Tuesday, December 29, 2015

कृषि विकास में युवाओं की भूमिका - रामशरण

कृषि प्रधान देश भारत में सदैव से कृषि जीवन यापन का साधन रही है। समाज में ‘‘उत्तम खेती मध्यम वान, निकट चाकरी भीख निदान’’ की अवधारणा रही है। अन्नदाता किसान खेती का सूत्रधार रहा है व खेती उसे विरासत में मिलती चली आई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश की आबादी 34 करोड़ थी जो बढ़कर अब सवा सौ करोड़ हो गई है। देश का खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 1950-51 में 5.1 करोड़ टन था तो वर्ष 2013-14 में बढ़कर 26.57 करोड़ टन हो गया है। देश की 60 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या आज भी कृषि एवं इससे सम्बन्धित व्यवसायों पर आश्रित है। दुर्योग से कृषि आज भी व्यवसाय नहीं बन सकी है।
आजादी प्राप्ति के समय देश के सकल घरेलू उत्पाद (जी॰डी॰पी॰) में कृषि क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत था जो निरन्तर घटते हुए वर्तमान समय में 17 प्रतिशत रह गया है। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद वर्ष 2030 के दशक तक 35 करोड़ टन खाद्यान्न पैदा करने की चुनौती देश के समक्ष है।
देश के विकास का रास्ता इसके 6.4 लाख गाँवों से होकर गुजरता है तथापि विगत में देश के आर्थिक विकास का लाभ गाँवों की तुलना में शहरों को अधिक मिला है। ग्रामीण भारत की आबादी तेजी से बढ़ने के कारण कृषि पर निर्भर लोगों की आय घट रही है। गाँवों में वैकल्पिक रोजगार के अवसर कम हैं जिससे किसान वैकल्पिक लाभकारी व्यवसाय की तलाश में शहरों की ओर पलायन हेतु बाध्य हो रहें हैं।
वर्तमान समय में देश में कृषि एवं कृषक परिवारों की दशा सोचनीय है। किसान परिवार गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, कर्ज, घटती उत्पादकता एवं गुणवत्ता, मृदा का गिरता स्वास्थ्य, मंहगे बीज, खाद, उर्वरक, सिंचाई जल, सूखा-बाढ़, मौसम की बेरुखी आदि समस्याओं से जूझ रहा है साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण भी हो रहा है। नवीनतम वैज्ञानिक शोध तथा तकनीकी ज्ञान खेतों तक नहीं पहुँच रहा है। ऐसी परिस्थिति में लघु एवं सीमान्त कृषकों के लिए खेती घाटे का सौदा है तथा ऐसे 40 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। वर्तमान समय में देश में जोत का औसत आकार 1.16 हेक्टेयर है साथ ही मृदा की उर्वरा शक्ति लगातार कम होती जा रही है। इन समस्याओं के साथ ही एक समस्या खेती से युवाओं की बेरुखी है। विख्यात कृषि वैज्ञानिक डा॰ एम॰एस॰ स्वामीनाथन का मानना है कि युवाओं को खेती से जोड़े रखना बहुत बड़ी चुनौती है। इसरो के विशिष्ट वैज्ञानिक प्रो॰ वाई॰एस॰ राजन का कथन है कि देश में 13 से 35 वर्ष के 70 प्रतिशत युवा जिनकी आबादी लगभग 35 करोड़ है, के पास आधुनिक कौशल नहीं है। ऐसे लोग किशोरावस्था में ही गाँव छोढ़कर शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। उन्होंने कहा कौशल का संकट बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार एवं आय के साधनों की उपलब्धता की सम्भावनाएं अपार है। अतएव, देश को युवाओं की सोच एवं उनके जोश को भुनाना चाहिए।
देश में इस समय 77 कृषि विद्यालय हैं, इनसे प्रति वर्ष लगभग 50,000 छात्र निकलते हैं।
