आज हमारे बीच पूर्व राष्ट्रपति ए॰पी॰जे॰अब्दुल कलाम नहीं हैं, परन्तु उनके द्वारा युवाओं को दिलाई जाने वाली सात शपथ हैं, जो उनका हमेशा मार्गदर्शन करती रहेंगी।
पहली शपथ - ‘मैं मानता हूँ कि मुझे अपने जीवन में एक लक्ष्य तय करना है। लक्ष्य पाने के लिए मैं ज्ञान हासिल करूंँगा, मेहनत करूँगा और जब कोई समस्या आई, तो उस पर विजय प्राप्त कर सफल बनूंँगा।’
दूसरी शपथ - ‘अपने देश का एक युवा होने के नाते मैं अपने लक्ष्य्र में सफल होने के लिए हिम्मत से कार्य करूँगा और दूसरों की सफलता पर प्रश्न्न होऊँगा।’
तीसरी शपथ - ‘मैं हमेशा अपने घर, परिवेष को व्यवस्थित और स्वच्छ रखूँगा।’
चैथी शपथ - मैं मानता हूँ कि सदाचार से चरित्र निश्छल बनता है, निश्छल चरित्र से घर में मेल-जोल रहता है, घर में मेल-जोल से राष्ट्र व्यवस्थित रहता है और व्यवस्थित राष्ट्र से विश्व में शान्ति आती है।’
पाँचवी शपथ - ‘मैं भष्टाचार से मुक्त एक ईमानदार जीवन व्यतीत करूँगा और सदाचारपूर्ण जीवन अपनाने के लिए स्वयं दूसरों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करूँगा।’
छठी शपथ - ‘मैं देश में ज्ञान का प्रकाश फैलाऊँगा और कोशिश और कोशिश करूँगा कि हमशा फैलाता रहूँ।’
सातवीं शपथ - ‘मैं मानता हूँ यदि मैं हर एक कार्य ठीक से करूँगा, तो 2020 तक एक विकसित भारत बनाने के मिशन को साकार करने में अपना योगदान दे सकूँगा।’
आज समाज में समृद्धि और सद्ज्ञान की कमी नहीं है। समृद्धि बढ़ती जा रही हैं। जानकारियाँ बढ़ती जा रही हैं, ज्ञान बढ़ रहा है, कमी हे तो अपने ज्ञान को बाँटने के भाव और व्यवहार की। राष्ट्रपति पद के अपने कार्यकाल के दौरान उनके द्वारा राष्ट्र-निर्माण के सपने देखते रहना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात हे अपने सपनों को पैतालीस करोड़ युवाओं की आँखें में उतारना।





