Friday, December 25, 2015

सम्पादकीय

परम्परागत सभ्यता पोषणीय समृद्धि एंव आनन्दप्रदायिनी रही है। भारत की सनातन संस्कृति इस सभ्यता की अनुगामिनी रही है। परम्परागत जीवन सर्वव्यापी आत्मदर्शन के विचार पर स्थापित रहा है। इसमें जल, जमीन, जंगल, जानवर एवं समस्त जीव-जन्तुओं के मध्य संतुलन का भाव विद्यमान रहा है। जलचर, थलचर एवं नभचर के पारस्परिक समन्वय से समस्त ब्रह्माण्ड की व्यवस्था संचालित होती थी। ‘अभ्युदय’ की अवधारणा में क्षिति, जल, पावक, गगन, एवं समीर में समरसता रही है। इसमें ‘सर्वहिताय’ एवं ‘सर्वसुखाय’ की अवधारणा को सम्यक् स्थान प्राप्त था। लेकिन आधुनिकता के नाम पर अंधाधुंध विकास की ईप्सा ने समग्र व्यवस्था में विष घोल दिया। इससे विनाश लीलायें अदम्य कहर बरपा रही हैं।
भौतिक  विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का जिस अंधाधुंध दंग से दोहन हुआ है उससे असाध्य विपदायें जन्म लेती जा रही हैं। पर्यावरणीय एवं पारिस्तिथकीय अंसतुलनों ने जीव-जन्तु, पेड़-पौधों, एवं चर-अचर सबके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। जब तक मानव परम्परागत जीवन-शैली जीता रहा न तो जल का संकट था, न जलवायु का। लेकिन पदार्थों के उत्पादन को बढ़ाकर विकास की गति को तेज करने की लालसा ने सृष्टि के मूलाधारों पर ऐसा कुठाराघात किया कि मानव सभ्यता की चूलें ही हिल गयी हैं।
आधुनिक सभ्यता की कंकरीट नगरीय यन्त्रों से चालित औद्योगिकीकरण ने एक ओर जहां जल-स्त्रोतों को बेतरह तबाह कर दिया वहीं साथ-साथ जल को प्रदूषित कर अनेकानेक व्याधियों को जन्म दिया। नदियों, तालबों, पोखरों, झीलों एवं झरनों का रुग्ण होकर मृतप्राय होना आधुनिक शैतानी सभ्यता का ही दुष्परिणाम है। गोमती सहित अन्य नदियों व आनुसांगिक जल-स्रोतों की स्वच्छता एवं उनके पुनर्जीवन की सदीक्षा रखने वाले लोगों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती ‘त्वरित’ एवं ‘पोषणीय’ विकास के मध्य किसी एक का वरण करने की है। जब तक सृष्टि के सदाचारी नियमों का अनुपालन नहीं होता, नदियों का काल-कवलित होना अवश्यसम्भावी है। यदि नदियां मरीं तब सर्वविनाश निश्चित है। अब भी समय है चेत जाने का। पश्चिम के विकसित औद्योगिकीकृत देश बारम्बार संकट से काँँँप रहे हैं। उन देशों की पैशाचिक संस्कृति को आत्मसात करने की रीति-नीति पर अंकुश लगने से ही बात बनेगी; अन्यथा की स्थिति में सर्वविनाश तय है। भारत की बौद्धिक पूँजी विनाशगामिनी भौतिक संस्कृति के उद्दाम व्यवहार को नियंत्रित करने की शक्ति रखती है। आवश्यकता है उसे उद्दीपित करने की।
लोक भारती भारतीय सनातन परम्परा में रचे-बसे ‘अभ्युदय’ की कामना करते हुए सृष्टि संतुलन के सरोकारों के प्रति समर्पित एवं प्रयासरत है।
- डाॅ॰ भारती पाण्डेय