व्यक्ति के जीवन की वह अवस्था जब वह शारीरिक दृष्टि से सर्वाधिक सबल, मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ तथा आत्मिक रूप से प्रखर होता है, वह अवस्था होती है- युवावस्था। युवावस्था में व्यक्ति के जीवन में उमंग, ऊर्जा तथा उत्साह होता है, यदि इस अवस्था में व्यक्ति को सही दिशा मिल जाये तो उसके जीवन का स्वरूप ही बदल जाता है। आज हमारे देश में 18 से 40 वर्ष की वय के लगभग 65-70 प्रतिशत लोग हैं, किसी भी राष्ट्र के लिए यह सबसे बड़ी धरोहर, सबसे बड़ी पँूजी सिद्ध हो सकते हंै। हमारे देश में लगभग 65-70 करोड़ युवाशक्ति है, यह वह शक्ति है जो किसी भी राष्ट्र को ऊँचा उठा सकती है और पतनोन्मुख भी बना सकती है। इस समय युवाओं कीे सबसे बड़ी आवश्यकता होती है- जीवन की सही दिशाधारा की। यदि युवाओं को सही दिशाधारा मिले तो वह देश को फिर से सोने की चिड़िया, चक्रवर्ती सम्राट और जगद्गुरु बना सकते हैं।
युवाओं को सही दिशा देने के लिए हमें मौलिक रूप से चार बातों पर ध्यान देना होगा, युवाओं को शिक्षा, युवाओं का स्वास्थ्य, युवाओं का रोजगार तथा युवाओं का चरित्र निर्माण। युवाओं की शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल, इंस्टीट्यूट, विश्वविद्यालयों का निर्माण, इनके कोर्सेस के स्तर को सुधारना जरूरी है। इसके साथ-साथ इनकी शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए व्यावहारिक ज्ञान का समावेश करने की भी जरूरत है। वास्तव में शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान खोज सकंे। शिक्षा ही किसी भी समाज राष्ट्र को ऊँचा उठाती है व आगे बढ़ाती है। शिक्षा ही वह आधार है जो व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण, राष्ट्र निर्माण तथा विश्व का नवनिर्माण कर सकती है। इस हेतु ऐसे कोर्स बनाए जायें तो समय की पुकार तथा विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान कर सकें। आज की शिक्षा में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चारों तत्वों का समावेश बहुत जरूरी है।
युवाओं के स्वास्थ्य के लिए पोषण युक्त आहार की बेहद जरूरत तो है, साथ ही युवाओं से खेलकूद, योग, व्यायाम तथा स्वास्थ्य सधार के विभिन्न कार्यक्रमों को जोड़ने की बेहद जरूरत है। ‘टाॅक्सिस से टाॅनिक की ओर’’, ‘‘सफाई से सच्चाई की ओर’’ युवाओं को प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाये। युवाओं को पोषण युक्त जैविक फल, अन्न, शाक मुहैय्या कराया जायेे तथा गौपालन ,द्वारा अमृत तुल्य गौ द्रव्यों का सेवन कराया जाये तो इनके स्वास्थ्य की समस्याएँ स्वमेव ही हल हो जायेंगी। तीसरी बात आती है युवाओं के रोजगार की। युवाओं को रोजगार देने के लिए हमारे पास चार कार्यक्रम है।
(1) ग्राम्य विकास से युवाओं को जोड़ा जाए। भारत के 60 लाख युवाओं को 6 लाख गांव के विकास में लगाया जाये तो शिक्षित, स्वावलम्बी व स्वस्थ हर गंाव में ‘‘मेरा गाँव मेरा तीर्थ’’ ‘‘मेरा गाँव मेरा विश्व’’ की भावना के साथ काम करें।
(2) ग्रामवासियों को गौपालन, जैविक खेती सिखायेंगे, पुरुषों को ‘बोने से बिकने’ तक की सारी कृषि योजना का क्रमबद्ध प्रशिक्षण दें।
(3) महिलाओं को ‘‘बुनने से बिकने तक’’ के कुटीर उद्योगों का विधिवत मार्गदर्शन व सारी व्यवस्था करें तो देखते-देखते रोजगार की समस्याओं का समाधान निकल आयेगा।
इसके लिए बेहतर होगा कि युवाओं को जैविक, गौपालन, कुटीर उद्योगों का निःशुल्क प्रशिक्षण दिया जाये तथा इनको भारत के सात लाख ग्रामों के ग्राम्य विकास कार्याें में समायोजित किया जाये तो आर्थिक विकास की धारा बह निकलेगी।
(4) युवाओें को चैथी जरुरत है चरित्र निर्माण की। युवाओं का चरित्र तो राष्ट्र की धरोहर है। इसके लिए युवाओं को आध्यात्मिक प्रशिक्षण देना होगा ताकि युवा नशा, अश्लीलता जैसी बुराइयों से दूर रह सकेें। इन्हें पत्नी व्रत व पति व्रत जैसी नैतिक मान्यताओं का लाभ भी बताया जाये। इन्हें हमारी संस्कृति, हमारा धर्म, हमारे नैतिक आधार के वैज्ञानिक पहलुओं का महत्व समझाया व बताया जाये। नशे आदि बुराईयों की हानियों से भी सावधान व सचेत किया जाये। मांसाहार, दहेज जैसे कुप्रथाओं की वास्तविकता बताई जाए। इन सब बातों का समावेश करते हुए हमने युवाओं के एक संगठन का सूत्रपात किया है जो युवाओं का, युवाओं के लिए युवाओं के द्वारा संचालित संगठन है। जिसका नाम है - परमार्थ युवा परिषद। इसमें इन सभी कार्यक्रमों का ध्यान दिया गया है कि युवा इन सारे कार्यक्रमों को जीवन में समावेश करके अपना तथा विश्व का कल्याण कर सकें। हमारी आपको एवं भारत वर्ष के सभी युवाओं को आत्मिक मंगलकामनाएँ, परमात्मा से प्रार्थना कि हमारे युवाओं को सही दिशा मिले जो पूरे युग की माँग व समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
- परमाध्यक्ष, परमार्थ निकेतन।





