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Wednesday, March 26, 2014

गंगा समग्र शिखर सम्मेलन - दिनाँक - 19 जून, 2013, दिन - बुधवार

गंगा को अविरल-निर्मल रखने हेतु ‘‘गंगा समग्र’’ के अन्तर्गत प्रथम चरण में पांच कार्यक्रम सुनिश्चित किए गये थे। उनमें (1) गंगा के निकटवर्ती दस प्रमुख केन्द्रों पर जारूकता संगोष्ठियां के आयोजन, (2) गंगा सागर से गंगोत्री तक ‘गंगा यात्रा’, (3) गंगोत्री से गंगा सागर तक मानव श्रृखला निर्माण तथा (4) सभी सांसदों के गंगा अभियान में सहयोग हेतु गंगाजली भेंट कार्यक्रम तथा (5) राष्ट्रीय स्तर पर गंगा की अविरलता-निर्मलता हेतु सकारात्मक भाव विकसित करने और अगले चरण की पीठिका के रूप में ‘‘गंगा शिखर सम्मेलन’’ आयोजित करना सुनिश्चित हुआ था।
अतः गंगा अवतरण दिवस गंगा दशहरा के उपलक्ष्य में 19 जून, 2013 को दिल्ली के सिरीफोर्ट सभागार में देश भर से आये तीन हजार से अधिक गंगा भक्तों के सहकार से हाईकोर्ट इलाहाबाद के पूर्व न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय के संयोजन व उमाश्री भारती के कुशल नेतृत्व में अविरल निर्मल गंगा के लिए ‘‘गंगा शिखर सम्मेलन’’ आगामी चरण की पीठिंका के रूप में पूर्व निश्चय के अनुरूप सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर पेजावर मठ के पूज्य स्वामी विश्वेस्वतीर्थ, परमार्थ निकेतन ऋषीकेश के परमाध्यक्ष व गंगा एक्शन परिवार के संस्थापक स्वामी चिदानन्द ‘मुनि’, तख्त श्री हरिमन्दिर ‘पटना साहब’ के जत्थेदार श्री ज्ञानी इकबाल सिंह, मुफ्ती ए-शहर बनारस मुफ्ती अब्दुल बातिन नोमानी, सरधना मेरठ चर्च के प्रमुख पादरी फादर सुदीप, बौद्ध भिक्षु भदन्त ज्ञान जगत थेरो, अहिंसा विश्व भारती के अध्यक्ष आचार्य लोकेश मुनि, गाँधीवादी प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र, राष्ट्रीय गंगा प्राधिकरण के सयोजक प्रो॰ विनोद तारे सहित अनेक विद्वानों, समाज सेवियों की सहभागिता में प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक आर्शीवाद, पर्यावरण व गंगा वैशिष्ट्य, गंगा के सामाजिक व आर्थिक पक्ष के साथ भविष्य की कार्य योजना सहित चार सत्रों में सम्पन्न हुआ।

एक दृष्टि में - लोक भारती उत्तर प्रदेश की वर्तमान गतिविधियां

लोक भारती उत्तर प्रदेश अपने प्रारम्भिक काल से ही शिक्षा, समाज सेवा, ग्राम विकास, स्वास्थ्य, रसायन मुक्त खेती, सामाजिक जागरूकता तथा शिक्षण एवं प्रशिक्षण के कार्य प्रभावी एवं परिणामकारी ढ़ंग से सम्पन्न करती रही है। क्रमशः कार्य के नये आयाम पर्यावरण, वृक्षारोपण, गंगा, गोमती एवं नदी संरक्षण, मेरा गाँव-मेरा तीर्थ एवं जीरो बजट प्राकृतिक कृषि आदि विषय जुड़ते गये, जिनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।
1. जीरो बजट प्राकृतिक खेती - लोक भारती उत्तर प्रदेश ने पिछले वर्षों में जीरो बजट प्राकृतिक कृषि विधा को समझा और अनेक सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर उसके विस्तार हेतु प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन सम्पन्न हुए, जिनमें उत्तर प्रदेश सहित राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखण्ड, हिमांचल, मध्य प्रदेश, बिहार एवं बंगाल के लगभग तीन हजार प्रयोगधर्मी कृषकों एवं स्वयंसेवी संगठनों की सहभागिता रही। वर्गों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है:
  • 11 से 14 मार्च, 2012 दीनदयाल धाम फरह, मथुरा। सहयोगी संस्था - दीनदयालधाम, मथुरा।
  • 27 से 31 मई, 2012 भानी देवी गोयल इण्टर कालेज, झांसी।
  • 17-18 अक्टूबर, 2012 सहभागी केन्द्र, लखनऊ। सहयोगी संस्था - अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट।
  • 20 से 22 अक्टूबर, 2012 छेरत, अलीगढ़। सहयोगी संस्था - यूथफार नेशन।
  • 24 से 28 जनवरी, 2013 गायत्री शक्तिपीठ, कायमगंज। सहयोगी संस्था - गायत्री परिवार।
  • 12 से 15 फरवरी, 2013 गौरी बाजार, देवरिया। सहयोगी संस्था - समाजवादी जन परिषद।
  • 14 से 18 अप्रैल, 2013, पीलीभीत। सहयोगी संस्था - बजाज ग्रुप।
  • 09 से 13 जून, 2013, इंचैली, हमीरपुर/बांदा। सहयोगी संस्था - चैधरी ब्रजराज सिंह ट्रस्ट।
  • आगामी प्रशिक्षण वर्ग -
  • 29 सितम्बर से 3 अक्टूबर, 2013, भायला, सहारनपुर।
  • 11 नवम्बर से 15 नवम्बर, 2013, झांसी/ललितपुर में आयोजित होन बाले प्रशिक्षण वर्ग में  गौशाला प्रमुखों को वरीयता रहेगी।
2. नदी समग्र चिन्तन कार्यशाला - लोक भारती उत्तर प्रदेश का विश्वास हैं, कि यदि गंगा को निर्मल रखना है तो हमें सभी नदियों को स्वच्छ व सजला रखने के लिए कार्य करना होगा। इसी उद्देश्य से 28 अप्रैल, 2013 को नेहरू युवा केन्द्र, लखनऊ में एक दिवसीय ‘‘नदी समग्र चिन्तन कार्यशाला’’ का आयोजन किया गया, जिसमें उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, गुजरात एवं दिल्ली सहित एक दर्जन नदियों के 300 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में भारत सरकार के जल संसाधन मन्त्रालय के पूर्व सचिव माधव चितले, परमार्थ आश्रम, ऋषीकेश के परमाचार्य स्वामी चिदानन्द ‘मुनि’, गंगा महासभा के महामन्त्री आचार्य जितेन्द्र, लोहिया बौद्धिक महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री दीपक मिश्रा, उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा॰ दुर्ग सिंह चैहान, जल बिरादरी के प्रमुख कार्यकर्ता श्री अरूण तिवारी, ‘गंगा समग्र’ उत्तराखण्ड प्रमुख श्री प्रेम बड़ाकोटी, सरदार पटेल डेन्टल कालेज के डायरेक्टर श्री अनुराग सिंह व लखनऊ महानगर के महापौर डा॰ दिनेश शर्मा तथा दिल्ली से श्री ललित कपूर, सूरत, गुजरात से इन्जीनियर श्री जी॰एस॰ मनियार, पटना, बिहार से प्रो॰ देवेन्द्र प्रसाद सिंह सहित बड़ी संख्या में पर्यावरणविद्, इन्जीनियर एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की समहत्वपूर्ण भागीदारी रही।
इस चिन्तन कार्यशाला में ही नदियों पर आगामी कार्ययोजना बनी, जिसके अनुसार - (1) 18 जून गंगा दशहरा के अवसर पर नदी, तट एवं घाट स्वच्छता केन्द्रित ‘संकल्प’ कार्यक्रम, (2) 22 जुलाई, गुरूपूर्णिमा से 9 अगस्त, हरियाली तीज तक ‘‘वृक्षारोपण पखवारा’’ (3) सितम्बर से नवम्बर तक कालेज व छात्र आधारित ‘‘जागरूकता, श्रमदान एवं नदी सेवा के कार्यक्रम’’ तथा (4) 17 नवम्बर, कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर ‘‘नदी स्नान एवं देव दीपावली के आयोजन’’ आदि।
गोमती संरक्षण अभियान - पिछले नदी समग्र चिन्तन कार्यशाला में सुनिश्चित कार्यक्रमों के प्रकाश में गोमती संरक्षण हेतु ‘‘गंगा दशहरा’’ केन्द्रित लखनऊ में क्रमशः निरन्तरता में कई कार्यक्रम आयोजित किए गये, जिनकी संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है।
गोमती तट घाट स्वच्छता कार्यक्रम - गंगा दशहरा के अवसर पर गोमती का जल स्नान योग्य हो जाये तथा उसके तट व घाट स्वच्छ हों इस हेतु कुडि़याघाट को चुना गया। इसके क्रियान्वयन हेतु इससे निकट के तीन प्रमुख नाले नगरिया, सरकटा व पाटा के प्रदूषित प्रवाह को रोकने के लिए जल निगम पर दबाव बनाया गया तथा 17 मई को सामाजिक सहभागिता के आधार पर स्वच्छता कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें दुर्गा मन्दिर सेवा समिति, शुभ संस्कार समिति के साथ ही बड़ी संख्या में अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित जलपुरूष राजेन्द्र सिंह ने भी भाग लिया, जिससे सामाजिक जाग्रति के साथ ही शासन, प्रशासन में भी इस हेतु कुछ करने का भाव जागा।
गोमती संरक्षण हेतु एक दिवसीय उपवास- गंगा दशहरा तक कम से कम कुडि़याघाट तक गोमती स्वच्छ हो इस हेतु निरन्तर सामाजिक दबाव बनाये रखने हेतु दिनाँक 22 मई, 2013 को गोमती तट शहीद स्मारक पर प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक एक दिवसीय उपवास का आयोजन किया गया। इसमें महन्त रामसेवक दास (गोमती बाबा), मनकामेश्वर पीठ की महन्त देव्यागिरि, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी डा॰ बैजनाथ सिंह, नवाब जफर मीर अबदुल्ला सहित सिन्धी समाज, व्यापार मण्डल, पटरी दुकानदार संघ, शिक्षक व छात्र संगठनों के 100 से अधिक प्रतिनिधियों की भागीदारी रही। समापन के अवसर पर जल पुरूष राजेन्द्र सिंह ने नदी नीति बनाने व गोमती को राज्य नदी धोषित किए जाने के सम्बन्ध में मुख्यमन्त्री श्री अखिलेश यादव की सकारात्मकता की जानकारी दी।
सिंचाई विभाग व प्रोजेक्ट कार्पोरेशन का सहयोग -  गोमती के तल में बड़ी मात्रा में सिल्ट जमी है, उसे निकालने के लिए डेªजिंग की आवश्यकता थी, अतः सिंचाई मन्त्री शिवपाल सिंह ने लोक भारती उत्तर प्रदेश के 25 मई के पत्र के का संज्ञान लेकर सिंचाई विभाग को कुडि़याघाट गोमती के 800 मी॰ क्षेत्र हेतु डेªजिंग के लिए निर्देशित किया, जिसके अन्र्तगत 11 जून से  17 जून तक आंशिक रूप से कार्य हुआ, जोे गोमती संरक्षण की दिशा में सांकेतिक पहल भर थी। इस अवसर पर प्रोजेक्ट कार्पोरेशन ने भी एक घाट को स्वच्छ कर स्नान योग्य बनाया। 
सप्ताह में दो दिन नियमित स्वच्छता कार्यक्रम- कुडि़याघाट को गंगा दशहरा हेतु चुना गया था, अतः 22 मई के बाद सप्ताह में दो दिन रविवार व गुरूवार को प्रातः 7 से 9 बजे तक निरन्तर स्वच्छता कार्यक्रम चलाया गया, जिसमें लोक भारती उत्तर प्रदेश के साथ दुर्गा मन्दिर सेवा समिति, शुभ् संस्कार समिति, पर्यावरणविद् कृष्णानन्द राय व डाक्टर नरेन्द्र मेहरोत्रा की विशेष भूमिका रही। 
संकल्प से मना गंगा दशहरा - 16 जून से 18 जून प्रातः तक निरन्तर वर्षा हो रही थी। इसके बाद भी वर्षा की परवाह किए बिना गंगा दशहरा के पावन पर्व 18 जून को प्रातः 6 बजे से ही बड़ी संख्या में गोमती भक्त एकत्र होने लगे। पूर्व निश्चय के अनुसार गोमती घाट स्वच्छता सेवा, गोमती स्नान और गुरूकुल के बटुकों व शिवशान्ति आश्रम के योगाभ्यासियों के साथ शुभसंस्कार समिति द्वारा गोमती आरती, लोक भारती उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष विश्वनाथ खेमका द्वारा गोमती संरक्षण संकल्प व पी॰ए॰सी॰ फ्लड यूनिट के साथ नौका बिहार व जेठ मास के अन्तिम मंगल के प्रसाद के साथ पिछले तीन महीने से चल रहे गोमती संरक्षण अभियान का एक चरण सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर पर्यावरणविद् व भोजपुरी कवि श्री कृष्णानन्द राय ने संकल्प लिया कि लखनऊ होने पर प्रत्येक गुरूवार को कुडि़याघाट पर प्रातः एक घंटा वह नियमित गोमती सेवा करेंगे। उनका संकल्प उनके साथ समाज के अन्य कार्यकर्ताओं को भी प्रेरित करके कुडि़याघाट तक सेवा हेतु ले आता है। 
वृक्षारोपण पखवारा - पूर्व की भांति, गुरू पूर्णिमा 22 जुलाई से हरियाली तीज 9 अगस्त तक पूरे लखनऊ में विभिन्न व्यक्तियों, संगठनों, संस्थाओं को प्रेरित कर पर्यावरण के लिए वृक्षों का महत्व समझने और उसके लिए प्रत्यक्ष कार्य करने के संकल्प को व्यक्त करने हेतु ‘‘वृक्षारोपण पखवारा’’ मनाने का निश्चय किया गया है। इस हेतु दिनाँक 21 जून, दिन रविवार को सायं 3-5 तक वृक्ष एवं पर्यावरण कवि गोष्ठी एवं वृक्ष भण्डारे का आयोजन श्री महेन्द्र प्रताप सिंह, श्री अजय प्रकाश, सुश्री डा॰ अंशु केडिया व एक दर्जन से अधिक संस्थाओं के प्रत्यक्ष सहकार में सुनिश्चित हुआ है , जिससे वृक्षारोपण के साथ ही उनके संरक्षण के भाव वाले वृक्ष मित्र परिवार का विकास सम्भव होगा।

स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का - आचार्य सोम दीक्षित

भारत में यदि सूत्रपात करना है लोक सुधार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।1।।
दिव्य देश के दिग्दिगन्त में स्वर्ण किरण संचार हो।
चारूचित्र पावन चरित्रगत चन्दन का सुविचार हो।
भूख-भ्रान्ति-भय-भ्रष्ट आचरण-शोषण का प्रतिकार हो।
योगेश्वर का शंखनाद हो-गीता का उच्चार हो।
तो फिर समय आगया है अनुबन्धों के एपचार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।2।।
संस्कृति के रंग में जन-मन का रंजन परमावश्यक है।
लोक समाहित विक्रतियों का वर्जन परमावश्यक है।
शास्त्र मनन के साथ शस्त्र का चिन्तन परमावश्यक है।
धर्मचक्र का फिर से क्रान्ति प्रवर्तन परमावश्यक है।
अगर लक्ष्य है दिव्य दृष्टि से सृष्टि के द्वार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।3।।
जन-मन ऊबा, राजनीति के दोषों के दुर्गन्धों से।
घिरती जाती धुन्ध देश में, वेधर्मी के धन्धों से।
होने लगा रिसाव धर्म की धारा के तटबन्धों से।
अब विश्वास उठगया घर के धृतराष्ट्रों से अन्धों से।
यदि नेतृत्व नियत करना है अवसर दो सरकार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।4।।
मेरा नहीं विरोध, शान्ति करूणा औ प्रेमप्रसार पर।
मेरा नहीं विरोध, नागरिक-समानता की धार पर।
है विरोध, कायरता भरे समर्पण के व्यवहार पर।
धर्म नाम पर आतंकी अपसंस्कृति के विस्तार पर।
मूल्य चुकाना है यदि मां के ममता भरे दुलार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।5।।
(1)सिन्धु नदी की लहरें फिर से बड़ी व्यथा से बोली हैं।
(2)लौहकोट-मुल्तान राज्य की धरती फिर से डोली है।
(3)सबल सपादलक्ष्य ने फिर से रची भाल पर रोली है।
किसी वीर ने सोमनाथ पट्टन की खिड़की खोली है।
यदि सटीक उत्तर देना है गजनी की तलवार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।6।।
यदि हमको (4) गुर्जर के गौरव सोमनाथ से आपा है।
भोग भूमि औ मातृभूमि के अन्तर को यदि भांपा है।
तो देखो फिर शिखर महालय (5) पर केशरिया कांपा है।
सनो, कक्ष के रन से गरजे फिर से घोघाबापा (6) है।
परिस्कार यदि करना है फिर संसद के संस्कार का।
स्वागत करना होगा निश्चित निष्कलंक अवतार का।।7।।
उपरोक्त कविता के चिन्हांकित वाक्यांशों का विवरण दिया जा रहा है, जिससे कविता के भाव और उसके संदर्भ को समझा जा सके -
(1) सोमनाथ मन्दिर पर आक्रमण करने वाला मोहम्मद गजनवी अपनी साठ हजार सेना के साथ सिन्धु नदी पार कर आया था।
(2) उसने (गजनी ने) लौहकोट और मुल्तान (मूलस्थान) के राजाओं को पहले से भेजे गये छद्मवेशी फकीरों व औलियों के माध्यम से बरगलाकर, अपने मार्ग को बाधा रहित बना लिया था।
(3) आमेर और अजमेर का संयुक्त राज्य उस समय सपादलक्ष नाम से बोला जाता था, यह नाम सवा लाखरूपये का राजस्व देने वाले राजा के रूप में जाना जाता था। यहां के राजा धर्मगज देव थे जिनसे मोहम्मद गजनवी की सेना पराजित हो गई थी, किन्तु युद्ध के बाद रात में पुनः अपनी सेना को संगठित कर धोखे से धर्मगज देव के सोते हुए सैनिकों पर हमला कर दिया था और आगे बढ़ गया था।
(4) गुर्जर प्रदेश, गुजरात का ही नाम है।
(5) सोमनाथ मन्दिर की विशालता के कारण उसे महालय कहा जाता था।
(6) कच्छ के रेगिस्तान में स्थित घोघा गढ़ के पच्चासी वर्षीय घोघाबापा केवल पांच सौ सैनिकों को लेकर गजनबी की साठहजार सेना से कई दिनों तक अकेले युद्धकर अपना बलिदान दिया था।
- प्रधानाचार्य, गुरूगोविन्द सिंह विद्या मन्दिर इण्टर कालेज, रिखौना, सीतापुर

