Saturday, December 26, 2015

पर्यावरणीय समस्याओं से जूझता विश्व और हमारी भूमिका

विश्व के समक्ष आज जो भी पर्यावरणीय समस्यायें मुहँ बाये खड़ी हैं, वह चाहें ग्लोबल वार्मिंग हो, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो, ओजोन की परत का क्षरण हो, जल, वायु या मृदा प्रदूषण हो, सागरों के जल स्तर में वृद्धि, ग्लैशियरों का पिघलना अथवा सदानीरा अमृत तुल्य जल वाली नदियों का प्रदूषित होना हो सब के मूल में विकास की अंधीदौड़ है और उसके उत्तरदायी हम सब हैं। आज कहा जा रहा है कि वायुमण्डल का तापमान यदि 2 डिग्री सेल्सियस से आगे बढ़ गया तो सागर का जल स्तर 2 से 3 मीटर बढ़ जायेगा और टोक्यो, मुम्बई जैसे महानगरों का क्षेत्र जल मग्न हो जायेगा जिससे 30 से 40 प्रतिशत आबादी प्रभावित होगी। धरती का तापमान बढ़ना हमारे शरीर में आये बुखार के समान है। यदि शरीर को बुखार बना रहे तो शरीर की जो दुर्गति होती है वही हाल पृथ्वी व पृथ्वी वासियों का होगा। अतः तत्काल बुखार को कम करने के उपाय करने आवश्यक होंगे। धरती के बुखार को कम करने के लिए जितना हम प्रतिदिन कार्बन का उत्सर्जन करते हैं, उसके अनुपात में हमें वनावरण तैयार करना होगा। इसके लिए अमेरिका जैसे विकसित देश चाहते हैं कि जो कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, उसमें विकासशील देश कटौती करें और विकासशील व गरीब देश उसकी भरपाई हेतु अपने यहाँ जंगल लगायें। भारत भी 35 से 40 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन की कटौती की बात कर रहा है तथा निराकरण हेतु हरित उर्जा की ओर कदम बढ़ने के लिए संकल्पित है।
संसार का हर जीवमान विकासमान है। जिस दिन उसका विकास रुक जाता है, उस दिन से उसकी मृत्यु की उलटी गिनती प्रारम्भ हो जाती है। अर्थात कह सकते हैं कि विकास का रुकना मृत्यु का परिचायक है। अतः किसी भी राष्ट्र या समाज का निरन्तर विकास के लिए प्रयत्नशील होना आवश्यक है। परन्तु विकास की दिशा और दृष्टि यदि सही है तो विकास में स्थायित्व होगा और वह प्रकृति मित्र व समाज के लिए मंगलकारी होगा। अतः विकास मार्ग पर चलते हुए हमें कुछ मूलभूत मर्यादाओं का पालन एवं उस कसौटी पर अपने द्वारा किए गयें कार्य व उसके बाद के परिणामों को कसना होगा। कसौटी पूर्ण वे मर्यादायें हैं, कि- हमारे द्वारा किए गये कार्य व उसके परिणामों से प्रकृति, समाज व  संस्कृति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचनी चाहिए।
महात्मा गाँधी ने प्रकृति के सम्बन्ध में कहा था, कि ‘‘प्रकृति हमारी सभी जरूरतें पूरी करने में सक्षम है, परन्तु वह हमारे लालच पूर्ण भोग की पूर्ति नहीं कर सकती।’’ इसीलिए हमारे ऋषियों ने कहा था, ‘‘तेन त्यक्तेन भुंज्जीथा’’ अर्थात त्याग पूर्व भोग करो। इसके साथ ही हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि प्रकृति का एक चक्र है, एक लय है, यदि उस चक्र की एक भी कड़ी या लय को हानि पहुँचाई तो उसका दुष्परिणाम समस्त प्रकृति पर पड़ेगा।
अतः यदि हम अपने जीवन में निम्नांकित दो सिद्धान्तों का विचार कर कार्य करें तो उपरोक्त सभी समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो जायेगा।
मूलभूत सिद्धान्त - (1) प्रकृति से हम जितना लेते हैं, उसका सवा गुना लौटायें। (2) हमारी जीवनचर्या या गतिविधियों के कारण प्रकृति को जितनी हानि होती है, क्या उसकी भरपाई करें।
