Tuesday, December 29, 2015

सुभाष चन्द्र बोस का बहुआयामी व्यक्तित्च - संकलित

नेता जी सुभास चन्द्र बोस स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श और प्रेरणास्रोत मानते थे। युवाओ के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानन्द जिनके जन्मदिन (12 जनवरी) को सम्पूर्ण देश ‘राष्ट्रीय युवा दिवस‘ के रूप मे मनाता है। स्वामी जी का जीवन और चरित्र आज भी युवाओं का मार्ग दर्शन करता है। स्वामी जी का शक्तिशाली एवं प्रेरणा दाई विचार सुप्त एव शिथिल मानव मस्तिष्क मे भी ज्वलंत ऊर्जा के संचार से ओत-प्रोत कराता है। असहाय एव आत्मविश्वास विहीन मन को भी स्वामी जी के विचारों से शक्ति का प्रवाह होता है और व्यक्ति अपने स्वरूप तथा असीमित क्षमता से अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर होता है। नेता जी ने लिखा है की जब मैं 15 साल की अवस्था में था तो विवेकानन्द जी के साहित्य और विचारों से परिचित हुआ। स्वतन्त्रता संग्राम के समय जब में हताश एवं निराश होता था तब स्वामी जी का फोटो अपने सामने रखता था उसको एकटक देखता था और मुझमें एक नवीन ऊर्जा का संचार होता फिर में दूने उत्साह के साथ अपनी लड़ाई जारी रखता। 
स्वामी विवेकानन्द ने सत्य ही कहा था, ’स्वाधीनता आत्मा का संगीत है’। इससे प्रतीत होता है कि स्वामी जी के विचारों का प्रभाव नेता जी के मन मस्तिष्क पर था। नेता जी को तो स्वामी जी के इस विचार ने कि ‘मानव सेवा ही माधव सेवा है’ के आह्वान पर अपने गृह नगर कटक मे बाढ़ पीड़ितो के लिए 18 वर्ष कि आयु में मित्रों के साथ सेवा कार्य किया। स्वामी जी की उद्घोषणा थी की ‘मैं उस प्रभु का सेवक हूँ जिसको मूर्ख लोग मनुष्य कहते हैं। यह सेवा एवं समरसता का मूल मंत्र है। यदि इस  भाव और समर्पण से व्यक्ति समाज मैं कार्य करे तो आपसी वैमनष्यता एवं कटुता के साथ गरीबी, अशिक्षा, कुसंस्कर जैसी समस्याओ से भी समाज को मुक्ति मिल जाएगी। स्वामी जी के इन सिद्धांतों को मानते हुये नेता जी का झुकाव सेवा कार्य की तरफ हुआ। 3 मई, 1928 को पूना के अपने व्याख्यान मैं नेता जी ने कहा कि ‘स्वतन्त्रता मेरे लिए एक अंतिम लक्ष्य है, एक असीम सम्पदा है। मनुष्य की आत्मा के लिए स्वाधीनता अपरिहार्य है।’ नेता जी अपने भाषणों मे युवाओं को हमेशा स्वामी जी का साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। स्वामी जी के त्याग एवं चरित्र निर्माण के सन्देश को जीवन मे धारण करने के लिए कहते थे। नेता जी का मानना था कि स्वामी जी की शिक्षाओं को आत्मसात् किया जाय तो देशवासी अभूतपूर्व आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आत्मप्रतिष्ठा का बोध कर सकेंगे। 6 मई, 1932 को मराठा पत्र के श्री ए॰आर॰ भट्ट को लिखे पत्र में नेता जी ने लिखा है कि ‘स्वामी जी के बारे मैं लिखते हुए मैं  आत्मविभोर हुए बिना नहीं रह पाता। इस जगत में उनके जैसा व्यक्तित्व दुर्लभ है’। स्वामी जी की शिष्या  सिस्टर निवेदिता ने अपनी पुस्तक ‘मेरे गुरुदेव जैसा मैंने देखा’ में लिखा है कि ‘उनकी आराधना की देवी उनकी मातृभूमि थी’। नेता जी ने भी अपना सम्पूर्ण जीवन ही मातृभूमि के लिए न्योछावर कर दिया। आज भी हमारे देश के लक्षावधि युवा इन दोनों महापुरुषों से प्रेरणा लेते हंै, जो आज की आवश्यकता है।