Monday, December 28, 2015

उत्तर प्रदेश बने उद्योग प्रदेश

विश्व में जब से औद्योगिक क्रान्ति हुई है तभी से ही कई देशों ने उद्योगों की स्थापना से विकास के सर्वोच्च शिखर को फतह किया है। मानव सभ्यता का कोई भी बिन्दु औद्योगिक विकास से अछूता नहीं रहा। औद्योगिक क्रान्ति ने समाज में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव किये। औद्योगिक क्रान्ति से भारत में भी अलग-अलग पंचवर्षीय योजनाओं में उद्योगों की स्थापना की गई जिससे स्वतंत्रता के 67 साल बाद आज हम विकसित देशों से लोहा लेने को तैयार खड़े हैं और कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भी हैं। कई प्रदेशों ने भी अपने यहाँ उद्योगों की स्थापना की और राष्ट्रीय आय में योगदान दिया और इसके बदले वह केन्द्र से विकास राशि में अधिकतम हिस्से की माँग करते हैं, परन्तु जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़े राज्य में उद्योगों की स्थिति वह नहीं हो पाई जो गुजरात या महाराष्ट्र की है। यह ऐसा प्रदेश है जिसका योगदान राष्ट्रीय आय में ककम लेकिन अनुदान लेने में ज्यादा है।
अर्थशास्त्र कहता है कि आर्थिक विकास की अपेक्षा रखने वाले राज्यों को उद्योग पर पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए लेकिन उत्तर प्रदेश ऐसे किसी भी सिद्धान्त को सिरे से खारिज करता है। सरकारें बदलती रहीं लेकिन किसी भी सरकार ने प्रदेश के औद्योगिक विकास में रुचि नहीं दिखाई। बल्कि हर एक राजनीतिक दल ने धर्म और जाति की राजनीति की, जिसका विद्रूप उदाहरण हमने अभी कूछ दिन पहले देखा। अगर प्रदेश पर राज करने वाले दलों ने औद्योगिक विकास के लिए देश के बड़े-बड़े घरानों को प्रदेश आने का न्योता दिया होता तो आज तस्वीर ही कुछ और होती। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यदि किसी देश या प्रदेश का अर्थशास्त्र अच्छा होगा तो उसका समाजशास्त्र स्वतः ही मजबूत हो जायेगा। उद्योगों से बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी जैसी समस्याएँ दूर करने में बहुत मदद मिलती है। आम लोगों के साथ-साथ उद्योगपतियों को भी इसका फायदा मिलेगा। इससे प्रोत्साहित होकर वे प्रदेश में और ज्यादा पैसा निवेश करेंगे जो विकास के काम आयेगा।
हालाँकि कानपुर, फिरोजाबाद, आगरा, मेरठ आदि औद्योगिक नगर हैं लेकिन जैसा उनसे व्यवहार किया जाता है उसे देखकर लगता नहीं है कि प्रदेश में औद्योगिक नगरों की कोई कद्र होती है। इस युग में विकास का पहिया विद्युत आपूर्ती के चारों ओर घूमता है और यही इन नगरों में लकवाग्रस्त है। सरकार के पास इस बिमारी का कोई इलाज भी नहीं है क्योंकि बिजली भी सरकार की लचर व्यवस्था की शिकार है। दूसरी ओर इन शहरों में सड़कें भी दुरुस्त नहीं है जिससे होकर विकास की ट्रक का पहिया सही सलामत निकल सके। यहाँ वह औद्योगिक पर्यावरण ही नहीं है जो प्रदेश की आर्थिक व्यवस्था को मजबूती दे सके। हालाँकि कुछ बड़े नेताओं ने यहाँ पर उद्योगों की स्थापना का काम किया है जिसमें रायबरेली और जगदीशपुर औद्योगिक