Tuesday, December 29, 2015

विकास की भारतीय अनुदृष्टि एवं युवा - प्रो॰ ए॰पी॰ तिवारी

पिछले लगभग साढे़ तीन दशक से भारत विश्व की सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। 1980 के दशक में हमारी विकास दर लगभग 5 प्रतिशत रही। 90 के दशक में 6.3 प्रतिशत व इस शताब्दी के पहले दशक में हमारी विकास दर लगभग 7.2 प्रतिशत रही। वैश्विक मंदी के दौर में भी हमारी व चीन की विकास दर ने पूरे विश्व को मंदी की गर्त में जाने से बचाये रखा।
हम 2010 में ही पी0पी0पी0 (क्रय क्षमता संतुलन) मूल्यंाकन में विश्व की चैथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके थे। 1996 में हमारा जी0डी0पी 0.4 ट्रिलियन डालर थी जो अब लगभग 2 ट्रिलियन डालर हो रही है। विकास की कसौटी पर आज सारा विश्व भारत का लोहा मान रहा है। आने वाले समय में भी माना जा रहा है कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी व प्रभावशाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगी। 2030 तक हमारी जी0डी0पी0 बढ़कर 13 ट्रिलियन हो जाने की संभावना हैं माना जा रहा है कि हम 2030 तक अमेरिका व चीन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगें।
दूसरे देशों की तुलना में भारत युवाओं का देश है। आज हमारी औसत आयु लगभग 25 वर्ष है। जहाँ चीन 34, अमेरिका 37 व जापान की औसत आयु लगभग 45 वर्ष है। युवा भारत इस देश की सबसे बड़ी शक्ति व पूंजी हैं और यही देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है। 1970 के दशक में जब जी0डी0पी0 में 1 प्रतिशत की बढोत्तरी होती थी तो रोजगार सृजन भी 0.4 प्रतिशत बढ़ जाता था। इस शताब्दी का पहला दशक आते-आते जी0डी0पी0 में 1 प्रतिशत बढोत्तरी से मात्र 0.1 प्रतिशत की रोजगार सृजन में बढोत्तरी होती है। दूसरे शब्दों में यह खाली बक्सों की कहानी है, जहाँ देश रोजगार रहित विकास की तरफ बढ गया है।
यहाँ यह समझना अति आवश्यक है कि भारत को डेमोग्राफिक डिविडण्ड (demographic dividend) का अत्यन्त लाभ मिला है। भारत में 60 प्रतिशत से अधिक व 15 वर्ष से कम आयु के लोगों की संख्या तुलनात्मक तौर पर कम हैं जबकि ऐसे कामकाजी लोग जिनकी आयु 15 से 60 वर्ष के बीच है उनकी तुलनात्मक संख्या कहीं अधिक है। दूसरे शब्दों में ऐसे लोग जो उपयोगी काम कर सकते हैं उनकी संख्या अधिक हैं व ऐसे लोग जो कामकाजी लोगों पर अपने जीवीकोपार्जन के लिए निर्भर हैं उनकी संख्या बहुत कम है। ऐसी स्थिति में उपभोग कम व बचत अधिक हो जाती है। यही बचत निवेश में परिवर्तित होकर विकास का आधार बनती है। पिछले कई दशकों से भारत अपनी आय का लगभग 25 प्रतिशत बचत कर निवेश करता रहा है और इसी निवेश ने भारत को प्रगति के मार्ग पर बनाये रखा। 2008 आते-आते भारत ने जी0डी0पी0 के अनुपात में निवेष 37 प्रतिशत हो गया। जिसमें से मात्र 1.5 प्रतिशत विदेशी पूंजी का योगदान था। बाकी लगभग 35.5 प्रतिशत निवेश को हमारी अपनी बचत के द्वारा वित्त पोषित किया गया। यही भारत की ताकत हैं जिसने भारत को न सिर्फ प्रगति के मार्ग पर बनाये रखा बल्कि वैश्विक उथल पुथल से भी बचाये रखा है।
यह चिंता का विषय है कि सवा सौ करोड़ का देश जिसकी आबादी का बड़ा हिस्सा युवा शक्ति से भरपूर है, वह देश रोजगार रहित विकास की ओर अग्रसर हो गया हैं ऐसा विकास अधिक समय तक कायम नही रह सकता और न ही यह युवा शक्ति की अपेक्षाओं को पोषित कर सकता है। निश्चित तौर पर हमें अपने विकास के माॅडल पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