एक मन्दिर से जागा: लोक सेवा का मंगल भाव - आचार्य सोम दीक्षित

‘‘चलती को ‘गाड़ी’ कहते हैं, ‘गाड़ी’ को कहें ‘उखाड़ी’।’’ यह कैसी उलटवांँसी हैं समाज की? प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक ओर जहां लोगों के पास अपनों के लिए भी समय कठिनाई से ही निकल पाता है; वहीं जेठ की तपती धूप में मंगल के दिन मानो पूरा समाज ही यहां के लोगों को अपना लगने लगता है। जी हां! इस दिन यहाँ के लोगों का मन बड़ा होता है, इसलिए इस दिन को शायद बड़ा मंगल कहते हैं। वैसे तो ‘मंगल’ का अर्थ ही शुभ् होता है, परन्तु लखनऊ में जेठ के मंगल का अर्थ हैं मंगलकारी, संकटमोचक हनुमान जी का दिन। कहते हैं कि ‘जेठ के महीने में ही हनुमान जी की भेंट श्रीराम से प्रथम बार हुई थी। हनुमान जी ने श्रीराम से जुड़कर अपने को बड़ा (गौरवशाली) अनुभव किया था, वहीं रामचन्द्र सीता हरण के पश्चात् तीन संख्या से घट कर दो रह गये थे, इस जेठ मास में हनुमान जी के मिलन के पश्चात् वानर राज सुग्रीव से मिलकर दो चार हो गये थे और बालि वध के बाद तो उनके सहयोगियों की संख्या बड़ी ही होती चली गई थी। अतः श्रीराम-हनुमान मिलन को यदि हम लोक मंगलकारी बड़ा दिन मान लें तो जेठ मास के बडे़ मंगल की सार्थकता और भी सिद्ध हो जाती है।’ एक बात और जेठ मास के बड़े मंगल को लोकभाषा में बुढ़वा मंगल भी बोलते हैं। महाभारत की एक कथा के अनुसार वनवास भोग रहे पाण्डवों में एक पवनपुत्र भीम की भेंट अत्यन्त बूढ़े शरीर वाले पवनपुत्र हनुमान जी से ज्येष्ठ मास में तब हुई थी जब भीम जल की तलाश में वन में भटक रहे थे। सम्भव है वह दिन भी मंगल रहा हो या एक युवा पवन पुत्र की एक वृहद पवन पुत्र की इस भेंट को ही मांगलिक मान लिया जाय।
इसीलिए इस दिन लखनऊ नगर के हर गली मोहल्ले में हनुमान भक्तों के द्वारा जगह-जगह सबेरे से ही शामियाना सज जाते हैं और फिर पूरे दिन प्रसाद, शर्बत और शीतल जल के साथ चलता है। अपनेपन का वह महाप्रयोग जिसकी केवल अनुभूति ही की जा सकती है।
लखनऊ में बड़े मंगल के दिन छोटे बड़े सभी लोग इन ‘मंगल पंडालों’ से प्रसाद लेकर अपने को धन्य मानते हैं। अपनेपन के इस मंगल प्रसाद में कहीं गरमागरम पूड़ी-सब्जी, कहीं बूँदी-पूड़ी तो कहीं देशी घी का हलुवा और शीतल जल या कहीं-कहीं शर्बत लिए ये हनुमान भक्त बड़े प्रेमभाव से सेवा में तत्पर रहते हैं। इस दिन लोगों में इस प्रेम प्रसाद के साथ लोगों में मस्ती का भाव भी जाग जाता है और फिर उन्हें दो-दो, तीन-तीन पण्डालों से प्रसाद लेने में कोई गुरेज नहीं होता। अनेक परिवारों को इस दिन चूल्हा जलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि दिन भर चलने वाले ऐसे असंख्य भण्डारों में मानो लखनऊ का हृदय बुला रहा हो। यह दृश्य लखनऊ में जेठ मास के सभी मंगलों को रहता है, जो किसी वर्ष चार तो किसी वर्ष पांच पड़ते हैं। इन बडें मंगल का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि पहले मंगल के दिन लखनऊ के सरकारी दफ्तरों में सार्वजनिक अवकाश रहता है।
सामान्यतः एक पण्डाल से पूरे दिन में कम से कम दो हजार लोग प्रसाद लेकर अपनी प्यास बुझाते हैं। पूरे लखनऊ में पांच सौ के लगभग पण्डाल सजते हैं, जिनके माध्यम से एक दिन में लगभग दस लाख लोगों की सेवा होती है, जिसका मूल्य अमूल्य है, पर इस आर्थिक युग में जब पीने का पानी भी पन्द्रह रू॰ बोतल बेचने की फितरत पैदा हुई है, ऐसे में डेढ़ से दो करोड़ रूपया एक दिन में समाज सेवा पर उल्लास पूर्वक खर्च कर देने वाला हमारा समाज अद्भुत है।
ऐसा ही एक पण्डाल लखनऊ के परिवर्तन चैक पर बड़े मंगल के अतिरिक्त दिनों में भी गर्मी के तीन महीने अप्रैल, मई और जून में आम राहगीर की भूख-प्यास बुझाने का नियमित, सेवाभावी एवं प्रेरक उपक्रम है, जिसका संचालन ‘दुर्गा मन्दिर धर्म जागरण सेवा समिति’ द्वारा किया जाता है। इस समिति का केन्द्र लखनऊ के शास्त्री नगर स्थित दुर्गा देवी मन्दिर में है, जिसके माध्यम से कई पे्ररणादायी कार्य चलते हैं।
मन्दिर के समीप ही इस समिति का छः मंजिला सेवा भवन है, जिसकी एक मंजिल में सन् 2004 से प्रातः 9 बजे से 1 बजे तक चलने वाला नियमित चिकित्सालय है, जिसमें एलोपैथी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक एवं फीजियोथेरेपी आदि विभागों के साथ ही एक्सरे एवं ईसीजी की उत्तम व्यवस्था हैं। यहाँ सामान्य मरीजों से दो दिन की दवा हेतु 10 रू॰ पंजीकरण शुल्क लिया जाता है। यदि कोई मरीज 10 रू॰ देने में भी असमर्थ है तो उसकी चिकित्सा निःशुल्क की जाती है और उसे दवा के साथ में राशन का एक पैकेट भी दिया जाता है जिससे भूखे पेट उसे दवा न लेनी पडे़ं। यह सामाजिक स्वास्थ्य का अच्छा प्रकल्प है।
सेवा केन्द्र की एक मंजिल पर कल्याण मण्डप है, जिसमें समय-समय पर कथा, प्रवचन, योग अभ्यास आदि कार्यक्रम चलते रहते हैं। इसमें से एक अभिनव कार्यक्रम है ‘संस्कार-पथ’, जिसमें गर्मियों की छुट्टियों में मन्दिर से जुडे़ विभिन्न परिवारों के बच्चे प्रातः 10 बजे से सायंकाल पांच बजे तक एकत्र होकर सामूहिक संस्कार ग्रहण करते हैं। क्योंकि स्वस्थ समाज के लिए बच्चों में शिक्षा के साथ संस्कार देना भी आवश्यक है। आज जब समाज में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की होड़ लगी है, ऐसे में यह ‘संस्कार-पथ’  समस्त परिवारों के लिए अमृतधारा से कम नहीं है।
इसी भवन में पिछले एक वर्ष से छोटा, पर महत्वपूर्ण आवासीय व्यवस्था युक्त गुरूकुल भी प्रथमा कक्षा से प्रारम्भ हुआ है, जिसमें अभी 11 वटुक एवं उनके शिक्षक हैं। दूसरे खण्ड में सन्तआवास एवं भोजनालय है, तो सबसे ऊपरी मंजिल में तुलसी उद्यान है; जहाँ से जिस किसी को तुलसी पौधे की आवश्यकता हो, दिया जाता है, जिससे प्रत्येक घर तुलसी पौधे से युक्त बना रहे।
इस समिति द्वारा लोकहित का एक महत्वपूर्ण कार्य ‘सामूहिक विवाह’ आज से 23 वर्ष पूर्व 1992 में  से प्रारम्भ हुआ तो आज तक विधिवत् चल रहा है। अभी तक इन वर्षों में 47 विवाह समारोहों का आयोजन सम्पन्न किया जा चुका है जिनके माध्यम से 992 जोडे़ संस्कारपूर्ण विवाह बंधन में जुड़कर अपने दायित्व का निर्वहन करने में समर्थ हुए हैं। इस समिति द्वारा प्रत्येक जोड़े को उसके विवाह के समय ही जीवन संचालन हेतु जहां आवश्यक समस्त भौतिक वस्तुयें भेट स्वरूप दी जाने की व्यवस्था है, वहीं संस्कार स्वरूप उनके जीवन में यह भाव भी विकसित होता है कि समाज में आप अकेले नहीं, सम्पूर्ण समाज तुम्हारे साथ है।
सामूहिक विवाह की प्रेरणा भी श्रीराम-सीता के विवाह से ली जा सकती है, जब चार-चार दूल्हा-दुल्हनों को चार अवस्थाओं और उनके चार स्वामियों के समान एकत्र देखकर जनकराज कहते हैं -‘हम बड़े अब सब विधि भये’। अतः हर बड़ा मंगल हमारी राजधानी लक्ष्मणपुरी का सांस्कृतिक और सामाजिक बडप्पन बनाये रखे, यही मंगल कामना है।
उत्तराखण्ड की प्रकृतिक आपदा में भी अग्रणी - जैसे ही सूचना मिली किउत्तराखण्ड में फंसें लोगों को तत्काल मदद की आवश्यकता है, तत्काल वहां के लिए आवश्यक राशन व अन्य समिग्री तथा भोजन बनाने बानी टीम के साथ पांच गडि़यों में सेवा समिति के कार्यकर्ता 24 जून को ऋषीकेश पहुंच गये और वहोँ पांच दिन रूक कर विपदा पीडि़तों की सेवा की।

पेड़ हैं प्रकृति का अमूल्य वरदान। - संकलित

  • क्या आप जानते हैं? कि, एक पेड़ अपने जीवन काल में हमें 32 लाख रूपये का लाभ पहुँचाता है। क्या हमने कभी इस ओर ध्यान दिया है? यदि नहीं तो अब जानें, नही तो बहुत देर हो जायेगी।
  • हमारे जीवन के लिये सबसे आवश्यक है, प्राण वायु अर्थात आक्सीजन। जिसका एक मात्र स्रोत पेड़ है और जो हमे बिना कोई मूल्य चुकाये प्रतिदिन देते रहते है, जिसका मूल्य 8.60 लाख रू॰ होता है।
  • आज सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण प्रदूषण से चिन्तित है। इस कार्य में पेड़ों का महत्वपूर्ण योगदान है। पर! उसके लिए धरती के 1/3 भाग पर पेड़ चाहिए। उत्तर प्रदेश में वर्तमान समय में मात्र 7 प्रतिशत भू-भाग पर ही पेड़ हैं, जिसमें से तराई और मिर्जापुर के जंगलों को यदि निकाल दिया जाये तो मात्र चार प्रतिशत वनावरण ही शेष है। एक पेड़ अपने जीवन काल में वायु प्रदूषण रोकने में 10.50 लाख रूपये का योगदान करता है।
  • व्यक्ति के जीवन के खाद्यान्न का अत्यन्त महत्व है, जिसके लिए कृषि भूमि का उपजाऊ बने रहना आवश्यक है। इस कार्य में एक पेड़ का योगदान 8.40 लाख रू॰ आंका गया हैं।
  • मनुष्य के जीवन के साथ प्रकृति के विभिन्न जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों से गहरा रिश्ता है और इनका बहुत बड़ा आश्रय पेड़-पौधे हैं। इस कार्य में एक पेड़ का योगदान 5.30 लाख रू॰ होता है।
  • मनुष्य के सुख का महत्वपूर्ण आधार है स्वास्थ्य, जिसके लिए हमें पेड़ देते हैं फल, फूल और औषधियाँ, जिनका मूल्य 4.30 लाख रू॰ होता है।
  • इसके अतिरिक्त भी पेड़ पौधों से हमें बहुत कुछ मिलता है। चूल्हा जलाने के लिए उसकी स्वयं सूखी लकडि़यां, दोने, पत्तल एवं कई अन्य उत्पादों के लिए पत्ते। अतः हम कह सकते हैं, कि पेड़ हमारे लिए प्रकृति का अमूल्य वरदान हैं। यदि हमे अपनी रक्षा करनी है तो पेड़ों की रक्षा करना भी हमारी आवश्यकता है।

जब गोमती जल वरदान बना! - अखिलेश कुमार

अमावस के दिन सम्पूर्ण गोमती के किनारे बहुत बड़ी संख्या में लोग श्रद्धापूर्वक मनौती लेकर स्नान के लिए जाते हैं। हमारे गांव में एक व्यक्ति के शरीर में स्वेत कुष्ठ के दाग हो गये, तो उन्होने भी उसको ठीक होने की मनौती लेकर प्रत्येक अमावस को गोमती में जा कर स्नान करना और फिर वहां से जल लाकर गांव के देवी मन्दिर में देवी का अभिषेक करना यह नियम बना लिया। मैं, क्या गांव के सभी लोग इस विषय को जानते थे और निरन्तर देखते भी थे कि क्या स्वेत दागों में कोई अन्तर आ रहा है या नहीं। एक-दो अमावस स्नान के बाद देखने पर मालुम हुआ कि स्वेत दागों में आश्चर्यजनक ढ़ंग से परिचर्तन आना प्रारम्भ हो गया था। उनका गामेती स्नान का यह क्रम लगभग डेढ साल चला होगा, उनके शरीर के सफेद दाग गायब हो गये और उससे उनको समाज में सामान्य जीवन जीने का पुनः अवसर मिल पाया।
इतना ही नहीं तो, इससे से भी आश्चर्य जनक एक घटना गोमती से जुड़ी है। हमारे गांव के निकट ही एक गांव का मुस्लिम परिवार का व्यक्ति अपनी निसन्तानता के कारण बहुत दुखी रहता था। उसने जब गोमती स्नान और गोमती का जल लाकर देवी जी को चढ़ाने से स्वेत कुष्ठ ठीक होने का समाचार सुना और प्रत्यक्ष आकर देखा, तो उसके मन में भी श्रद्धा जागी। उसके बाद अपने मन में अपनी सन्तान का भाव लेकर  नियमित रूप से अमावस्या को गोमती स्नान के लिये नियमित जाने और वहां से जल लाकर देवी का अभिषेक रिने लगा। गोमती के प्रति उसकी श्रद्धा रंग लाई और एक वर्ष के पश्चात उसके घर पुत्र रत्न की सहनाईयां बजीं।
इससे उसका गोमती के प्रति विश्वास इतना दृढ़ हुआ कि उसने एक मुस्लिम परिवार का होने के बाद भी अमावस को गोमती स्नान और उसके बाद उसके जल से देवी अभिषेक का क्रम निरन्तर जारी रखा।

भारतीय संस्कृति में त्रिदेवों की शाश्वत वैज्ञानिक दृष्टि - संकलित

भारतीय संस्कृति में सृष्टि को त्रिगुणा कहा है और उसके नियन्ता को त्रिगुण के प्रभाव से मुक्त ‘त्रिगुणातीत’’ कहा गया है। वह त्रिगुण हैं; जन्म, पालन-पेाषण और मृत्यु अर्थात जिसका जन्म हुआ है, उसका पालन-पोषण होगा और एक निश्चित अवधि के बाद उसकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। इन तीनों कार्यों के लिए  त्रिदेव हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश। जिसमें ब्रह्मा का कार्य है उत्पत्ति, विष्णु का कार्य है उसका पालन-पोषण और विकास तथा सदाशिव अर्थात सदैव कल्याणकारी महेश का कार्य है उसकी अवधि की पूर्णता पर संहार अर्थात मृत्यु, जो इस सृष्टि का परम सत्य है। सृष्टि में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है और जब तक चलता रहेगा तब तक सृष्टि चलती रहेगी।
यह त्रिआयामी कार्य सृष्टि के प्रत्येक अणु, परमाणु एवं प्रत्येक घटक में निरन्तर चलता रहता है। जैसे कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में हर क्षण नई कोशिकायें जन्म लेती हैं और पुरानी कोशिकाये मरती रहती हैं। जब तक शरीर में यह प्रक्रिया अपने स्वस्थ स्वरूप में चलती रहती है, तव तक जीवन स्वस्थ रहता है और इस प्रक्रिया के रूकते ही व्यक्ति के जीवन का भी अन्त हो जाता है।
भारतीय संस्कृति में जहां इस सृष्टि नियन्ता शक्ति को त्रिदेव ब्र्रह्मा, विष्णु, महेश कहा है, विज्ञान की भाषा में इन्हें एलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्युट्रान कहते हैं, वहीं पाश्चात्य संस्कृति में उसे GOD कहा है, जिसमें ‘जी’ से जनरेटर, ‘ओ’ से आपेरटर और ‘डी’ से डिस्ट्रवाय का भाव है। अर्थात ब्रह्या, विष्णु, महेश और ‘GOD’ एक ही है, केबल भाषा का अन्तर है। भारतीय मनीषियों ने उसका साक्षात्कार किया और उसकी अभिव्यक्ति इस प्रकार की।
‘‘तद्देजति तन्नेजति तद्दूरे तद्दन्तिके।
तदद्न्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य वाहयतः।।’’
इन तीनों शक्तियों की इस सृष्टि का त्रिगुण सम्पन्न मूल स्वभाव सत्यं-शिवमं-सुन्दरम’ है और जिनके मूल में  ‘सत-रज-तम’ युक्त त्रिगुणी ऊर्जा विद्यमान रहती है। इस सृष्टि में समय अर्थात काल भी त्रिआयामी है; जिसे भूत-वर्तमान-भविष्य और दैनन्दिनि उसे त्रिकाल अर्थात ‘प्रातः-दोपहर-सन्ध्या’ के रूप में हम सब जीते हैं। प्रातः अर्थात जागरण-काल, दोपहर अर्थात क्रिया-काल और संध्या अर्थात अवसान या पुर्नजागरण हेतु निद्रा-काल है।
सृष्टि की त्रिगुणात्मकता और त्रिदेव महत्व को अपने जीवन-सूत्र के रूप में समझने हेतु  त्रिदेवी-शक्ति को भी जान लेना आवश्यक है। उत्पत्ति के देव ब्रह्मा की शक्ति सरस्वती, पालक विष्णु की शक्ति लक्ष्मी और संहार के देव सदाशिव की शक्ति दुर्गा देवी है। प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन में ब्रह्मा के कार्य सृजन के लिए सरस्वती अर्थात ‘बुद्धि’, विष्णु के कार्य पालन हेतु लक्ष्मी अर्थात ‘धन’ और जीवन अवरोध को हटाने के लिए शिव के कार्य हेतु दुर्गा अर्थात ‘शारीरिक बल’ रूपी शक्ति आवश्यक है।
यहीं पर भारतीय मनीषियों नें इन तीनो शक्तियों के बाहनों की समाज-विज्ञान के आधार पर संरचना की है। सरस्वती का वाहन नीर-क्षीर विवेकी ‘हंस’, लक्ष्मी का वहान रात्रि में विचरण करने वाला उल्लू और दुर्गा का वाहन वनराज सिंह है। सभी शक्तियों के वाहनों की अपनी-अपनी प्रवृत्तियां है, जिनको साधने से सुफल और न साधने से कुफल मिलना  अवश्यम्भाभी है।
यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में इन तीनों शक्तियों की नितान्त आवश्यकता है और आज हर व्यक्ति उनको एन-केन प्रकारेण प्राप्त कर लेने के लिए प्रयत्नशील रहता है। अतः उन्हें प्राप्त करने और उनके सुफल हेतु इस त्रिगुणा-सृष्टि में मानव को अपने जीवन-लक्ष्य ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ की चतुष्पदी को कभी नहीं भूलना चाहिए।

जल संकट के समाधान का प्रयास - देवकी नन्दन ‘शान्त’

