Tuesday, December 29, 2015

राष्ट्र निर्माण और युवा शक्ति - नवल किशोर

आधुनिक भारत युवाओं का देश है, 125 करोड़ आबादी में 60 करोड़ युवा-युवतियाँ है। इस विशाल युवा जन समूह को अपनी प्रतिभाओं की पंखुड़ियों को पूर्ण रूप से प्रसारित करने का, अपनी ताजगी भरी चेतना का उन्मेष करने का, अपने स्वतंत्र अस्तित्व की सुगन्ध से समाज और राष्ट्र के हर क्षेत्र को सुव्यवस्थित करने के सही अवसर और दिशायें मिलती हैं क्या?
जिस देश के युवाओं के सामने समुचित आदर्श न हो, कर्म परिकल्पना न हो, मूल्यों की धारणा न हो, केवल स्वार्थपरता, आलस्य, उदासीनता, कर्मविमुखता, भ्रष्टाचार से पूर्ण सामाजिक परिवेश हो तो वहाँ युवा शक्ति का दिशाहीन होना अवश्यम्भावी है। ‘युवाशक्ति’ इस शब्द से परिश्रम, सक्रियता, उत्साह, कर्मठता, आत्मविश्वास, त्याग, सहानुभूति, उदारता और तेजस्विता की अवधारणा मन में आती है।
ऊर्जा जन्मती है पर अपना उपयोग स्वयं नहीं कर पाती वही ऊर्जा चिकित्सालय रोग निदान का साधन बनती है, विद्यालय में अध्ययन, अध्यापन को सुगम बनाती है। विज्ञान के क्षेत्र में वही ऊर्जा नये शोध करती है। वही ऊर्जा आतंकवाद फैलाती है। तो वही ऊर्जा पशु वध कराती है। निर्भर होता है किसको किसका सानिध्य मिला, बल्कि यह कहा जाये, उस ऊर्जा का भगीरथ कौन बना? गंगा तो लिपटी सोई थी पिनाकवाणी शिव की जटाओं में, ऊर्जा थी नरेन्द्र में, स्वामी रामकृष्ण ने नरेन्द्र की ऊर्जा को विवेकानन्द का रूप दिया, जिसने सम्पूर्ण दुनिया में हिन्दु धर्म एवं हिन्दु संस्कृति की विजय पताका फहराई। ऊर्जा थी शिवाजी में, स्वामी समर्थ गुरू रामदास जी ने मुगल अत्याचार एवं मुगल शासन को समाप्त करके हिन्दु साम्राज्य की स्थापना कर शिवाजी को छत्रपति बनाकर शासन का नेतृत्व दिया। आचार्य चाणक्य ने भारत की अखण्डता और एकता के लिए चन्द्रगुप्त की ऊर्जा को सम्राट चन्द्रगुप्त के रूप में स्थापित किया। ऊर्जा थी डा॰ हेडगेवार में, जिसे डा॰ हेडगेवार ने माधव को गेरुआ वस्त्र पहना सन्यस्त होने के बजाए भारत को परमवैभव हेतु कंटकहीन बनाने के कार्य में जुटा दिया। ऊर्जा थी विनायक दामोदर सावरकर में जिन्होंने  कितने ही युवकों को देश की स्वतंत्रता के लिए सुख वैभव को त्यागकर जीवन का अध्र्य चढ़ाने को तैयार किया। अर्थात ऊर्जा का सही उपयोग एवं दिशा की आवश्यकता होती है। इसके अनुकूल एवं उपयुक्त वायुमण्डल चाहिए।
भारत के प्रधानमन्त्री जब मोरार जी देशाई थे तब आचार्य रजनीश देश में बड़ी चर्चा में थे। पुणे उनका केन्द्र था। एक व्यक्ति ने कुछ बाते जोड़कर मोरार जी को बताई, मोरार जी बोले कि रजनीश अभी छोटा है, युवा है, समझ जायेगा। उसी संदेश वाहक ने रजनीश से जाकर कहीं तो रजनीश ने उत्तर दिया और कहा ‘मोरार जी को जाकर कह दो, मैं उतना छोटा नहीं हूँ’, जीसस जिस धर्म को प्रेम के रूप में व्याख्यायित कर रहे थे तो लोगों ने यही कहा था, ‘कि जीसस अभी छोटा है, समझ जायेगा। विवेकानन्द भी जब शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भारतीय दर्शन की व्याख्या कर रहे थे, तो लोगों ने सही कहा था कि स्वामी अभी छोटा है। समझ जायेगा। जगतगुरू शंकराचार्य जब धर्म का मर्म समझा रहे थे तो लोगों ने यही कहा था कि अभी छोटा है, समझ जायेगा।’ इस प्रसंग को उद्धत करके मैं यह स्मरण कराना चाह रहा हूँ कि जीसस हों या शंकराचार्य हों या विवेकानन्द हों सभी ने यह पाया कि युवावस्था में ही विश्व को कुछ दिया।
