इस वर्ष 26 नवम्बर, 2015 से प्रारम्भ हुए शीत कालीन सत्र के पहले दो दिन संविधान पर चर्चा हुई तथा इसके साथ ही प्रतिवर्ष 26 नवम्बर को संविधान दिवस मनाने की शुरूआत हो रही है। इस अवसर पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान के सम्बन्ध में तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं- (1) संविधान हमारा धर्मग्रन्थ है। (2) 26 नवम्बर संविधान दिवस हमारे गणतन्त्र दिवस 26 जनवरी का आधार है। (3) भारत के समस्त नागरिकों को अपने संविधान के सम्बन्ध में जानकारी हो इस हेतु जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। अतः संविधान की मूलभूत बातें जिनमेे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों, अपने मूल कर्तव्यों और अपने मौलिक अधिकारों सम्बन्धी संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।
संविधान की प्रस्तावना - हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर संविधान सभा में तारीख 26 नवम्बर, 1949 को संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। 26 जनवरी 1950 को इस पर संविधान सभा ने हस्ताक्षर किए और इसके साथ ही प्रभावी हो गया।
संविधान में 448 अनुच्छेद, 25 हिस्से, 12 अनुसूचियां, 5 परिशिष्ट और 98 संशोधन हैं। 26 जून 1976 आपातकाल के समय जब देश के सभी राजनेता जेलों में बंद थे तब बिना संसदीय बहस के 42वें संशोधन के द्वारा संविधान में समाजवादी व पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़े गये, जिसमें पंथ निरपेक्षता को अब धर्म निरपेक्षता कहा जाने लगा है। इस वर्ष 26 नवम्बर, 2015 सविधान दिवस पर लोक सभा मे पहले दिन बोलते हुए गृहमन्त्री राजनाथ सिंह ने स्मरण कराते हुए कहा कि पिछले वर्षों में भारत में इस पंथनिरपेक्ष (सेकुलर) शब्द का सबसे अधिक दुरूपयोग हुआ है, जो अब रुकना चाहिए।
नीति निर्देशक तत्व - राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि पुरुष और स्त्री को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो, समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियन्त्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम साधन हो आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-संसाधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी सकेन्द्रण न हो, पुरुषों और स्त्रियों दोनो को समान कार्य के लिए समान वेतन हो, आर्थक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को एसे रोजगारों में न जाना पड़े जो आयु व शक्ति के अनुकूल न हो, बालकों को गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधायें दी जायें और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों के शोषण से तथा नैतिक और आर्थक परित्याग से रक्षा की जाये।
नागरिक कर्तव्य -
1. प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।
2. स्वतन्त्रता के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोकर रखना और उनका पालन करना।
3. भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करना और उसकी मर्यादा बनाये रखना।
4. देश की रक्षा और आवाहन किए जाने पर राष्ट्र की सेवा।
5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो। ऐसी प्रथाओं का त्याग जो स्त्री सम्मान के विरुद्ध हैं।
6. सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझना और उसका परीक्षण करना।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अन्र्तगत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा और उसका सम्वर्धन तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास।
9. सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखना और हिंसा से दूर रहना।
10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले।
11. माता-पिता छह वर्ष से चैदह वर्ष तक की आयु वाली सन्तान को शिक्षा का अवसर प्रदान करे।
मौलिक अधिकार - मौलिक अधिकारों में प्रमुख रूप से (1) समानता का अधिकार, (2) स्वतन्त्रता का अधिकार, (3) शोषण के विरुद्ध अधिकार, (4) धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार, (5) संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार और (6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार आते हैं।
यदि हम सब अपने कर्तव्यों का पालन करें तो हमारे अधिकारों का संरक्षण स्वतः ही हो जाता है। इस हेतु संविधान साक्षरता अभियान चलाने की आवश्यकता है।
- कृपाशंकर चैबे
एसोशियेट प्रोफसर, महात्मा गांधी वि॰वि॰, कोलकता।





