देवास जिले ने रचा पानी का इतिहास
मध्य प्रदेश का देवास जो कभी इसलिए चर्चित था कि वहां पीने के लिए रोज ट्रेन से पानी पहुंचाया जाता है, आज वही देवास पानी से सराबोर है और देश भर से लोग पानी सहेजने के तरीके सीखने यहाँ आ रहे हैं।
हुआ यूं कि भारत में स्वतन्त्रता के बाद क्षेत्र के अनुसार परिस्थतियों का दीर्घकालिक अध्ययन किए बिना नई-नई योजनाएँ बनीं, हरितक्रान्ति की लहर चली, खेती में अधिकाधिक पानी की जरूरत बढ़ी और सब जगह जमीन के अन्दर सहेजा गया लाखों वर्ष पुराना पानी निकालने के लिए सब ओर बोरिंगों की होड़ प्रारम्भ हुई, जिससे पूरे देश में भूगर्भ जल स्तर पिछले पचास वर्षों में इतना घटा कि देश के अधिकांश कुएँ सूख गये।
देवास में भी 60-70 के दशक में भूमि से पानी निकालने के लिए नलकूप बनने लगे और सरकार ने इसे किसानों के बीच प्रोत्साहित करने के लिए बैंक से कर्ज की भी व्यवस्था कर दी। प्रारम्भ में तो इन नलकूपों से खेती को लाभ हुआ, लेकिन कुछ वर्षों में ही अधिक नलकूप लग जाने से क्षेत्र का जो भूजल स्तर 60-70 फुट पर था वह 400-500 फुट पर जा पहुंँचा। इतने गहरे नलकूप लगाने से पानी में खनिज आने लगे जिससे, जिससे खेती बर्बाद होने लगी और इन नलकूपों में खर्च अधिक आने के कारण किसान कर्ज में डूबने लगे। जल स्तर भी धीरे-धीरे इतना कम हुआ कि सात इन्च के नलकूप में मुस्किल से एक इन्च का पानी निकलने लगा, जिससे सिंचाई सम्भव नहीं थी और परिणामस्वरूप किसान खेती छोड़ने पर मजबूर होने लगे।
नब्बे का दशक आते-आते स्थिति इतनी बिगड़ गई कि देवास में पीने के पानी की पूर्ति के लिए ट्रेन लगानी पड़ी। योजनकारों का करतब देखिये कि देवास में पानी की समस्या का स्थाई हल खोजने की बजाय 25 अपै्रल 1990 को इन्दौर से 50 टैंकर पानी लेकर टेªन देवास पहुँची, जो क्रम 2006 तक तब तक चला जब तक दूर दृष्टि रखने वाले तथा अपनी परम्परागत तकनीक के महत्व को समझने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमाकान्त उमराव देवास में कलेक्टर बन कर नहीं आये।
उमाकान्त उमराव देवास में कलेक्टर बने और उन्होने यहांँ आते ही पानी की समस्या का हल खोजना प्रारम्भ कर दिया। पानी और बरसात के पिछले दस साल के रिकार्ड देख कर उन्होने पाया कि यहांँ इतना पानी तो हर साल बरसता है कि उसे सहेजने पर पानी की समस्या हल की जा सकती है। जल सहेजने की परम्परागत व स्वावलम्बी तकनीक ‘‘तालाब बनाने’’ पर वह काम करना चाहते थे, अतः उन्होंने एक बैठक बुलाई और देवास के कृषि संचालक मोहम्मद अब्बास को जिले के बड़े किसानों की सूची बनाने के लिए कहा। उनके अनुसार प्रारम्भ में पानी सहेजने में बड़े किसानों को जोड़ने के तीने कारण थे। एक, छोटे किसान अक्सर बड़े किसानों का ही अनुसरण करते हैं, यदि बड़े किसानों ने तालाब बना लिए तो छोटे किसान देखा-देखी अपने आप तालाब बनाने लगेंगे। दूसरा, बड़े किसानों ने ही अधिकाधिक जमीन के अन्दर के पानी का दोहन किया था, जिसके कारण बिन पानी देवास हो गया और इसकी भरपाई भी उन्हीं को करनी थी। तीसरा, बड़े किसान इतने सम्पन्न भी थे जो तालाब बनाने पर खर्च करने का जोखिम उठा सकते थे, जिसके परिणाम अभी किसी ने देखे नहीं थे।
