Saturday, December 26, 2015

घाघ की दृष्टि में श्रेष्ठ किसान

अषाढ़ मास जो गँवही कीन।
ताकी खेती होवै हीन।।
उत्तम खेती जो हर गहा।
मध्यम खेती जो संग रहा।।
जो पूँछेसि हरवाहा कहाँ।
बीज बूडि़गे तिनके तहाँ।।
जब बरसै तब बाँधौ क्यारी।
बडा किसान जो हाथ कुदारी।।
जो हल जोतै खेती वाकी।
और नहीं तो जाकी ताकी।।
- डाॅ॰ रमेश प्रताप सिंह