिट/कनेक्टिंग चैम्बर को जहाँ तक सम्भव हो, भूतल से लगभग 30 सेमी0 ऊँचा रखना चाहिये जिससे कि जल प्लावन के समय प्रदूषित जल पिट में प्रवेश न कर पाये। 6. रिर्चाज पिट एवं छिद्रित पाइप के चारों ओर लिपटी नायलन स्ट्रिप की समय-समय पर सफाई की जानी चाहिये। 7. रिचार्ज पिट के आस-पास सीवेज का कोई सोकपिट इत्यादि नहीं होना चाहिये। भूगर्भ जल की समस्याओं का समाधान-एक दृष्टि मे ंः- 1. वर्षा जल संचयन 2. भूगर्भ व भूस्तरीय जल का प्रबन्धन 3. एकीकृत जल संसाधन प्रबन्धन का अंगीकरण 4. फसल चक्र में परिवर्तन 5. कम पानी चाहने वाली फसलों का प्रोत्साहन 6. स्प्रिन्कलर एवं टपक (ड्रिप) सिंचाई 7. नहर पानी के वितरण की प्रभावी प्रक्रिया 8. फालतू पानी के प्रबन्धन, इसके पुनर्चक्र एवं पुर्नप्रयोग हेतु दक्ष, मितव्ययी एवं टिकाऊ उपचार का विकल्प। ु - इं॰ जितेन्द्र मोहन गुप्ता एवं इं॰ एस॰ पी॰ शर्मा गंगोत्री कन्सल्टेंसी सर्विसेस, न्यू जनपथ काम्पलेक्स, 9 ए, अशोक मार्ग, लखनऊ।