बड़े किसानों की बैठक बुलाई गई और उनके सामने योजना रखी गई, तो इनमें से कुछ किसान ऐसे भी मिल गये जो पहले से ही तालाब बना चुके थे और इसके लाभ जानते थे। इन्ही में से एक थे हरनावदा गांव के किसान हरनाम सिंह तोमर, जो 2005 में ही तालाब बना चुके थे। जिला कलेक्ट्रेट उमराव ऐसे ही कसी किसान की तलाश में थे, उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सके। किसान ही किसान को बेहतर तरीके से समझा सकते थे इसलिए ऐसे ही कुछ अनुभवी किसानों को मास्टर ट्रेनर बनाया गया और अभियान की शुरूआत हुई।
उमाकान्त उमराव और मोहम्मद अब्बास जैसे अधिकारियों ने भी गांँव-गाँव जा कर लोगों को अपनी जमीन के दसवें हिस्से में तालाब बनाने के लाभ बताए। लेकिन किसानों को अभी संदेह था कि दसवें हिस्से में तालाब बनाने का मतलब है, जमीन का कम हो जाना। किसानों के इस संदेह को दूर करने के लिए उमराव ने उनसे बस एक सवाल किया, ‘‘मान लो तुम्हारे पास कुल दस बीघा जमीन है, तुम अपने बच्चों को यह दस बीघा असिंचित जमीन सौंपना पसंद करोगे या फिर नौ बीघा सिंचित जमीन?’’ पानी के अर्थशास्त्र की यह बात किसानों की समझ में आ गयी। अब इस समझ को परिणाम में बदलने के लिए किसानों के खेत में जिला कलेक्टर उमराव ने स्वयं फावड़ा चलाया। जहाँ आमतौर पर कलेक्टर से मिल पाना भी किसानों के लिए मुश्किल रहता हो ? वहांँ एक कलेक्टर का किसान के खेत में फावड़ा चलाना उन्हें प्रेरित करने के लिए काफी था, परिणामतः कुछ ही महीनों में सैकड़ों तालाब बन कर तैयार हो गये। इन तालाबों को ‘रेवा सागर’ नाम दिया गया और तालाब बनाने वाले किसान को ‘भगीरथ कृषक’ कहा गया। 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने इस अभियान की सफलता को देखते हुए ‘बलराम तालाब योजना’ भी बना दी गई तथा इसके तहत किसानों को तालाब बनाने के लिए 80 हजार से एक लाख रू॰ तक अनुदान दिया जाता है, फिर तो देवास की शकल ही बदल गई।
आज देवास जिले में कुल दस हजार से भी ज्यादा तालाब बन चुके हैं। धतूरिया, टोंककला, गोवा, हरनावदा और चिड़ावत जैसे कई गांव तो ऐसे हैं जहां 100 से ज्यादा तालाब हैं। यहां लोगों ने कुछ साल पहले नलकूपों की अरथी निकाल कर कभी नलकूप न लगाने का भी प्रण लिया है। निपनिया गांव के पोप सिंह को तालाब बनाने के लिए जिला कलेक्ट्रेट ने अपनी व्यक्तिगत गारन्टी पर 14 लाख रू॰ का लोन दिलवाया था, जिससे उन्होने दस बीघे का विशाल तालाब बनवाया। पोप सिंह कहते हैं ‘पहले जहांँ एक ही फसल हो पाती थी, वहां अब साल में दो फसलें होती हैं, तालाब का पानी नलकूपों से ज्यादा उपजाऊ भी है, इसलिए फसल भी अच्छी होती है। बैंक से लिए लोन के बारे में बताते हैं, लोन तो मैने दो साल पहले ही चुका दिया है, उसके बाद तो मैं 10 बीघा जमीन और खरीद चुका हूंँ, जितनी जमीन मैने तालाब बनाने में खर्च की उतनी ही जमीन इस तालाब ने कमाकर दे दी।
अच्छा पानी मिले तो, किसानी सबसे अच्छी...