गरीब परिवार के युवाओं को रोजगार के लिए प्रशिक्षित करने और उत्पादक क्षमता बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल  विकास योजना (डीडीयू-जीकेवाई) शुरु की गई है। इस योजना के माध्यम से निर्धन एवं सीमान्त लोगों को लाभकारी योजनाओं तक पहुँचने के लिए सक्षम बनाया जाएगा। ग्रामीण गरीबों के लिए माँग आधारित कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी। इस योजना का मूल उद्देश्य यह है कि प्रशिक्षण लेकर युवा जीविकापार्जन से जुड़े। भारत सरकार के द्वारा ग्रामीण भारत के न केवल विकास पर जोर दिया जा रहा है अपितु ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को स्वावलम्बी बनाने की दिशा में भी प्रयास किया जा रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 87 वें स्थापना दिवस समारोह का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कृषि को नई ऊँचाई देने के लिए बनी निम्न चार योजनाओं का शुभारम्भ किया।
1. आर्या (अट्रैक्टिंग एण्ड रिटेनिंग यूथ एग्रीकल्चर): देश में युवाओं की बड़ी संख्या का लाभ उठाने के लिए आर्या नामक एक कार्यक्रम भारत सरकार के द्वारा प्रारम्भ किया जा रहा है। इसके अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रों के 35 वर्ष से कम आयु के युवाओं को कृषि की ओर आकर्षित करने के लिए विशेष कदम उठाये जाएंगे ताकि आजीविका के लिए शहरों की ओर युवाओं के पलायन को रोका जा सके। इस निमित्त एक सौ करोड़ रुपये का प्राविधान किया गया है।
इस कार्यक्रम के अन्तर्गत देश के चुने हुए प्रत्येक जिले के 400 युवाओं को शामिल किया जाएगा। देश के पर्वतीय एवं कम आबादी वाले हिस्सों से प्रत्येक जिले से 200 से 250 ग्रामीण युवाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाएगी। इस प्रकार अखिल भारतीय स्तर पर कुछ  दस हजार युवाओं को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन करने वाले कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा प्रत्येक युवा प्रत्याशी की क्षमताओं का आकलन कर उनके लिए उपयुक्त कृषि उद्यम का चयन किया जाएगा।
ज्ञातव्य है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के द्वारा देश में 642 कृषि विज्ञान केन्द्रों की स्थापना की गई है। ताकि राष्ट्रीय कृषि शोध प्रणाली के अन्तर्गत विकसित कृषि टेक्नालोजी किसानों को सुलभ हो सके। केन्द्र सरकार ने उपरोक्त के अतिरिक्त 109 कृषि विज्ञान केन्द्रों की स्थापना करने निर्णय लिया है। देश में 100 से अधिक शोध संस्थाएं भी है।
2. स्टूडेन्ट रेडी: कृषि के स्नातक छात्रों के साथ काम होगा। उन्हें उनके पाठयक्रम के अनुसार प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रथम चरण में पच्चीस हजार छात्रों का चयन होगा। यह कार्यक्रम कौशल विकास के साथ ही आत्मविश्वास भी पैदा करेगा। इसके तीन प्रमुख घटक हैं। पहला घटक है 24 सप्ताह का अनुभव आधारित प्रशिक्षण, दूसरा है 10 सप्ताह का ग्रामीण कृषि कार्य का अनुभव और तीसरा है 10 सप्ताह का उत्पादन इकाइयों में औद्योगिक प्रशिक्षण। इस योजना की परिधि व्यापक है तथा इसमें वायोएजेन्ट्स, जैव उर्वरकांे का उत्पादन, बीज उत्पादन प्रोद्योगिकी, मशरूम उत्पादन, मृदा और पौध पोषक तत्व विश्लेषण इकाइयाँ, मधुमक्खी पालन, ब्रायलर एवं लेयर उत्पादन, पशुपालन, पशुचिकित्सा क्लीनिक, जल कृषि, उन्नत बागवानी, फल-सब्जी उत्पादन, औषधीय पौधों की खेती, दूध , माँस, मछली उत्पादन व्यवसाय के साथ वर्गीकरण, प्रसंस्करण, मूल्य सम्वर्द्धन जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।
3. फार्मर फसर््ट: एक हजार कृषक परिवारों का चयन होगा। वैज्ञानिक उनके परिवारों के साथ मिलकर उनके खेतों में काम करेंगें। प्रयोगशाला से खेत तक (कैब टू लैण्ड) की परिकल्पना के अन्तर्गत यह योजना बनी है।
4. मेरा गाँव मेरा गौरव: देश के कृषि वैज्ञानिकों की टीम बनेगी। प्रत्येक टीम 4 से 5 गाँवों में जाएगी।