जल-संकट का चाहिये, समाधान इक ठोस।
कार्य करें जी-जान से, छोड़ परस्पर रोष।। 1 ।।

‘बेपानी’ होकर अगर, लड़ा करेंगे लोग।
‘गाँव-शहर’ के बीच फिर, बढे़गा जल का रोग ।। 2 ।।

‘सिंचित खेती’ और फिर ‘उद्योगों’ के बीच।
‘जल-संकट’ ले आयेगा, हमें घरों से खींच ।। 3 ।।

‘समाधान’ हैं ‘पाँच’ ही, खुल कर करें विचार।
‘भारत’ में वरना नहीं, फिर इसका उपचार।। 4 ।।

‘वर्षा जल’ को समक्षकर, खूब समेटें आप।
‘समाधान’ यह प्रथम है, स्वीकारें चुपचाप।। 5।।

‘जल के वाष्पीकरण’ को, बचा सकें गर लोग।
‘पेट धरा का’ भर सके, ‘वर्षा जल’ का योग।। 6 ।।

‘कम से कम’ खींचें अगर, ‘भू’ से ‘जल’ श्री मान।
‘समाधान’ यह तीसरा, होगा ठोस प्रमाण।। 7 ।।

‘अनुशासित’ होकर करें, ‘जल’ का हम उपयोग।
‘जल-संकट’ से खुद-ब-खुद, उबरेंगे हम लोग।। 8 ।।

‘समाधान’ अंतिम अगर, माने ये संसार।
‘संस्कार’ से जोड़दें, ‘जल’ के प्रति ‘व्यवहार’।। 9।। ु
- साहित्य भूषण एवं अधीक्षण अभियन्ता (से॰नि॰), उ॰प्र॰ पावर कारपोरेशन लि॰। मो॰: 9935217841

पकृति को संवारें निर्माण को सहेजें - प्रो॰ (डा॰) रोमल मेहता

उत्तराखण्ड की त्रासदी संरचनाओं, परिवहन कारीडोर, वनो और कृषि क्षेत्रों के व्यापक पैमाने पर विनाश का नतीजा है। इस कारण आपदा के लिए प्रकृति नहीं मनुष्य जिम्मेदार है। तबाही की व्यापकता और भयावहता के कारण स्थानीय पारिस्थतिकी पर पड़े परिणामों की बजह से इसे आपदा कहा जा रहा है। लेकिन सबसे पहले मनुष्य ने ही पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाया।
उत्तराखण्ड की पहाडि़यों पर बादल फटने और अत्याधिक वारिश की घटनायें होती रहती हैं। वास्तव में त्रासदी की मुख्य वजह जटिल प्राकृतिक संरचना का निर्मम तरीके से क्षरण, अनियोजित तरीके से विकास और मुनाफे का लालच है। उत्तराखण्ड की पारिस्थितिकी और प्रकृति के मुख्यतः तीन तत्व हैं:
1. वन: केवल पेड़ ही जंगल का निर्माण नहीं करते। इनमें वृक्ष, झाडि़यां और घास-फूस से ढ़की जमीन शामिल है।
2. नदी: यह चैनल (जल प्रवाह का जरिया क्षेत्र) बाढ़ के मैदानों और बाढ़ के मैदानों से सटे दलदलों से बनती है।
3. भू-गर्भ: भू-आकृतिकी और मिट्टी।
मानव के हस्तक्षेप से दो अत्यन्त प्रभावी तथ्य उत्पन्न होते हैं।
1. पर्यटन और इससे जुड़ी गतिविधियों के लिए प्राकृतिक स्रोतों की मांग।
2. विकास जिनमें भवन, सड़के ओर अन्य संरचनाओं का निर्माण शामिल है।
वनों की अन्धाधुन्ध कटाई और अत्यधिक वारिश के कारण हालिया बाढ़ में वन उन्मूलन उत्तराखण्ड़ में  पर्यावरणीय आपदा के सबसे प्रमुख कारण रहे। उत्तराखण्ड़ में वनों का सबसे अधिक अनुपात है जो क्षेत्रीय पर्यावरण, लोग और जैवविविधता के टिकाऊपन के लिए आवश्यक है। यह मिट्टी को अपरदन से भी बचाता है और बदले में मिट्टी, कृषि और जंगलों के अस्तित्व के लिए जरूरी है। अतः...
एक: ज्रगलों को पुनर्जीवित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए तात्कालिक रूप से क्षतिग्रस्त पेड़ों की देखभाल के साथ जिन जगहों से पेड़ बह गये  हैं, उनकी जगह नए सैंपल लगाये जाने की जरूरत हैं। इस लक्ष्य को पाने के लिए पहले की तरह ही 35 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन होने चाहिए। इसके लिए स्थानीय विशेष परिस्थिति का ध्यान रखकर पौधे लगाये जाने चाहिए तथा स्थानीय आबादी की जरूरतों के लिहाज से  उपयोगी क्षेत्र को चारागाह भूमि के रूप में घोषित करना चाहिए ताकि जंगली भूमि की रक्षा हो सके।
दो: नदी केवल चैनल नहीं है। उसके सभी क्षेत्रों के दायित्वों को प्रकृति द्वारा प्रदत्त कार्य करने देना चाहिए। उनमें छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। इस लिहाज से नदी चैनल पर कोई भी निर्माण या अवरोध किसी भी सूरत में नहीं होने देना चाहिए। बाढ़ के मैदान भी उपजाऊ हैं अतः नदी सुरक्षा की दृष्टि से बाढ़ के मैदान से जुड़े क्षेत्र को बफर जोन के रूप में संरक्षित करना चाहिए।
तीन: दुनियां की सबसे नई पर्वत श्रृंखलाओं के चलते उत्तराखण्ड भौगोलिक दृष्टि से अत्यन्त नाजुक है। इसका अधिकांश हिस्सा उच्च रूप से सक्रिय भूकम्प क्षेत्र चार और पांच के तहत आता है। यहां धरती के नीचे की हलचल तेज है, जो कभी भी यहां की भौगोलिक स्थिति और नदियों की संरचना में विक्षोभ पैदा कर सकती है। इस तथ्य के साथ यहां की भौगोलिक संरचना को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि नदियों के पास बड़ी संरचनाओं से परहेज किया जाय। प्रदेश के पुनर्निमाण में इस तथ्य को कड़े मानक के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
चार: क्षेत्र में पर्यटन और पर्यावरण के सहजीवन को बनाए रखने पर जोर देना होगा। पर्यटन के चलते इस क्षेत्र को गंभीर क्षति पहुँचती रही है। इसे रोका जाना चाहिए। पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उन्हें सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अनियोजित बुनियादी सुविधाओं के विकास में इजाफा हुआ है। इससे बचने का एक तरीका यह हो सकता है कि पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में पर्यटकों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए। इस नियंत्रण को लागू करने के लिए यात्रियों को बेस केंन्द्रों पर ही रोका जाना चाहिए जहाँ पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए उन्हें सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा सके।
पाँच: अन्त में, यहाँ पर होने वाले विकास को अत्यधिक संगठित तरीके से किया जाना चाहिए और प्लानिंग इस तरह से वर्गीकृत हो जिससे सभी विशिष्ट दिशानिर्देशों का अनुपालन हो सके।
इस सन्दर्भ में प्लानिंग की कार्यप्रणाली में आमतौर पर स्वीकार किए जाने वाले सहज सुझावो की भी समीक्षा की जानी चाहिए और यदि आवश्यक हो तो उत्तराखण्ड के पुनर्निर्माण को लक्षित प्लानिंग और डेवलपमेंट का एक नया तरीका विकसित किया जाना चाहिए। सड़कों पर भी विशेष ध्यान की जरूरत है। आमतौर पर सड़कों को पहाड़ों के किनारे बनाया जाता है यह इसी रेखा में हजारों किलोमीटर तक चली जाती है। इसे बनाये जाने से वहाँ की नाजुक भौगोलिक संरचना को क्षति पहुँचती है। वर्तमान स्थिति में इस पर गंभीर रूप से विचार करने की जरूरत है कि पहाड़ों और सड़कों के जुड़ाव को सीमित किया जाए। इसी के साथ यात्रा की दूरी को कम करने के लिए और पहाड़ों से सटकर पर सड़के बनाने और उससे होने वाले नुकसान में कमी लाने के लिए जितना सम्भव हो पुल बनाया जाए और उनसे सड़कों को जोड़ा जाए। इसके अलावा अत्यधिक भूगर्भीय हलचल वाले क्षेत्रो में सभी भवन निर्माण गतिविधियों पर रोक लगे। - डिपार्टमेंट आफ लैंडस्केप आर्किटेक्चर, स्कूल आफ प्लानिंग एण्ड आर्किटेक्चर, दिल्ली।

उत्तराखण्ड के आपदा प्रबन्धन पर फिर सवालिया निशान - डा॰ विशेष गुप्ता

उत्तराखण्ड के भूगोल का इतिहास बताता है कि वहाँ प्रकृति की इस विनाशलीला का यह महामंजर पहली बार देखने को मिला है। हालीय स्थितियाँ बतातीं है कि वहाँ अब तक हजारों लोग इस जल प्रलय के चलते मारे जा चुके हैं तथा हजारों अभी भी लापता हैं। हो सकता है वहाँ का प्रशासन अब सभी लापता लोगों को मृत घोषित कर दे। परन्तु अभी भी हजारों दुखित परिजन अपनों की खोज में इधर-उधर भटक रहें हैं। उत्तराखण्ड में दोबारा बारिश के शुरु हो जाने से राहत कार्य कमजोर हो रहा है। मलबे में शवों के दबे होने से महामारी फैलने का अंदेशा हो रहा है। ऐसा अनुमान है कि 15-17 जून के वक्त पूरे उत्तराखण्ड के चारों धाम में लगभग दो लाख से भी ज्यादा तीर्थ यात्री वहाँ मौजूद थे। हालात बता रहें हैं कि जिस समय पत्थर और कीचड़ के साथ यह सैलाब आया उस समय पूरे उत्तराखण्ड में लाखों लोग जहाँ-तहाँ फंस चुके थे। स्थितियाँ यह भी गवाही दे रही हैं कि उत्तराखण्ड में हालात यह जल सैलाब आते ही बेकाबू हो गये थे। अनेक जगहों से संपर्क पूरी तरह से टूट चुका था। बचाव और राहत कार्यों के लिए सेना को बुलाना सरकार की मजबूरी बन गयी थी। इसलिए आपदा की इस घड़ी में आई॰टी॰बी॰पी॰ फोर्स तथा सेना के बहादुर जवानों को इस राहत कार्य में दिये गये सक्रिय सहयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा होनी चाहिए। हजारों सरकारी व गैर सरकारी हाथ उत्तराखण्ड में राहत के लिए उठे तो हैं परन्तु अभी भी वहाँ के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सही बात यह है कि उत्तराखण्ड की बारिश और इस भूस्खलन ने देश में तेजी से बढ़ रहे उपभोक्तावाद और आपदा प्रबंधन की तैयारियों की पोल खोल कर रख दी है। ऐसा नहीं है कि उत्तराखण्ड में पिछले सालों में बारिश नहीं हुयी। हाँ, इतना जरुर है कि इस बार समय से पूर्व आये मानसून ने कुछ ज्यादा ही तबाही मचायी है। परन्तु लगता ऐसा है कि हमने प्रकृति की पुरानी विनाशलीलाओं से कोई भी सबक नहीं सीखा है। आँकड़े बताते हैं कि देश को प्रति वर्ष जीडीपी का दो फीसदी तथा राजस्व का 12 फीसदी नुकसान इन प्राकृतिक आपदाओं की वजह से उठाना पड़ता है। पिछले दो दशकों के आँकड़े यह भी बताते हैं कि बाढ़ अनेक प्राकृतिक आपदाओं में सबसे बड़ी आपदा बनकर सामने आती है। दरअसल हिमालय क्षेत्र भी इन प्राकृतिक आपदाओं से अछूता नहीं रह गया है। लगता है कि अब वहाँ भी इनकी मारक क्षमता दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे मानव के बढ़ते हस्तक्षेप एवं वनो की अंधाधुंध कटाई, विद्युत परियोजनाओं, होटल व धर्मशालाओं के मनमाने तरीकें से निर्माण इत्यादि को इस आपदा की मुख्य वजह मान रहे हैं। इस प्रकार की आपदा अब साफ संकेत दे रही है कि कहीं न कहीं मानव और प्रकृति के बीच का संतुलन लगातार गड़बड़ा रहा है।
यह सच्चाई है कि तमाम आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। परन्तु इतना अवश्य है कि इस प्रकार की आपदाओं के घटित होने के बाद देश के श्रेष्ठ आपदा प्रबंधन के द्वारा इनके नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट भी हमें ध्यान देने की महती आवश्यकता है जिसमें कहा गया है कि अगर समय रहते हम नहीं चेते तो धरती के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से तेजी से होते जलवायु परिवर्तन की घातक मार से हम बच नहीं सकते। हमारे देश में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन का भारी भरकम तंत्र मौजूद है। सन् 2005 में आपदा प्रबंधन पर राष्ट्रीय नीति का निर्माण भी किया गया। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन का यह संस्थात्मक रचना तंत्र तथा आपदा प्रबंधन के अधिनियम के साथ में इसका प्रबंधकीय ढांचा केन्द्रीय सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार से लेकर जनपद स्तर तक विस्तारित है जिसमें आपदा के बाद बचाव, इसके नुकसान की भरपाई तथा इसके पश्चात फिर से आपदा पूर्व की तैयारी शुरु कर दी जाती है। इस आपदा प्रबंधन तंत्र पर वर्ष में करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं। परन्तु फिर भी केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के इतने बड़े आपदा प्रबंधन के सामने उत्तराखण्ड जैसी आपदायें राष्ट्रीय लाचारी का आइना दिखाती साफ नजर आती हैं। वह केवल इसलिए कि हम परमाणु शक्ति सम्पन्न देश होने का दम तो भरते हैं, परन्तु राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की कुशल रणनीति निर्माण एवं उसके कार्यान्वयन में हम कछुआ चाल से चल रहे हैं। आपदाओं पर बड़ी-बड़ी बहस एवं उनसे जुड़ी सैद्धान्तिक रणनीति बनाने में तो हम माहिर हैं। परन्तु व्यावहारिक स्तर हादसों से प्रभावी रूप से निपटने में हम अभी सफल नहीं हो पा रहे हैं। वह इसलिए कि राष्ट्र के आपदा प्रबंधन तंत्र पर भी राजनीतिक जंग लगनी शुरू हो गयी है। आपदा से जुड़े विशेषज्ञों की भी हमारे पास कमी है। हम कोई ऐसी टीम भी गठित नहीं कर पा रहे हैं जो समय-समय पर आने वाली आपदाओं का जायजा लेकर उनसे जुड़ी रणनीति भी तैयार करके उसे आपदाओं के समय कार्यान्वित कर सकें।
गहराई से विचार करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि आपदाओं से जुड़े खतरे हमेशा आस-पास की परिस्थिति से जोखिम को ओर बढ़ाते हैं। कहना न होगा कि आपदाओं के लिए उसके चारों ओर की परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं। इन परिस्थितियों की हम हमेशा अनदेखी करते रहते हैं। उत्तराखण्ड की जल प्रलय से जुड़ी आपदा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम अपनी बढ़ती हुयी आबादी के प्रभाव तथा अपने भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े खतरों को लगातार नजर अन्दाज करते रहे हैं। इस सच को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि यदि हम अपने भूगोल के प्रति वफादार होते तथा समय रहते इस प्राकृतिक आपदा से निबटने के पुख्ता इंतजाम होते तो निश्चित ही इतने बड़े हादसे को टाला जा सकता था।
कहा जा रहा है कि उत्तराखण्ड के प्रभावित ढ़ाँचे को खड़ा करने में अभी सालों का समय लगेगा। हो सकता है कि प्रदेश को संसाधनों की कमी से जूझना पड़े। इलाके में हुए बड़े नुकसान का प्रभाव एन॰सी॰आर॰ तथा दिल्ली तक की अर्थव्यवस्था पर भी दिखायी दे। हो सकता है कि इसके साथ-साथ उससे जुड़े पर्यावरणीय दुष्परिणामों का सामना भी वहाँ के लोगों को करना पड़े। परन्तु इतना अवश्य है कि भविष्य में इस प्रकार के हादसों में वृद्धि होने से इन्कार नहीं किया जा सकता। कड़वी सच्चाई यह है कि देश में तकनीकी विशेषज्ञों की भीड़ जितनी तेजी से बढ़ रही है, उसी अनुपात में कार्य संस्कृति में गिरावट भी लगातार बढ़ रही है। हमारी लाभोन्मुख प्रवृति हमारी प्रतिबद्धता को कमजोर कर रही है। तात्कालिक लाभ मिलने का दृष्टिकोण हमारी दूरदर्शिता को कमजोर बना रहा है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भौतिक प्रगति के इस कालखण्ड में विकास के साथ-साथ  हादसों की भी संभावनाऐं बढ़ीं हैं। परन्तु इन हादसों से निपटने की पूर्व तैयारी तथा आपदाओं के पश्चात का समयबद्ध आपदा प्रबंधन तंत्र इस प्रकार की आपदाओं के प्रभाव को कम करने में कारगर सिद्ध तो हो ही सकता है।
ऐसी आपदा के समय में हमें गाँधी जी के शब्दों का स्मरण करना चाहिए जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि ‘‘इस पृथ्वी के पास प्रत्येक व्यक्ति की मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी कुछ मौजूद है, मगर यह किसी के लालच पूरा नहीं कर सकती‘‘। ध्यान रहे विलासितापूर्ण जीवन से बचाव के साथ-साथ हमें प्रकृति का संरक्षण करते हुए उससे अपना दोस्ताना रिश्ता भी कायम करना होगा। तभी हम प्रकृति के ऐसे असामयिक और तीव्र प्रकोप से बच सकते हैं। - एसोसियेट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, महाराजा हरीशचन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरादाबाद।

सहायता को बढ़े हाथ - रंजीत सिंह ‘ज्याला’