देवास जिले में टोंक कला के निवासी देवेन्द्र सिंह खिंची ने इन्दौर से इन्जीनियरिंग की पढ़ाई की है, पर वह नौकरी न करके पूरा समय अपनी खेती को ही देते हैं। इतनी पढ़ाई के बाद भी नौकरी क्यों नही की? इस प्रश्न पर उनका कहना है, ‘‘अगर अच्छा पानी मिले तो किसानी से बढ़कर कोई अन्य व्यवसाय हो ही नहीं सकता।’’ अन्य किसानों की भांँति देवेन्द्र ने भी खेत पर ही सुन्दर तालाब बनाया है, जिसके चारो तरफ पाल पर पेड़ लगाये हैं, वे थोड़ी दूरी पर बंँधी गायें दिखाते हैं और जैविक खेती के बारे में बताते हैं कि ‘‘बरसात में उपजाऊ मिट्टी पानी के साथ बहकर तालाब में आती है और इन गायों का गोबर भी हम तालाब में ही डाल देते हैं, जो मछलियों का चारा बन जाता है और फिर पानी में मिलकर तालाब के पानी को उपजाऊ बना देता है, जिससे हमारी फसलें अच्छी होती है।’’ उनका कहना है कि ‘‘फरवरी-मार्च में जब तालाब का पूरा पानी हम निकाल लेते हैं, तो इसकी सफाई करते हैं। इसमें जो खेत की बहकर आई मिट्टी और गोबर जमा हुआ होता है, उसे हम वापस खेतों में डाल देते हैं, जो खेत में बेहतरीन खाद का काम करता है।’’ देवेन्द्र 75 बीघा जमीन पर खेती करते हैं, उसमें से काफी जमीन पर उन्होनें मिर्च की खेती की है, जिसमें उन्हें एक मौसम में लगभग डेढ लाख रू॰ प्रति बीघा मुनाफा हो जाता है तथा तालाव में पाली गई मछलियों से भी साल भर में दो लाख रू॰ कमा लेते हैं। इस प्रकार वर्ष भर में देवेन्द्र को अपनी खेती से एक करोड़ के लगभग आमदनी हो जाती है, जिसमें स्वावलम्बन भी है, जो किसी भी नौकरी से बहुत अधिक है।
देवास में सफलताओं की, अनेक कहानियाँ हैं...
चिड़ावदा गांव के विक्रम सिंह पटेल ने अपने घर से लगभग 400 फुट दूर एक गोबर गैस प्लांट लगाया है, जिससे पूरे वर्ष उनके घर का खाना बनता है, उन्हे गैस बिल्कुल भी बाहर से खरीदनी नहीं पड़ती। उन्होंने गोबर गैस के ऊपर ही कम्पोस्ट खाद के खांचे बनाये हुए हैं, जिससे सर्दियों में भी उनके गोबर गैस प्लांट में गर्मी बनी रहती है और पूरी गैस मिलती रहती है।
पानी की व्यवस्था हो जाने से चारे की सुविधा हो गई है, जिससे अब यहाँ दुबारा गाय-भैंस पालना शुरू हो गया। अकेले धतूरिया गांव से ही एक हजार ली॰ दूध की प्रतिदिन बिक्री होती है। पर्यावरण पर भी तालाबों का अच्छा प्रभाव हुआ है। लोगों ने तालाबों के बीच में टापू बनाये हैं, इन टापुओं पर पक्षी धोसले बनाते हैं और अन्डे देते हैं, चारो ओर से पानी से घिरे होने के कारण कोई जंगली जानवर इन्हें कोई नुकसान भी नहीं पहुंचा पाते।
तालाब बनने से खेती में ही फायदा नही हुआ, बल्कि असिंचित जमीन सिंचित हो गई, जिससे खेती में उत्पादन बढ़ने के साथ ही उसकी कीमत बढ़ गई तथा पलायन पर रोक लग गई। जो पहले काम की तलाश में बाहर जा रहे थे उनका गांव छोड़कर बाहर जाना ही नहीं रूका, अपितु जो गांव से बाहर चले गये थे उनका भी अपने गांव वापस लौटना प्रारम्भ हो गया हैं।