हमारा भारतीय बांगमय तो युवाओं की सिद्धियों से उनके तेज ओज से भरा हुआ है। ध्रुव युवा थे वे दृढ़ता के प्रतिमान बन गये, प्रहलाद युवा थे जब उन्होंने यह जान लिया कि नारायण सर्वत्र हैं, जल में, थल में, खड़ग में, खम्भ में। राम युवा थे, जब पिताजी की आज्ञा  शिरोधार्य कर सत्ता सिंहासन को त्याग कर वन में निकल गये थे। बुद्ध युवा थे जब संसार को समझने एवं प्राणी मात्र के कल्याण के लिए राजपाट त्याग दिया था। सम्राट अशोक युवा थे जब युद्ध से घृणा कर शस्त्र त्याग दिया था। राजा हर्ष युवा थे जब वर्षों की अर्जित सम्पदा प्रयाग में दान करने का निर्णय लिया था।
स्वामी विवेकानन्द कहते थे, कि ‘‘अगर मुझे सौ निष्ठावान, त्यागी सेवाभावना से युक्त निर्भीक युवा मिल जायें तो समाज की काया पलट कर सकता हूँ’’ उन्होंने विदेश प्रवास से लौटने पर शिष्या क्रिस्टायन को कहा था- "The Country is dead, The man making education is required" (राष्ट्र मृत प्राय है, व्यक्ति निर्माण की शिक्षा की आवश्यकता है)। राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यकता है तेजस्वी चरित्र सम्पन्न राष्ट्र भक्तों की जो अपने पूर्व पुरुषों के उज्ज्वल आदर्शों से ओतप्रोत हो, यह अपनत्व की अनुभूति जब कसक को जन्म देगी तभी भ्रष्ट जीवन की जिन्दगी दूर करेगी और भारत उन्ननि के शिखर की ओर प्रगति करेगा।
स्वामी रामदेव जी भी हर युवक एवं हर भारतीय को निम्नलिखित संकल्प लेने का आह्वान करते हैं - ‘‘मैं एक व्यक्ति नहीं, एक संस्कृति हूँ। मेरे प्राणों में भारत बसता है। हर भारतीय की पीड़ा मेरी वेदना है। भारत का उत्कर्ष मेरा उत्कर्ष है। अपने पुरुषार्थ से स्वयं का एवं राष्ट्र का भाग्योदय करूँगा। ऐसा संकल्प हर भारतीय का होना चाहिए।’’
प्रत्येक युवक को लगता है कि मै कहाँ करूँ और क्या करूँ? इसके उत्तर मे मैं यही कहना चाहँूगा कि आज नौकरी नहीं कर्म चाहिए, कार्यालय नहीं खेल भी चाहिए, कुर्सी नहीं धरती और सागर की छाती चाहिए, उठो! देखो! हिमाद्रि से लेकर सिन्धु तक फैली भारत की धरती तुम्हारे पुरुषार्थ को चुनौती देती है,। राजस्थान की तपती हुई माटी अपनी प्यास बुझाने के लिए आपकी ओर टकटकी लगाये निहार रही है। मध्य प्रदेश, उत्कल, महाराष्ट्र का वक्षस्थल हलधर की बाट जोह रहा है। आकाश को चूमती गिरिश्रंगों की ऊचाँईयाँ कर्मण्यता को आमन्त्रण दे रही है। रत्नगर्भा भारत वसुन्धरा अपने वैभव को करोड़ों करों में समर्पित करने को आतुर है। सागर अपनी सम्पदा अर्पित करने का खड़ा है। लक्ष्मी अपने पुत्रों को सर्वस्व देना चाहती है। पर कहाँ है वे कर? कहाँ है वे चरण? और कहा है वह दृष्टि?
स्वामी विवेकानन्द ने संजीवनी मंत्र के रूप में कहा - ‘तुम अपने आत्मत्व, स्वत्व को पहचानों। तुममें अदम्य, अपराजेय ऊर्जा सन्निहित है। यह ऊर्जा जब शक्तिमान हो जायेगी, आलस्य और निंद्रा पराभूत हो जायेगी तब निर्भय एवं साहसी होकर संगठित हो जाओगे तो भारत माता का कल्याण होगा।’
अतः उनका अविस्मरणीय अमर उद्घोष हुआ ‘‘उठो! जागो! एवं रुको नहीं जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये’’ उतिष्ठ, जाग्रत, प्राप्य वरान्निवोधत।’’