उत्तराखण्ड में पिछले कुछ वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ा है। यहां 1991 में विनाशकारी भूकम्प आया, जिसमें उत्तरकाशी के भटवाड़ी विकास खण्ड के 60 गांवों में से लगभग 30 गांव तबाह हो गये और टिहरी जिले के भी कुछ गांव प्रभावित हुए तथा जन-धन की अकल्पनीय हानि हुई, परन्तु पूरा देश इस विपदा में उत्तराखण्ड के साथ खड़ा हो गया। आपदा पीडि़तों की तात्कालिक सहायता हेतु अनेक संस्थायें आगे आयीं और हर सम्भव मदद की। विभीषिका में तात्कालिक राहत पीडि़तों को सुरक्षित निकालना, चिकित्सा, भोजन और सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने के बाद असली चुनौती आती है, उनके पुर्नवास और रोजगार की तथा अनाथ हो गये बच्चों के भरण-पोषण, संरक्षण और शिक्षण व्यवस्था की।
1991 के भूकम्प की भयानक तबाही के तत्काल बाद जागरूक समाज ने उत्तराखण्ड की प्राकृतिक त्रासदी में मदद और उसके दुष्परिणामों से निपटने के लिए ‘उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति’’ का गठन कर तात्कालिक रूप से डेढ़ करोड़ आर्थिक मदद के साथ ही दीर्घकालिक सेवा योजना बनायी और भटवाड़ी विकास खण्ड के ध्वस्त हुए 30 गांवों में से 10 गावों में 427 भूकम्परोधी भवन बनाये और भूकम्प पीडि़त परिवारों के बच्चों की शिक्षा के लिए तीन छात्रावास स्थापित किए गये। उत्तरकाशी जिले के मनेरी सेवा केन्द्र पर 80, लक्षेश्वर में 72 और यमुना घाटी के नेकवाड़ छात्रावास में 40 सुदूर गांवों के 54 कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों के भोजन, आवास, एवं शिक्षण की व्यवस्थायें की गईं हैं।
इस वर्ष 14 जून से ही भगीरथी, मन्दाकिनी, अलकनन्दा व उनकी सहायक नदियों ने भयानक रूप ले लिया था जो 16-17 जून को भयंकर त्रासदी में बदल गया। अभी उत्तराखण्ड सरकार जागी भी नहीं थी, लेकिन ‘‘उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति’’ के कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रो में सहयाता के लिए तत्काल पहुंच गये। प्रेम बड़ाकोटी उत्तरकाशी पहुँचे और गंगोत्री मार्ग पर पीडि़तों के लिए ‘‘मनेरी सेवा केन्द्र’’ पर निशुल्क भोजन, आवास व्यवस्था प्रारम्भ की, जहां अब तक 10 हजार लोगों को रात्रि विश्राम तथा 8750 लोगों को भोजन की व्यवस्था की गई तथा 15 हजार यात्रियों को उनके घर सुरक्षित भेजा गया।
गंगोत्री से उत्तरकाशी तक 100 किमी मार्ग टूट जाने के कारण संस्था के दो प्रमुख कार्यकर्ता हरीश सेमवाल व गोपाल सिंह गंगोत्री से उत्तरकाशी तक पीडि़तों की सहायता हेतु उनके साथ ही 100 किमी पैदल चलकर आये।
गंगोत्री, केदारनाथ एवं बद्रीनाथ क्षेत्र में फंसे लोगों की सहायता हेतु युद्धस्तर पर सहायता कार्य प्रारम्भ किया गया, जिसमें लगभग 5 हजार कार्यकर्ताओं ने रात-दिन लग कर अथक परिश्रम किया। इस हेतु सर्वप्रथम एक मुख्य सूचना एवं सहायता केन्द्र, 10 कान्वेन्ट रोड देहरादून में प्रारम्भ किया गया तथा अन्य क्षेत्रों में सहायता हेतु 1. हरिद्वार,  2. ऋषीकेश, 3. चम्बा, 4. मनेरी, 5.उत्तरकाशी, 6. घनशाली, 7. रूद्रप्रयाग, 8. फाटा तथा      9. श्रीनगर सहित 15 स्थानों पर सेवा केन्द्र स्थापित किए गये, जहां से तत्काल सूचना एवं सहायता हेतु संपर्क नम्बर घोषित किए गये और पीडि़तो के आवास, भोजन, चिकित्सा एवं उनको घर तक भेजने में सहयोग की व्यवस्था की गई, जो अभी तक जारी है।
इसके अतिरिक्त जहां-जहां मार्ग खुलते जा रहे हैं, वहां-वहां स्थानीय पीडि़त गावों में सम्पर्क कर उनके लिए राशन व आवश्यक सामान भेजा जा रहा है तथा इसके साथ ही दीर्घकालिक सेवा हेतु सर्वेक्षण का कार्य किया जा रहा है। लोक भारती भी इस कार्य में सहभागी बनेगी।

Tuesday, March 25, 2014

अब सधे कदमों की दरकार है। - डा॰ दाताराम पुरोहित

उत्तराखण्ड की आपदा के बाद हमें ऐसी रणनीति अपनानी होगी जिससे क्षेत्र के तबाह हो गये रोजगारों व यहां की अर्थव्यवस्था का पुनर्निमाण किया जा सके। दूसरा यहां के लोगों के बीच जकड़ गई असुरक्षा की भावना को दूर करना होगा। आधारभूत सुविधायें सड़क, संचार, बिजली, अस्पताल एवं स्कूल आदि सुव्यवस्थित करने के साथ ही सरकार को हिमांचल सरकार की तरह एग्रो आधारित बिजनेस को वरीयता देनी होगी। हमें ऐसी रणनीति अपनानी होगी ताकि कृषि, बागवानी, पशुपालन और औषधीय जड़ी-बूटियों से रोजगार उत्पन्न हो सके।
उत्तराखण्ड में चारधाम यात्रा का राष्ट्रीय महत्व है और इस आपदा में वही क्षेत्र विशेष प्रभावित हुए है। अतः भविष्य में चारधाम यात्रा को खतरा मुक्त बनाने आवश्यक है और इस हेतु निम्न सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए।
  • वैकल्पिक मोटर रोड का निर्माण किया जाये, जिससे यदि किसी आपदा में एक मार्ग बाधित हो दूसरे मार्ग का उपयोग किया जा सके।
  • वैकल्पिक पगडण्डी या खच्चर मार्गों को पुनर्जीवित व नये मार्गों का निर्माण किया जाना चाहिए। क्योंकि यदि चैमासी केदारनाथ और तौसी, रामबाड़ा टेक बाढ़ के दौरान काम कर रहे होते तो सुविधा होती। यही बात गंगोत्री, यमुनोत्री और बद्रीनाथ पर लागू होती है।
  • जहाँ पुल बह गये हैं या नये पुलो का निर्माण हो वहाँ पर उनकी ऊँचाई बढ़ाई जाये जिससे बाढ़ की विभीषिका में वह सुरक्षित रहें। क्योंकि 1970 की बाढ़ में अलकनन्दा पर बने सभी पुल बह गये थे, उनके पुनः निर्माण के समय ऊंचाई नहीं बढ़ाई गई, जिसके परिणाम स्वरूप वह सब पुल पुनः बाढ़ में बह गये।
  • बरसात के दिनों में खाद्यान्न व जरूरी चीजों का अतिरिक्त भण्डारण किया जाना चाहिए, जिससे आपदा के समय भोजन आदि जरूरी चीजों का संकट न पैदा हो।
  • स्थानीय कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि भोजन, सब्जी और फलों की आपूर्ति के लिए नीचे के क्षेत्रों पर निर्भर न रहना पड़े। - हिमालयी सरोकारों के चिन्तक व गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है।

विनाश का माडल - एम॰सी॰ मेहता

उत्तराखण्ड या दूसरे पहाड़ी राज्यों में प्राकृतिक आपदा का आना अस्वभाविक बात नहीं है, लेकिन जिस तरह केदारनाथ और बद्रीनाथ में प्रकृति का रौद्र रूप देखने-सुनने को मिला वह हमारी चिन्ता को बढ़ाता है। यह चिन्ता इसलिए कहीं अधिक है, क्योंकि यह प्रकृति से कहीं ज्यादा मानवीय आपदा है, जो दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। ऐसी आपदायें भविष्य में और बढ़ें तो कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि हमारी सरकार ने जो विकास का माडल चुना है, वह विकास का नहीं विनाश का है। वन क्षेत्र में चलती अन्धाधुन्ध आरी, पहाड़ों पर बढ़ती होटलों की संख्या, नदियों के बहाव क्षेत्र का अतिक्रमण करके बस्तियों की बसावट आपदाओं को आमन्त्रित करती है। विकास के नाम पर नियमों को ताक पर रखकर दुकानें और भवन खड़े किए जा रहे हैं और बड़ी कारपोरेट कंपनियों को प्राकृतिक संपदा दोहन की खुली छूट दी जा रही है। तीर्थ स्थलों को पर्यटक स्थल के रूप में तब्दील कर दिया गया है और इसे पर्वतीय राज्य के विकास का नया आर्थिक आधार बताया जा रहा है। सरकार हर साल संख्या बढ़ाने का प्रचार करती है, लेकिन यह सब करते हुए वह विशेषज्ञों के सुझावों को भूल जाती है कि इस तरह के कार्यों से राज्य में नई आपदाओं का आगमन होगा, जिसका कई गुना ज्यादा खामियाजा भुगतना होगा और वास्तव में यही सब हो भी रहा है।
उदाहरण के तौर पर उत्तराखण्ड की आबादी करीब एक करोड़ है, लेकिन करीब दो करोड़ लोग बतौर पर्यटन यहां आते हैं, जो अपने पीछे गंदगी का अम्बार छोड़ जाते हैं, जिसकी साफ-सफाई की व्यवस्था शायद ही की जाती है, जिससे प्राकृतिक असन्तुलन बढ रहा है।
ऊर्जा उत्पादन के नाम पर बांधों और पनबिजली परियोजनाओं की बाढ़ सी आ गई है, लेकिन पर्यावरण मन्त्रालय को इसमें कोई खामी नजर नहीं आती। यह मन्त्रालय प्रधानमन्त्री कार्यालय के इशारे पर काम करता है और कोई भी निर्णय सरकार के हित और इच्छा के अनुरूप करता है। भारत एवं विश्व के तमाम विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद बार-बार अग्रह करते रहते है, कि उत्तराखण्ड का पहाड़ कच्चा है और यह अधिक भार वहन करने के योग्य नही है, लेकिन इस सुझावों को लगातार अनसुना किया जा रहा है।
उत्तराखण्ड की तबाही के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अखिरकार इसके लिए जिम्मेदार कौन है? राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण और राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण का अध्यक्ष होने के नाते प्रधानमन्त्री की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसकी निगरानी करें और समुचित कदम उठायें, लेकिन उत्तराखण्ड में 2007 से आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण गठित होने के बाबजूद आज तक इसकी एक भी बैठक नहीं हुई। न ही इस दिशा में केन्द्र ने कोई दिशानिर्देश दिये।
जब मौसम विभाग ने 16 जून को भारी बारिश के आसार जताये थे, तो तीर्थ यात्रियों को रोका क्यों नहीं गया? इसका दोषी कौन है? निश्चित रूप से यह प्रधानमन्त्री की सीधे-सीधे जिम्मेदारी थी, जिसका निर्वाह करने में वह विफल रहे। राज्य सरकार भी बराबर की दोषी है, जिसके लिए न तो पीएम ने और न राज्य सरकार ने त्रासदी के शिकार लोगों के परिजनों से माफी माँगी है।
मेरा मानना है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा की भांति सीमित संख्या में लोगों को अनुमति दी जाय और बाकायदा उनका चिकित्सीय परीक्षण भी किया जाए तथा उसी तरह बाकी तीर्थ स्थलों के लिए भी नीति बनाई जानी चाहिए।
यह सही है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का चक्र अनियमित हुआ है और प्राकृतिक आपदाओं की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन केदारनाथ और बद्रीनाथ में जो कुछ हुआ है उसके लिए सरकार अधिक जिम्मेदार है।
हमने गंगा को राष्ट्रीय नदी तो घोषित कर दिया है लेकिन बांध बनाकर गला दबाने का काम भी कर रहे हैं, उन्हे न तो पहाड़ों की चिन्ता है ओर न नदियों की और न ही राज्य और देश की जनभावनाओं की। आम लोगों के विरोध को दबा दिया जाता है और विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की बात को अनसुना कर दिया जाता है और तबाही होने पर इसे प्राकृतिक आपदा का नाम दे दिया जाता है। टिहरी बांध को लेकर कहा जा रहा है कि  यदि किसी कारण से यह टूटा तो न केवल उत्तराखण्ड अपितु दिल्ली को भी डूबने से कोई नहीं बचा पायेगा। पर इस सब पर चिन्ता करने के लिए सरकार के पास समय कहां है? शायद हम किसी और बड़ी तबाही के इन्तजार में है। - लेखक प्रख्यात पर्यावरविद् और मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित हैं।

पहाड़ पर प्रलय - मनोज द्विवेदी

सिसकते लोग, हताहत परिजनों की पथराई आंखें, मदद मांगते हाथों की बेबसी, बहुखण्डी इमारतों और गाडि़यों का तिनके की माफिक जल प्रलय में बह जाने की तस्वीरें समूचे सभ्य समाज को विचलित कर रही हैं। बिलखते, सिसकते सैकड़ों लोगों का कोई न कोई अब तक इस भयानक त्रासदी में लापता है या या फिर हमेशा के लिए इस दुनियाँ को छोड़ कर चला गया है। आखिर इस मातम को क्या नाम दें? इसके साथ ही यह स्थिति जो सवाल पैदा करती है, उसके जबाब किसी के पास नहीं हैं और अन्ततः यह स्थिति पूरी व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर देती है।
दरअसल विकास की अंधी दौड़ में हम सब इतना खो गये हैं कि हमने कुदरत के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। अपनी जरूरत पूरी करने के लिए प्राकृतिक संपदा का आवश्यकता से अधिक दोहन कर रहे हैं और जंगलो को उजाड़ कर इमारतें खड़ी कर रहे हैं। नदियों को उनके स्वाभाविक प्रवाह से विमुख कर रहे हैं, उन्हें अवरूद्ध कर रहे हैं। इसका खामियाजा सुनामी और  विहार की बाढ़ में हम भुगत चुके हैं। फिर भी हम लालची प्रवृत्ति पर कोई रोक नहीं लग रही, उल्टे बढ़ोत्तरी ही हो रही है। विकास और आर्थिक प्रगति के नाम पर मुनाफा कमाने की लूट मची हुई है। दरअसल पहाड़ी शहरों और कस्बों का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। नदियों के एक दम किनारे तक बहुमंजिला इमारतें, होटल, लाज और रिसोर्ट बनाये जा रहे हैं। साथ ही नदियों में बालू निकालने के लिए अवैध खनन कार्य अलग से चलता रहता है। ‘पर्यटन विकास’ के नाम पर पहाड़ों का लगातार खोखला किया जा रहा है।
अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि मीडि़या की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बनाई गई तीन सौ से अधिक बहुमंजिला इमारतें, होटल व अन्य व्यावसायिक भवन बाढ़ में बह गये या क्षतिग्रस्त  हो गये। ये इमारतें नदियों के बहुत किनारे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में गैरकानूनी तरीके से बनाई गई थीं, जो पहाड़ों पर यह स्थिति आम हो गई है; यह छोटा सा उदाहरण भर है।
पर सबाल उठता है कि यहां प्राकृतिक आपदा क्या पहली बार आयी है? क्या बादलों का फटना, पहाड़ो का खिसकना, बाढ़ का आना यहां के लिए अजूबा है?  बिल्कुल नहीं। तो सवाल उठता है कि क्यों नही आपदा से निपटने की समुचित व्यवस्था अबतक की गई। क्यों आज भी इन्सान आदिम सभ्यता के मानव की भांति प्रकृति के सम्मुख बेबस और लाचार है? पिछले दो सौ सत्तर वर्षों में जिस भारतीय उपमहाद्वीप ने दुनियाँ में आये तेईस सबसे बडे़ समुद्री तूफानो में से इक्कीस की मार झेली हो और ये तूफान भारत में 6 लाख जानें लेकर शान्त हुए हों, जिस मुल्क की उन्सठ फीसदी जमीन कभी भी थरथरा सकती हो और पिछले अठारह सालों में आये सबसे बड़े भूकम्पों में जहां 24 हजार से अधिक लोग जान गवां चुके हों, वहां आपदा प्रबन्धन तन्त्र का कोई माई-बाप न होना आपराधिक लापरवाही है।
प्राकृतिक आपदाओं का हल प्रकृति के असीमित संसाधनों में ही खोजा जा सकता है। प्रकृति को माता समझ कर उसके योगिक पदार्थों की खोज, शोधन या उपयोग की बात सोचनी चाहिए। प्रकृति को जननी मानकर सभी धारणाओं में परिमार्जन हो और ऐसी अवधारणाओं को त्यागना चाहिए जो प्रकृति के सिद्धान्तों के विपरीत हों। प्रकृति के वात्सल्य को हम अनुभव नहीं कर पाते। प्रकृति की गोद हमारी माता की गोद की तरह सुरक्षित तथा आनन्ददायक है, इसके ममत्व का सुख उठाया जाये।

प्रकृति से छेड़छाड़़ विनाशक - दिनेश रावत

हम इस प्रकृति से जुड़े हैं, जिसे रोज अनुभव करते हैं, जो कभी हमें अपने सौंदर्य से लुभाती है तो कभी अपने रौद्र रूप से भयभीत भी करती है। प्रकृति के बारे में कहा जाता हे कि वह न तो किसी पर दया करती है और न किसी से दया की उम्मीद करती है, क्योंकि प्रकृति निरपेक्ष है। हर हाल में अन्ततः जीत प्रकृति की ही होती है, क्योंकि वह अजेय है। यही बजह है कि मानव ने प्रकृति की अकल्पनीय शक्ति को अच्छी तरह समझा  और उसके सामने नतमस्तक हो गया। उसी दौर में प्रकृति के विभिन्न रूपों को उसने पूजना शुरू किया और पराशक्ति के रूप में उसने ईश्वर की खोज की जो प्रकृति के समस्त क्रियाकलापों को संचालित करता है।
हाल ही में उत्तराखण्ड में प्रकृति का जो विनाशक रूप दिखा, उसे आम तौर पर ‘कुदरत’ का ‘कहर’ कहा जारहा है। लेकिन अगर जानकारों और पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो विनाश के इस ताण्डव के पीछे सिर्फ प्रकृति ही जिम्मेदार नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ कुदरत के साथ मानवीय खिलवाड़ है, प्रकृति के साथ अनावश्यक हस्तक्षेप है। जिस तरह पिछले कुछ दशकों से पहाड़ों के विकास के नाम पर अन्धाधुन्ध छेड़खानी हुई है, उसका हश्र इस विनाश में होना स्वाभाविक-सा था। जिस तरह नदियों के तटों पर इमारते बनाकर नदियों के स्वाभाविक रास्तों को रोक दिया गया या रोका जा रहा है। जिस तरह  संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में दर्जनो बांध बने हैं और बनाये जा रहे हैं, जिस तरह हर साल वहां पर्यटकों का दबाव बढ़ रहा है, विविध विकास कार्यों के लिए पहाड़ को छलनी किया जा रहा है और अन्धाधुन्ध खनन किया जा रहा है, जिस तरह अनियोजित, अनियन्त्रित शहरी करण बढ़ रहा है, जिस तरह लगातार वन क्षेत्र घट रहा है, जिस तरह वहां दौडती गाडि़यों की संख्या हजारों से बढ़ कर लाखों में हो रही है- ऐसी तमाम परिस्थितियों में अतिवृष्टि, बादल फटना, भू-स्खलन, बाढ़ और भूकम्प जैसी घटनाओं का बढ़ना स्वभाविक ही है। पिछले दो दशकों में जिस तरह उŸाराखण्ड में भू-स्खलनों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है, उससे साफ है कि पहाड़ अब और अधिक छेड़खानी सहने की स्थिति में नहीं है। अतः अब इसे इको सेन्सटिव जोन घोषित करने की जरूरत है।
उŸाराखण्ड में जो भयावह रूप दिखा और जिसे हिमालयन सुनामी कहा जा रहा है, उसके पीछे सबसे बड़ा हाथ मूसलाधार वर्षा या ‘क्लाउड वसर्ट’ या जिसे बादल फटना कहते हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार बादल फटने की घटना अप्रत्याशित, आकस्मिक व डुवो देने बाली वर्षा होती है। ऐसी वारिश कुछ मिनटों या कुछ घंटों तक होती है और इस दौरान बड़ी-बड़ी बूंदों बाली 5 इन्च या 13 सेमी से भी अधिक बारिश हो जाती है। इस प्रकार की वारिश का पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल होता है।
भारी वर्षा में यूं तो पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन आम बात है, लेकिन इस बार का भू-स्खलन अप्रत्याशित, अकल्पनीय व भयावह था। उत्तराखण्ड में नदियों के किनारे जो इमारतें बन रही हैं, विजलीघर बनाने के लिए जो सुरगें बन रही हैं या बनाई जा रही हैं, उन सब का मलवा पहाड़ की ढ़लान पर ड़ाल दिया जाता है, जो बर्षा के साथ भूस्खलन का कारण बनता है और पानी के साथ मिलकर भारी तबाही लाता है। मलबे का यह सैलाब पेड़ों, घरों, गाडि़यों, बड़ी-बड़ी चट्टानों और जो कुछ इसके मार्ग में पड़ता है उसे बहाकर ले जाता है और मार्ग में पड़ने बाली सहायक नदियों में गिराकर उसका रास्ता रोक देता है, जिससे बाढ़ और भयावह रूप ले कर, कभी-कभी बड़े बांध टूटने का भी कारण बनती है।
हिमालय क्षेत्र भूगर्भीय फाल्ट जोन में आता है, इसलिए भूकम्प की दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है। अतः पर्यावरण की परवाह किये बिना किया जा रहा विकास इस समूचे क्षेत्र के जन-जीवन के लिए खतरनाक है। उत्तराखण्ड की यह ताजा तबाही एक चेतावनी है, संभलने की, सीख लेने की। यदि वक्त रहते पहाड़ों व उसके पर्यावरण पर ध्यान नही दिया गया तो आने बाले वक्त में न जाने कितनी ऐसी ही घटनाओं को हमें झेलना पड़ेगा, जिसके जुम्मेदार हम खुद होगे।