इस हेतु हमें पहल स्वयं से करनी होगी। हम जहाँ, जिस परिसर मे प्रभावी भूमिका में हैं वहाँ से कार्य प्रारम्भ करना होगा, जिससे वहाँ के लोगों के जीवन में प्रकृति के अनुरूप जीने का संस्कार बने और समाज का अनुकरणीय प्रेरणा बन सके।
अपने परिसर हेतु अनुकरणीय कार्य -
(1) जल प्रबन्धन - भूमि या वायुमण्डल से हम जितना जल लेते हैं, क्या उसके अनुपात में हम लौटाते हैं उत्तर होगा नहीं, जिसका परिणाम हम देख रहे हैं। भूमि से हम निरन्तर अन्धाधुन्ध पानी निकालते जा रहे हैं, लेकिन भूमि की कोख में भरने के प्रति उदासीन हैं। परिणाम स्वरूप भूमि का जल स्तर निरन्तर गिरता जा रहा है। उत्तर प्रदेश के 50 से अधिक विकास खण्ड डार्कजोन में चले गये हैं। कुएँ, तालाब सूख गये हैं। नदियों के स्रोतों ने पानी देना बन्द कर दिया है, जिसके कारण छोटी नदियाँ सूख गई हैं और बड़ी नदियाँ सूखने की कगार पर हैं। यदि इसी अनुपात में भूजल शोषण चलता रहा तो कुछ ही समय में स्वच्छ पेय जल का गंभीर संकट खड़ा हो जायेगा जिसके उत्तरदायी हम सब होंगे। अतः अपने परिसर में हम जल प्रबन्धन से कार्य प्रारम्भ करें, जिनमें मुख्यतः हैं।
पहला (रिचार्जिंग) - अपने परिसर के समस्त वर्षा जल को वैज्ञानिक पद्यति से भूगर्भ पुर्नभरण (रिचार्जिंग) में भेजने की स्थानीय सरल तकनीक की विविधि संरचनायें बनायें तथा भूगर्भ जल स्तर के परिवर्तन को एक पटल पर अंकित करें। 
दूसरा (जल संभरण) - वर्षा जल के संभरण की संरचनायें बनायें, जिसका प्रयोग हम दैनन्दिन उपयोग के विविध कार्यों में कर सकें। इससे भूगर्भ से जल लेने में कमी आयेगी।
तीसरा (जल शोधन एवं पुर्नउपयोग) - हम जो जल प्रयोग करने के बाद प्रदूषित अवस्था में नालों द्वारा बहा देते हैं जो अन्ततः हमारी नदियों को प्रदूषित करता है। यदि हम उस जल के शोधन की व्यवस्था अपने परिसर में ही बनायें और फिर उसके बाद उसका फिर से उपयोग वहीं पर करें, जैसे सिंचाई, फसल आदि। इससे भूगर्भ जल के उपयोग में कमी आयेगी और भूजल स्तर बढ़ने में मददगार होगा।
चैथा (जल उपयोग में कमी) - हम प्रतिदिन जितना जल उपयोग करते हैं, उसमें विचार करें कहाँ-कहाँ, किस विधि के प्रयोग से जल उपयोग में कमी कर सकते हैं। सामान्यतः टोटियों को ठीक रखकर, सिंचाई (टपक, फव्वारा, नाली) पद्धति बदल कर।
पाचवाँ (भूजल प्रदूषण मुक्ति) - हम अपने परिसर में ऐसी कोई संरचना न बनायें जिसके कारण भूजल के साथ ही भूजल-धारा में किसी प्रकार का प्रदूषण पहुँचने की सम्भावना हो। इसमें हैण्डपम्प के पास जल भराव, गलत सोकपिट, बोरिंग द्वारा सीधे रिचार्जिंग,  प्रदूषित जल को बोरिंग द्वारा भूगर्भ में डालना तथा रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग आदि।
छठवाँ (जल स्रोत संरक्षण) - यदि हमारे परिसर में कोई जल स्रोत कुआँ, तालाब आदि है तो उसके संरक्षण एवं पुर्नजीवन के कार्य की आवश्यकता है। इस हेतु छात्र समूह या कालेज किसी एक जल स्रोत को गोद लेकर उसके संरक्षण का एक माॅडल विकसित करके अनेकों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
सातवाँ (नदी तट/घाट पर कार्य) - हमारे परिसर द्वारा निकटस्थ किसी नदी के घाट पर स्वच्छता, श्रमदान, पूजन, दीपदान आरती एवं सामयिक उत्सवों एवं मेंलों के अवसर पर प्रबन्धन के वह सब कार्य करना जिससे वहाँ का तट स्वच्छ रहे और लोगों को स्वच्छता का संस्कार व पे्ररणा भी मिल सके।