देवास में पानी सहेजने और खेती में सफलता के माँडल को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं और अपने-अपने यहांँ इसका अनुकरण करते हुए नये इतिहास रचने के प्रयत्न कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश का देवास जो कभी इसलिए चर्चित था कि वहां पीने के लिए रोज ट्रेन से पानी पहुंचाया जाता है, आज वही देवास पानी से सराबोर है और देश भर से लोग पानी सहेजने के तरीके सीखने यहाँ आ रहे हैं।
हुआ यूं कि भारत में स्वतन्त्रता के बाद क्षेत्र के अनुसार परिस्थतियों का दीर्घकालिक अध्ययन किए बिना नई-नई योजनाएँ बनीं, हरितक्रान्ति की लहर चली, खेती में अधिकाधिक पानी की जरूरत बढ़ी और सब जगह जमीन के अन्दर सहेजा गया लाखों वर्ष पुराना पानी निकालने के लिए सब ओर बोरिंगों की होड़ प्रारम्भ हुई, जिससे पूरे देश में भूगर्भ जल स्तर पिछले पचास वर्षों में इतना घटा कि देश के अधिकांश कुएँ सूख गये।
देवास में भी 60-70 के दशक में भूमि से पानी निकालने के लिए नलकूप बनने लगे और सरकार ने इसे किसानों के बीच प्रोत्साहित करने के लिए बैंक से कर्ज की भी व्यवस्था कर दी। प्रारम्भ में तो इन नलकूपों से खेती को लाभ हुआ, लेकिन कुछ वर्षों में ही अधिक नलकूप लग जाने से क्षेत्र का जो भूजल स्तर 60-70 फुट पर था वह 400-500 फुट पर जा पहुंँचा। इतने गहरे नलकूप लगाने से पानी में खनिज आने लगे जिससे, जिससे खेती बर्बाद होने लगी और इन नलकूपों में खर्च अधिक आने के कारण किसान कर्ज में डूबने लगे। जल स्तर भी धीरे-धीरे इतना कम हुआ कि सात इन्च के नलकूप में मुस्किल से एक इन्च का पानी निकलने लगा, जिससे सिंचाई सम्भव नहीं थी और परिणामस्वरूप किसान खेती छोड़ने पर मजबूर होने लगे।
नब्बे का दशक आते-आते स्थिति इतनी बिगड़ गई कि देवास में पीने के पानी की पूर्ति के लिए ट्रेन लगानी पड़ी। योजनकारों का करतब देखिये कि देवास में पानी की समस्या का स्थाई हल खोजने की बजाय 25 अपै्रल 1990 को इन्दौर से 50 टैंकर पानी लेकर टेªन देवास पहुँची, जो क्रम 2006 तक तब तक चला जब तक दूर दृष्टि रखने वाले तथा अपनी परम्परागत तकनीक के महत्व को समझने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमाकान्त उमराव देवास में कलेक्टर बन कर नहीं आये।
उमाकान्त उमराव देवास में कलेक्टर बने और उन्होने यहांँ आते ही पानी की समस्या का हल खोजना प्रारम्भ कर दिया। पानी और बरसात के पिछले दस साल के रिकार्ड देख कर उन्होने पाया कि यहांँ इतना पानी तो हर साल बरसता है कि उसे सहेजने पर पानी की समस्या हल की जा सकती है। जल सहेजने की परम्परागत व स्वावलम्बी तकनीक ‘‘तालाब बनाने’’ पर वह काम करना चाहते थे, अतः उन्होंने एक बैठक बुलाई और देवास के कृषि संचालक मोहम्मद अब्बास को जिले के बड़े किसानों की सूची बनाने के लिए कहा। उनके अनुसार प्रारम्भ में पानी सहेजने में बड़े किसानों को जोड़ने के तीने कारण थे। एक, छोटे किसान अक्सर बड़े किसानों का ही अनुसरण करते हैं, यदि बड़े किसानों ने तालाब बना लिए तो छोटे किसान देखा-देखी अपने आप तालाब बनाने लगेंगे। दूसरा, बड़े किसानों ने ही अधिकाधिक जमीन के अन्दर के पानी का दोहन किया था, जिसके कारण बिन पानी देवास हो गया और इसकी भरपाई भी उन्हीं को करनी थी। तीसरा, बड़े किसान इतने सम्पन्न भी थे जो तालाब बनाने पर खर्च करने का जोखिम उठा सकते थे, जिसके परिणाम अभी किसी ने देखे नहीं थे।