कुदरत को छेड़े बिना आगे की राह तलाशनी होगी। - शेखर प्रियदर्शी

कुदरत से छेड़छाड़ का नतीजा क्या होता है, यह हमने देवभूमि में हुई विनाश लीला में देख लिया। देव भूमि की त्रासदी सिर्फ और सिर्फ मानव निर्मित है।
इस त्रासदी के कुछ दिन पूर्व ही मुझे सपरिवार केदारनाथ और बद्र्रीविशाल के दर्शन का सौभाग्य मिला और उस यात्रा के दौरान मैने जो कुछ भी देखा-समझा वह आशंका इतनी जल्दी प्रलयंकारी रूप में सामने आयेगी इसका हमें कतई आभास नहीं था।
नदियों के किनारे बेरोकटोक अवैद्य निर्माण, खनन, खनन के लिए हरे-भरे जंगलों की कटाई, सड़कों और टैनल बनाने के लिए विस्फोटों का अन्धाधुन्ध उपयोग और पनविजली लगाने की बेतहाशा होड़ की परिणति ही यह तबाही है। इसे हम अपने तरीके से प्रकृति का प्रतिशोध भी कह सकते हैं। अब हमारे लिए यह निहायत जरूरी हो जाता है कि आगे के लिए हम सचेत होकर प्रकृति के साथ पूरी तरह सामंजस्य बिठाते हुए कदम दर कदम बढ़ायें।
हमें हर हाल में अपने तीर्थ स्थनों के व्यावसायी करण को रोकना और वहां जाने बाली संख्या को  नियन्त्रित करना होगा। विकास की वर्तमान अवधारणा का पुनर्विचार करते हुए बेतहासा बन रही विद्युत परियोजनाओं का भी वैज्ञानिक अध्यन करते हुए  उन पर रोक लगानी होगी। नदियों के किनारे बन रहे होटलों, गेस्टहाउसों आदि को रोकना जरूरी हो जाता है, क्योंकि इनके द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण, कचड़ा, पालीथीन आदि पहाड़ों के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं।
पेड़ों की कटान एवं विस्फोटों को रोकना,उत्तराखण्ड की परिस्थितिकी के अनुकूल बनों को बढ़ाना, भवन निर्माण की स्थानीय शैली, गैर पारम्परिक ऊर्जा जैसे सौर, पवन आदि स्रोतों को प्रोत्साहित करना तथा जलवायु के अनुरूप कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन, जिससे स्थानीय नगरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इसके साथ ही शिक्षा के पाठ्यक्रम में प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने और आपदा प्रबन्धन को जोड़ना भविष्य के लिए हितकर होगा।
- लेखक लोक भारती के कार्यकर्ता हैं।

यदि नहीं चेते तो हराती रहेगी आपदा - रण विजय सिंह


उत्तराखण्ड में आई प्राकृतिक आपदा ने सभी को झकझोर दिया है। ऐसे में कई सवाल बनते हैं; क्या पहाड़ में आपदा ऐसे ही आती रहेगी? क्या इसे रोका नहीं जा सकता था? कहां चूक हो रही है? अति संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में आपदा की स्थिति में तत्काल बचाव और राहत कार्य प्रभावी ढ़ंग से चलाने के लिए कौन-कौन से उपाय किए जाएँ? क्या पांच हिमालयी राज्यों के लिए एक समग्र व समन्वित राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई जानी चाहिए, जिसके तहत ही पहाड़ों की पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाते हुए जरूरी और नियोजित विकास के साथ राज्य के नागरिकों को खुशहाल किया जा सके? और इस राष्ट्रीय नीति की कमान सीधे केन्द्र के अधिकार में न दे दी जाय ताकि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के अहं सवालों पर राज्यों की मनमानी न चल सके, उसकी नीतियों में समरूपता और समान सरोकार हो? अति संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में जवाबदेह व त्वरित आपदा प्रबन्धन के लिए कैसे उपाय होने चाहिए?
जाहिर है कि यह सवाल अति संवेदनशीलता की अपेक्षा करते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के संरक्षण और वहां के निवासियों से जुड़े मसलों पर राजनीति से ऊपर उठ कर फैसला लेना होगा। जरूरत ठोस नीति बनाने की है अन्यथा हमें आये दिन इसी तरह की प्राकृतिक आपदाओं से दो-चार होना पड़ेगा। हिमालय क्षेत्र सबसे युवा और नाजुक है। सरकारी आँकड़ों पर यकीन करें तो यहां के पहाड़ में कटाव और मिट्टी के बहाव का प्रतिशत 10 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष है, जबकि चार मीट्रिक टन तक कटान को ही खतरनाक माना जाता है। विकास के नाम पर जंगल काटे जा रहे हैं, बहुमंजिली इमारते और होटल बन रहे हैं। नदियों से रेत और बजरी तेजी से निकाली जा रही है, जिससे पहाड़ और नंगे व कमजोर हो रहे हैं। हमें याद है कि जंगल माफियाओं के खिलाफ समाजसेवी सुन्दरलाल बहुगुणा ने ‘चिपको आन्दोलन’ चलाया था। इसके पीछे पहाड़ को बचाने और पर्यावरण सन्तुलन की सोच थी। किन्तु उŸाराखण्ड बनने के बाद पिछले 12 वर्षों में जिस तरह पहाड़ों का दोहन हुआ, ताजा आपदा उसी का खामियाजा है।
एक सरकारी रिर्पोट के अनुसार पहाड़ के लगभग 233 गांव मौत के मुहाने पर खड़े हैं। इतना ही नहीं, गंगोत्री से लेकरउत्तरकाशी के करीब 150 किमी क्षेत्र को इको सेंसेसिटिव जोन करने का फैसला हुआ था। इस दिशा में उत्तराखण्ड सरकार ने अपने आर्थिक अधिकार प्रभावित होने के ड़र से इस पर अमल नहीं होने दिया। नतीजा यह है कि अनियोजित विकास और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से ग्लैशियर टूट रहे हैं। विशेषज्ञों का मत है कि केदारनाथ धाम का धौराबाड़ी ग्लैशियर भी जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर हो गया था और बादल फटने से केदारनाथ क्षेत्र पूरी तरह तहस-नहस हो गया। अलकनन्दा नदी के रौद्र रूप धारण करने के कारण ही रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, गोपेश्वर आदि में जानमाल का भारी नुकसान हुआ है। इसी तरह भीलांगना और भगीरथी नदियों में भी बाढ़ आयी थी किन्तु टिहरी डैम के कारण फिलहाल बड़ी त्रासदी होने से बच गई। अब सवाल उठने लगा है कि यदि टिहारी की तरह ही अलकनन्दा में भी बांध बंधे होते तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी न होती। फिलहाल यह तर्क पहाड़ की नदियों पर बांध निर्माण समर्थकों का है, परन्तु बड़ा वर्ग पर्यावरण की दुहाई देकर इसके खिलाफ है। किसी बड़ी त्रासदी के बाद इस तरह के किन्तु-परन्तु होते हैं। हमारी कोशिश उन अनछुए सवाल उठाने की है, जिनसे पहाड़ की विनाशलीला पर अंकुश लग सके।
पहाड़ों के अन्धाधुन्ध दोहन को रोकने, विकास की सुसंगठित नीति बनाने और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए जो रणनीति प्रबन्ध होने चाहिए थे, वह हुए ही नहीं। यदि नदियों के किनारे निर्माण प्रतिबन्धित होता तो इस प्राकृतिक आपदा के बावजूद जन-धन की इतनी हानि नहीं होती।
यह सच है कि पहाड़ी राज्यों का पर्यटन सबसे बड़ा उद्योग है, पर इस विनाश को देखते हुए परिस्थितियों की मांग है कि चारधाम के श्रद्धालुओं की संख्या सीमित करने के उपाय करने होगे और दूसरे यात्रा मार्गों पर यात्रियों की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर सहायता देने के लिए जगह-जगह चैकियाँ बनानी चाहिए। इस कार्य में आईटीबीपी के जवानों और स्थानीय लोगों की सेवायें ली जा सकती हैं ताकि किसी आपदा में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सके।
जलवायु परिवर्तन से होने वाली समस्याओं का समाधान राष्ट्रीय कार्यक्रम का अहं हिस्सा है। अतः केन्द्र सरकार को हिमालयी राज्यों के लिए केन्द्रीयकृत नीति बनानी चाहिए। साथ ही पहाड़ों के दोहन को रोकने के लिए ग्रीन बोनस तथा अति संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों को इको-सेन्सटिव जोन घोषित करना चाहिए।उत्तराखण्ड में बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटान, खुदाई और अनियोजित निर्माण के कारण ऐसी विकट स्थिति उत्पन्न हुई है। लिहाजा, पहाड़ की संतुलित पारिस्थितिकी के अनुकूल पेड़-पौधे लगाये जाने चाहिए, क्योंकि अभी वहां चीड़ के जंगल हैं। पर्यावरणविद् मानते हैं कि मैदानी क्षेत्रों से चलने वाली गर्म हवाओं को रोकने की क्षमता चीड़ के पत्तों में नहीं है। 

ये प्रलयंकारी दृश्य हमें चेतावनी दे रहे हैं - अवधेश कुमार

सबका एक ही स्वर। उत्तराखंड में जल प्रलय की ऐसी विनाशलीला कभी नहीं देखी गई। निस्संदेह, उत्तराखंड का दृश्य भयावह है, उसका बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है। न जाने कितने हजार लोग जलप्लावन में बह गए, कितने मकानों, दुकानों, वाहनों, जानवरों को जल की प्रलयंकारी धारा ने अपने में समाहित कर लिया इसकी पूरी गणना कभी संभव नहीं हो सकती। चारों ओर केवल बरबादी का आलम। एक दो नहीं हिमालय से निकलती लगभग सारी नदियांें मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी, गौरी, काली, कोशी, गंगा, यमुना की धाराएं इतनी विकराल हो गईं कि मनुष्य के नाते लोगांें के पास अपना सब कुछ स्वाहा होते और अपनोें को खोते देखने के अलावा कोई चारा ही नहीं रहा। जब समाचार चैनलों के माध्यम से आतीं तस्वीरें इतनी डरावनीं हंैं तो जिनके सामने वे घटित हुई होंगी उनकी दशा कैसी हुई होगी इसकी कल्पना करिए। पहाड़ काटकर बनाईं गईं सड़कें ऐसी तबाह हुई हैं कि बारिश थमने के बावजूद लोगों तक पहुंचना और उन्हें सड़क मार्ग से निकालना असंभव बना रहा। न जाने कितने स्थानों पर सड़के भयानक खाइयों में बदल चुकीं हैं। राज्य प्रशासन इसे यदि उत्तराखंड सुनामी का नाम दे रहा है तो इसे अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता है।
हालांकि भारत में बाढ़ का प्रकोप कोई नई बात नहीं है। स्वयं उत्तराखंड को इसकी भयावहता का अनुभव है। 2010 में ही उत्तरकाशी के बाढ़ ने भयानक विनाशलीला मचाई थी। पर इतने व्यापक पैमाने पर, एक साथ इतनी नदियों द्वारा विनाश के ऐसे दिल दहलाने वाले दृश्य कभी न देखे गए। जो लोग 16 जून के पूर्व केदारनाथ धाम से लौट आए होंगे वे यदि कुछ दिनों बाद वहांँ जाएं तो उनके लिए यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि यह उनकी श्रद्धा का वही केन्द्र है जहां वे पहले आ चुके हैं। मुख्य मंदिर को छोड़कर शेष हिस्से लगभग ध्वस्त हो चुके हैं। मंदिर भी क्षतिग्रस्त हुआ है। यहाँं दो तिहाई भवन ढहने के साथ ही गौरीकुंड व केदारनाथ के बीच यात्रा के प्रमुख पड़ाव रामबाड़ा का नामोनिशान मिट चुका है। ऐतिहासिक शंकराचार्य समाधि स्थल मलबे में दब चुका है। कहा जाता है कि इसको ठीक करने में कई साल लग सकते हैं।
उत्तराखंड भारत के पारिस्थितिकी, पर्यावरण संतुलन और संरक्षण का सर्वप्रमुख आधार तो है ही आध्यात्मिक परंपरा, सभ्यता-संस्कृति का मुख्य स्रोत और इसकी पहचान का प्रमुख क्षेत्र रहा है। हिमालय की गोद, उससे निकलती नदियांँ, पहाड़, वनस्पतियांँ, सदियों से साधकों, रचनाकारों का वास, चिंतन-मनन और लेखन का स्थल रहा है। हरिद्वार को तो केवल प्रवेश द्वार माना जाता है जहाँं से चार धाम की यात्रा आरम्भ होती है। इस तरह उत्तराखंड की तबाही का आयाम आम वहां के आम जन-जीवन और हजारों पर्यटकों व तीर्थयात्रियों के लिए अनर्थकारी साबित होने के साथ हमारी अध्यात्म परम्पराओं, सभ्यता-संस्कृति के विनाश तक विस्तारित होता है। कहा जा सकता है कि प्रकृति के प्रकोप के सामने हमारे कोई बस नहीं, वहीं पर मनुष्य की शक्ति की दयनीय सीमाएंँ साबित होतीं हैं। अगर एकाएक जल सैलाब उमड़ जाए तो कोई क्या कर सकता है? हमारे हाथ में केवल स्वयं को बचाने, राहत, बचाव और फिर पुनर्वास का ही विकल्प बचता है। निस्संदेह, बड़े जलाप्लावन, बारिश और तूफान से निपटना सम्भव नहीं। कुछ विनाश इसी श्रेणी के हैं। समय पूर्व और औसत से ज्यादा बारिश को विनाशलीला का कारण बताया जा रहा है। उत्तराखंड में 16 जून को ही 24 घंटे के भीतर 220 मिलीलीटर से ज्यादा बारिश हुई, जो सामान्य से 300 प्रतिशत ज्यादा है।
किन्तु यह एकपक्षीय सच है। उत्तराखंड को विकास के नाम पर जिस तरह तबाह-बरबाद किया गया है उसमें विनाश की सम्भावनाएं कई गुणा बढ़ गईं हैं। पूरे उत्तराखंड में पहाड़ों पर, नदियों के किनारे और पेटी के अंदर बनाए गए रिसोर्ट, होटलों, अपार्टमेंटों, आम मकानों को देखने से ही भय पैदा होता है। आखिर हिमालय जैसा कच्चा पहाड़ अपने ऊपर कितना वजन बरदाश्त कर सकता है? सीमेंट और कंक्रीट के कंकाल को सहने और झेलने की क्षमता पहाड़ों में नहीं होतीं। इसीलिए वहां घर प्रायः लकडि़यों के बनाए जाते थे। जिनके वजन कम होते थे, इसलिए बाढ़ और तूफान आया भी तो तबाही का आयाम अत्यन्त सीमित। उनका पुनर्निर्माण भी आसान। धीरे-धीरे निर्माण कंपनियों ने प्रकृति द्वारा प्रदत्त स्वर्ग को कमाई का ऐसा जरिया बनाया, सरकारें और सरकारी महकमों ने विकास के नाम और लालच में उनको छूट दी, स्थानीय लोगों में कुछ विवश होकर सब कुछ बदलते देखते रहे या कुछ लालच में फंसकर स्वयं इसके अंग बन गए। जाहिर है, जब अट्टालिकाएंँ बनेंगी तो फिर विनाश का परिमाण भी बढ़ेगा। यही हाल सड़कों और बांधों का है। सड़कों ने हमारे लिए उन इलाकों में जाना सुगम बना दिया जहाँं पहुंचने की कथाएं इतिहास की साहसी गाथाओं मे गिनी जाती थीं। सड़कों के लिए पहाड़ों की कटाई ने उनको स्थायी रुप से घायल किया। समय-समय पर वहांँ से दरकते पत्थर और मिट्टियाँं इसका प्रमाण देतीं रहतीं हैं कि आने वाले समय में ये विनाश का कारण बनते हैं।
वर्ष 2005-06 में राज्य में पंजीकृत वाहनों की संख्या 83,000 थी, जो 2012-13 में बढ़कर 1 लाख 80 हजार हो गई हैं। इसमें तीर्थयात्रियों, पर्यटकों के आवागमन का मुख्य जरिय बने कार, जीप एवं टैक्सी जैसे वाहनों की संख्या वर्ष 2005-06 में करीब 4000 थी जो 2012-13 में 40 हजार हो गई। यह दस गुना बढ़ोŸारी है। जितनी संख्या में वाहन और लोग पहाड़ों को रौदंेगे भू-स्खलन उतना ही ज्यादा होगा। जब उतनी ज्यादा संख्या में लोग वहां पहुंचने लगे तो उनके वास और सुख सुविधाओं की संरचनाएंँ फिर विकसित करनी पड़ीं और इन सबने संतुलन को नष्ट किया है। विनाश का परिमाण बढ़ा और उसे झेलने और रोकने की शक्ति क्षीण हो गई। पेड़ों की कटाई और खनन माफिया द्वारा पहाड़ों के लिए दीवालों का काम करने वाले पत्थरों की कटाई ने मिट्टी, पानी रुकने और सोखने का आधार काफी हद तक नष्ट किया है। कृत्रिम बांधों ने भी नदियों और पहाड़ों के सन्तुलन को चरमरा दिया है।
हम आपदा प्रबन्धन, सरकार की अक्षमता और आपराधिक लापरवाही को निशाना बना सकते हैं। बनाना भी चाहिए। आखिर जब भारत में अब हर वर्ष कई क्षेत्रांें में जल प्लावन, तूफान जैसी आपदाएं आ रहीं हैं हमारा आपदा प्रबन्धन तंत्र उसके अनुरुप विकसित न होना चिंताजनक है। वैसे आपदा प्रबधन सरकारी तंत्र के साथ धीरे-धीरे हमारी संस्कृति का अंग बनना चाहिए। हमारे यहां परम्परागत आपदा प्रबन्ध के स्थानीय तंत्र विकसित थे, किन्तु इन महाकाय निर्माणों ने अपने सामने समुदाय की क्षमता को बिल्कुल खत्म जैसा कर दिया है। खैर, राष्ट्रीय आपदा राहत बल या एनडीआरएफ (नेशनल डिजास्टर रिस्पान्स फोर्स) की भूमिका विनाश से निपटने की है। सेना के जवान भी राहत बचाव करते हैं। कुल मिलाकर 22 से 25 हेलीकॉप्टर राहत कार्य में जुटे जो बचे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और मृतकों के शव निकालने में सफल रहे हैं। किन्तु इन सबकी भूमिका राहत और बचाव की है।
विकास के नाम पर भारत के मस्तक उत्तराखण्ड को जिस तरह कुचल दिया गया है उसे दुरुस्त कौन करेगा? उत्तराखण्ड अगर भारत का मस्तक है तो वहांँ  महाकाय निर्माण वैसे ही हैं जैसे मस्तक को मार-मार कर लहूलुहान कर दिया जाए और वे घाव जगह-जगह सूजकर अलग-अलग आकार में दिखने लगें।
अलकनन्दा, मन्दाकिनी, भागीरथी फिर आगे गंगा ने अपना रौद्र रुप पहले भी दिखाया है। लेकिन उस समय न इतने निर्माण थे, और न इतनी संख्या में यात्री। इसलिए विनाश काफी कम होते थे। पहले इनके बीच 20 से 40 वर्ष का अन्तर होता था। वर्ष 2008 के बाद हर वर्ष यानी 2009, 2010, 2011, 2012 और अब 2013 में भी छोटी-बड़ी बाढ़ आ रही हैं। क्या ये विनाश की चेतावनी नहीं दे रहे हैं? आप देख लीजिए अति संवेदनशील वासों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2010 में ऐसे वासों की संख्या 233 थी, जो लगभग 450 हो गई और सम्भव है इस प्रकोप के बाद इनकी संख्या और बढ़े। कितने लोगों को विस्थापित कर कहाँ और कैसे बसाया जाएगा? विकास के नाम पर हुए विनाश की बलि आखिर कितने गांव, शहर, लोग, पशु-पक्षी, वनस्पतियाँं चढ़ेंगी? खुद हमें ही ठहरकर सोचना होगा कि आखिर हम विकास क्यों चाहते हैं और कैसा विकास चाहिए? अगर यातायात से लेकर संचार, ऊर्जा, सारी सुख सुविधाओं से लैश चमचमाते भवन, भोग विलास की सारी सामग्रियाँ चाहिए तो फिर ऐसे ही विनाशलीला के सतत् दुष्चक्र में फंसने के लिए हमंे तैयार रहना चाहिए। अगर नहंीं तो फिर थोड़ा पीछे लौटकर प्रकृति के अनुसार जीने और रहने का अभ्यास डालना होगा। यही दो विकल्प हमारे पास हैं। इसके बीच का कोई रास्ता हो ही नहीं सकता। 
- अवधेश कुमार, ई. 30, गणेश नगर, पांडव नगर काम्प्लेक्स,दिल्ली-110092,
 दूरभाष: 01122483408, 09811027208ं