(2) वृक्षावरण - पहले हम विचार करें कि हमारे परिसर द्वारा कितनी मात्रा में आक्सीजन का उपयोग हो रहा है तथा हमारे परिसर में प्रयुक्त उपकरणों द्वारा कितनी मात्रा में हानिकार गैसों का उत्सर्जन होगा है, फिर उस अनुपात में प्रकृति को लौटाना तथा भरपाई हेतु कितने पेड़ों की आवश्यकता है का अध्ययन करें और उसके अनुरूप आवश्यक वृक्षावरण विकसित करें। यदि परिसर में पेड़ लगाने की जगह कम है तो उसके विकल्प हेतु किसी अन्य स्थान पर उतने पेड़ लगायें और उनको संरक्षित रखने की व्यवस्था करें।
(3) स्वच्छता एवं कचरा प्रबन्धन - हमारा परिसर स्वच्छ रहे, इसका प्रबन्ध तथा परिसर से जो कचरा निकलता है उसके निस्तारण की उचित व्यवस्था का निर्माण करना। इस हेतु जैविक, अजैविक व रासायनिक कचरे को अलग-अलग रखने, संग्रहण व निस्तारण की व्यवस्था। स्वच्छता का संस्कार परिसर में विकसित हो इस हेतु स्वच्छता के साथ ही जगह-जगह कूड़ेदानों एव उनके खाली करने की व्यवस्था। कचरे के निस्तारण की तकनीक एवं व्यवस्था का उपयोग।
(4) स्वच्छ ऊर्जा प्रबन्धन - सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा, बायोगैस आदि के प्रयोग को बढ़ावा, अधिक ऊर्जा खपत वाले उपकरणों का न्यूनतम उपयोग तथा परिसर का ताप नियन्त्रित रखने हेतु ऊर्जा रहित तकनीक का प्रयोग लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
(5) सहभागी प्रबन्धन - परिसर की उपरोक्त व्यवस्था में वहाँ से सम्बन्धित सभी की सहभागिता एवं उत्तरदायित्व निर्धारित हो तथा वह सभी अपने कार्य को सर्वोत्तम विधि से कर सके इस निमित्त उनके मध्य गौरव की भावना एवं प्रतियोगी भाव जगाना उपयोगी हो सकता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों में छात्रों व छात्र समूहों (एन.एस.एस., एन.सी.सी. आदि) की भूमिका आदि।
(6) जागरूकता कार्यक्रम - समय-समय पर जागरूकता के कार्यक्रम जैसे, गोेष्ठी, श्रमदान, स्वच्छता,  पर्यावरण प्रतियोगिता (लेख, चित्रकला, माॅडल निर्माण, भाषण, वाद-प्रतिवाद, कार्य निष्पादन आदि), पदयात्रा, रैली, ज्ञापन, पत्राचार, आदि अनेक कार्य व कार्यक्रमों के द्वारा पर्यावरण के अनुकूल सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक कदम बढ़ा सकते हैं।
(7) प्रेरक पहल - (1) पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अनेक करणीय कार्य हैं, हमारे संकल्प से हमारा परिसर पर्यावरण के अनकूल कार्यों का एक माॅडल बन सकता है, जो दूसरों को भी पे्ररणा देगा। (2) हमारे परिसर द्वारा ऐसी उत्तरदायी टीमें विकसित हो सकती हैं जो अन्य परिसरों में परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ कर सकते हैं। इस निमित्त छात्रों के घर, कालोनी तथा उनके गांव भी हो सकते हैं। (3) हमारे द्वारा पर्यावरण के सम्बन्ध में प्रशिक्षक तैयार हो सकते हैं जो जहाँ माँग हो वहाँ जा कर प्रेरणा दे सके व कार्य प्रारम्भ करा सके। (4) पर्यावरण के अनुरूप कार्य करने वाले अनेक व्यक्ति व अनेक परिसर, संस्थान पहले से भी हैं या अब कार्य प्रारम्भ कर रहे हैं, उनकी जानकारी एकत्र करना तथा उनके मध्य समन्वयक की भूमिका निभा सकने वाले पे्ररक कार्यकर्ताओं का विकास हमारे द्वारा हो सकता है। हमारे द्वारा एक पे्ररणा-दीप जल सकता है।
- बृजेन्द्र पाल सिंह