भारतीय नौ जवानो में प्रतिभा, उद्यमिता और कौशल की कमी नहीं है। चाहें प्रतिष्ठित उद्योगों को चलाना हो या नए उद्यम शुरू करने हों, भारतीय हर जगह अब्बल हैं। भारतीयों ने सिलिकान वैली में तो असीम उँचाइयां हासिल की हैं, उनमें से गूगल के नए सीईओ बने सुन्दर पिच्चई, गूगल के ही सीनियर वाइस प्रेसीडेन्ट रूड़की के पूर्व छात्र अमिति सिंघल, माक्रोसाफट के सीईओ सत्या नडेला सहित तमाम भारतीय नाम शिखर पर है। ऐसे तमाम भारतीयों पर गर्व किया जा सकता है। यद्यपि सिलिकान वैली में भारतीय प्रवासी या भारतीय मूल की भागीदारी केवल 6 प्रतिशत है, लेकिन नए उद्यमों के प्रारम्भ में भारतीय 15 प्रतिशत हैं। अमेरिका में प्रवासियों द्वारा प्रारम्भ किए गये उद्यमों में से 32.4 प्रतिशत भारतीयों के हैं।
यहीं पर यह भी विचारणीय है, कि जब भारतीय युवा विदेशों के उद्यमों में शिखर पर पहुँच सकते हैं, तो भारत में क्यों नहीं? इसका उत्तर हमें खोजना होगा। हमारे देश के पिच्चई और नड़ेला जैसे नौ जवान यह सिद्ध करते हैं कि यदि हम अपने देश में उनके विकास की राह के रोड़े हटा सकें तो, हम दुनियाँ में अब्बल हो सकते हैं।
इसके साथ ही हमारे देश में युवाओं की अपार शक्ति है, पर वह खाली हाथ निराशा से जूझ रहे हैं। हमें इस ओर भी ध्यान देना होगा और युवाओं के विकास के अनुकूल व्यवस्था निर्माण के साथ ही उनमें कौशल विकास के लिए उनके मानस को भी बदलना होगा।
एक युवा प्रमोटर का कहना है कि बहुत से लोग कौशल विकास के लिए औपचारिक शिक्षा को ही साधन मानते हैं, पर इसका एक तरीका अवैतनिक कार्य भी है। एक आई॰टी॰ प्रोफेशनल का रूझान प्रबन्धन की ओर देख कर मैने उन्हें चैरिअी कमेटी से जुड़ने की सलाह दी, ताकि उनके स्ट्रैटजिक और आपरेशनल मैनेजमेन्ट का दायरा बढ़ सके। बाद में उनका यही अनुभव उन्हें टेंकनिकल से मैनेजमेन्ट कैरियर में ले जाने में सहायक सिद्ध हुआ।
कितने ही ऐसे युवाओं से आपका मिलना होता होगा, जो अफसोस जाहिर करते मिलेंगे कि पढ़ाई के दौरान ही मैने यह क्यों नहीं सोचा या यह विषय क्यों नहीं लिया। ऐसा उसी बक्त कर लिया होता तो अपना कैरियर आज मनमुताविक डिजाइन कर पाता?
अतः जो युवा अभी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, उनको सोचने का नहीं, करने का अवसर है। इसके लिए आवश्यक है कि औपचारिक पढ़ाई के साथ अपने आप में कोई न कोई स्किल अवश्य जोड़ें।
इसके अतिरिक्त एक सफल युवक के लिए लोगों से व्यवहार, कठिन परिस्थितियों से निकलने की कला, सकारात्मक सोच, नेतृत्व क्षमता, लक्ष्य के प्रति समर्पण, कम्युनिकेशन स्किल, पर्सनालिटी लुक, भाषा पर अच्छी पकड़, आत्मविश्वास आदि गुणों का अपने आप में विकसित करना भी आवश्यक है।
इसके साथ ही अनेक बार आपको अपनी औपचारिक शिक्षा के विपरीत भी कार्य करना या चुनना पड़ता है। वहाँ पर आपकी कार्यकुशलाता व धैर्य की परीक्षा होती है। आपने ‘‘बेलकम टू सुजानपुर’’ फिल्म देखी होगी? इस फिल्म के नायक को जब अपने मनमुताविक काम नहीं मिलता, तो वह गांव के लोगों की चिट्ठियाँ लिखने लगता है, लेकिन अपने आप को यहीं तक सीमित नहीं रखता। वह गांव में हो रहे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक हर तरह के बदलाव पर नजर रखता है और बदले बक्त तथा हालात के हिसाब से खुद को अपडेट कर अपनी काबिलियात निखारता जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि वह पत्र लेखक से प्रसिद्ध साहित्यिक लेखक बन जाता है।
आप में कुशलता समय, स्थान और परिस्थिति के अनुकूल चयन की विकसित होनी चाहिए, जब आप कभी भी यह कहने की स्थिति में होंगे, मेरे पास कोई काम नहीं है और अनेक युवाओं के लिए प्रेरणा के दीपक बन सकेंगे, जिसकी आज नितान्त आवश्यकता है।