भारत सरकार के द्वारा वर्ष 2002 में एक योजना ‘‘एग्री क्लीनिक एवं एग्री विजिनेस’’ प्रारम्भ की गई है जिसके अन्तर्गत अबतक 40,000 से अधिक कृषि स्नातकों को दो माह का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
युवाओं एवं लधु एवं सीमान्त कृषकों के लिए बागवानी फसलें वरदान स्वरूप हैं जो बहु आयामी हैं और इनमें विविध प्रकार के फल, शाक-सब्जियाँ, जड़ एवं कन्दीय फसलें, पुष्प, मसाले, औषधीय एवं सगंध पौधे, मशरूम, पान, मधुमक्खी पालन तथा खाद्य प्रसंस्करण, फल सरंक्षण जैसे विविध क्षेत्र हैं जो प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक आय के सृजन, पर्यावरण हितैषी उत्पादक प्रक्रियाओं के साथ-साथ बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सक्षम हैं।
एग्री बिजिनेस एवं सेवाओं के अन्तर्गत आने वाले व्यवसाय हैं; आटा चक्की/मिल, दाल मिल, तेल मिल, चावल हलर/मिल, बीज प्रसंस्करण, कृषि रक्षा सेवायें (कीट नियन्त्रण, चूहा नियन्त्रण, दीमक नियन्त्रण, दवा छिड़काव/बुरकाव), आसवन (मेन्था, औषधीय/सगंध पौधों का), मूगंफली का छिलका उतारना (डिकार्टिकेशन)।
कृषि के अन्तर्गत आने वाले कार्य ट्रैक्टर से जुताई, राइस ट्रान्स्प्लान्टर, सीड-कम-फर्टी ड्रिल, हारवेस्टर/ कम्बाइन द्वारा कटाई, थ्रेसर द्वारा मड़ाई, कृषि उत्पादों  की ढुलाई, भण्डारण, शीत गृह, रेफ्रेजरेटेड वैन, पैरा एग्रो, पैरा वेट के कार्य, ऋण दिलाना, बीमा कराना, ग्राम व्यापारी, थोक व्यापारी, आढ़तियों के कार्य, वे-ब्रिज, बीज, खाद, उर्वरक, कृषि रक्षा रसायन, ड्रिप इरीगेशन, फव्वारा सिंचाई, सोलर पम्प आदि की बिक्री व सर्विस, मृृदा परीक्षण का कार्य।
हमारे देश में पूर्ण ग्रामीण विकास वित्तीय समावेशन  के बिना सम्भव नहीं है, क्योंकि वित्तीय समावेशन पूर्ण ग्रामीण विकास हेतु जरूरी ऋण, बचत, बीमा, पेंशन इत्यादि वित्तीय सेवाओं एवं उम्पादों की कमी दूर करता है।
वित्तीय समावेशन का एक अन्य घटक किसान केडिट कार्ड भी है। इसके अन्तर्गत अल्पकालीन ऋण सुविधा जनक तरीके से अत्यल्प कम ब्याज दरों पर उपलब्ध कराया जाता है। इसके अतिरिक्त जोखिमों के विकल्प के रूप में फसल बीमा योजना को भी लागू किया गया है।
नाबार्ड के द्वारा कृषि एवं अनुषांगिक गतिविधियों के लिए ऋण उपलब्घ कराया जाता है यथा लघु सिंचाई, कृषि मशीनरी, भूमि विकास, मुर्गी पालन, सूकर पालन, बागवानी, वानिकी, मत्स्य पालन, भण्डारण, मण्डी  स्थल, बायोगैस, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, रेशम पालन, मधुमक्खी पालन, पशुपालन, बैलगाड़ी, कृषि प्रसंस्करण, कृषि सेवा केन्द्र इत्यादि।
किसान के असंगठित होने के कारण उसकी उपज का विक्रय मूल्य या तो सरकार तय करती है अथवा खरीदार-व्यापारी जबकि गैर कृषि उपज का मूल्य उसका उत्पादक तय करता है और मंहगाई के साथ यह भाव बढ़ते रहते है जबकि कृषि पदार्थों के बाजार भावों में अनिश्चितता रहती है। फल-सब्जियों एवं नकदी फसलों का उत्पादन अधिक होने पर इनके बाजार भाव इतने नीचे गिर जाते हैं कि इनसे लागत भी नहीं निकल पाती है।
ज्ञातव्य है कि कृषि उपज के व्यापार में उत्पादक-विक्रेता की तुलना में व्यापारी/बिचैलिए अधिक संगठित हैं और इनका तन्त्र दिन प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है जिससे यह बाजार भाव एवं आपूर्ति को प्रभावित करने में सक्षम एवं समर्थ हैं जिससे एक ओर किसान को उचित मूल्य नहीं मिल पाता है और दूसरी ओर उपभोक्ता को अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है विशेष रूप में शीघ्र नष्ट होने वाले सब्जी-फलों में जैसा कि विगत में प्याज, आलू, टमाटर आदि के सम्बन्ध में हम देख चुके हैं और दालों में देख रहे हैं।