आंकड़ों, तथ्यों और संकेतों को समझें - ध्रुवज्योति पुरकेत एवं ओसामा सलमान

ऽ उत्तराखण्ड़ बनने के बाद अब तक यहां पर्यटन में 141 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
ऽ सेंन्टर फार साइन्स एन्ड़ एनवायरमेन्ट की निदेशक सुनीता नारायण के अनुसार ‘उत्तराखण्ड में करीब 558 हाइड्रोइलेक्ट्रिकल पावर परियोजनायें पाइपलाइन में हैं, जो भगीरथी को करीब 80 प्रतिशत और अलकनन्दा को 65 प्रतिशत तक प्रभावित करेंगी।
ऽ इन्टरनेशनल संन्टर फार इन्ट्रीग्रेटेड माउन्टेन डेवलपमेन्ट की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 100 सालों में जहां एक ओर वैश्विक तापमान में 0.74 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है, वही तिब्बती पठार का तापमान करीब 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की उम्मीद है।
ऽ 2001 से 2012 के बीच यहां कारों के रजिस्ट्रेशन में 700 प्रतिशत की बढ़ोŸारी दर्ज की गई है।
ऽ उत्तराखण्ड में 1951-2004 के मध्य हर दशक में वर्षा में 14.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
ऽ रूद्रप्रयाग जिले में पिछले 34 सालों में 8 बार मानसूनी आपदाये आ चुकी हैं।
ऽ 1953 से 1980 के मध्य आयी बाढ़ से 764.48 मिलियन लोग प्रभावित हुए हैं।
ऽ दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख महाराज पंडित के अनुसार, ‘लकड़ी और पŸाथरों के घरों को तोड़ कर यहां कंकरीट व सीमेन्ट के बना दिये गये हैं, जिससे रात के समय अधिक गर्मी होने लगी और धीरे-धीरे यह इलाका गर्म होने लगा।’
ऽ चिपको आन्दोलन से जुड़े चण्डी प्रसाद भट्ट ने आज से लगभग 15 साल पहले लिखा था, ‘हिमालय में नदियांे के तटों के साथ छेड़छाड़ करने से पहले यह आवश्यक है कि पहले नदियों का इतिहास जान लिया जाये, जिससे बनने बाले रिजार्टस पर्यटकों  के लिए मौत की सौगात न ले आयें।’
ऽ प्रसिद्ध पर्यावरणविद वन्दनाशिवा का कहना है, ’पहाड़ों के बीच में सड़क और बांध बनाने के कारण यहाँं काफी भू-स्खलन होने लगे हें।’
ऽ गढ़वाल की प्रसिद्ध पर्यावरणविद मीर बहन ने 5 जून 1950 को एक लेख में लिखा था, ‘‘साल-दरसाल उŸार भारत में आने वाली बाढ़ का रूप विकराल व विध्वन्सक होता जा रहा है। इसका मतलब यह कि उŸाराखण्ड़ में हालात कुछ गड़बड़ हैं और यह ‘कुछ’ यहां के जंगलों से जुड़े है। हिमालय की दक्षिणी ढ़लान के क्षेत्र में बढ़ते वृक्षांें की नस्ल में आई तब्दीली का मुझे ज्ञान है। यह घातक परिवर्तन स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल वृक्ष ‘बांँज’ के स्थान पर ‘चीड़’ के पेड़ों के रूप में सामने आया है।
बांँज के पेड़ों के कारण नीचे झाडि़यां, लताओं और घास का एक प्रचुर सांचा अस्तित्व में आता है, जिसके कारण ऐसा वन तैयार होता है, जिसमें करीब सारा वर्षा जल समा जाता है, शेष बचा पानी वाष्पित होकर उड़ जाता है, कुछ पहाड की ढ़लान पर लुढ़क जाता है। जिससे पहाड़ का कटान रूकता है और जल संचयन होता है, जिससे पूरे वर्ष झरने व नाले बहते रहते हैं। बांज की पत्तियां मैदान से आने बाली गर्म हवाओं व कार्बनडायआक्सायड का अवशोषण करती हैं, जिससे पहाड़ के ऊपरी हिस्से में स्थित ग्लेशियर सुरक्षित बने रहते हैं, जो पूरे वर्ष नदियों का अक्षय जल स्रोत हैं।
इसके विपरीत, ‘चीड़’ के पेड़ बिलकुल विपरीत प्रभाव ड़ालते हैं। इसके पेड़ के नीचे कोई वनस्पति नहीं उगती जिसके कारण जमीन नंगी होकर पानी शोखने व रोकने की शक्ति खो देती है जिससे वर्षात का पानी वहकर नदियों में चला जाता है और पहाड़़ मरूभूमि का रूप लेने लगता है। इसकी पत्तियों में गर्म हवाओं को सोखने की क्षमता भी कम है, जिसके कारण मैदानी गर्म हवायें ग्लैशियर को प्रभावित करती हैं, जिससे हिमालय का पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र प्रभावित होता है, जिससे सम्पूर्ण उत्तर भारत प्रभावित होगा।’’
ऽ हिन्दुस्तान टाइम्स में 1977 में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया था, ‘समय तेजी से भाग रहा है। हिमालय के पास ही नहीं, बल्कि देश के पास भी जागने का वक्त कम बचा है।’

मैं निर्मल-पावन सरिता हूँ - गौरी शंकर ‘‘विनम्र’’

मंगल उर की निश्छलता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        हिमगिरि से निकली, बन निर्झर
        फिर प्रवह मान, कल-कल’कल स्वर
        सिकता - प्रस्तर रख उर अन्तर
        पीड़ा सह कर भी देती हूँ वर
जीवन-धुन में जन-कविता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        युग-युग से हूँ  मोक्ष-दायिनी
        सर्व मंगला पाप नाशिनी
        प्राणि मात्र सेवा मेरा व्रत
        पिलर रही हूँ, जीवन-अमृत
सरल-तरल अक्षय ममता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        भू-सिंचन ही परम धम है
        वृक्ष-पुत्र, पावन सुकम है
        अगणित तीर्थ वसे हैं तट पर
        संस्कृति-सृष्टि रचूं मरघट पर
दिव्य शक्ति पूरित क्षमता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        मानव, बन बैठा दानव
        डाल रहा अपशिष्ट और शव
        दूर करो अपने ही अवगुण
        मंगल उर की निश्छलता हूँ

सेना को प्रणाम! - प्रेम बड़ाकोटी

सेना जहाँ एक ओर सीमाओं की सुरक्षा के लिये सन्नद्ध है, वहीं आन्तरिक सुरक्षा तथा प्राकृतिक आपदाओं में भी उसकी अहम भूमिका है। जहाँ कहीं भी कठिन परिस्थिति निर्माण होती है, तथा हालात नियन्त्रण से बाहर होते हैं, उस समय यह कहा जाता है कि इसे अब सेना के हवाले कर दिया गया है। उत्तराखण्ड में आई इस प्राकृतिक आपदा में स्थानीय प्रशासन से भी कहीं अधिक सब प्रकार के जोखिम भरे कार्यों में सेना की अतुलनीय भूमिका रही है। यह सीमान्त का क्षेत्र है, सेना के पास अपना सुगठित तन्त्र है, तथा समय-समय पर सेना में विशेष प्रशिक्षणों की व्यवस्था है, इसी कारण किसी भी आपात स्थिति में सेना के द्वारा कार्य को योग्य परिणाम प्राप्त होता है।
हम वर्तमान परिस्थिति में जब सेना की चर्चा कर रहे हैं तो उसके अन्तर्गत प्रत्यक्षतः जल-थल-नभ, एन॰डी॰आर॰एफ॰, आई॰टी॰बी॰पी॰, बी॰एस॰एफ॰, सीमा सड़क संगठन आदि सभी की प्रमुख भूमिका है। यदि यह कहा जाए कि राहत तथा बचाव कार्य में सेना ने विशेष भूमिका निभाई है तो यह इन कर्मवीरों के प्रति योग्यतम टिप्पणी होगी। बीहड़ क्षेत्रों में यत्र-तत्र फंसे हुए लोगों को निकालना, छोटी बड़ी नदियों पर पुल बनाकर सम्पर्क मार्ग को जोड़ना, त्रासदी में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना, सुदूरवर्ती क्षेत्र में रसद लेकर जाना, यह एक बड़ा अभियान सेना सम्पन्न किया है। वायुसेना ने इस सब कार्य में कारगो विमान का भी प्रयोग किया। रसद सामग्री के लिये आई॰एल॰ 76 और 3 एन॰एन॰के॰ बत्तीस विमानों का सहयोग लिया। इन्हीं के माध्यम से यात्रियों को भी पहुँचाया गया। सीमा सड़क संगठन (बी॰आर॰ओ॰) ऋषिकेश से बदरीनाथ तथा गंगोत्री तक की सड़क के लिये सदैव सजग है। कई स्थानों पर निरन्तर हो रहे भूस्खलन में भी उसके जवान सड़क खोलने का कार्य कर रहे हैं। वर्षाकाल में यह टास्क एक बड़ी चुनौती है।
इन सब अभियान के रूप में सेना के 8000 जवान, 10 मैरामिलिट्री दस्ते व एन॰डी॰आर॰एफ॰ की 2 बटालियनें लगी रहीं। वायुसेना ने कुल मिलाकर 2500 तक उड़ानें भरीं।
अलकनन्दा, मन्दाकिनी तथा भागीरथी घाटी के यात्रा मार्गों के ध्वस्त हो जाने के बाद सैनानियों ने पहाड़ की दुर्गम ऊँचाईयों पर चलने योग्य जो वैकल्पिक मार्ग बनाए, यह एक अत्यधिक साहसिक कार्य था। अनेक स्थानों पर पानी, बिजली तथा प्रशासन से सम्बन्धित अनिवार्य व्यवस्थाओं में भी सेना का महत्वपूर्ण योगदान है।
यह विशेष उल्लेखनीय है कि आपदा कार्यों के लिये गठित एन॰डी॰आर॰एफ॰ के सैनानी सबसे पहले राहत के लिये पहँुचे। केदारनाथ में 14 जून से हवाई सेवा बन्द थी। 16, 17 जून को जो तबाही हुई इसकी सर्वप्रथम सूचना कैप्टन भूपेन्द्र सिंह, योगेन्द्र राणा तथा बृजमोहन बिष्ट ने प्रशासन को दी। 17 जून की सायंकाल उन्होंने केदारनाथ के लिये उड़ान भरी थी। मौसम खराब होने के कारण वे केदारनाथ तो नहीं पहुँच पाये किन्तु रामबाड़ा में तबाही देखकर उन्हें आपदा का अनुमान लग गया। इतना ही नहीं तो सीमा सुरक्षा बल ने 10 करोड़ रूपये की धनराशि राहत हेतु तथा 6 करोड़ की राशि केदारघाटी के पाँच ग्रामों के पुनर्वास हेतु उत्तराखण्ड सरकार को सौंपी है।
इस रेस्क्यू आपरेशन के मध्य सेना को एक बड़ा आघात भी सहना पडा। वायुसेना, आई॰टी॰बी॰पी॰ तथा एन॰डी॰आर॰एफ॰ के 20 जवान तथा अधिकारी गौरीकुण्ड के निकट वायुसेना के हैलीकाप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण शहीद हो गये। कठिनाई से उनके शवों को निकाला गया तथा राष्ट्र ने उनको श्रद्धांजलि अर्पित की।
उल्लेखनीय है कि सेना का सहयोगी भाव और सौहार्दपूर्ण व्यवहार इस सब कार्य में प्रदर्शित हुआ। कमान सम्भल रहे ले॰ जनरल व कमाण्ड कर रहे अधिकारियों के वक्तव्य विश्वास से भरे थे। सदैव उन्होंने जो बात व्यक्त की उसमें उनका संकल्प झलकता था। तीर्थयात्री, स्थानीय समाज तथा राज्य का शासन/प्रशासन सभी के मन पर उनकी कर्मशीलता की अमिट छाप अंकित रहेगी।
गंगोत्री मार्ग पर सेना का हर्शिल केन्द्र राहत का एक बड़ा कार्य कर रहा था। यहाँ आर्मी मेडिकल कोर के कर्नल डा0॰ अरूण सिंह ने यात्रियों को सब प्रकार की चिकित्सा सुविधा प्रदान की व अपने मुख्यालय को लौटते समय उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति के केन्द्र मनेरी सेवा आश्रम में भी पधारे। उन्होंने कहा कि आप लोग एक स्वयंसेवी संगठन के नाते इस त्रासदी में यात्रियों की जो सेवा कर रहे हैं, यह एक बड़ा पुण्य का काम है। - लेखक लोक भारती के उपाध्यक्ष तथा उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति के प्रमुख कार्यकता हैं और इस आपदा के समय आपदा प्रबन्धन में संलग्न रहे।

‘नगाधिराज’ क्यों हैं ‘नाराज’!!