बड़े किसानों की बैठक बुलाई गई और उनके सामने योजना रखी गई, तो इनमें से कुछ किसान ऐसे भी मिल गये जो पहले से ही तालाब बना चुके थे और इसके लाभ जानते थे। इन्ही में से एक थे हरनावदा गांव के किसान हरनाम सिंह तोमर, जो 2005 में ही तालाब बना चुके थे। जिला कलेक्ट्रेट उमराव ऐसे ही कसी किसान की तलाश में थे, उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सके। किसान ही किसान को बेहतर तरीके से समझा सकते थे इसलिए ऐसे ही कुछ अनुभवी किसानों को मास्टर ट्रेनर बनाया गया और अभियान की शुरूआत हुई।
उमाकान्त उमराव और मोहम्मद अब्बास जैसे अधिकारियों ने भी गांँव-गाँव जा कर लोगों को अपनी जमीन के दसवें हिस्से में तालाब बनाने के लाभ बताए। लेकिन किसानों को अभी संदेह था कि दसवें हिस्से में तालाब बनाने का मतलब है, जमीन का कम हो जाना। किसानों के इस संदेह को दूर करने के लिए उमराव ने उनसे बस एक सवाल किया, ‘‘मान लो तुम्हारे पास कुल दस बीघा जमीन है, तुम अपने बच्चों को यह दस बीघा असिंचित जमीन सौंपना पसंद करोगे या फिर नौ बीघा सिंचित जमीन?’’ पानी के अर्थशास्त्र की यह बात किसानों की समझ में आ गयी। अब इस समझ को परिणाम में बदलने के लिए किसानों के खेत में जिला कलेक्टर उमराव ने स्वयं फावड़ा चलाया। जहाँ आमतौर पर कलेक्टर से मिल पाना भी किसानों के लिए मुश्किल रहता हो ? वहांँ एक कलेक्टर का किसान के खेत में फावड़ा चलाना उन्हें प्रेरित करने के लिए काफी था, परिणामतः कुछ ही महीनों में सैकड़ों तालाब बन कर तैयार हो गये। इन तालाबों को ‘रेवा सागर’ नाम दिया गया और तालाब बनाने वाले किसान को ‘भगीरथ कृषक’ कहा गया। 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने इस अभियान की सफलता को देखते हुए ‘बलराम तालाब योजना’ भी बना दी गई तथा इसके तहत किसानों को तालाब बनाने के लिए 80 हजार से एक लाख रू॰ तक अनुदान दिया जाता है, फिर तो देवास की शकल ही बदल गई।
आज देवास जिले में कुल दस हजार से भी ज्यादा तालाब बन चुके हैं। धतूरिया, टोंककला, गोवा, हरनावदा और चिड़ावत जैसे कई गांव तो ऐसे हैं जहां 100 से ज्यादा तालाब हैं। यहां लोगों ने कुछ साल पहले नलकूपों की अरथी निकाल कर कभी नलकूप न लगाने का भी प्रण लिया है। निपनिया गांव के पोप सिंह को तालाब बनाने के लिए जिला कलेक्ट्रेट ने अपनी व्यक्तिगत गारन्टी पर 14 लाख रू॰ का लोन दिलवाया था, जिससे उन्होने दस बीघे का विशाल तालाब बनवाया। पोप सिंह कहते हैं ‘पहले जहांँ एक ही फसल हो पाती थी, वहां अब साल में दो फसलें होती हैं, तालाब का पानी नलकूपों से ज्यादा उपजाऊ भी है, इसलिए फसल भी अच्छी होती है। बैंक से लिए लोन के बारे में बताते हैं, लोन तो मैने दो साल पहले ही चुका दिया है, उसके बाद तो मैं 10 बीघा जमीन और खरीद चुका हूंँ, जितनी जमीन मैने तालाब बनाने में खर्च की उतनी ही जमीन इस तालाब ने कमाकर दे दी।
अच्छा पानी मिले तो, किसानी सबसे अच्छी...