राज्य सरकारों के द्वारा लागू किए जा रहे कृषि उत्पादन मण्डी अधिनियम (ए॰पी॰एम॰सी॰) भी अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। कृषि उत्पादों की जमाखोरी, कालाबाजारी एवं मुनाफाखोरी रोकने में सक्षम आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 ठण्डे बस्ते में पड़ा हुआ है इसके बावजूद सरकार इसे और सख्त बनाने जा रही है। भारत सरकार के द्वारा मूल्य समर्थन योजना के अन्तर्गत 24 कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम॰एस॰पी॰) घोषित किए जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार आधे से अधिक किसानों को इस योजना की जानकारी नहीं है। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि गैर कृषि क्षेत्रों में वेतन-भत्ते मंहगाई से जुड़े होते हैं किन्तु कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य तथाकथित अविश्वसनीय उत्पादन लागत के आधार पर ‘न्यूनतम’ घोषित किए जाते हैं। समर्थन मूल्य निर्धारित करने के लिए क्या किसान के एक किलां गेहूँ या चावल की उपभोक्ता वस्तुओं की क्रय शक्ति जो विगत वर्षों में रही है, उसे संरक्षित नही किया जाना चाहिए?
अतएव, यह आवश्यक है कि कृषक-विक्रेताओं एवं उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित करने हेतु विपणन की दोष रहित व्यवस्था सुनिश्चित की जाय।
हर्ष का विषय है कि केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि बाजार (एन॰ए॰एम॰) विकसित करने का निर्णय लिया है जिसका लक्ष्य है कि पूरा देश एक मण्डी क्षेत्र बने, जिसमें किसी भी स्थान से दूसरे स्थान के लिए कृषि उत्पाद की आवाजाही तथा विपणन आसानी से व कम समय में हो। इसका सीधा लाभ कृषकों, व्यापारियों तथा ग्राहकों को मिलेगा। इस प्रक्रिया में स्थानीय कृषि उपज मण्डी को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा क्योंकि पूरा व्यापार उसी के माध्यम से होगा। किसान और व्यापारी देश भर में पारदर्शी तरीके से कृषि पदार्थाें की खरीद/बिक्री कर सकें, इसके लिए 585 विनियमित मण्डियों को ‘‘आम इलेक्ट्रानिक प्लेट फार्म’’ के साथ एकीकृत किया जाएगा। किसानों को नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराने के लिए एक किसान टीवी चैनल भी शुरू किया जा रहा है।
अर्थशास्त्रियों का मत है कि यदि भारत को 8  प्रतिशत की दर से आगे बढ़ाना है तो कृषि क्षेत्र में कम से कम 4 प्रतिशत की बढ़त आवश्यक है। चालू वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में कृषि क्षेत्र की विकास दर 1.9 प्रतिशत रही है। अतएव, कृषि की आय को बढ़ाने के लिए सरकार समेत सभी हितग्राहियों को तात्कालिक प्रभाव से अपने से सम्बन्धित कार्यवाहियों को करना पड़ेगा। साथ ही विगत 68 वर्षों में की गई उपेक्षाओं की पुनरावृत्ति रोकनी होगी व देश को कृषि प्रधान देश के स्थान पर ‘कृषक प्रधान’ देश निर्मित करना होगा व इसके गाँवों का विकास कर इनको विकासशील भारत के स्थान पर विकसित भारत के विकसित गाँवों में बदलना होगा।
वर्णित परिस्थितियों में देश की निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या हेतु खाद्यानों की सतत आपूर्ति के लिए उपलब्ध संसाधनों, वैज्ञानिक तकनीकों का कुशलता पूर्वक उपयोग करना आवश्यक है ताकि जल की प्रत्येक बूँद, मृदा का प्रति इकाई क्षेत्र, उर्वरक/खाद के प्रत्येक कण तथा कृषक परिवार के समस्त सदस्यों के श्रम के प्रत्येक क्षण से अधिकाधिक मात्रा एवं गुणवत्ता का उत्पादन प्राप्त हो सके ताकि इससे देशवासियों का पेट भरे और किसानों की जेब भरे।