राज्य निर्माण के बाद से ही उत्तराखण्ड के राजनैतिक तबके में विकास माडल के दृष्टिकोण का सर्वथा अभाव और स्वार्थप्रेरित विकास की अंधी होड़ ही है इस आपदा की मुख्य जनक-
देवभूमि उत्तराखण्ड में चार धाम यात्रा को प्रारम्भ हुए अभी एक माह भी नहीं बीता कि बरसात की पहली दस्तक ने भीषण तबाही का रूप धारण कर लिया और एक साथ नगाधिराज हिमालय की केदारनाथ, बद्रीनाथ और गंगोत्री घाटियों में तबाही का वज्रपात हुआ, साथ ही यमुनोत्री से काली नदी तक भीषण आपदा का रूप देखने में सामने आया। आपदाओं के दर्ज इतिहास में पहली बार चार धाम यात्रा के गंगा-क्षेत्र में इतनी बड़ी विनाशलीला को दुनियाँ ने देखा। विगत वर्षों से देखने में आ रहा है कि गंगा के क्षेत्र में लगातार बादल फटने, भूस्खलन, भू-धंसाव की घटनाएं बढ़ती जा रही थी। 2010 के बरसात में आई बाढ़, 2011 में भारी भूस्खलन और नुकसान के बाद पिछले वर्ष 2012 में तो बादल फटने से आई बाढ़ में गंगोत्री घाटी में असी गंगा और केदारघाटी के उखीमठ में भारी तबाही के साथ ही कई जाने गई और इस प्रकार विगत वर्ष से ही पहाड़वासी में एक असुरक्षा और भय की भावना घर करने लगी थी। वर्ष 2006 से लगातार गंगा व हिमालय संरक्षण का प्रश्न गहराता रहा, गंगोत्री घाटी में बांधों के निर्माण के चलते सुरंग खुदान, विस्फोटों जैसी गतिविधियाँ व गंगा को रोके जाने का विरोध जोर पकड़ा व 2008 में राज्य को अपनी दों बाँध परियोजनाएं पाला-मनेरी व भैरोंघाटी बंद करनी पड़ी, इसके बाद केन्द्र में गंगा प्राधिकरण व पर्यावरण मंत्रालय ने गंभीर संज्ञान लेते हुए 600 करोड़ खर्च हो जाने के बावजूद लोहारीनाग-पाला बाँध परियोजना को भी 2010 में निरस्त कर दिया व गंगोत्री घाटी को इको-सेंसिटिव जोन बनाने की एक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक पहल की। बावजूद इसके यहाँ राजनीतिक सूबा नहीं चेता और संस्कृतिक-पर्यावरणीय सरकारों को सिरे से नजरअंदाज कर बड़ी-बड़ी कम्पनियों को उत्तराखण्ड का दामाद बना उन्हें गंगा व हिमालय के संवेदनशील क्षेत्र सौंप कर अधाधुंध विकास की होड़ में अपना निजी स्वार्थ साधता रहा।
हिमालय अभी कच्चा पहाड़ है, भूकम्प एवं भूस्खलन के प्रति अत्यन्त संवेदनशील जोन है, जलश्रोतों एवं नदियों से भरपूर है, दिव्य वन एवं औषधियों का भण्डार है, साथ ही सदियों से ऋषि-मुनियों एवं अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों की साधनास्थली रही है। यह सब विशेषता ही गंगा के इस क्षेत्र को अत्यन्त पवित्र एवं आस्था का केन्द्र बनाती है, किन्तु पिछले कुछ समय से पर्यावरण एवं संस्कृति की कीमत पर विकास करने वाले तथाकथित विकासवादी राज्य के मुखिया का स्वर इतना कटु हो चुका था कि उनके कई वक्तव्य अखबारांे की सुर्खियों में देखे जा सकते हैं, जैसे .........पर्यावरण को विकास के आड़े नहीं आने देंगे............. आस्था को विकास में बाधा नहीं बनने देंगे........आदि। यहाॅं तक कि गंगा हिमालय की रक्षा हेतु आवाज उठाने वाले जनों को उत्तराखण्ड से बाहर का पता, राज्य के भीतर टकराहट और अराजकता का वातावरण पैदा करवा यहाॅं की शांत संस्कृति को भी कलंकित करने का कार्य वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हुआ है। जिसका ज्वलंत उदाहरण विगत माह चार-धाम यात्रा प्रारंभ के दिन अक्षय-तृतीया को जब हम धारी देवी मंदिर में दुर्गा-सप्तशती पाठ कर रहें थे, तो षड़यन्त्र पूर्वक प्रशासन की नाक के नीचे दिन-दहाड़े शराब पीकर मंदिर परिसर में घुस आये बाध कंपनी के गुण्डों से उत्पाद करवाकर हमारा पाठ भंग करवाया गया, अभद्रता के साथ ही जान से मारने की नियत से हमले भी हम पर हुए, जिसके विरूद्व दर्ज हमारी एफ.आई.आर. के बावजूद राजनीतिक शह के चलते अभी तक ये आरोपी खुले घूम रहे हैं। इस व्यवसायिक खिलवाड़ द्वारा अपमानित व तिरस्कृत होती हमारी संस्कृति के प्रतीक के रूप में पीडि़त की जा रही धारी माॅं के स्थान को खण्डित करते ही जैसे केदार शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया हो। राज्य के झूठे विकास की पैरवी करते यहा के मुखिया और राजनेता राज्य से बाहर के गंगा प्रेमियों को यहा का विकास रोकने हेतु दोषी ठहराते रहे हैं। शायद इसी आस्था के अनादर का ही एक रूप यह भी है कि आज प्रकृति उन्हीं राजनेताओं को राज्य के बाहर से आये श्रद्धालुओं की रक्षा-सुरक्षा और त्रासदी के भार की कठिन जिम्मेदारी का अनुभव भी करवा रही है।
यदि पिछले वर्षों की त्रासदियों पर नजर डालें तो टिहरी बाध सहित, मनेरी भाली, कोटेश्वर और विष्णुप्रयाग बांधों के बनने के बाद से ही इन बांधों के प्रभाव में आने वाले उत्तरकाशी से लेकर रूद्रप्रयाग और चमोली जिले तक के क्षेत्र में भीषण भूस्खलन, भूधंसाव, बादल फटने जैसी घटनाओं ने सर्वाधिक तबाही मचाई है। यही वह क्षेत्र भी है जहाँ गंगा-भागीरथी सहित अलकनंदा और मंदाकिनी पर दर्जनों बाध परियोंजनाएं प्रस्तावित है तथा कई बांध परियोजनाओं जैसे श्रीनगर, सिंगोली-भटवाडी, फाटा-ब्युंग, विष्णुगाड-पीपलकोटी, तपोवन-विष्णुगाड आदि इसी क्षेत्र में निर्माणाधीन हैं। टिहरी बांध का विशालकाय जलाशय, सुरंगों में डाली जा रही गंगा की धाराएं, बेतरतीब सड़कों और भवनों को निर्माण, अवैध वन कटान, खनन आदि हिमालय के पर्यावरण को दुष्प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन इन सबको नजरंअदाज कर सुरंग और जलाशय युक्त बाँधों के निर्माण की होड़ मची है जिसके चलते उत्तराखण्ड के गंगा क्षेत्र में निर्मम वन कटान, विस्फोटों, सुरंगों के खुदान और भारी भरकम निर्माण व मशीनी गतिबिधियां संवेदनशील पारिस्थितिकीय तंत्र पर निश्चित रूप से गंभीर दुष्प्रभाव उत्पन्न कर रही हैं। इन क्षेत्रों में जहाॅं पानी के प्राकृतिक श्रोत व झरनों को सुखाती जा रही हैं वहीं भूस्खलन, भूधंसाव के साथ ही बादल फटने से आई बाढ़ का रूप लेकर भीषण तबाही का पर्याय भी ये मानवीय गतिविधियांँ बनती जा रही हैं।
यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि यह वही क्षेत्र है जहां टिहरी और मनेरी बांध निर्माण के नक्शे में आने के समय से ही 1978 में आई उत्तरकाशी की विनाशकारी बाढ़ के रूप में प्रकृति ने यह स्पष्ट संकेत किया। इसके बाद से ही जगह-जगह भूस्खलन, 1991 में उत्तरकाशी व 1998 में चमोली के विनाशकारी भूकंप, 2003 में वरूणावत त्रासद और हालिया वर्षों में तो उत्तरकाशी के भटवाडी, टिहरी में कोटेश्वर से लगे गावों जोशीमठ के चाई गाँव सहित कई कस्बों के जमींजोद हो जाने के साथ ही बादल फटने की घटनाओं ने व्यापक और विनाशकारी रूप गंगा के इस क्षेत्र में ले लिया है। जिन्होंने भी गंगा के इस क्षेत्र का निरीक्षण किया है वे यह जानते हैं कि सम्पूर्ण क्षेत्र में भारी तादात में वनों का कटान हुआ है, सुरंगों के खुदान और विस्फोटों के दुश्प्रभाव से जल-श्रोत सूख गये हैं, चारा-चुगान और वनस्पतियों का नाश और स्थानीय संस्कृति एवं परम्पराओं को गंभीर रूप से क्षति पहुंची है। कई किलोमीटर तक गंगा, अलकनंदा की धाराएं बांधों की सुरंगों और जलाशयों में बांधे जाने के कारण सूख गयी हैं, वर्षा काल को छोड़कर अन्य समय तो वहाॅं इतना पानी भी उपलब्ध नहीं रहता कि लोग आचमन ले सकें, मृतकों के अंतिम संस्कार हेतु जल के लिए भी ग्रामीणों को बाॅंध कंपनियों से जल छोड़ने की गुहार लगानी पड़ती है और अब 70 बाॅध केवल गंगा के इसी क्षेत्र में गंगा-भागीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी पर लादे जाने की तैयारियां चल रही है। विगत वर्षों से गंगा-हिमालय संरक्षण हेतु चल रहे आन्दोलन और इन बांधों के प्रबल वैचारिक और सैद्धंातिक विराध के उपरान्त भी राज्य के सभी प्रमुख राजनीतिक दल बांधों के निर्माण की पुरजोर पैरवी करते रहे हैं। वर्तमान राज्य सरकार के मुखिया को तो इस कदर विकास की काली पट्टी बाॅंध अधे हो चुके हैं कि उन्हें बाधों के निर्माण के सिवाय राज्य के विकास का और कोई रास्ता ही नही सूझता, तभी तो वे न केवल दल-बल के साथ गंगोत्री घाटी को इको जोन बनाये जाने की अधिसूचना के विरूद्ध अपने ही दल के प्रधानमंत्री के पास शिकायत लेकर पहुँच जाते हैं वरन बांधों के निर्माण को पहाड़ के विकास के लिए अति आवश्यक बताते हुए केन्द्र द्वारा निरस्त की गयी गंगोत्री घाटी की बाध परियोजनाओं को पुनःचालू करवाने की भी निर्लज्जता पूर्वक पैरवी भी करते हैं।
वास्तव में उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद से यहा के राजनीतिक तबके के अधिकांश लोग यहाॅं की संस्कृति से जुड़े दिव्य पर्यावरण और संसाधनों को केवल अपने राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति का पर्याय मात्र देखते रहे हैं। इस क्षेत्र सहित सारे राज्य की प्रतिष्ठा के रूप में विश्व में चार धाम यात्रा को देखा जाता है, लाखों लोगों का रोजगार एवं राज्य की आय का महत्वपूर्ण अंश भी इससे जुड़ा है। देश-विदेश के करोड़ों जनों को यह यात्रा संस्कृति के एक सूत्र में पिरोती आई है, किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से चार-धाम यात्रा सहित पर्वतीय क्षेत्र के अनुकूल विकास के माडल का सर्वथा अभाव हमारे राजनीतिक दृष्टिकोण में पाया जाता है और राज्य निर्माण के बाद से किसी भी राजनीतिक दल अथवा नेता ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई। इसीलिए बेतरतीब सड़कों का निर्माण, अवैध वनों का कटान, खनन, अतिक्रमण आदि में भी राज्य निर्माण के बाद चिंताजनक बढ़ोत्तरी होती रही, देव भूमि की संस्कृति एवं पर्यावरण के प्रति अनादर एवं संवेदनहीनता का ही परिणाम था कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से पूर्व ही विवादास्पद श्रीनगर बाँध परियोजना के मार्ग में रोड़ा बन रही माँ धारी देवी सिद्ध पीठ को 16 जून, 2013 की शाम को खंडित कर प्रतिमा को विस्थापित कर दिया, एवं केदारनाथ के इस रौद्र तांडव का समय भी संयोगवश उसी शाम से प्रारम्भ हुआ।
यहाँ की संस्कृति एवं पर्यावरण को मद्देनजर रखते हुए जहाँ देव-भूमि के अनुकूल विकास नीति का निर्माण होना चाहिए, उसके विपरीत यहाँ की सरकारंे और राजनेता संस्कृति और पर्यावरण की कीमत पर बनाए जा रहे बांधों को ही एक मात्र विकास का रोजगार का साधन देखती हैं। वर्तमान आपदा इसी खोखली और विनाशकारी सोच के साथ गंगा-हिमालय से किये जा रहे व्यावसायिक खिलवाड़ का दुष्परिणाम है। इसी व्यावसायिक नजरिये से प्रेरित नदी तटों के किनारे निर्मित भवन, सड़के, रिर्सोट आदि ने तबाही को और अधिक बढ़ा दिया, जिसके मुख्य दोषी के रूप में इस क्षेत्र की नीति निर्धारक सरकारें, योजना आयोग व राजनेता हैं, जो देव-भूमि उत्तराखण्ड के मूल स्वरूप और संस्कृति को बदलकर इसे बाँध-भूमि (ऊर्जा-प्रदेश) बनाने पर अमादा है। वैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो, यहाँ के पर्यावरण, संस्कृति एवं सामाजिक ताने-बाने के महत्व के प्रति उदासीन व संवेदनहीन हुए लोग देव-भूमि का डी॰एन॰ए॰ परिवर्तन कर इसे बाँध-भूमि बनाने को विकास समझ रहे हैं। वास्तव में मानव द्वारा प्रकृति के साथ मोल लिए द्वन्द का परिणाम इस भीषण तबाही के रूप में नजर आ रहा है।
हमारे नीति-निर्धारको को समझना होगा कि यदि भारत-भूमि की संस्कृति व आस्था के प्रतीक ‘गंगा-हिमालय’ के साथ आदर पूर्वक व्यवहार किया जाता, बांधों में बाँधने का खिलवाड़ न किया होता, नदियों के किनारे इस प्रकार व्यावसायिक अतिक्रमण का शिखर न होते, यात्रा के स्वरूप को पर्यटन के बजाय तीर्थाटन के रूप में विकसित किया जाता तो कदाचित नगाधिराज यों नाराज न होते।

अपने हित में हिमालय और उसकी पीड़ा को समझें - संकलित

1. उत्पत्ति - हिमालय की उत्पत्ति प्लेटटेक्टोनिक सिद्धान्त के अनुसार इण्डो-आस्टेलियन और यूरेशियन प्लेट की टकराहट के चलते हुई है। करीब सात करोड़ साल पहले इण्डो-आस्टेलियन प्लेट उत्तर की ओर हर साल 15 सेमी की दर से खिसक रही थी। बाद में इसने टेथीस सागर को पूरी तरह खत्म कर दिया। यहां तक कि उत्तर-पूर्व में अभी तक भी जमीन के नीचे समुद्री जीवन के अवशेष मिल जाते हैं। अभी भी प्लेटों के दबाव की वजह से हिमालय की ऊंँचाई लगातार बढ़ रही है। धरती पर हिमालय सबसे युवा पर्वत श्रंखला है और सेन्डीमेटरी व मेटामार्फिक चट्टानों से निर्मित है। पश्चिम में सिंन्धु नदी के पास नागा पर्वत से लेकर, पूर्व में व्रह्मपुत्र नदी के निकट नमचा बरवा तक इसका विस्तार है।
2.श्रेणियां- हिमालय को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है -
अ. बृहत्तर (ग्रेटर) हिमालय - पर्वत श्रंखला का सबसे ऊँंचा और उउत्तरी हिस्सा। इसका विस्तार पाकिस्तान, उउत्तरी भारत, नेपाल, भूटान से लेकर पूर्व में अरूणांचल प्रदेश तक है। उउत्तर में यह पूरी लम्बाई में तिब्बत स्वायŸा के दक्षिणी हिस्से से सटा हुआ है। इसकी कुल लम्बाई लगभग 2500 किमी और औसत ऊंचाई 6,100 मी॰ से अधिक है। इस पर दुनियाँं की सबसे ऊंची चोटी माउन्ट एवरेस्ट (8,848 मी॰) है।
ब. लोअर हिमालय - इसे लघु हिमालय या महाभारत श्रंखला भी कहा जाता है। 1800-4,600 मी॰  ऊंची पूर्व-पश्चिम दिशा में ग्रेटर हिमालय के समानान्तर  सिन्धु नदी से लेकर उŸारी भारत, नेपाल और सिक्किम से होती हुई भूटान के पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के आस-पास तक है।
स. शिवालिक हिमालय - इसको बाहरी हिमालय या सब हिमालय रेंज भी कहा जाता है। इनकी औसत ऊंँचाई 1500-2000 मी॰ और चैड़ाई 10-15 किमी है। यह हिमालय का सबसे दक्षिणी हिस्सा है। इनका विस्तार कश्मीर, हिमांचल, उŸाराखण्ड, नेपाल, पश्चिम बंगाल, भूटान और अरूणांचल प्रदेश तक है।
3.पारिस्थितिकी -हिमालय की पारिस्थितिकी अत्यन्त नाजुक व विविधता से परिपूर्ण है। प्राकृतिक भू-सम्पदा, औषधीय सम्पदा, जंगल, वन्यजीव, पादप प्रजातियाँं, जैवविविधता, ग्लैशियर और जल स्रोत आदि विशेषतायें इसको खास बनाती हैं। इसकी अपनी एक जलवायु है, जो एशिया की अधिकांश जलवायु को प्रभावित करती है। इसके टिकाऊपन पर एशिया के 1.3 अरब लोगों की आजीविका निर्भर है।
4. परिवर्तन - पारिस्थितिकी तन्त्र नाजुक होने के कारण हिमालय पर किसी भी प्रकार का गैर टिकाऊ बदलाव भारत सहित पूरे एशिया सहित 130 करोड़ लोगों को प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन से ग्लोबल वार्मिंग होगी, जिससे तापमान में वृद्धि और ग्लेशियरों पर प्रभाव होगा और उससे नदियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जायेगा। नदियों के प्रभावित होने से वह बड़ा भू-भाग व वहां के निवासी प्रभावित होगे, जिसे नदियां सींचकर धनधान्य से परिपूर्ण करती हैं। आईपीसीसी के अनुसार अगले 100 साल में दुनियां का औसत तापमान 1.6 से 3 डिग्री सेल्शियस तक बढ सकता है।
5. विस्तार - भारतीय क्षेत्र में हिमालय का भौगोलिक विस्तार 5.3 लाख वर्ग किमी तक फैला है। इसके अन्र्तगत व्यापक पर्वत श्रंखलायें सिन्धु और ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र के बीच 2500 किमी तक फैली हैं। हिमालय 80 से 300 किमी तक चैड़ाई के क्षेत्र में फैला है, जिसकी ऊंँचाई 8 हजार मीटर तक है और उसकी जलवायु भारतीय क्षेत्र के एक बड़े भू-भाग को प्रभावित करती है। यह भारत के समस्त उत्तरी सीमा का प्रहरी है, जिसके भौगोलिक क्षेत्र का 41.5 फीसदी हिस्सा वनों से आच्छादित है, जो देश के कुल वन क्षेत्र का एक तिहाई है और अच्छे वन के रूप में इसकी हिस्सेदारी लगभग आधी (47 फीसदी) है। इसके वन क्षेत्र में पुष्पीय पौधों की 8000 प्रजातियां, 816 से अधिक वृक्षों की प्रजातियां, 775 खाने योग्य पौधे और 1740 के करीब औषधीय महत्व की प्रजातियां हैं। इसका विस्तृत हरियाली से आच्छादित क्षेत्र कार्बन डाईआक्साइड अवशोषण का एक बड़ा स्रोत्र है। इसका हमेशा बर्फ से ढ़का रहने वाला ग्लैशियर क्षेत्र 17 फीसदी और मौसमी बर्फ से ढ़का रहने वाला क्षेत्र 30-40 फीसदी है। देश की करीब चार फीसदी आबादी भारतीय हिमालयी क्षेत्र में निवास करती है, जिसकी आजीविका इसी हिमालय पर निर्भर है। इसके कैलाश पर्वत के निकट से निकने वाली दुनियांे की तीन प्रमुख नदियां सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र हिमालय को पार करती हैं और इनके सामूहिक अपवाह तन्त्र से करीब 60 करोड़ लोग जुड़े हैं।
6. परिणाम - भौगोलिक कारणों, आबादी के बढ़ते दबाब, विकास की अंधी दौड़, संसाधनों के अत्यधिक दोहन तथा हिमालयीन अन्य चुनौतियों नें हिमालय को अत्यन्त संवेदनशील तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या ने इन कारकों को और भयावह कर दिया है। मानव जनित कारकों और जलवायु परिवर्तन से हिमालयीन पारिस्थितिकी के सामने संकट खड़ा हो चुका है। परिणामस्वरूप अनियमित और असंतुलित वर्षा, भू-स्खलन, नदियों के पानी और बहाव में अनियमितता, जैव विविधता कां क्षरण, सिकुड़ते ग्लेशियर, घटते और कटते जंगल,  प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि, पलायन और हिमालयी पारिस्थितिकी पर आश्रित जनजीवन के दरबदर जैसी समस्यायें दिखाई दे रही हैं, निदान खोजना है। 
दूर से देखने पर पहाड़ जितने कठोर प्रतीत होते है, अन्दर से वे उतने ही नाजुक होते हैं। उनकी पारिस्थितिकी छुई-मुई जैसी होती है। इसकी पारिस्थतिकी तन्त्रों के बीच एक तादातम्य स्थापित होता है। इस पारिस्थितिकी तन्त्र के तहत पहाड, झरने, झील, छोटी-बड़ी नदियांँ, जंगल जीव-जन्तु एवं वनस्पितियांँ आदि आती हैं। इस तन्त्र में से अगर किसी एक को भी छेड़ा जाता है तो पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र गड़बड़ा जाता है। वर्तमान हिमालयीन ‘सुनामी’ पारिस्थितिकी तन्त्र के साथ किए जा रहे खिलवाड़ का परिणाम है।
पहाड़ अपने आकार के बराबर ही लाभकारी हैं। इनकी पारिस्थितिकी को बिगाड़ कर इन्सान सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को मार कर एक बार में ही सभी अण्डे लेने के उपक्रम कर रहा  है।