देवास जिले में टोंक कला के निवासी देवेन्द्र सिंह खिंची ने इन्दौर से इन्जीनियरिंग की पढ़ाई की है, पर वह नौकरी न करके पूरा समय अपनी खेती को ही देते हैं। इतनी पढ़ाई के बाद भी नौकरी क्यों नही की? इस प्रश्न पर उनका कहना है, ‘‘अगर अच्छा पानी मिले तो किसानी से बढ़कर कोई अन्य व्यवसाय हो ही नहीं सकता।’’ अन्य किसानों की भांँति देवेन्द्र ने भी खेत पर ही सुन्दर तालाब बनाया है, जिसके चारो तरफ पाल पर पेड़ लगाये हैं, वे थोड़ी दूरी पर बंँधी गायें दिखाते हैं और जैविक खेती के बारे में बताते हैं कि ‘‘बरसात में उपजाऊ मिट्टी पानी के साथ बहकर तालाब में आती है और इन गायों का गोबर भी हम तालाब में ही डाल देते हैं, जो मछलियों का चारा बन जाता है और फिर पानी में मिलकर तालाब के पानी को उपजाऊ बना देता है, जिससे हमारी फसलें अच्छी होती है।’’ उनका कहना है कि ‘‘फरवरी-मार्च में जब तालाब का पूरा पानी हम निकाल लेते हैं, तो इसकी सफाई करते हैं। इसमें जो खेत की बहकर आई मिट्टी और गोबर जमा हुआ होता है, उसे हम वापस खेतों में डाल देते हैं, जो खेत में बेहतरीन खाद का काम करता है।’’ देवेन्द्र 75 बीघा जमीन पर खेती करते हैं, उसमें से काफी जमीन पर उन्होनें मिर्च की खेती की है, जिसमें उन्हें एक मौसम में लगभग डेढ लाख रू॰ प्रति बीघा मुनाफा हो जाता है तथा तालाव में पाली गई मछलियों से भी साल भर में दो लाख रू॰ कमा लेते हैं। इस प्रकार वर्ष भर में देवेन्द्र को अपनी खेती से एक करोड़ के लगभग आमदनी हो जाती है, जिसमें स्वावलम्बन भी है, जो किसी भी नौकरी से बहुत अधिक है।
देवास में सफलताओं की, अनेक कहानियाँ हैं...
चिड़ावदा गांव के विक्रम सिंह पटेल ने अपने घर से लगभग 400 फुट दूर एक गोबर गैस प्लांट लगाया है, जिससे पूरे वर्ष उनके घर का खाना बनता है, उन्हे गैस बिल्कुल भी बाहर से खरीदनी नहीं पड़ती। उन्होंने गोबर गैस के ऊपर ही कम्पोस्ट खाद के खांचे बनाये हुए हैं, जिससे सर्दियों में भी उनके गोबर गैस प्लांट में गर्मी बनी रहती है और पूरी गैस मिलती रहती है।
पानी की व्यवस्था हो जाने से चारे की सुविधा हो गई है, जिससे अब यहाँ दुबारा गाय-भैंस पालना शुरू हो गया। अकेले धतूरिया गांव से ही एक हजार ली॰ दूध की प्रतिदिन बिक्री होती है। पर्यावरण पर भी तालाबों का अच्छा प्रभाव हुआ है। लोगों ने तालाबों के बीच में टापू बनाये हैं, इन टापुओं पर पक्षी धोसले बनाते हैं और अन्डे देते हैं, चारो ओर से पानी से घिरे होने के कारण कोई जंगली जानवर इन्हें कोई नुकसान भी नहीं पहुंचा पाते।
तालाब बनने से खेती में ही फायदा नही हुआ, बल्कि असिंचित जमीन सिंचित हो गई, जिससे खेती में उत्पादन बढ़ने के साथ ही उसकी कीमत बढ़ गई तथा पलायन पर रोक लग गई। जो पहले काम की तलाश में बाहर जा रहे थे उनका गांव छोड़कर बाहर जाना ही नहीं रूका, अपितु जो गांव से बाहर चले गये थे उनका भी अपने गांव वापस लौटना प्रारम्भ हो गया हैं।
देवास में पानी सहेजने और खेती में सफलता के माँडल को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं और अपने-अपने यहांँ इसका अनुकरण करते हुए नये इतिहास रचने के प्रयत्न कर रहे हैं।