क्षेत्रों का नाम लिया जा सकता है। लेकिन ये क्षेत्र बड़े राजनीतिक घरानों से ताल्लुक रखते हैं और दूसरे किसी जिले को यह सौभाग्य नहीं मिला। यह स्थापित सच है कि एक फैक्ट्री की स्थापना अपने साथ कई तरह के रोजगार लाती है। एक औद्योगिक इकाई अगर अपनी चहारदीवारी के अन्दर संगठित श्रमिकों को रोजगार देती है तां वहीं बाहर वह असंगठित श्रमिकांे को विभिन्न प्रकार के धन्धोे के लिए प्रेरित करती है। ये वे लोग हैं जो अपने सेवाओं और छोटे-मोटे व्यवसायों से फैक्ट्री को सहायता देने के साथ-साथ अपना और अपने परिवार का पेट पालते है। औद्योगिक विकास के लिए जहाँ एक ओर निर्बाध विद्युत आपूर्ती चाहिए वहीं दूसरी ओर मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति भी। पिछले कई सालों से प्रदेश में दोनों का ही प्रभावी रूप से अभाव रहा है। शायद यही वजह है कि कोई भी उद्योगपति प्रदेश का रुखनहीं करना चाहता है। औद्योगिक वातावरण न होने से प्रदेश के अधिसंख्य युवक बेरोजगार हैं। वे अपनी रोटी की जुगत में दूसरे प्रदेशों का रुख करते हैं। जहाँ वे ताना सुनते हैं कि ‘‘यू॰पी॰ के भईया चोर हैं’’। उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का नारा तो दिया जाता है लेकिन उद्योग प्रदेश का नहीं।
चुनावों राजनीतिक दलों को उद्योगों को अपने चुनावी घोषाणापत्रों में प्रमुखता से जगह देनी होगी। ये प्रदेश के विकास में उनकी कटिबद्धता को दिखायेगा। क्योंकि उत्तर प्रदेश के निवासी अब अपनी लगातार पिछड़ती हुई हालत से उकता चुके है। कहना गलत नहीं होगा कि एक जमाने में जिस प्रकार समाज के दलित वर्ग की हालत थी वही अब उत्तर प्रदेश की हो गई है। जैसे उन वर्गों को आरक्षण और अन्य योजनाओं आदि की व्यवस्था करके समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया गया ठीक वैसे ही भागीरथ प्रयास उत्तर प्रदेश्रा की बदतर होती औद्योगिक व्यवस्था को सुधारने के लिए करना होगा। जिससे वह अर्थ जगत की मुख्यधारा में शामिल होकर देशी और विदेशी निवेश को आकर्षित और आमंत्रित कर सके। औद्योगिक विकास इसलिए भी जरूरी है कि प्रदेश से ‘‘ब्रेन ड्रेन’’ रोका जा सके। जैसा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी कहा करते हैं। यहाँ तकनीकि शिक्षा देने वाले विश्वस्तरीय शैक्षणिक संस्थान हैं जिनमें देश-विदेश से विद्यार्थी आते है और शिक्षा लेते हैं लेकिन उनके लिए यहाँ नौकरी का अकाल है। अगर प्रदेश में ही उनके लिए नौकरी की व्यवस्था हो तो निश्चित तौर पर वे यहीं की औद्योगिक इकाईयों में काम करके यहाँ के विकास में अपना योगदान देंगे। फिलहाल तो औद्योगिक विकास और प्रदेश, दोनों ही नदी के दो किनारों की तरह एक दूसरे से मिलने को तरस रहे हैं। लेकिन लगता है कि उनके बीच की राजनीतिक नदी बहुत ही तेज बी रही है जिससे दोनों ही किनारों की मिट्टी लगातार कमज़ोर होकर नदी में मिलती जा रही है और किनारे दूर होने जा रहें हैं।
- डाॅ॰ रोहित मिश्र
समाजकार्य विभाग, लखनऊ विश्व विद्यालय, आई.सी.एस.एस.आर. दिल्ली के पोस्ट डाॅक्टोरल फेलो।