प्रलय संकेतों पर गौर कीजिए - हृदय नारायण दीक्षित

प्रकृति की शक्तियां देवता हैं, हिमालय देवालय और उत्तराखंड देवभूमि है। फिर, क्या वजह हो सकती है - इन्द्र के कोप की? ऋगवेद के इन्द्र अविरल जल प्रवाह में आनन्दित होते हैं। वृत्ति जल प्रवाह रोकते हैं। इन्द्र उनका वध करते हैं।
वैदिक ऋषियों नें जल की आराधना की है। उन्हे जल माताएं कहा है। बीच में आ गये जल अवरोधक शत्रु। नदियों पर जगह-जगह बांँध बने। जहां नदियां बहती थीं, मन्त्र गूंजते थे, योग, ध्यान और उपासनाएं चलती थीं, वहांँ नदी क्षेत्र में होटल बने। जल, जंगल और जमीन आधुनिक वृत्तासुर अपने कब्जे में लेने लगे।
भगीरथ का तप था कि गंगा उतरीं। यहां वन संरक्षित थे। कथित विकास के नाम पर वन काटे, पहाड़ उजाड़े। डायनामाइट चलाकर पहाड़ और धरती का अन्तस्थल छलनी किया। अर्थववेद के भूमिसूक्त में अर्थवा ने पृथ्वी से कहा ‘हे माता! यज्ञ और मंगल कार्योंं के लिए आपको खोदते हैं, अपको चोट न लगे। हम क्षमा प्रार्थी हैं। पर आज प्रकृति बिरूद्ध जो कुछ हो रह है, हम सबने इसे विकास कहा। वही विकास विनाश के रूप में सामने है।
प्रकृति को जल अवरोध स्वीकार नहीं। ऋगुवेद का ‘वृत्त’ प्रतीक ध्यान देने योग्य है। एक मन्त्र में ‘वृत्त’ का शरीर बहुत व्यापक बताया है। मुनाफाखोर सभ्यता का शरीर भी बहुत बड़ा है। ऋगुवेद (1.52 व 8.12) के अनुसार इन्द्र उनका वध करते हैं और नदी प्रवाह के अवरोध हटाकर बहाव सुनिश्चित करते हैं। हमारे पूर्वजों का ध्यान जल की हर एक गतिविधि पर था। मेंघों पर, मेंघों में दमकती विद्युत पर, वर्षा की बूंदों पर, नदियों और समुद्रो पर भी, लेकिन आधुनिक विकास के मालिकों का ध्यान सिर्फ मुनाफे पर ही है।
शिव ने रोका था गंगा के उद्दाम वेग को और जितना जरूरी था भगीरथी का उतना प्रवाह ही नीचे आया। आज उस संस्कृति के मर्म को समझने हेतु भारत के प्रथम प्रज्ञा पुरूष मनु का संदेश ध्यान देने योग्य है। वह कहते हैं- ‘‘प्रकृति के सभी जीवों, शक्तियों और नियमों का सम्मान करना ही होगा।’’ हम सब भारतवासी इसी प्रकाश में देव भूमि पर आये प्रलय संकेतों को समझें ंऔर आगे का मार्ग प्रशस्त करें।

प्रकृति चेतावनी देती है, मगर हम चेतते नहीं - वी॰के॰ जोशी

देवभूमि माना जानेवाला राज्य उŸाराखण्ड़ इन दिनों जबरदस्त त्रासदी से गुजर रहा है। हालात यह है कि जनता सरकार को और सरकार प्रकृति को दोषी ठहरा रही है। दोष प्रत्यारोपण की बजाय यह समझना आवश्यक है कि प्रकृति का यह कहर क्यों बरपा और इसमें हमारा कितना हाथ है। साथ ही भविष्य में बचाव की रणनीति पर भी विचार करने की आवश्यकता है।
आज से मात्र 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट की तिब्बती प्लेट से हुई जबरदस्त टक्कर के कारण जन्मा हमारा हिमालय है। आज भी भारतीय प्लेट, तिब्बती प्लेट के अन्दर 5 सेमी प्रति वर्ष की दर से धंसती जा रही है।  जिसके फलस्वरूप हिमालय के गर्भ में हर समय तनाव एवं संवेदनशीलता बनी रहती है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि हिमालय की भू-वैज्ञानिक एवं भू-आकृतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि वे हिमस्खलन, भूस्खलन, भूकम्प एवं अचानक वाढ़ आदि प्रकृतिक आपदाओं से कभी भी ग्रसित हो सकती हैं। अतः हिमालय में कोई भी विकास योजना बनाने से पूर्व इन बातों को जेहन में रखना आवश्यक है।
जहांँ तक प्रकृति के प्रकोप की बात है, तो उसे रोका नहीं जा सकता और आने वाले समय में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति नकारी नहीं जा सकती। कुछ प्राकृतिक आपदायें हिमस्खलन, भूस्खलन एवं बाढ़ का पूर्वनुमान संभव है, परन्तु भूकम्प का नहीं। प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक प्रो॰खड़गसिंह वल्दिया एवं प्रसिद्ध अमेरिकी भूकम्पविद रोगर विल्हैम के मुताविक केन्द्रीय कुमाऊंँ क्षेत्र जिसमें वागेश्वर और अल्मोड़ा भी आते हैं, बड़े भूकम्प की आशंका है। परन्तु कब यह भूकम्प आयेगा, कोई नहीं कह सकता। परन्तु शायद हम इन चेतावनियो से अनभिज्ञ हैं।
यदि हम कुछ पुराने भूस्खलनों की बात यहाँं दोहरायें तो अनुचित न होगा। सैलानियों के स्वर्ग नैनीताल को अंग्रेज व्यापारी तथा शिकारी पी॰बैरन नें 1841 में चुना और 1858 तक नैनीताल में अंग्रेजों की भरमार हो गई। पर तभी 1867 नैना पीक की ओर से हुए भूस्खलन से पिलग्रिम के घर का कुछ भाग भी ध्वस्त हो गया। आनन-फानन में अंग्रजों ने नैनीताल में जल निकासी के लिए नालों का जाल फैला दिया। तभी 1880 में शेर का डांडा की ओर से हुए भूस्खलन के कारण 193 लोग मारे गये तथा झील का एक भाग आज के फ्लैट्स के रूप में आ गया। इसके बाबजूद नैनीताल में निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी। आज भी शेर का डांडा उतना ही खतरनाक है जितना 1880 में था।
दूसरा उदाहरण है उत्तरकाशी का। 2003 में उŸारकाशी के वरूणाव्रत पर्वत पर कार्य कर रहे भारतीय भूवैज्ञानिकों ने सर्वेक्षण में देखा, चोटी से धीरे-धीरे भूस्खलन हो रहा है। उन्होने तुरन्त जिलाधिकारी को सूचित किया और सरकारी तन्त्र ने तत्काल नीचे बसी आबादी को सुरक्षित स्थानों में भेज दिया। लगातार वर्षा हो रही थी और पानी के दवाव से 24 सितम्बर को बरूणाव्रत पर्वत पूरे जोर-शोर के साथ नीचे चल दिया और अपने साथ ले गया 40 से 50 हजार क्युविक मीटर मलबा। जान का नुकसान तो बच गया लेकिन नीचे सड़क के किनारे बने घर, होटल सब ध्वस्त हो गये। शायद हमारी याददास्त बहुत ही कमजोर है और उससे भी घनी आबादी जोखिम भरे क्षेत्र में फिर से बस गई। इतिहास गवाह है कि वरूणाव्रत पर्वत से पूर्व में ताम्बाखाण्डी तथा ज्ञानसू में भी इसी प्रकार के भयंकर भूस्लखलन हो चुके हैं।
ऐसे उदाहरण अनेक हैं, जैसे 1893 में गौना में पर्वत गिरने से बिरही गंगा अवरूद्ध हो गई थी और वन गया था गौना ताल। अंगे्रज भूवैज्ञानिक टीएच हालैण्ड ने हरिद्वार से 160 मील की पैदल (उस समय हैलीकैप्टर नहीं होते थे) यात्रा करके रिपोर्ट में लिखा था कि 25-26 अगस्त 1984 तक बांध टूट जायेगा और नियत समय पर बांध टूटा जिससे चमौली में नदी का जल स्तर 160 फिट तथा हरिद्वार में 1 फिट चढ़ा। चूंकि उस समय भूवैज्ञानिकों की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता था, सरकार ने बन्दोवस्त कर रखा था और जान का नुकसान नहीं हुआ।
अब विज्ञान का युग है और पूर्वानुमान के लिए सेटेलाइट हैं, जिसके माध्यम से इस क्षेत्र में हो रहे हर क्षण हो रहे बदलाव पर नजर रखी जा सकती है। स्वचालित मौसम सूचना एकत्रित करने के सैकड़ों केन्द्र स्थापित कर समस्त सूचना मौसम के पूर्वानुमान लगा रहे केन्द्रों को पे्रषित की जानी चाहिए। जहांँ से समस्त जिलाधिकारियों को नित्य मौसम की बुलेटिन भेजी जा सकती है और वह आवश्यकतानुसार तैयारी कर सकते हैं।
हमारे पर्वत जितने विशाल और स्थितिप्रज्ञ दिखते हैं, उतने हैं नहीं। इन पर निर्माण से पूर्व स्थापत्य एवं जल निकासी आदि का ध्यान रखना आवश्यक है। पिछले दशक में उŸाराखण्ड में अन्धाधुन्ध निर्माण हुआ है, पर क्या सारा निर्माण पर्यावरण सुरक्षा को मद्देनजर रख कर किया गया है? शायद नहीं। इस प्रकार के निर्माण पर ंस्थानीय सरकार को सख्ती से रोक लगानी होगी तथा स्थानीय निवासियों को स्वनुशासन का पालन करना होगा तभी शायद देवभूमि भविष्य में सही मायनों में ‘देवभूमि सिद्ध’ हो सकेगी। -प्रसिद्ध पर्यावरणविद।

अपने हाथों रची गई तबाही - कौशल किशोर

उत्तराखंड की भीषण आपदा और भयानक तबाही ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह प्रकृतिक आपदा नहीं, बल्कि अन्धाधुन्ध विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किए गये अत्याचार का प्रतिकार है। विकास के नाम पर उपजी परियोजनाओं ने पर्वत के नैसर्गिक स्वरूप को बिगाड़ दिया जिसने मौसम का मिजाज बदलने में अहं भूमिका निभाई। प्रकृति अपनी नैसर्गिक अवस्था में वायुमण्डल में जमा वाष्प को समान रूप से वितरित करती है, परन्तु मानवीय हस्तक्षेप से इसमें बाधा उत्पन्न होती है और उसका नतीजा बादलों के फटने के रूप में सामने आता है।
हिमालय क्षेत्र में उत्तर भारत का सदावहार व सघन वन था, जो अब नष्ट हो चुका है। भूमि को सहेजने और संवारने में कारगर वनस्पतियों का विनाश 10वीं सदी में फ्रेडरिक बिल्सन के समय ही शुरू हो गया था, जब हिमालयन वृक्ष बांझ को नष्ट कर उसकी जगह चीड़़ के जंगलों में तब्दील कर दिया गया। परिणामस्वरूप मृदा की गुणवत्ता नष्ट हुई, वर्षा जल को संजोने की क्षमता घटी और उसके कारण धीरे-धीरे पहाड़ी नाले व झरने कमजोर पड़ते गये, उपयोगी वनस्पितियांँ नष्ट प्राय हो गईं, अन्ततः जैवविविधता की अपूरणीय क्षति हुई।
हिमालय का सौंदर्य और ऐश्वर्य ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन साबित हुआ। विकास के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया किया, विस्फोंटों का बेतहाशा इस्तेमाल कर पहाड़ काटे व लम्बी सुरंगें बनाई गईं। वर्तमान समय उŸाराखण्ड़ में 70 से अधिक परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिनके और बढ़ने की सम्भावना है।
यह सब पहाड़ों को कमजोर करने के लिए काफी था। वस्तुतः यह स्वार्थ, लालच और भ्रष्टाचार के बोये बीज की उपज है। पर अब! यह सरकार और समाज के चेतने और जागने का वक्त है। प्रकृति और उसकी धाराओं के साथ छेड़-छाड़ बंद कर सृजन के अविरल और निर्मल मार्ग को अपनाना ही उपयुक्त निदान है। - पर्यावरण विशेषज्ञ

विकास की विभीषिका - भरत झुनझुनवाला

मई, २०१३ को उत्तराखण्ड में आई विभीषिका का प्रत्यक्ष कारण ग्लोबल वार्मिंग दिखता है। धरती का तापमान बढ़ने से बरसात तेज और कम समय में हो रही है। भीषण बरसात और सूखे के दौरे पड़ रहे हैं। वायुमण्डल की विशेष परिस्थिति में बादल फटते हैं। सामान्य परिस्थिति में हवा पानी की बूंदों को लेकर ऊपर उठती रहती है। छोटी बूंदे बड़ी होती जाती हैं। तापमान कम होता है तो यह बूंदें बर्फ बन जाती है और ओले का रूप धारण कर लेती हैं। विशेष परिस्थितियों में हवा ऊपर नहीं उठ पाती, परन्तु पानी की बूंदें बड़ी होती जाती हैं और ये बड़ी बूंदें एकदम से गिर पड़ती हैं, जिसे बादल फटना कहते है।
गिरने वाले इस पानी को यदि पहाड़ सहन कर लेता है तो विशेष नुकसान नहीं होता है। पहाड़ कमजोर हो तो वही पानी विभीषिका का रूप धारण कर लेता है। बड़ी मात्रा में पेड़ लगे हों तो पानी उनकी जड़ों के सहारे पहाड़ के अन्दर तालाबों में समा जाता है, जिन्हे एक्वीफर कहते हैं। पेड़ न हों तो वही पानी सीधी धारा बनाकर नीचे गिरता है और तब उफनती नदी अपनें साथ पेड़ों और पत्थरोें को लेकर बहती है। इनकी टक्कर से मकान और पुल घ्वस्त हो जाते है, जैसा कि हाल में हुआ है।
केदारनाथ के नीचे फाटा व्यूंग और सिंगोली भटवारी जल विद्युत परियोजनाएंँ बनाई जा रही हंै। इनमें लगभग 30 किलोमीटर की सुरंग खोदी जा रही है। भारी मात्रा में डायनामाईट का प्रयोग किया जा रहा है। इन विस्फोटों से पहाड़ के एक्वीफर फूट रहे हंै और जमा पानी रिस कर सुरंग के रास्ते निकल रहा है। जिससे पहाड़ के जल स्रोत सूख रहे हैं। पेड़ों को पानी नहीं मिल रहा है और वे कमजोर हो रहे हैं। धमाकों से पहाड़ कमजोर व जर्जर हो रहे हैं। फलस्वरूप पानी बरसने से चट्टानें धसक रही हंै तथा पत्थर नीचे आ रहे हैं। मैने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत डाइरेक्टर जनरल आफ माइन सेफ्टी से पूछा कि विस्फोट की मात्रा के निर्धारण संम्बन्धी फाईल मुझे उपलब्ध कराई जाए। उत्तर दिया गया कि फाईल गुम हो गई है। इससे ज्ञात होता है कि कम्पनियांँ विस्फोटों पर परदा डालना चाहती हैं। वर्तमान विभीषिका में श्रीनगर परियोजना का विशेष योगदान रहा है। कम्पनी ने भारी मात्रा में मिट्टी को नदी के किनारे डाल दिया था। जलस्तर बढ़ने पर यह मिट्टी नदी के साथ बहकर घरों में घुस गई और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जमा हो गई। राजमार्ग सात दिनों से बंद है।
सारांश है कि बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने जलविद्युत परियोजनाआंें को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है। ऐसा ही प्रभाव सड़कों को बनाने के लिए गए विस्फोटों और गैरकानूनी खनन का होता है। नदी के पाट पर किए जा रहे अतिक्रमण से व्यक्ति अपने को बाढ़ के मुंह में डालता है।
जल विद्युत परियाजनाओं से उत्पन्न विद्युत का लाभ शहरी उपभोक्ताओं को होता है। उत्तराखण्ड के पास अपनी जरूरत भर बिजली उपलब्ध है, लेकिन राजस्व कमाने के लिए राज्य सरकार प्रत्येक नदी के प्रत्येक इंच के बहाव पर जल विद्युत परियोजना बनाने का प्रयास कर रही है। इन परियोजनाओं से राज्य को 12 प्रतिशत बिजली फ्री मिलती है। इसे बेचकर सरकार राजस्व कमाती है। इस राजस्व में आधा सरकारी कर्मियों के वेतन को जाता है। शेष में बड़ा हिस्सा अन्य प्रशासनिक खर्चों में जाता है, जैसे गाड़ी इत्यादि में। बची रकम विकास कार्यों में खर्च की जाती है। इसमें 20 से 50 प्रतिशत घूस में जाता है। आम आदमी को राजस्व का केवल 20-25 प्रतिशत ही मिलता है, लेकिन परियोजना के 100 प्रतिशत दुष्परिणाम को आम आदमी झेलता है। उसकी बालू-मछली से होने वाली आय बंद हो जाती है। परियोजना में उत्पन्न मच्छरों से आम आदमी की मृत्यु होती है। विस्फोटों से आई विभीषिका का ठीकरा भी आम आदमी के सिर ही फूटता है।
इसी प्रकार का प्रभाव दूसरे विकास कार्यों का होता है। अंधाधुंध खनन से लाभ खनन माफिया को होता है। खनिज का उपयोग मुख्य रूप अमीरों की इमारत बनाने के लिए किया जाता है। सरकार को अवैद्य खनन से राजस्व कम और सरकारी कर्मियों को घूस ज्यादा मिलती है। नदी के पाट में अतिक्रमण का प्रभाव भी ऐसा ही है। अतिक्रमण प्रभावी वर्ग ही करता है। अमीर को सस्ती भूमि मिल जाती है। सरकार को रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं मिलता है। हाँं घूस भरपूर मिलती है। इनके कार्यों के विपरीत सड़क निर्माण का आम आदमी पर सुप्रभाव पड़ता है। उसके लिए आवागमन सुगम हो जाता है। कालेज, अस्पताल और साफ्टवेयर पार्क बनाने का आधार बनता है। इनसे दीर्घकालीन और उच्चकोटि के रोजगार स्थापित होते हैं, जैसे लेक्चरर या साइंटिस्ट के।
समग्र दृष्टि से देखने पर विभीषिका के कारणों में मात्र सड़क बनाना ही लाभप्रद दिखता है। सड़क निर्माण से आपदा में वृद्धि न हो, इसके लिए डायनामाइट का उपयोग अपरिर्हाय स्थिति में ही किया जाए। छेनी और सब्बल से ही पहाड़ काटना चाहिए। हां इससे निर्माण कार्य धीमी गति से होगा, पर पहाड़ जर्जर होने से बच जाएंगे।
अवैध खनन, अतिक्रमण और जल विद्युत परियोजनाएँं इस विभीषिका के कारण हंै। इन परियोजनाओं में घूस वसूलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। जानकार बताते हैं कि जल विद्युत परियोजनाओं के अनुबन्ध पर दस्तखत करने की एक करोड़ रूपये प्रति मेगावाट की घूस दी जाती है?
उत्तराखण्ड में 40,000 मेगावाट की सम्भावना को देखते हुए घूस की इस विशाल राशि का अनुमान लगाया जा सकता है। इन कार्यों से राज्य सरकार गरीब पर आपदा डालकर अमीर को लाभ पहुँचा रही है और इस पाप में अपना हिस्सा बटोर रही है। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
गम्भीर गुनाह
बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने परियोजनाओं को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है।