विश्वविद्यालयों में ऐसे तमाम छात्र दिखायी देते हैं जो होनहार होने के बावजूद उपयुक्त रोजगार नहीं पाते। वही दूसरी ओर उद्योग जगत में लगातार यह समस्या बनी हुयी है कि तमाम दक्षतायें जिसकी आवश्यकता विभिन्न उद्योगों को है उस दक्षता के लोग उद्योग को उपलब्ध नहीं हो पाते। अजब विडम्बना है कि शिक्षा जगत से निकलने वाले युवाओं के पास रोजगार नही हैं। वही उद्योगों को उचित क्षमता वाली जनशक्ति उपलब्ध नहीं है। स्पष्ट है कि जन शक्ति नियोजन (man power planning)  का न होना भारत के नियोजित विकास की एक बड़ी समस्या है। जिस पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। कहना होगा कि यह शायद नियोजनकर्ताओं की चूक नहीं थी बल्कि शायद यह उनकी सोच की समस्या थी। यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर लगातार हमारे नियोजन के उद्देश्यों में विकास ने प्रमुख स्थान ग्रहण किया है। जबकि रोजगार एक उद्देश्य के रूप में शामिल तो किया गया लेकिन उसे कभी भी न तो प्रमुखता का स्थान दिया गया और न ही सही मायनों में हमारे नियोजन के मुख्य दायरे (maine frame)  का हिस्सा बन सका। यही कारण है कि लगातार विकास की बेदी पर रोजगार की बलि दी गई।
यह संयोग नहीं है कि 1970 से 21वीं शताब्दी के पहले दशक आने तक इस देश के रोजगार सृजन की क्षमता 0.4 प्रतिशत से घटकर 0.1 प्रतिशत रही गयी। आज यह समझना मुश्किल है कि हमने रोजगार परक शिक्षा को उचित महत्व क्यों नहीं दिया। हर वर्ष लाखों इतिहास व समाजशास्त्र जैसे दसियों विषयों के लाखों लाख स्नातक व परास्नातक होकर निकलते हैं। क्या हमने कभी यह समझने की कोशिश की कि देश को प्रतिवर्ष कई लाख इतिहासकारों की या कई लाख राजनीति शास्त्रियों या ऐसे ही दूसरे विशेषज्ञों की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा को हमने माॅस एजूकेशन (mass education) बना दिया और पूरी शिक्षा प्रणाली को देश की जनशक्ति आवश्यकताओं से पूर्ण रूप से विमुक्त कर दिया। यह कोई संयोग नही है कि उ0प्र0 सचिवालय में लगभग 350 चपरासी के पदों के लिए लगभग 23 लाख आवेदन आये। जिसमें आवेदकों में बड़ी संख्या में पी0एच0डी0, एम0टेक0, एम0एस0सी0 जैसे आवेदक शामिल हैं।
आने वाले समय में आंकलन सुझाते हैं कि हेल्थ केयर (health care) पर होने वाला खर्च सन् 2005 की तुलना में 20 वर्षों में दोगुने से ज्यादा हो जायेगा। शिक्षा पर लगभग दोगुना हो जायेगा। यातायात पर भी दोगुना हो जायेगा। इसी तरह टेक्सटाइल (textile) में चमड़ा उद्योग में, फूड प्रोसेसिंग (food processing)  में आने वाले समय में अत्यन्त रोजगार की संभावनाये सृजित होंगी और इन सभी क्षेत्रों में विकास को बनाये रखने के लिये व बढ़ाये रखने के लिए हमें तमाम तरह की दक्षताओं की आवश्यकता होगी। यदि हम भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप जनशक्ति सृृजित करेगें तो निश्चित रूप से इस देश की रोजगार की व विकास दोनों की समस्या से देश को मुक्ति दिला ऐसे विकास की संभावना सृजित कर पायेगें जो देश की युवा शक्तियों के अनुरूप होंगी व जो भारत को सही मायने में एक वैश्विक शक्ति के रूप में खड़ा करेगा।
भारत युवा देश हैं। युवा शक्ति को सींच कर ही ये देश आगे बढ़ेगा। हमारे विकास के लिए डेमोग्राफिक डिविडण्ड (demographic dividend) को बनाये रखना अत्यंत आवश्यक है और इस डेमोग्राफिक डिविडण्ड (demographic dividend) को बरकरार रखने के लिए इस देश की नियोजन व्यवस्था में और विकास रणनीति में अमूल चूल परिवर्तन करने होंगे। जहाँ रोजगार योजना हमारे नियोजन व विकास का अभिन्न अंग या मुख्य दायरे ;उंपदम तिंउमद्ध का हिस्सा होगी। यदि इस देश को विकास पथ पर बनाये रखना है और इसकी पूर्ण क्षमता को उजागर करते हुये देश को स्वर्णिम युग की तरफ ले जाना है तो आवश्यक होगा कि देश जनशक्ति नियोजन(man power planning) पर विशेष ध्यान दें।