खेती किसानी में समस्यायें विगत कुछ वर्षों से गुणात्मक रूप से बढ़ रही हैं। लेकिन यह सभी समस्यायें मनुष्य द्वारा निर्मित हैं। मनुष्य के तीन कार्य हैं - धरती का संरक्षण, संवर्धन और सदुपयोग, लेकिन मनुष्य ने समस्त कार्य इसके विपरीत किये हैं और दुःखभोग रहे हैं। कृषि के क्षेत्र में जो भी समस्यायें किसान झेल रहे हैं वो सभी वैज्ञानिकों की ही देन हैं, जिन्होंनें प्रकृति की व्यवस्था के बिलकुल विपरीत किसानों को खेती करने की सलाह दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारा पूरा भोजन ही विषाक्त हो गया और पूरा का पूरा पर्यावरण प्रदूषित हो गया, और हमारे देश के 98.6 प्रतिशत लोग बीमार रहने लगे। लेकिन मैं यह लेख सिर्फ समस्यायें गिनाने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, अपितु उपरोक्त सभी समस्याओं के समाधान में सहायक है।
चै मासे नही बरसते, दो मासे पानी बरसते हैं, वो भी अनिश्चित रूप से कभी एक दिन में ही इतना पानी बरस जाता है कि बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और कभी-कभी पूरे समय सिर्फ फुहार ही पड़ती रहती है। लेकिन वर्तमान समस्याओं का समाधान शून्य लागत प्राकृतिक कृषि से सम्भव है। जिसमें अनावृष्टि और अतिवृष्टि, सूख और पाले से किसानों को बहुत कम नुकसान होता है और पर्यावरण भी शुद्ध होने लगता है।
इस निमित्त यहाँ पर केबल रवि के समय गन्ने की सहफसली खेती की शून्य लागत प्राकृतिक विधि प्रस्तुत है। शून्य लागत प्राकृतिक खेती की बेसिक जानकारी ‘लोक सम्मान’ के पिछले अंकों में विस्तार से दी गयी है। यहाँ पर हम यह चर्चा करेंगे कि रवी के समय बोई जाने बाली गन्ने के साथ कौन सी फसलें ले सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश उ॰प्र॰ के ज्यादा हिस्सों में अगस्त के अन्तिम सप्ताह तक ही होती और अब किसान 7-8 सितम्बर से अगैती आलू, अगैती लाही, मूंग की फसल लेते हैं। इन सभी फसलों में गन्ने की फसल ले सकते हैं, या यों कहें कि इस समय बोये गन्ने के साथ यह सभी फसले ली जा सकती हैं।
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि में सभी फसलें मेड़ विधि से लगायी जाती हैं। अब आलू, लाही, मटर आदि मेड़ों के ऊपर लगाते हैं तथा गन्ना नालियों में बोया जाता है। लाइन से लाइन गन्ने की दूरी 8 या 9 फीट की रखते है तथा पौधे से पौधे की दूरी 2,4,6 या 8 फीट रखते हैं। इसके बाद किसान भाई अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में भी आलू, चना, मटर, मसूर, अलसी की गन्ने के साथ बुवाई कर सकते हैं।
इसके अतिरिक्त अगैती गेंहू जो कि नवम्बर के प्रथम सप्ताह में बोया जाता है उसमें भी गन्ने की फसल ली जा सकती है। इस विधि में गेंहूँ भी मेंड़ विधि से बोया जाता है। इसके साथ दलहनी, तिलहनी व मसाले वाली फसलें (चना, मटर, मसूर, सरसों, अलसी, धनियाँ, सौंफ, मेथी आदि) भी ली जा सकती हैं, जिनमें सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता होती है। अतः जिस नाली में गन्ना बोया गया उसी में पानी देना है। बाकी नालियों में पानी नहीं देते है। आलू की फसल में भी पानी कम दिया जाता है लेकिन 10 दिन में एक बार दिया जाता है। अतः आलू के साथ गन्ने में कोई विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं है। इस खेती में गन्ने की नाली में वरसीम तथा खेत के चारो ओर दो लाइन अलसी बोना उपयोगी रहेगा। अलसी को कोई जानवर नहीं खाता, इसलिए खेत में जानवर घुस कर नुकसान नहीं करेंगे। वरसीम से जहां हरा चारा मिलेगा वहीं खेत में अच्छादन रहेगा जिससे घास नहीं होगी और साथ ही नाट्रोजन भी मिलेगी। गन्ने की सह फसलें जब कट जायें तो उनके स्थान पर उपयुक्त जायद की भी फसलें ली जायेंगी, जिनमें अरवी, लोबिया, मक्का, मूंग, टमाटर, प्याज एवं अन्य शब्जियाँ ली जा सकती हैं।

अपने विवेक से करना चाहिए।
इस विधि से गन्नें में एक एकड़ के लिए केवल 70 गन्ने (700 गन्ने के टुकड़े) लगते हैं, जबकि सामान्य विधि से 8-10 कुन्तल गन्ना चाहिए। इस विधि में बइयर गन्ने के एक किल्ले से 10-20 किल्ले निकलते हैं, जबकि पेड़ी में 50-60 तक किल्ले निकलते हैं। अर्थात एक एकड़ में (700गुणा 50) 35000 हजार गन्नें और एक गन्ने का बजन 1.5 किलो तक होता है। सह फसलों का लाभ अलग।
अन्तः मैं कह सकती हूँ कि किसानों और सभी मानव जाति की समस्याओं का समाधान शून्य लागत प्राकृतिक कृषि में निहित है। अधिक जानकारी के लिए इस नम्बर पर सम्पर्क कर सकते हैं (9319856993)।





